COP31: क्या अंतालिया में निकलेगा संकट का ठोस हल?
८ नवम्बर २०२६
तुर्की में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (COP31) की शुरुआत से पहले एक प्रमोशनल वीडियो में राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन और उनकी पत्नी एमिने को यह कहते दिखाया गया है कि कैसे इंसानी गतिविधियों की वजह से हमारी पृथ्वी पर बोझ पड़ रहा है. इस वीडियो में संगीत और स्पेशल इफेक्ट्स के साथ तुर्की को आधुनिक और पर्यावरण-सचेत देश बताया गया है. तुर्की इस सम्मेलन का आधिकारिक मेजबान है. लेकिन क्या टिकाऊ विकास और जलवायु परिवर्तन को कम करने की राह इतनी आसान होगी?
बढ़ते संकट के बीच जुट रहे दुनिया भर के प्रतिनिधि
इस साल यूरोप ने भयानक सूखा, रिकॉर्ड गर्मी और मुख्य नदियों में घटता जलस्तर देखा है. अगस्त के अंत में नेपाल और तिब्बत में चट्टान और बर्फ खिसकने से आई भीषण बाढ़ में 1,400 से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों लापता हो गए. विशेषज्ञ बताते हैं कि इन आपदाओं का सीधा संबंध ग्लोबल वॉर्मिंग से है.
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, 2015 के पेरिस समझौते में तय किए गए 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को बनाए रखना अब संभव नहीं रहा. कार्बन उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है, और कोयला, तेल व गैस जैसे जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाना एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है.
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के जलवायु विशेषज्ञ डेविड विक्टर के अनुसार, 2015 से पहले दुनिया 3 से 3.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की ओर बढ़ रही थी. मौजूदा वादों के लागू होने पर यह वृद्धि 2.6 डिग्री सेल्सियस तक सीमित हो सकती है. यह सुधार तो है, लेकिन खतरे अभी भी बरकरार हैं.
COP सम्मेलनों में हर फैसले पर सभी देशों की सर्वसम्मति जरूरी होती है. ऐसे में कोई भी एक देश बड़े प्रस्ताव को रोक सकता है. साथ ही, जारी युद्ध, व्यापारिक तनाव और आर्थिक संकट इस बार हो रही बातचीत को और मुश्किल बना रहे हैं.
बड़े गुटों के बजाय 'छोटे क्लब' ला सकते हैं बदलाव
डेविड विक्टर मानते हैं कि सभी देशों के एकमत होने का इंतजार करने से बेहतर है कि छोटे सरकारी व कॉरपोरेट गठबंधन मिलकर काम करें. एविएशन, शिपिंग या इलेक्ट्रिक वाहनों के क्षेत्र में ऐसी साझेदारियां ज्यादा असरदार साबित हो सकती हैं. इसका एक बेहतरीन उदाहरण अप्रैल में कोलंबिया में हुआ सम्मेलन, जहां 57 देशों ने जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाने की रणनीति पर गहन चर्चा की.
तुर्की और ऑस्ट्रेलिया ने इस सम्मेलन में ग्रीन इंडस्ट्रियलाइजेशन को प्रमुखता दी है. उनका मुख्य लक्ष्य 2035 तक कुल ऊर्जा खपत में बिजली की हिस्सेदारी को 20 फीसदी से बढ़ाकर 35 फीसदी करना है.
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी आईईए के मुताबिक, तेजी से इलेक्ट्रिफिकेशन करने यानी चीजों को बिजली से चलाने की कोशिश करने से ईंधन आयात करने वाले देश 2035 तक सालाना लगभग 400 बिलियन डॉलर की बड़ी बचत कर सकते हैं. जर्मनी और यूरोपीय संघ जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने के पक्ष में हैं.
हालांकि, सऊदी अरब जैसे तेल उत्पादक देश ऐसे समझौतों में दिलचस्पी नहीं रखते जो उनके बिजनेस मॉडल को कमजोर करें. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलनों में बार-बार किसी भी ऐसे अंतिम समझौते का विरोध किया है जिसमें जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने की योजनाएं शामिल हों.
यहां तक कि चीन भी इस ऐसी योजनाओं का समर्थन नहीं करता. सऊदी अरब जैसे तेल उत्पादक देश और चीन जैसी बड़ी आर्थिक ताकतें अपनी ऊर्जा नीतियों में बाहरी हस्तक्षेप का हमेशा विरोध करती आई हैं.
वादों और जरूरत के बीच बड़ा अंतर
गर्मी, सूखे और तूफानों से दुनिया भर में अरबों का नुकसान हो रहा है. 2024 के बाकू सम्मेलन में आर्थिक रूप से मजबूत देशों ने 2035 तक हर साल कम से कम 300 बिलियन डॉलर की जलवायु फंडिंग देने का वादा किया था.
हालांकि ऐसा हुआ नहीं. अमेरिका जैसे कई बड़े देशों ने अपनी विदेशी सहायता में कटौती की है. जर्मनी ने भी अपने 2025 के अंतरराष्ट्रीय जलवायु फंड को घटाकर 4,7 अरब यूरो कर दिया, जो 2024 में 6.1 अरब यूरो था.
ऑक्सफैम के विशेषज्ञ यान कोवाल्जिग का कहना है कि विकासशील देशों को मिलने वाली मदद जरूरत से बेहद कम है, जिससे अमीर देशों पर से भरोसा उठ रहा है. वहीं थिंक टैंक E3G की कोसिमा कासेल का मानना है कि अंतालिया सम्मेलन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि देश सिर्फ वादे करते हैं या पावर ग्रिड और बैटरी स्टोरेज जैसे बुनियादी ढांचे पर ठोस काम करते हैं.