ऑस्ट्रिया के मध्यमार्गी गठबंधन में शरणार्थियों पर एक नये कानून के मसौदे पर सहमति हो गई है. इस कानून के बन जाने से अधिकारी ठुकराये गये ऐसे शरणार्थियों को मकान और खाने की सुविधा न देने का फैसला ले सकेंगे जो ऑस्ट्रिया छोड़ने से मना करते हैं. इस कानून को संसद की अनुमति जरूरी होगी. यह मसौदा ऑस्ट्रिया में विदेशियों से जुड़े कानूनों में किये जा रहे सुधारों का हिस्सा है. इसमें अपनी पहचान के बारे में झूठ बोलने वाले शरणार्थियों पर जुर्माने या कैद का प्रावधान होगा.
ऑस्ट्रिया की सरकार उग्र दक्षिणपंथी फ्रीडम पार्टी के प्रसार को रोकने के लिए नीतियों का एक पैकेज तैयार कर रही है. दिसंबर में हुए राष्ट्रपति चुनावों में फ्रीडम पार्टी के उम्मीदवार को लगभग आधे मतदाताओं ने वोट दिया था.
देश के गृह मंत्री वोल्फगांग सोबोत्का ने कहा है कि ऐसे विदेशी जिनका शरण का आवेदन ठुकरा दिया गया है और जो वापस जाने को तैयार नहीं हैं, उन्हें इसके नतीजे भुगतने होंगे. "पहली बात ये कि यदि उन्हें यहां रहने का अधिकार नहीं होगा तो उन्हें सरकार से कुछ भी नहीं मिलेगा." उन्होंने कहा कि इस कानून का मकसद कानून व्यवस्था को बहाल करना और ठुकराये गये शरणार्थियों को स्वेच्छा से जाने के लिए प्रोत्साहित करना है.
बर्लिन के फोटोग्राफर डेनियल जोननटाग शरणार्थियों की दर्दनाक कहानियों को सामने लाना चाहते हैं. इस सिलसिले में उन्होंने एक फोटो सीरीज ‘इनके नाम भी हैं' की है, जिसे काफी सराहा जा रहा है.
तस्वीर: Daniel Sonnentagशेहदा नाम की ये बच्ची बर्लिन के उस अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस सेंटर में रहती है जहां से डेनियल जोननटाग ने शरणार्थी बच्चों की तस्वीरों की एक सीरिज शुरू की. जोननटाग कहते हैं, “मैं ऐसे लोगों को पेश करना चाहता हूं जिन्हें शरणार्थी कहा जाता है. लेकिन उनके नाम भी हैं.”
तस्वीर: Daniel Sonnentagसीरिया की इस कुर्द बच्ची अल्हाम की उम्र आठ साल है. जोननटाग ने इस बच्ची की आंखों में गहरी उदासी को महसूस किया. अपने हम उम्र बच्चों के साथ यह खेलती और हंसती भी है, लेकिन फिर भी एक उदासी उसे घेरे रहती है.
तस्वीर: Daniel Sonnentagचार साल के अली का संबंध इराक से है. उसके परिवार की तरफ से दी गई शरण की याचिका खारिज हो चुकी है, लेकिन परिवार इस फैसले के खिलाफ अपील करना चाहता है. इस सेंटर में कई परिवार बरसों से अपनी याचिका पर फैसले का इंतजार कर रहे हैं.
तस्वीर: Daniel Sonnentagआठ साल की जीनत और छह साल की रुकैया अपने घर वालों के साथ इराक से जर्मनी पहुंची है. फोटोग्राफर जोननटाग के मुताबिक ये शरणार्थी शिविर समस्याओं की गढ़ बनता जा रहा है, जहां प्रशासन की कोशिशों के बावजूद समस्याओं का अंबार लगा है.
तस्वीर: Daniel Sonnentagफोटोग्राफर जोननटाग और जीनत. जोननटाग कहते हैं कि ये बच्ची अपनी उम्र से ज्यादा स्मार्ट है और अन्य बच्चों के मुकाबले उसने जर्मन भी बहुत जल्द सीख ली. वहीं बड़ी उम्र के लोगों के लिए जर्मन सीखना टेढ़ा काम है.
तस्वीर: Daniel Sonnentagछह साल की अल्मा और उनके 33 वर्षीय पिता अहमद. जोननटाग कहते हैं कि इन लोगों की मदद करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि इस कैंप में जाया जाए और इनकी जिंदगी आसान बनाने की कोशिश की जाए.
तस्वीर: Daniel Sonnentagये है जहरा जिसके बारे में जोननटाग कहते हैं कि वो थोड़ी सी पागल, सपने देखने वाली और बड़े दिल की लड़की है. सात साल की जहरा का संबंध इराक से है.
तस्वीर: Daniel Sonnentagछह साल की अया और उसका भाई हमजा. ये लोग सीरिया से आए हैं. हमजा के बारे में जोननटाग कहते हैं कि वो एक जबरदस्त और सवेदनशील बच्चा है.
तस्वीर: Daniel Sonnentagबर्लिन का अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस सेटर कभी दुनिया के सबसे बड़े कांफ्रेस सेंटरों में से एक था. 2014 में इसे बंद करना पड़ा, लेकिन एक साल बाद इसे खोल दिया गया. अब इसमें अफगानिस्तान, सीरिया, इराक, इरीट्रिया, ईरान और बाल्कन देशों के 600 से ज्यादा लोग रहते हैं.
तस्वीर: Daniel Sonnentag 2015 में जब शरणार्थी संकट चरम पर था तो ऑस्ट्रिया ने 90,000 लोगों को शरण दी थी. यह उसकी आबादी के 1 प्रतिशत से ज्यादा था. उस समय 1 लाख से ज्यादा लोग ग्रीस से होकर जर्मनी जाने के लिए यूरोप में घुस गये थे. इस बीच ऑस्ट्रिया ने आप्रवासी कानूनों को सख्ती कर दिया है और युद्ध और गरीबी से भागकर बाल्कान से होकर आने वाले शरणार्थी रास्ते को रोकने में मदद दी है.
ऑस्ट्रिया में शरणार्थियों को तथाकथित बेसिक सुविधा मिलती है जिसमें मुफ्त मकान, खाना, चिकित्सा सुविधा और 40 यूरो का मासिक पॉकेट मनी शामिल है. सोबोत्का का कहना है कि करीब 4000 ऐसे लोगों को बेसिक भत्ता मिलता है जिन्हें देश छोड़ कर चला जाना चाहिए था, उनमें से 2000 लोग नये कानून से प्रभावित होंगे. ये लोग इतने स्वस्थ हैं कि अपने देश वापस लौटने की यात्रा कर सकें.
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संस्था यूएनएचसीआर के ऑस्ट्रियाई दफ्तर ने नये कानून के मसौदे की आलोचना की है और सांसदों से उसकी पुष्टि करने से पहले गंभीरता से विचार करने को कहा है. नये कानून के मुताबिक अपनी पहचान के बारे में झूठ बोलने वालों को 5000 यूरो का जुर्माना देना होगा या तीन महीने की सजा होगी. गृह मंत्रालय के डाटा के अनुसार 2016 में ठुकराये गये शरणार्थी मुख्यतः अफगानिस्तान, पाकिस्तान और नाइजीरिया से थे.
एमजे/एके (रॉयटर्स)
अपने देश से भागे और दर-दर भटकते लोगों को दुनिया शरणार्थी कहती है. चलिए मिलवाते हैं आपको 10 ऐसे लोगों से जो शरणार्थी थे लेकिन संगीत, अभिनय, विज्ञान और राजनीति के क्षेत्र में वे बुलंदियों तक पहुंचे.
तस्वीर: Imago/StockTrek Imagesजर्मन गायिका और अभिनेत्री डिट्रीश नाजी जर्मनी को छोड़ कर अमेरिका गई थीं और 1939 में उन्होंने वहां की नागरिकता ली. वो एक अहम शरणार्थी शख्सियत थीं जिसने हिटलर के खिलाफ खुलकर बोला. उन्होंने कहा था, "वो जर्मन पैदा हुई हैं और हमेशा जर्मन रहेंगी."
तस्वीर: picture-alliance/dpaअंतरराष्ट्रीय मामलों के विद्वान और अमेरिका के 56वें विदेश मंत्री. लेकिन उनका जन्म जर्मन राज्य बवेरिया में हुआ था और उन्हें भी नाजी अत्याचारों से बचने के लिए 1938 में जर्मनी छोड़ना पड़ा था.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/M. Schiefelbeinअलब्राइट अमेरिकी विदेश मंत्री बनने वाली पहली महिला हैं और 1997 से 2001 तक इस पद पर रहीं. उनका जन्म आधुनिक समय के चेक गणराज्य में हुआ था. जब 1948 में वहां सरकार पर कम्युनिस्टों का नियंत्रण हो गया तो उनके परिवार को भाग कर अमेरिका जाना पड़ा.
तस्वीर: Getty Images/AFP/S. Loebसापेक्षता के सिंद्धांत के लिए मशहूर जर्मन यहूदी नोबेल विजेता अलबर्ट आइंसटाइन 1933 में अमेरिका के दौरे पर थे जब यह साफ हो गया कि वो वापस नाजी जर्मनी नहीं लौट सकते हैं.
तस्वीर: Imago/United Archives Internationalब्रिटिश यहूदी लेखक वीडनफेल्ड का जन्म 1919 में विएना में हुआ था. लेकिन जब नाजियों ने ऑस्ट्रिया को अपना हिस्सा बना लिया तो वो लंदन चले गए. उन्होंने अपनी एक प्रकाशन कंपनी भी खोली और इस्राएल के पहले राष्ट्रपति के चीफ ऑफ स्टाफ भी रहे.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/N.Bachmann20वीं सदी के हंगेरियन संगीतकार बेला बारतोक यहूदी नहीं थे लेकिन वो नाजीवाद के उभार और यहूदियों पर होने वाले अत्याचारों के विरोधी थे. 1940 में उन्हें अमेरिका जाना पड़ा.
तस्वीर: Getty Imagesमशहूर फिल्म निर्देशक मिलोस फोरमैन को 1968 की प्राग क्रांति के बाद चेकोस्लोवाकिया छोड़ कर अमेरिका का रुख करना पड़ा. उन्होंने दो विश्व विख्यात और ऑस्कर प्राप्त फिल्में "वन फेलो ओवर द कूकूज नेस्ट" (1975) और "अमादेओस" (1984) बनाईं.
तस्वीर: picture-alliance/abaca/V. Dargentचिली के राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे का 1973 में तख्तापलट किया गया और इस दौरान उनकी मौत भी हो गई. तब उनकी भतीजी इसाबेल को भाग कर वेनेजुएला जाना पड़ा. बाद में वो अमेरिका में बस गईं और लेखिका के तौर पर उन्हें बहुत शोहरत मिली.
तस्वीर: Koen van Weel/AFP/Getty Imagesमिरियम मकेबा जिन्हें मामा अफ्रीका के नाम से भी जाना जाता है. वो अमेरिका के दौरे पर थी जब दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने रंगभेदी सरकार के खिलाफ अभियान चलाने के लिए उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया था और इस महान गायिका को अमेरिका में बसना पड़ा.
तस्वीर: Getty Imagesटाटांका इयोटेक यानी सिटिंग बुल अमेरिकी इतिहास में सबसे मशहूर मूल निवासी नेताओं में से एक थे. अमेरिकी सरकार की नीतियों के खिलाफ लड़ने वाले सिंटिंग बुल को 1877 से 1881 तक शरणार्थी के तौर पर कनाडा में रहना पड़ा था.
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