सरकार पर वोटर कार्ड को आधार से जोड़ना अनिवार्य करने की कोशिश करने के आरोप लग रहे हैं. प्राइवेसी कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह निजता के साथ साथ चुनाव नियमों का भी उल्लंघन है.
वोटर कार्ड (मतदाता पहचान पत्र) को आधार से जोड़ने का प्रावधान दिसंबर 2021 में चुनावी कानून (संशोधन) अधिनियम, 2021, के पारित होने के बाद लाया गया था. इसके तहत स्वैच्छिक तौर पर वोटर आईडी को आधार से जोड़ने की अनुमति दी गई थी, ताकि मतदाता सूची में डाले गए नामों का सत्यापन कराया जा सके.
लेकिन निजता कार्यकर्ताओं ने दावा किया है कि सरकार ने चुपचाप नए कानून के तहत दोनों को जोड़ना अनिवार्य कर दिया है. बल्कि ऐसे दावे भी किए जा रहे हैं कि चुनाव आयोग के अधिकारी तो यहां तक कह रहे हैं कि आधार नंबर ना देने से मतदाता सूची से नाम हटा दिया जाएगा और मत डालने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
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एनजीओ इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (आईएफएफ) ने ट्विटर पर लिखा कि उसके एक कर्मचारी को उसके बूथ स्तर के अधिकारी (बीएलओ) ने संपर्क कर कहा कि वो अपना आधार नंबर दें नहीं तो उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाएगा.
उस अधिकारी ने यह भी बताया कि 16 अगस्त को जारी एक पत्र के जरिए हरियाणा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सभी बीएलओ से कहा कि वो घर घर जा कर मतदाताओं के आधार नंबर हासिल करें. उस पत्र में लिखा हुआ है कि आधार नंबर देना स्वैच्छिक है, लेकिन आयोग के अधिकारी इसे अनिवार्य बता रहे हैं.
आईएफएफ का कहना है कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि कानून जब संसद से पारित हुआ तब उसमें तो 'स्वैच्छिक आधार' का जिक्र किया गया था लेकिन बाद में विधि मंत्रालय ने जब कानून के नियम बनाए तो उनमें आधार नंबर देना अनिवार्य कर दिया गया.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह चिंता का विषय है क्योंकि मत डालने के अधिकार को आधार की जानकारी साझा करने या ना करने से नहीं जोड़ा जा सकता. आधार के बारे में तो खुद यूआईडीएआई कहती है कि वह "ना तो नागरिकता का प्रमाण है और ना निवास का."
इस संबंध में हरियाणा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बताया है कि आधार नंबर लेने का उद्देश्य मतदाताओं की जानकारी का सत्यापन है और यह पूरी तरह से स्वैच्छिक है. उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि आधार नंबर ना देने से किसी का भी नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जाएगा.
लेकिन इसे लेकर पहले भी चिंताएं जताई जा चुकी हैं. सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने कुछ ही दिनों पहले चुनाव आयोग को एक पत्र लिखकर इस विषय को उठाया था.
कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि आधार के डाटाबेस में मतदाता सूची के डेटाबेस से ज्यादा त्रुटियां पाई जाती हैं, इसलिए इन्हें जोड़ना ठीक नहीं होगा.
दूसर, डाटा सुरक्षा कानून के अभाव में नागरिकों का डेटा जमा करने वाले संस्थानों की संख्या का बढ़ना ठीक नहीं है क्योंकि डाटा की सुरक्षा की गारंटी कोई नहीं दे पाएगा और उसके दुरूपयोग का खतरा हमेशा बना रहेगा.
कहां किस उम्र में मिलता है वोट देने का अधिकार?
भारत समेत दुनिया के अधिकतर देश 18 की उम्र में वोट देने का अधिकार देते हैं. लेकिन हर जगह ऐसा नहीं है. कहीं 16 साल में ही लोगों को समझदार मान लिया जाता है, तो कहीं यह हक 25 की उम्र तक नहीं मिल पाता.
तस्वीर: Reuters/C. Pike
16 साल
दुनिया में कुल 11 ऐसे देश हैं जहां 16 साल में ही वोट देने का अधिकार मिल जाता है. ये देश हैं: ब्राजील, इक्वाडोर, ऑस्ट्रिया, क्यूबा, गनजी, आइल ऑफ मैन, जर्सी, माल्टा, निकारागुआ, स्कॉटलैंड और अर्जेंटीना.
तस्वीर: Fotolia/william87
16 साल
अर्जेंटीना में 16 से 18 साल के बीच वोट देना वैकल्पिक है. 19 साल की उम्र पूरी होने के बाद यह अनिवार्य हो जाता है. वहीं ऑस्ट्रिया में ना केवल कम उम्र में वोट देने का हक है बल्कि 31 साल की उम्र में सेबस्टियन कुर्त्स देश के चांसलर बन गए थे.
इस सूची में सात देश शामिल हैं: ग्रीस, सूडान, दक्षिण सूडान, इथियोपिया, उत्तर कोरिया, इंडोनेशिया और पूर्व तिमोर. ग्रीस ने 2016 में वोटिंग की उम्र को 18 से घटा कर 17 साल किया था.
तस्वीर: Cardy/Getty Images
17 साल
इंडोनेशिया में माना जाता है कि अगर कोई शादी करने लायक समझदार है, तो वोट देने के लिए लायक भी है. इसलिए आधिकारिक उम्र भले ही 17 हो लेकिन अगर आप शादीशुदा हैं, या तलाक हो चुका है, तो उम्र कुछ भी हो, आपके पास वोट देने का हक है.
तस्वीर: Reuters/W. Kurniawan
19 साल
इस उम्र में मताधिकार देने वाला दुनिया का एकमात्र देश था दक्षिण कोरिया. लेकिन अप्रैल 2020 में यह बदल गया. देश में पहली बार 18 साल के युवाओं ने अपना वोट दिया. दक्षिण कोरिया में इस पर लंबे समय से बहस चल रही थी.
तस्वीर: Getty Images/C. Sung-Jun
20 साल
फारस की खाड़ी में मौजूद छोटे से देश बहरीन में वोट देने की न्यूनतम उम्र 20 साल है. ऐसा ही दक्षिणी प्रशांत महासागर में स्थित नौरू में भी है. नौरू दुनिया का सबसे छोटा द्वीप राष्ट्र है जिसका क्षेत्रफल केवल 21 वर्ग किलोमीटर है.
तस्वीर: Reuters/L. Niesner
21 साल
इस सूची में कुल दस देश मौजूद हैं: मलेशिया, सिंगापुर, ओमान, कुवैत, लेबनान, कैमरून, सोलोमन द्वीप. इनके अलावा दक्षिणी प्रशांत महासागर में मौजूद छोटे छोटे द्वीप टोकेलाऊ, सामोआ और टोंगा में भी वोट देने की न्यूनतम उम्र 21 साल है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/R. Jensen
21 साल
सिंगापुर में वोटिंग की उम्र को 21 से घटा कर 18 करने पर चर्चा चलती रही है लेकिन सरकार का कहना है कि उसका ऐसा कोई इरादा नहीं है. सिंगापुर में साक्षरता दर 97 फीसदी है और सरकार का मानना है कि उच्च शिक्षा के बाद ही व्यक्ति राजनीतिक फैसले लेने में सक्षम बनता है.
संयुक्त अरब अमीरात दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां वोट देने की न्यूनतम उम्र 25 साल है. हालांकि शादी करने की उम्र लड़के और लड़कियों दोनों के लिए यहां 18 साल है.