करोड़ों साल से धरती पर कैसे मौजूद हैं मगरमच्छ और घड़ियाल
२३ अक्टूबर २०२६
मगरमच्छ और घड़ियाल जैसे वन्यजीवों की कई प्रजातियां लुप्त हो गईं लेकिन फिर भी इनका एक विशाल समुदाय दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पूरे शान से जी रहा है. रिसर्चरों ने इन जीवों की सफलता की एक खास वजह का पता लगाया है. इसी के दम पर दुनिया की गर्म होती जलवायु में भी यह फलते फूलते रहे. रिसर्चरों का तो कहना है कि इसी खूबी ने संभवतया इन जीवों को लगभग 6.6 करोड़ साल पहले धूमकेतू की उस टक्कर से बदली परिस्थितियों में भी बचा लिया जिसमें डायनासोर खत्म हो गए. इनका अस्तित्व बचे रहने में कुछ भूमिका इनके शारीरिक गुणों की भी है जो इन्हें एक कठोर सरीसृप बनाती हैं.
मगरमच्छों की उत्पत्ति का सिरा स्यूडोसूचिया कहा जाता है. यह पृथ्वी पर डायनासोर जैसे स्तनधारियों के उदय से लाखों साल पहले ट्रेयासिक पीरियड में हुआ था. यह पर्मियान पीरियड का आखिरी दौर था जिसमें धरती से बड़े पैमाने पर समुद्री और स्थलीय जीव लुप्त हो गए. इसके बाद ट्रेयासिक पीरियड शुरू हुआ जिसमें बहुत से स्तनधारी और सरीसृपों की उत्पत्ति हुई. डायनासोर भी इनमें से एक थे.
रिसर्चरों ने मगरमच्छों के पूरे इतिहास में उनकी भौगोलिक सीमाओं की पड़ताल की है. इसमें उत्पत्ति के दौर की एक वंशावली का इस्तेमाल कर 400 से ज्यादा जीवित और लुप्त प्रजातियों के बारे में पता लगाया है. रिसर्चरों ने 7,000 से ज्यादा जीवाश्मों के साथ ही धरती के अलग अलग हिस्सों में रह रहे वर्तमान मगरमच्छों की प्रजातियों के आंकड़े का इस्तेमाल किया. इनमें भारत के घड़ियालों से लेकर, खारे पानी के ऑस्ट्रेलियाई मगरमच्छ, फ्लोरिडा के एलिगेटर और ब्राजील के कायमान समेत कई प्रजातियां शामिल हैं.
जलवायु के हिसाब से चुना घर
उन्होंने इन सारी जानकारियों को दुनिया के 52 पैलियोक्लाइमेट रिकंस्ट्रक्शन से जोड़ा. पैलियोक्लाइमेट रिकंस्ट्रक्शन प्राचीन जलवायु की दोबारा बनाई संरचनाओं को कहते हैं. इनसे प्राचीन काल के वातावरण का पता चलता है. प्राचीन जलवायु में मगरमच्छों का जीवन कैसा था यह जानने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया. डायनासोर और दूसरे स्तनधारी कई तरह के वातावरणों में पलते रहे लेकिन रिसर्च ने दिखाया है कि मगरमच्छों ने हमेशा गर्म जलवायु को ही अपना घर बनाया.
इस बारे में एक नई रिसर्च रिपोर्ट साइंस एडवांसेज जर्नल में छपी है. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के जीवाश्मविज्ञानी अलफियो अलेसांद्रो चियारेंसा इस रिसर्च रिपोर्ट के प्रमुख लेखक हैं. उन्होंने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, "लगातार नई जलवायु के हिसाब से खुद को ढालने की बजाय मोटे तौर पर वे अनुकूल वातावरणों की तरफ चले गए, इसलिए गर्मी बढ़ने पर उन्होंने कभी ध्रुवों की तरफ कदम बढ़ाए तो ज्यादा ठंड होने पर भूमध्य रेखा की ओर."
जमीन पर रहने वाले मगरमच्छ का 50 साल पुराना जीवाश्म
मिसाल के तौर पर पृथ्वी के इतिहास में करीब 5 करोड़ साल पहले एक असाधारण गर्मी का दौर आया था. चियारेंसा का कहना है कि इस दौरान मगरमच्छों ने उत्तरी अमेरिका, यूरोप और यहां तक कि अंटार्कटिका के ऊंचे इलाकों में अपना ठिकाना बना लिया. चियारेंसा कहते हैं, "सबसे प्रबल प्रवृत्ति जो नजर आई है वह दुनिया के तापमान में बदलाव के हिसाब से अपने आवास को समेटना या फैलाना है."
तरह तरह के मगरमच्छों की प्रजातियां
वर्तमान में जो मगरमच्छ और घड़ियाल हैं वे अर्धजलीय, घात लगा कर हमला करने वाले शिकारी हैं लेकिन उनके लुप्त हो चुके रिश्तेदारों में कई प्रकार के जीव थे. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के जीवाश्मविज्ञानी और रिसर्च रिपोर्ट के सहलेखक फिलिप मैनियन का कहना है, "इकोलॉजी के हिसाब से हम जितनी भूमिकाएं सोच सकते हैं उन सब में वे दाखिल हुए थे."
डायनासोर से बहुत पुराना और शानदार शिकारी था यह जीव
ऐसे भी शिकारी मगरमच्छ हुए हैं जो पूरी तरफ धरती पर रहते थे. 9 मीटर तक की लंबाई वाले फासोलासुक्स, चपटी और छोटी थूथन वाले शाकाहारी सिमोसुक्स, मजबूत कवच वाले शाकाहारी एइटोसॉरस, घोंघा खाने वाले कुटानासाइमान, व्हेल की तरह छान कर भोजन खाने वाले मोरासुक्स और समंदर में जाने वाले मेट्रियोरिंक्स जैसे मगरमच्छ भी इसी धरती पर डायानासोर के काल में रहे हैं. इनके अलावा डाइनसुक्स जैसे अर्द्धजलीय मगरमच्छ भी हुए हैं जो 12 मीटर तक लंबे थे और वजन में टिरैनोसॉरस को टक्कर देते थे.
चियारेंसा कहते हैं, "आधुनिक क्रोकोडिलियंस (मगरमच्छों और घड़ियालों की प्रजातियां) एक असाधारण रूप से विविध प्रारंभिक जीव समूह का सिर्फ बाकी बचा हिस्सा हैं."
आसमान से आई आफत ने मिटाया जीवों को
क्रेटेशियस पीरियड के आखिर में मेक्सिको युकाटान प्रायद्वीप के तट पर चिक्सुलुब नाम की जगह से जब धूमकेतू टकराया तो पर्यावरण के लिहाज से वैश्विक प्रलय आई. धरती पर मौजूद जीवों की प्रजातियों का तीन चौथाई हिस्सा खत्म हो गया. इनमें डायनासोर भी शामिल थे. हालांकि उनके चिड़ियों वाले वंशज बच गए और मगरमच्छ भी.
मगरमच्छ क्या कभी दो पैरों पर चलते थे
चियारेंसा बताते हैं, "चिक्सुलुब इंपैक्ट की वजह से उस इलाके में आने वाली सूर्य की रोशनी नाटकीय रूप से कम हो गई, इससे एक सर्दी का प्रभाव उत्पन्न हुआ और पर्यावरण में भारी बाधा उत्पन्न हुई. जलवायु से जुड़े हमारे सिम्युलेशन बताते हैं कि इस ठंडी ने सारे जीव समूहों के लिए अनुकूल पर्यावरणीय स्थितियों पर समान असर नहीं डाला. चरम प्रभाव वाले परिदृश्यों को छोड़ अपने जिन इलाकों का परीक्षण किया उनमें ट्रॉपिकल और सबट्रॉपिकल इलाकों की स्थितियां मगरमच्छों के लिए अनुकूल बनी रहीं."
इइससे पता चलता है कि मगरमच्छों का गर्म और कम ऊंचाई वाले वातावरण से रिश्ता काफी लंबे समय से चला आ रहा है और इनकी कुछ आबादी जो जिंदा रही वह उन्हीं इलाकों में बने रहे जहां का वातावरण उनके लिए अनुकूल था. डायनासोर के लिए इन परिस्थितियों में अनुकूल आवास खत्म हो गया था.
चरम मौसम के लिहाज से खुद को ढालने की खूबी
मगरमच्छों की शारीरिक बनावट में कुछ ऐसी चीजें हैं जो पर्यावरण के लिहाज से तनावपूर्ण समय में उनकी मदद करती वे. वे कठिन परिस्थितियों में सुसुप्तावस्था में जा सकते हैं. अत्यधिक गर्मी से बचने के लिए वे ग्रीष्मनिद्रा और कड़ाके की ठंड से बचने के लिए वे शीतनिद्रा में जा सकते हैं. सूखा अगर उनकी सहनशक्ति से ज्यादा हो जाए तो वे मांद बनाकर कठोर कीचड़ में घुस जाते हैं और खुद को बचा लेते हैं. इस दौरान उनके दिल की धड़कन और सांसों की रफ्तार भी कम हो जाती है.
चियारेंसा ने बताया, "चिक्सुलुब इंपैक्ट के बाद जब सूरज की रोशनी बहुत घट गई और इलाके की प्राथमिक उत्पादकता गिर गई तो ऊर्जा खर्च करने में किफायत और सीमित भोजन पर जीवित रहने की खूबी उनके लिए बहुत फायदेमंद साबित हुई."
मगरमच्छों का खून ठंडा होता है जबकि हाल की रिसर्च से संकेत मिले हैं कि टिरैनोसॉरस समेत कुछ डायनासोर गर्म खून वाले थे. ठंडे खून वाले जीवों की बुनियादी मैटाबॉलिक जरूरतें गर्म खून वाले उसी आकार के जीवों की तुलना में काफी कम होती हैं. चियारेंसा के मुताबिक,"जब खाने की कमी हो तो इसका बड़ा फायदा मिल सकता है. मगरमच्छ ऐसी स्थिति में ज्यादा समय तक बिना भोजन के रह सकते हैं."