आरापाइमा मीठे पानी की शिकारी मछलियां हैं, दुनिया में सबसे बड़ी. उनकी कहानियां दक्षिण अमेरिका के मछुआरे पीढ़ियों से सुनते आए हैं. अमेजन की सहायक नदी रियो उकायली आरापाइमा मछलियों का घर है. इसकी दलदली झील में इन मछलियों का खूब मन लगता है. और यह पूरा माहौल लोगों की जिंदगी है. अमेजन प्रोजेक्ट में मैनेजर के तौर पर काम करने वालीं मिलाग्रोस ओबलिटास क्विरोस कहती हैं, "मैंने पहली बार जब नदी देखी तो मैं 11 साल की थी, और मैंने सोचा कि यह सागर है. जब आप देखते हैं कि आपका आसपास कितना विशाल है तो फिर आपको पता चलता है कि प्रकृति का आयाम कितना विशाल है. यही इसे मेरे लिए खास बनाता है. मैं खुद को इसका हिस्सा समझती हूं और ये अहसास मुझे सिर्फ यहीं होता है."
देखिए, सच में हैं ये जीव
नीले समुद्र के नीचे ऐसे-ऐसे जीव रहते हैं कि आप हैरत से भीग जाएंगे. मिलिए इन बेहद खूबसूरत और अद्भुत जीवों से...
तस्वीर: picture-alliance/dpaतस्वीर: picture-alliance/dpa तस्वीर: picture-alliance/Hippocampus/Bildarchiv तस्वीर: Imago/Blickwinkel तस्वीर: cc by Francesco Crippa 2.0 तस्वीर: picture-alliance/OKAPIA KG, Germany तस्वीर: picture-alliance/Arco Images यह इलाका इमीरिया कहलाता है और इसे संरक्षित क्षेत्र का दर्जा हासिल है. यहां अब आरापाइमा मछलियों के शिकार पर बैन है. लेकिन इस वजह से मछुआरों के जीवन पर असर पड़ता है. लिहाजा समाजसेवी संस्थाएं स्थानीय मछुआरों के साथ मिलकर आरापाइमा मछलियों को बचाने का रास्ता निकालना चाहती हैं, उन्हें पकड़ने पर रोक लगाए बिना. इसके लिए जरूरी है कि सब एक दूसरे पर भरोसा करें. अमेजन प्रोजेक्ट के मैनेजर एरनान फ्लोरेस मार्टिनेस कहते हैं, "स्थानीय लोगों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि वे परंपरागत रूप से आरापाइमा मछलियों पर निर्भर हैं. लेकिन अब तक वे ये काम अनौपचारिक रूप से कर रहे थे, बिना लाइसेंस के. इसलिए हमारा लक्ष्य है कि उन्हें अवैधता से बाहर निकाला जाए ताकि वे कानूनी तौर पर मछली पकड़ सकें. और वे मछली पकड़ने की योजना का पालन करें और टिकाऊ तरीके से मछली पकड़ें."
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दुनिया में करीब मछलियों के करीब 30,000 प्रकारों की पहचान हो चुकी है - जिसमें से कुछ किस्में काफी असाधारण हैं. इलेक्ट्रिक ईल के अलावा मछलियों की दुनिया के कुछ और अजूबे सदस्यों से मिलिए.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/MAXPPPइसका नाम भले ही इलेक्ट्रिक ईल हो लेकिन असल में यह मछली ईल नहीं बल्कि नाइफफिश नस्ल की है. अपने शिकार को यह 600 वोल्ट तक का बिजली का झटका दे सकती है. शोधकर्ताओं ने पाया है कि यह अपनी हाई वोल्टेज ऊर्जा का इस्तेमाल एक ट्रैकिंग डिवाइस के तौर पर भी करती है, बिल्कुल वैसे ही जैसे चमगादड़ का ईको-लोकेशन फॉर्मूला.
तस्वीर: imago/Olaf Wagnerखारे पानी में रहने वाली यह मछली अपने शिकार पकड़ने के लिए एक अनोखा तरीका अपनाती है. बैंडेड आर्चरफिश पानी की सतह पर आकर वहां से हवा में कीड़ों पर निशाना साधती है. इसके लिए वह अपने मुंह से पानी की एक फुहार हवा में फेंकती है और कीड़े उसमें फंस कर नीचे आ जाते हैं. बड़ी मछली तो करीब 3 मीटर दूर स्थित कीड़ों को भी निशाना बना लेती है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/I.Rischawy/Universität Bayreuthयह मछली खुद को बालू में धंसा लेती है और फिर किसी शिकार के अपने पास से गुजरने का इंतजार करती है. जैसे ही शिकार करीब से निकलता है वह उछल कर उसे अपना भोजन बना लेती है. इसकी आंखें और मुंह और मछलियों की तरह बगल में नहीं बल्कि सामने की ओर होते हैं. स्टार गेजर्स मछलियां जहरीली भी होती हैं.
तस्वीर: picture-alliance / OKAPIA KGजहरीली और छुपने में उस्ताद - स्टोन फिश में यह दोनों गुण हैं. ये लगती भी एक पत्थर जैसी है और इसके ऊपर शैवाल उग जाते हैं. इसको छूते ही इतने सख्त सूई जैसे कांटे चुभ जाते हैं जो कि जहर बुझे होते हैं. यह दुनिया की कुछ सबसे जहरीली मछलियों में से एक है जिससे इंसान की जान भी जा सकती है.
तस्वीर: gemeinfreiइस मछली का पेट इतना लचीला होता है कि डर लगने पर यह अपने पेट में खूब सारा पानी भर के अपना आकार काफी बड़ा कर लेती है. यह टेट्रोडोटॉक्सिन नाम का एक बेहद खतरनाक जहर पैदा करती है जिससे इंसान मर सकता है. जापान में यही पफर फिश बड़े चाव से खाई जाती हैं. जाहिर है कि इन्हें पका कर खाने योग्य बनाना भी एक कला है.
तस्वीर: picture alliance/Arco Imagesयह मछली अपने शिकार को सिर के ऊपर उगे इलिसियन नाम की संरचना से आकर्षित करती है. इसे मछली का फिशिंग रॉड भी कहा जाता है. इस रॉड के सिरे जगमगाते हैं जिससे उत्सुकतावश शिकार इनकी ओर खिंचा चला आता है और एंग्लर फिश का भोजन बन जाता है. यह मछली पूरी दुनिया में पाई जाती है यहां तक कि गहरे सागरों में भी.
तस्वीर: Flickr/Stephen Childsयह बेहद खतरनाक दिखने वाली मछली गहरे सागरों में पाई जाती है. उच्च् दबाव, अंधेरे और बहुत कम भोजन पर जीवित रहने वाली यह मछली मुश्किल वातावरण के लिए खास तौर पर ढली होती है. अगर कोई शिकार वाइपर फिश के पास से गुजरता है तो इसके बड़े मुंह और तीखे दांतों से बचने की कम ही संभावना होती है.
तस्वीर: picture-alliance/dpaइतना सुंदर, परिकथा के किरदार सा दिखने वाला दरियाई घोड़ा दुनिया की उन कुछ जीव प्रजातियों में से है जो सीधे खड़े तैरते हैं. जाहिर है ऐसे उर्ध्वाकार तैरने से इनके शरीर पर खूब गतिरोध लगता है जिसके कारण ये बहुत तेज नहीं तैर पाते. सीहॉर्स की एक और विशेषता नर के पेट की वह थैली है जिसमें वह निषेचित अंडे लेकर घूमता है और बच्चे को जन्म भी देता है.
तस्वीर: picture-alliance/ dpaइस मछली के बारे में कहा जाता है कि वह निर्णय नहीं कर पाती कि उसे पानी में रहना ज्यादा पसंद है या धरती पर. इसीलिए ये ऐसे समुद्री इलाके में रहती हैं जहां ज्वार के समय पानी हो और भाटा के समय सूखा. मेंढक जैसी एम्फीबियन प्रजाति की ही तरह यह भी अपनी त्वचा से सांस ले सकती हैं.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/MAXPPPइस हथौड़े जैसे सिर वाली शार्क से अजीब नजारा क्या होगा. रिसर्चर मानते हैं कि इसका चपटा, दोनों तरफ फैला हुआ सिर और उसके सिरों पर स्थित इसकी आंखें शार्क के दृश्य क्षेत्र को बढ़ा देती हैं. इससे वह ज्यादा बड़े क्षेत्र में देख पाता है और आसानी से शिकार भी कर पाता है.
तस्वीर: imago/imagebroker आरापाइमा, जिसे स्थानीय भाषा में पाइचे कहा जाता है, अनोखी होती हैं. वे विरले ही दिखती हैं. पहले मछुआरे यहां जिताना जी चाहे मछली पकड़ते थे. अब संरक्षित क्षेत्र में इस पर रोक है. मछुआरों को पता है कि अच्छी मछली पकड़ने के लिए उन्हें कितना वक्त चाहिए. बाजार हर दिन भरे होते हैं, पाइचे जैसे महंगी मछलियों से भी. इस मछली का सख्त मांस पेरू के भोजन में बहुत लजीज माना जाता है. लिहाजा पेरू की सरकार इस समस्या का सामना मत्स्यपालन को प्रोत्साहन देकर भी कर रही है. वह शोध में निवेश कर रही है. लोग मछलियों के बारे में जितना जानेंगे व्यावसायिक मत्स्यपालन उतना ही संभव हो सकेगा. और प्रकृति में उनके संरक्षण को संभव बनाएगा.
जब अक्टूबर से फरवरी के बीच आरापाइमा मछलियां अपने बच्चों का ख्याल रखती हैं, उस समय उसे आमतौर पर नहीं पकड़ा जाना चाहिए. इसके अलावा तभी जब वह प्रजनन के लायक हो जाए. देहाती इलाकों में, जैसे कि शिपीबो में संरक्षण के प्रयासों में बच्चों को भी साथ जोड़ा जा रहा है. मिलियाग्रोस ओबलितास क्विरोस चाहती हैं कि परंपरागत ज्ञान को बच्चों तक खेल खेल में पहुंचाया जाए. वह कहती हैं, "समस्या यह है कि जब स्थानीय लोग अपने आसपास की प्रजाति बहुलता को बहुत सामान्य मानते हैं तो वे प्रकृति के खजाने को कोई महत्व नहीं देते. लेकिन हमारा लक्ष्य लोगों को यह बताना है कि उनके यहां की प्रकृति कितनी मूल्यवान है."
तस्वीरों मेंः समंदर के राजा का शिकार
1986 में लगाई गई रोक के मुताबिक व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए व्हेलों को नहीं मारा जा सकता था. लेकिन जापान से जैसे कुछ देश इसके शिकार से बाज नहीं आ रहे थे. द हेग में यूएन की अदालत ने 31.03.2014 को इस पर रोक लगा दी.
तस्वीर: picture-alliance/ dpaनॉर्वे, आइसलैंड और जापान 1986 की रोक के बावजूद व्हेल मछलियों का शिकार कर रहे थे. जापान की दलील थी कि वो वैज्ञानिक शोध के लिए इनका शिकार कर रहे थे. लेकिन अब जापान को इस पर रोक लगानी होगी.
तस्वीर: picture-alliance/dpa20 साल तक ऑस्ट्रेलिया जापान के व्हेल प्रोग्राम को कूटनीतिक तरीके से हल करने की कोशिश कर रहे थे. फिर उन्होंने द हेग की अदालत में मुकदमा दायर किया. द हेग ने फैसला दिया कि अंटार्कटिक के आसपास समुद्र में जापान पूरी तरह शिकार रोक दे.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo1986 की रोक के बाद कई प्रजातियां बच गई लेकिन ब्लू, फिन, सेई, सदर्न राइट और स्पर्म व्हेल फिर भी खतरे में हैं और कुछ तो विलुप्त होने के कगार पर हैं. व्हेल स्तनपायी जीव होते हैं. ये 33 मीटर लंबी 190 टन भारी हो सकती हैं और धरती का सबसे बड़ा जीव हैं.
तस्वीर: DWअधिकारिक तौर पर तो जापान शोध के लिए व्हेलों का शिकार करता है लेकिन बाद में इसका मांस मछली बाजार और कई रेस्तरां में बेचा जाता है. जापान का व्हेल रिसर्च संस्थान 1986 के मोरेटिरयम के ठीक एक साल बाद बना था.
तस्वीर: Greenpeace/Kate Davisonजापान में लंबे समय से व्हेल मछली खाई जाती है. ये परंपरा दूसरे विश्व युद्ध के बाद शुरू हुई क्योंकि जनता के पास इनके अलावा खाने के लिए कुछ नहीं था. लेकिन अब जापान में मिलने वाले मांस का केवल एक फीसदी ही व्हेल से आता है.
तस्वीर: gemeinfreiजापान के फ्रीजरों में 7,000 टन व्हेल का मांस इकट्ठा हो जाता है. फिन व्हेल के लिए खरीदार नहीं मिलने पर जापान की एक कंपनी ने इसे कुत्ते के खाने में मिला दिया. हालांकि अब कंपनी ने इसे बाजार से वापिस ले लिया है.
तस्वीर: picture-alliance/dpaकई जापानी व्हेल के शिकार का समर्थन करते हैं. सरकार अपने खर्चे पर ये काम करती है. 25 साल में व्हेल के शिकार पर करीब 6 करोड़ 30 लाख यूरो की सब्सिडी दी गई.
तस्वीर: picture-alliance/ dpaआइसलैंड और नॉर्वे अभी भी व्हेल का शिकार कर रहे हैं. उन्होंने रोक के खिलाफ अपील की और वह खुद को इसके लिए प्रतिबद्ध नहीं मानते.
तस्वीर: picture-alliance / dpaरूस के चुकशी या कनाडा के इनुइट आदिवासियों को व्हेल का शिकार करने की अनुमति है, बशर्ते वो इसका व्यापार नहीं करें. व्हेल पकड़ने की परंपरा यहां सदियों पुरानी है. वे इस पर खाने, तेल और हड्डियों के लिए निर्भर हैं.
तस्वीर: picture-alliance/empicsकई देश जो पहले व्हेल का शिकार करते थे अब व्हेल की निगरानी या पर्यटकों को व्हेल के बारे में जानकारी देते हैं. जापान और नॉर्वे में भी ये परंपरा शुरू हुई है. अब कई जापानी व्हेल खाना पसंद नहीं करते.
तस्वीर: picture-alliance/Robert Harding सिर्फ आरापाइमा मछलियों के लिए ही इमीरिया का संरक्षित क्षेत्र आखिरी उम्मीद नहीं है. यहां के मछुआरों के लिए भी है. यदि वे नियमों पर चलें, तो वे जल्द ही आरापाइमा मछलियां कानूनी तौर पर पकड़ पाएंगे. और उन्हें अपने जाल की ओर खींच पाएंगे.