लंबे समय तक ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम बेचने से इनकार करता रहा. 2014 में विरोध खत्म कर समझौता हुआ लेकिन यूरेनियम भारत नहीं आया. अब सारी बाधाएं खत्म हो गई हैं.
मेलबर्न में भारत और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने यूरेनियम की सप्लाई पर करार की संयुक्त रूप से घोषणा की तस्वीर: Hollie Adams/REUTERS
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ऑस्ट्रेलिया भारत को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम की सप्लाई शुरू करेगा. दोनों देशों के नेताओं ने गुरुवार, 9 जुलाई को इसके लिए एक प्रशासनिक करार पर दस्तखत कर दिए हैं.
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीजी और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेलबर्न में मुलाकात के बाद संयुक्त रूप से इसकी घोषणा की. हालांकि नेताओं ने तुरंत यह नहीं बताया कि ऑस्ट्रेलिया कितना यूरेनियम बेचेगा और कब?
वर्षों तक लटका रहा मामला
कई वर्षों से यह मामला लटका हुआ था क्योंकि ऑस्ट्रेलिया को डर था कि यह यूरेनियम कहीं हथियारों के लिए इस्तेमाल ना हो जाए. ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम के निर्यात के लिए 2014 में ही समझौता हो गया था.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सालाना लीडर्स समिट में हिस्सा लेने के लिए ऑस्ट्रेलिया आए हैं तस्वीर: Hollie Adams/REUTERS
ऑस्ट्रेलिया के पास यूरेनियम का दुनिया में सबसे बड़ा ज्ञात भंडार है. हालांकि उसके पास परमाणु ताकत या हथियार नहीं है. ऑस्ट्रेलिया अपना सारा यूरेनियम निर्यात कर देता है. 1.4 अरब की आबादी वाले भारत के सामने बढ़ते मध्यवर्ग की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की बड़ी चुनौती है. भारत 2047 तक 100 गीगावाट के परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाना चाहता है. इतनी बिजली लगभग 6 करोड़ घरों को पूरे साल बिजली देने के लिए पर्याप्त होगी. हालांकि इसके लिए यूरेनियम हासिल करना इतना आसान नहीं है.
भारत ने पिछले एक दशक में परमाणु बिजली पैदा करने की क्षमता दोगुनी कर ली है. हालांकि अब भी देश में पैदा होने वाली कुल बिजली का महज 3 फीसदी ही परमाणु रिएक्टरों से हासिल होता है.
भारत को क्यों नहीं मिला यूरेनियम
भारत ने न्यूक्लियर नॉन प्रोलिफरेशन ट्रीटी (एनपीटी) पर दस्तखत नहीं किए हैं. इस ट्रीटी में सिर्फ अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस को ही परमाणु हथियारों वाले देश के रूप में मान्यता दी है. इन देशों ने एनपीटी पर दस्तखत किए हैं और दस्तखत नहीं करने वाले भारत जैसे देशों को यूरेनियम बेचने से इनकार करते हैं.
भारत समेत दुनिया के कई देश परमाणु बिजली के जरिये अपनी ऊर्जा की भूख को शांत करने में लगे हैं. लेकिन चेर्नोबिल और फुकुशिमा जैसी त्रासदियां गवाह हैं कि बिजली बनाने का यह तरीका कितना खतरनाक है.
तस्वीर: Kerry Skyring
खतरनाक संकट
दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु त्रासदी यूक्रेन के चेर्नोबिल में घटी थी, जब एक धमाके के बाद वातावरण में बड़ी मात्रा में विकिरण फैल गया. प्लांट के आसपास यूक्रेन, बेलारूस और रूस के इलाकों की आबोहवा बुरी तरह दूषित हो गई, जबकि इसका असर पूरे यूरोप में महसूस किया गया. प्लांट के आसपास के एक बड़े इलाके में आज भी लोगों को रहने की अनुमति नहीं है.
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फिर एक बार संकट
मार्च 2011 में रिक्टर पैमाने पर 9 तीव्रता वाले भूकंप और फिर सुनामी के बाद जापान के फुकुशिमा पावर प्लांट के तीन रिक्टर पिघलने लगे. चार हाइड्रोजन धमाके भी हुए. इसके चलते इतना रेडियोधर्मी विकिरण फैला कि वह हिरोशिमा में 1945 में गिराए गए परमाणु बम से हुए विकिरण का 500 गुना था. इसकी सफाई में दशकों का समय लगेगा.
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सेहत पर मार
चेर्नोबिल के बाद हजारों लोगों को कैंसर की बीमारी हो गई. फुकुशिमा में भी प्लांट के आसपास रहने वाले दो लाख लोगों को अपने घर गंवाने पड़े. उनमें भी कैंसर के मामले बढ़ गए. वहां बच्चों में थायराइड कैंसर के मामले दूसरे इलाकों की तुलना में 20 गुना ज्यादा हैं.
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परमाणु बिजली का विरोध
चेर्नोबिल हादसे ने परमाणु बिजली के खिलाफ जनमत तैयार किया, खास तौर से यूरोप में. फुकुशिमा के बाद जापान में भी ऐसा ही हुआ. हादसे से पहले जापान की जरूरत की 30 प्रतिशत बिजली परमाणु प्लांटों से मिलती थी, जो बाद में घटकर एक प्रतिशत पर आ गई. सरकार फिर परमाणु पावर प्लांट चलाना चाहती है, लेकिन बहुत से लोग इसके विरोध में हैं.
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संकट में परमाणु उद्योग
भारी विरोध के चलते आजकल परमाणु बिजली उद्योग भारी संकट का सामना कर रहा है. जापान, अमेरिका और फ्रांस में परमाणु बिजली संयंत्र घाटे में चल रहे हैं. ऐसे में, नये रिएक्टर बनाने की योजनाओं को टाला जा रहा है.
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लटकती परियोजनाएं
फ्रांस को अपने नए न्यूक्लिटर रिएक्टरों से बड़ी उम्मीद थी जिन्हें प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टर (पीडब्ल्यूआर) कहा जाता है. इस टेक्नोलजी को सुरक्षित माना गया. फ्लामनविले के प्लांट को 2012 में शुरू होना था, लेकिन सुरक्षा के जुड़े मुद्दों के कारण अब यह 2018 से पहले शुरू नहीं हो पाएगा. इस पर 10 अरब यूरो का खर्च आएगा.
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ब्रिटेन का इरादा
ब्रिटेन छह साल से पीडब्ल्यूआर रिएक्टर बनाने की योजना पर काम कर रहा है. इस पर 33 अरब यूरो का खर्च आएगा और इसे 2019 से शुरू किया जाना है. लेकिन इस बात को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या इसे बनाना आर्थिक रूप से वाजिब है. इससे बनने वाली बिजली सोलर और विंड पावर से मिलने वाली बिजली से कहीं महंगी होगी.
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बूढ़े होते रिएक्टर
परमाणु बिजली संयंत्र कभी बड़े आकर्षक समझे जाते थे. लेकिन अब उनमें से ज्यादातर पुराने पड़ गए और खस्ताहाल हैं. उनकी मरम्मत बहुत महंगा सौदा है. स्विस ऊर्जा निगम एलपिक ने हाल में अपने दो पुराने संयंत्र एक फ्रांसीसी ऊर्जा कंपनी को बेचने का फैसला किया, लेकिन कंपनी ने उन्हें लेने से इनकार कर दिया.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/P. Seeger
जर्मनी में जागरुकता
तीन दशक पहले चेर्नोबिल में हुए हादसे का असर यह हुआ कि जर्मनी में परमाणु बिजली के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया. जर्मनी में 2002 में एक कानून पास हुआ जिसके मुताबिक देश में 2022 में आखिरी परमाणु रिएक्टर को बंद कर दिया जाएगा. हालांकि मैर्केल की सरकार ने इस कानून को पलट दिया था, लेकिन फुकुशिमा हादसे के बाद उन्हें कदम पीछे हटाने पड़े.
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बड़ी लागत
अब तक जर्मनी में नौ रिएक्टर बंद हो चुके हैं और बाकी बचे आठ रिएक्टर 2022 तक बंद कर दिए जाएंगे. रिएक्टरों से निकलने वाले कचरे के निपटारे के लिए उन्हें चलाने वाली कंपनियां संघीय सरकार को 23.6 अरब यूरो की रकम देंगी. प्लांट को डिस्मेंटल करने पर इन कंपनियों को इतनी ही रकम और खर्च करनी होगी.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/D. Ebener
हादसों का डर
यूरोपीय संघ और स्विट्जरलैंड में अभी कुल मिलाकर 132 परमाणु रिएक्टर काम कर रहे हैं. इन रिएक्टरों को 30-35 साल तक चलने के लिए डिजाइन किया गया था. लेकिन इन सभी रिएक्टरों की औसत आयु 32 साल हो गई है. अकसर उनमें गड़बड़ियां और सुरक्षा जुड़ी समस्याएं सामने आती हैं. इसलिए उन्हें बंद करने की मांगें लगातार उठ रही हैं.
तस्वीर: DW/G. Rueter
चीन की दिलचस्पी
फुकुशिमा हादसे के बाद यूरोपीय संघ, जापान या रूस में कोई नया परमाणु बिजली संयंत्र नहीं बना है. लेकिन परमाणु बिजली में चीन की दिलचस्पी लगातार बनी हुई है. वह कोयले से बनने वाली बिजली पर निर्भरता कम करना चाहता है. लेकिन उसने विंड और सोलर पावर में भी निवेश बढ़ाया है.
तस्वीर: Imago/China Foto Press
कहां खडा है भारत
परमाणु प्लांट भारत में बिजली का चौथा सबसे बड़ा स्रोत हैं. उसने अमेरिका, रूस, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे कई देशों से परमाणु करार किए हैं. भारत में इस समय सात परमाणु पावर प्लांटों में 21 रिएक्टर काम कर रहे हैं जबकि छह और रिएक्टर बनाने पर काम चल रहा है. (रिपोर्ट: गेरो रॉयटर/एके)
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/Arun Sankar K.
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भारत का कहना है कि यह ट्रीटी भेदभावपूर्ण है क्योंकि यह 1967 से पहले परमाणु परीक्षण कर लेने वाले देशों को ही इस हथियार का हकदार मानती है. भारत जैसे देश इस कतार में नहीं आते. 1998 में परमाणु परीक्षण करने के बाद भारत पर तकनीक और यूरेनियम के कारोबार से जुड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगा दिए गए.
2008 में परमाणु आपूर्ति करने वाले देशों के समूह ने भारत को सदस्य देशों से यूरेनियम खरीदने की छूट दे दी. उसके बाद से भारत ने आपूर्ति करने वाले देशों से द्विपक्षीय समझौते किए हैं. भारत ने इसी तरह का एक समझौता इस साल मार्च में कनाडा के साथ भी किया है.
भारत ने 2047 तक 100 गीगा वाट परमाणु बिजली पैदा करने का लक्ष्य बनाया है तस्वीर: Rafiq Maqbool/AP Photo/picture alliance
ऑस्ट्रेलिया के नेता भारत के एनपीटी पर दस्तखत करने तक यूरेनियम बेचने से इनकार करते रहे. हालांकि 2014 में उनका रुख बदला और वो यूरेनियम के निर्यात के लिए तैयार हो गए. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के सुरक्षा मानकों और नागरिक और सैन्य रिएक्टरों को अलग करने की शर्त रखी गई.
गुरुवार को जिस प्रशासनिक करार पर दस्तखत किए गए हैं उससे समझौते के तहत यूरेनियम की आपूर्ति में आ रही सारी बाधाओं के खत्म होने की उम्मीद है.
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भारत और ऑस्ट्रेलिया
प्रधानमंत्री मोदी दोनों देशों के बीच होने वाले सालाना लीडर्स समिट के लिए ऑस्ट्रेलिया आए हैं. संयुक्त बयान में मोदी और अल्बानीजी ने एशिया प्रशांत में गहरे रक्षा और सुरक्षा सहयोग की बात कही है. दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा के मामले में करीबी सहयोग की बात ऐसे समय में आई है जब कुछ ही दिन पहले ऑस्ट्रेलिया ने चीन की एक लंबी दूरी के बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण की आलोचना की थी. चीन ने दक्षिण प्रशांत महासागर में एक परमाणु ऊर्जा वाली पनडुब्बी से यह परीक्षण किया था. यह इलाका एंटी न्यूक्लियर ट्रीटी के तहत संरक्षित है. दोनों ने संबंध मजबूत करने की घोषणा करते हुए चीन का नाम नहीं लिया.
कितनी खतरनाक है परमाणु बिजली?
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भारत ऑस्ट्रेलिया का पांचवां सबसे बड़ा कारोबारी साझीदार है. दोनों देशों के बीच सामान और सेवाओं का 2024-25 में कुल मिला कर करीब 37.7 अरब अमेरिकी डॉलर का कारोबार हुआ. ऑस्ट्रेलिया आने से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने इंडोनेशिया का दौरा किया. ऑस्ट्रेलिया से वह न्यूजीलैंड के दौरे पर जाएंगे.