एक नए शोध के मुताबिक अमेजन के जंगलों के अनछुए हिस्सों में भी जलवायु परिवर्तन का असर हो रहा है. पक्षियों के शरीर का आकार घट रहा है और उनके पंखों का फैलाव बढ़ रहा है.
तस्वीर: imago images/Ardea
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साइंस अड्वांसेस पत्रिका में छपे नए शोध के नतीजों में दावा किया गया है कि पिछले चार दशकों में ज्यादा गर्म और सूखे मौसम की वजह से अमेजन के जंगलों के अंदर रहने वाले पक्षियों पर यह असर पड़ रहा है. अनुमान लगाया जा रहा है कि ये बदलाव पोषण संबंधी और अन्य चुनौतियों की प्रतिक्रिया के रूप में आए होंगे.
यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि ऐसा विशेष रूप से जून से नवंबर के सूखे मौसम के दौरान हुआ होगा. इस शोध के मुख्य लेखक वितेक जिरिनेक का कहना है, "मेरे लिए सबसे बड़ी बात यह है कि यह सब दुनिया के सबसे बड़े वर्षावनों के ठीक बीच में ऐसी जगह हो रहा है जहां इंसानों का सीधा हस्तक्षेप भी नहीं है."
वजन में दो प्रतिशत की कमी
जिरिनेक इंटीग्रल इकोलॉजी रिसर्च सेंटर में इकोलॉजिस्ट हैं. अपने सहयोगियों के साथ मिलकर उन्होंने 40 सालों की अवधि में 15,000 से भी ज्यादा पक्षियों को पकड़ा, उनकी लंबाई नापी, उनका वजन लिया और उन्हें टैग किया. उन्होंने पाया कि लगभग सभी पक्षी 1980 के दशक के मुकाबले हल्के हो गए हैं.
कोलंबिया के अमेजन में उड़ता हुआ एक पक्षीतस्वीर: Juancho Torres/AA/picture alliance
अधिकांश प्रजातियों ने हर दशक में औसतन अपने शरीर के वजन का दो प्रतिशत गंवा दिया. इसका मतलब है, कोई प्रजाति जिसका वजन 1980 के दशक में 30 ग्राम रहा होगा उसका अब औसत वजन 27.6 ग्राम होगा. यह डाटा जंगल में किसी एक विशेष स्थान से नहीं लिया गया बल्कि एक बड़े इलाके से लिया गया.
इसका मतलब है कि यह लगभग हर जगह ही हो रहा है. कुल मिलाकर वैज्ञानिकों ने 77 प्रजातियों की पड़ताल की जो जंगल की ठंडी, अंधेरी जमीन से लेकर सूर्य की रौशनी में नहाए वनस्पति के मध्य भाग में रहते हैं.
ऊर्जा की चुनौतियां
इस मध्य भाग में जो पक्षी सबसे ऊपर की तरफ रहते हैं, ज्यादा उड़ते हैं और ज्यादा देर तक गर्मी का सामना करते हैं उनके वजन में और उनके पंखों के आकार में सबसे ज्यादा बदलाव आए. टीम ने अनुमान लगाया कि ऐसा ऊर्जा की चुनौतियों की वजह से हुआ होगा. उदाहरण के तौर पर फलों और कीड़ों की कमी या गर्मी की वजह से होने वाले तनाव के कारण.
अमेजन के अंदर चलती हुई एक नावतस्वीर: Florence Goisnard/AFP/Getty Images
जिरिनेक ने कहा, "जलवायु परिवर्तन की वजह से छोटे आकार फायदेमंद होगा इसकी तो अच्छी सैद्धांतिक व्याख्या है, लेकिन पंखों के बड़े होने को समझना ज्यादा मुश्किल है." उन्होंने कहा कि इसीलिए उन्होंने "विंग लोडिंग" की बात कही है. लंबे पंख और कम वजन-पंख अनुपात की वजह से उड़ान ज्यादा अच्छी रहती है.
ठीक वैसे जैसे लंबे पंखों वाले एक पतले जहाज को उड़ने के लिए कम ऊर्जा चाहिए होती है. वजन और पंखों का अनुपात अगर ज्यादा होगा तो पक्षी को उड़ते रहने के लिए पंख और तेजी से फड़फड़ाने पड़ेंगे, उसे और ऊर्जा की जरूरत होगी और वो और ज्यादा मेटाबॉलिक गर्मी पैदा करेगा.
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कम समय में बड़ा परिवर्तन
जिरिनेक ने यह भी कहा कि इस अध्ययन को यह पता करने के लिए नहीं बनाया गया था कि ये बदलाव प्राकृतिक चुनाव की वजह से होने वाले जेनेटिक बदलावों की वजह से हो रहे हैं या ये उपलब्ध संसाधनों के आधार पर विकास के अलग अलग पैटर्न के नतीजे हैं.
जून में ब्रिटेन में हुई जी7 बैठक में पक्षी बने प्रदर्शन करते जलवायु परिवर्तन ऐक्टिविस्टतस्वीर: Dylan Martinez/REUTERS
उन्होंने बताया कि ये दोनों बातें संभव हैं, "लेकिन एवल्यूशन छोटे अंतरालों में भी होता है इसके अच्छे प्रमाण उपलब्ध हैं." इस तरह के तेज एवल्यूशन का एक उदाहरण हैं अफ्रीका में हाल ही में सामने आने वाले बिना दांत के हाथी. अनुमान है कि ऐसा तस्करी की वजह से हुआ है.
इस नए अध्ययन के लेखकों का मानना है कि संभव है दुनिया में और प्रजातियां भी इस तरह के दबावों का सामना कर रही होंगी जिनका अभी तक अध्ययन नहीं किया गया है. अध्ययन के सह-लेखक और लूसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक फिलिप स्टोफर ने कहा, "इसमें कोई शक नहीं है कि यह सिर्फ चिड़ियों के साथ नहीं बल्कि हर जगह हो रहा है."
सीके/एए (एएफपी)
10 आपदाएं जो जलवायु परिवर्तन की वजह से आईं
आग हो या बाढ़, शीत लहर हो या टिड्डियों का हमला, विशेषज्ञों का कहना है कि मानव-निर्मित जलवायु परिवर्तन दुनिया के मौसम पर कहर बरपा रहा है. देखिए पिछले दो सालों में कैसी कैसी आपदाएं आईं.
तस्वीर: Ethan Swope/AP Photo/picture alliance
जंगली आग
इसी साल गर्मियों में ग्रीस में गर्मी की ऐसी लहर देखी गई जैसी पहले कभी नहीं आई. उसकी वजह से घातक जंगली आग फैल गई जिसने करीब 2,50,000 एकड़ जंगलों को जला कर राख कर दिया. अल्जीरिया और तुर्की में तो आग से करीब 80 लोग मारे गए. इटली और स्पेन में भी आग का प्रकोप देखा गया.
तस्वीर: NICOLAS ECONOMOU/REUTERS
रिकॉर्ड-तोड़ गर्मी
जून में पश्चिमी कनाडा और उत्तर पश्चिमी अमेरिका में अभूतपूर्व गर्मी देखी गई. ब्रिटिश कोलंबिया के लिट्टन शहर में पारा 49.6 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया जो कि एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड था. वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन (डब्ल्यूडब्ल्यूए) विज्ञान संघ का कहना था कि इस तरह की रिकॉर्ड-तोड़ गर्मी मानव-निर्मित जलवायु परिवर्तन के बिना "वास्तव में असंभव" थी.
तस्वीर: Jeff McIntosh/empics/picture alliance
घातक बाढ़
जुलाई में जर्मनी में भारी बारिश के बाद आई बाढ़ में 165 लोग मारे गए. स्विट्जरलैंड, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड, ऑस्ट्रिया और बेल्जियम में भी बाढ़ का प्रकोप रहा और 31 लोग मारे गए. डब्ल्यूडब्ल्यूए ने कहा कि धरती के लगातार गर्म होने की वजह से इस तरह की भीषण बारिश की संभावना बढ़ जाती है.
तस्वीर: David Young/dpa/picture alliance
चीन में तबाही
जुलाई में ही चीन में भी बाढ़ की तबाही देखी गई. केंद्रीय शहर जेनजाउ में एक साल के बराबर की बारिश बस तीन दिनों में हो जाने के बाद ऐसी बाढ़ आई कि उसमें 300 से भी ज्यादा लोग मारे गए. कई लोग तो सुरंगों और सबवे ट्रेनों में अचानक बढ़े पानी में डूब कर ही मर गए.
तस्वीर: Wang Zirui/Costfoto/picture alliance
ऑस्ट्रेलिया में भी बाढ़
मार्च में पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में भारी बारिश के बाद ऐसी बाढ़ आई जो दशकों में नहीं देखी गई थी. कई दिनों तक लगातार हुई बारिश की वजह से देश की नदियों में पानी का स्तर 30 सालों में सबसे ऊंचे स्थान पर पहुंच गया. हजारों लोगों को बाढ़ ग्रस्त इलाकों से दूर भागना पड़ा.
तस्वीर: Dan Himbrechts/VAAP/imago images
फ्रांस में शीत लहर
बसंत में फ्रांस में आई शीत लहर ने देश के लगभग एक तिहाई अंगूर के बागीचों को नष्ट कर दिया, जिनसे करीब 2.3 अरब डॉलर का नुकसान हुआ. डब्ल्यूडब्ल्यूए के मुताबिक जलवायु परिवर्तन ने इस ऐतिहासिक ठंड की संभावना को 70 प्रतिशत बढ़ा दिया.
तस्वीर: Getty Images/AFP/P. Desmazes
अमेरिका में तूफान
अगस्त में इदा तूफान ने उत्तरपूर्वी अमेरिका में भारी तबाही फैलाई. कम से कम 100 लोग मारे गए और करीब 100 अरब डॉलर का नुकसान हुआ. अमेरिका के छह सबसे ज्यादा नुकसानदायक तूफानों में से चार पिछले पांच सालों में ही आए हैं.
तस्वीर: Sean Rayford/AFP/Getty Images
टिड्डियों का हमला
जनवरी 2020 में पूर्वी अफ्रीका में अरबों टिड्डियों ने इतनी फसलें तबाह कीं कि इलाके में खाद्य संकट का खतरा पैदा हो गया. विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में टिड्डियों के जन्म के पीछे भी जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली चरम मौसम की घटनाएं ही हैं.
तस्वीर: Yasuyyoshi Chiba/AFP/Getty Images
अफ्रीका में बाढ़
अक्टूबर 2019 में भारी बारिश की वजह से सोमालिया में हजारों लोग विस्थापित हो गए, दक्षिणी सूडान में पूरे के पूरे शहर जलमग्न हो गए और केन्या, इथियोपिया और तंजानिया में बाढ़ और भूस्खलन में दर्जनों लोग मारे गए.
तस्वीर: Reuters/A. Campeanu
अमेरिका में सूखा
अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों में आए 500 साल में सबसे बुरे सूखे का प्रकोप जारी है. 'साइंस' पत्रिका में छपे एक अध्ययन के मुताबिक ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से सूख के ये हालात दशकों तक जारी रह सकते हैं. -सीके/एए (एएफपी)