'अनुकूल माहौल' बनाने की शर्त के कारण बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान का प्रस्तावित भारत दौरा अनिश्चित हो गया है. ये सवाल भी उठने लगा है कि क्या शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा तारिक के गले की फांस बन गया है?
तस्वीर: Mahmud Hossain Opu/AP Photo/picture alliance; Patrick van Katwijk/ANP/picture alliance
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बीते सप्ताह राजधानी ढाका में राजनयिक सूत्रों ने इस बात के ठोस संकेत दिए थे कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान अगस्त के तीसरे सप्ताह में भारत के पहले बहुप्रतीक्षित दौरे पर जाएंगे. दिल्ली में केंद्रीय विदेश मंत्रालयों के सूत्रों ने भी यही बात कही थी. लेकिन रविवार को बांग्लादेश ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की अर्जी पर शीघ्र फैसला करने और कुछ दूसरे भगोड़े अपराधियों को सौंपने की मांग रख दी. ढाका ने इन मांगों को आगामी दौरे के लिए 'अनुकूल माहौल' तैयार करने की शर्त बताया.
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता एकेएम शहीदुल करीम ने राजधानी ढाका में पत्रकारों से कहा, "पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का प्रत्यर्पण और उस्मान हादी की हत्या के अभियुक्त को सौंपना दोनों देशों के बीच सबसे अहम मुद्दे हैं."
उनका कहना था कि दोनों देशों के बीच प्रधानमंत्री के भारत दौरे के मुद्दे पर बातचीत चल रही थी. लेकिन भारत में शेख हसीना की वर्चुअल प्रेस कांफ्रेंस ने इस मुद्दे में रुकावट पैदा कर दी. करीम ने कहा, हमने हसीना के मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है.
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान से पिछले हफ्ते ही मिले थे भारतीय उच्चायोग के अधिकारीतस्वीर: Bangladesh PM office/ANI
बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाएं
बांग्लादेश में वर्ष 2024 में होने वाले विरोध प्रदर्शन का चेहरा रहे छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की बीते साल 12 दिसंबर को ढाका में गोली मार दी गई थी. एक सप्ताह बाद सिंगापुर के एक अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी. उसकी मौत के बाद देश भर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और दंगे हुए थे. पुलिस ने दावा किया था कि अभियुक्तों के संबंध शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी की छात्र शाखा से हैं. हमलावरों के कथित रूप से सीमा पार कर भारत में शरण लेने के दावों के बीच कुछ संगठनों ने इस हत्या में भारत का हाथ होने के आरोप लगाए थे. इसके बाद देश में भारत-विरोधी भावनाएं और भड़क उठी थीं.
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जहां तक शेख हसीना का सवाल है उन्होंने अपनी सरकार के तख्तापलट के बाद पांच अगस्त, 2024 से ही भारत में शरण ले रखी है. बांग्लादेश की सरकार औपचारिक रूप से उनके प्रत्यर्पण की मांग कर चुकी है. इस महीने हसीना ने दिल्ली में ऑनलाइन एक कार्यक्रम को संबोधित किया था. उससे बांग्लादेश की नाराजगी बढ़ी और प्रधानमंत्री तारिक रहमान का दौरा खटाई में पड़ गया.
दूसरी ओर, भारत सरकार की दलील है कि शेख हसीना के प्रत्यर्पण के लिए बांग्लादेश के अनुरोध पर तय कानूनी प्रक्रियाओं के तहत विचार किया जा रहा है. उसका कहना है कि फिलहाल शरीफ उस्मान हादी हत्याकांड के अभियुक्तों के भारत में होने के दावों की जांच चल रही है.
भारत में निर्वासन में रह रही हैं बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीनातस्वीर: Mohammad Ponir Hossain/REUTERS
इसके साथ ही अब सवाल उठने लगा है कि क्या शेख हसीना के प्रत्यर्पण का सवाल प्रधानमंत्री तारिक रहमान और उनकी सरकार के गले की फांस बन गया है? रहमान पर शेख हसीना के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने का भारी दबाव है. खासकर कट्टर राजनीतिक दलों को यह बात कभी मंजूर नहीं होगी कि हसीना के प्रत्यर्पण की अर्जी पर कोई फैसला हुए बिना रहमान भारत दौरे पर जाएं.
विश्लेषकों का सवाल है कि क्या घरेलू राजनीति के दबाव में रहमान अपने मजबूत पड़ोसी देश के साथ आपसी संबंधों को भी दांव पर लगाने को तैयार हैं. हसीना सरकार के सत्ता से हटने के बाद यह रिश्ते पहले से ही सबसे निचले स्तर पर हैं. तारिक रहमान सरकार के सत्ता संभालने के बाद इसमें बेहतरी की उम्मीद जगी थी. लेकिन अब तक सुधार के लक्षण नहीं नजर आ रहे हैं.
राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हसीना के मामले में सख्त रुख अपनाकर रहमान यह दिखा सकते हैं कि उनकी सरकार पिछली यानी हसीना सरकार से एकदम अलग रास्ते पर चल रही है."
उनका कहना था कि रहमान को जमात-ए-इस्लामी समेत कई कट्टरपंथी राजनीतिक ताकतों और सरकार में अपने दूसरे सहयोगियों के दबाव का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे तमाम संगठन हसीना सरकार से जुड़े लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं.
बांग्लादेश में कट्टरपंथियों का दबाव झेल रहे हैं प्रधानमंत्री तारिक रहमानतस्वीर: Munir Uz Zaman/AFP
बांग्लादेश की विदेश नीति पर घरेलू राजनीति का असर
कोलकाता के एक कालेज में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाली प्रोफेसर मालविका चक्रवर्ती डीडब्ल्यू से कहती हैं, "रहमान के लिए मौजूदा राजनीतिक समीकरण बेहद मुश्किल है. हसीना के प्रत्यर्पण की मांग से पीछे हटने पर उनको देश में भारी आलोचना का सामना करना पड़ सकता है. दूसरी ओर, इस मांग पर अड़े रहने से दोनों देशों के आपसी संबंधों को सुधारने की कोशिश खटाई में पड़ सकती है."
राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "रहमान के लिए एक ओर कुआं और दूसरी ओर खाई वाली स्थिति है. हसीना के खिलाफ कड़ा रुख अपना कर वो देश में राजनीतिक संगठनों का समर्थन तो मजबूत कर सकते हैं. लेकिन इससे भारत के साथ कामकाजी संबंध बहाल करना मुश्किल हो सकता है."
विश्लेषकों का कहना है कि अब गेंद बांग्लादेश सरकार के पाले में है. रहमान को यह तय करना होगा कि वो हसीना के प्रत्यर्पण की मांग में किस हद तक जा सकते हैं और क्या इस मुद्दे पर वो भारत के साथ राजनयिक संबंधों को दांव पर लगाने के लिए भी तैयार हैं?
बांग्लादेश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं शेख हसीना को भीषण हिंसा और छात्रों के आंदोलन के कारण इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ना. आखिर कैसे सत्ता उनके हाथों से फिसल गई. उनके राजनीतिक सफर पर एक नजर.
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शेख हसीना ने कैसे गंवाई सत्ता
5 अगस्त, 2024 को शेख हसीना ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और सेना के विमान में सवार होकर भारत पहुंच गईं. जुलाई की शुरूआत से ही बांग्लादेश में हजारों छात्र देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूदा कोटा सिस्टम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.
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कोटा सिस्टम का विरोध
साल 2018 तक बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में 56 फीसदी सीटों में कोटा लागू था. इसमें 30 प्रतिशत स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चों और उनके बच्चों के लिए, 10 प्रतिशत महिलाओं, 10 फीसदी पिछड़े जिलों के लोगों, पांच फीसदी अल्पसंख्यकों और एक प्रतिशत कोटा विकलांगों के लिए था. इस तरह सभी भर्तियों में केवल 44 फीसदी सीटें ही बाकियों के लिए खाली थीं.
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क्यों सड़कों पर आए छात्र
2018 में सरकार ने एक सर्कुलर जारी कर कोटा सिस्टम को खत्म करने की घोषणा की. इसके अंतर्गत स्वतंत्रता सेनानियों और उनके परिवारजनों के लिए आरक्षित 30 फीसदी कोटा को भी खत्म करने की बात कही गई. इसके खिलाफ 2021 में हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई. 5 जून, 2024 को हाई कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि वह संबंधित सर्कुलर को रद्द करे और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए चले आ रहे 30 फीसदी कोटा को कायम रखे.
इसके बाद देश के कई हिस्सों में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा. 21 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 93 फीसदी नौकरियों में भर्तियां योग्यता के आधार पर की जाएं. कोर्ट ने कहा 1971 के आंदोलन में शामिल रहे सेनानियों के परिजनों को सिर्फ पांच फीसदी आरक्षण मिले.
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हिंसा और इस्तीफे की मांग
जुलाई से चल रहा छात्रों का आंदोलन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से शांत नहीं हुआ और यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में छात्रों का विरोध प्रदर्शन जारी रहा. छात्र संगठनों ने चार अगस्त को पूर्ण असहयोग आंदोलन शुरू करने की घोषणा की थी.
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हसीना के इस्तीफे के पहले क्या हुआ
4 अगस्त को हुई हिंसा में 94 लोग मारे गए. जिनमें 13 के करीब पुलिस वाले थे. सरकार ने प्रदर्शनों को रोकने के लिए सड़कों पर सेना को उतार दिया लेकिन छात्र पीछे नहीं हटे और हसीना के इस्तीफे की मांग की. 5 अगस्त को छात्र संगठनों ने ढाका में लॉन्ग मार्च का एलान किया. जब प्रदर्शनकारी पीएम आवास की ओर बढ़ने लगे तो हसीना ने सेना के विमान में सवार होकर देश छोड़ दिया.
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बांग्लादेश पर मजबूत पकड़
दक्षिण एशियाई देश बांग्लादेश में 76 साल की शेख हसीना दुनिया की सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वालीं सरकार प्रमुख थीं. शेख हसीना पहली बार 1996 में प्रधानमंत्री बनी और 2008 में वापस लौटीं और 5 अगस्त, 2024 तक पद पर बनी रहीं.
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हसीना पर आरोप
शेख हसीना पर सत्ता में 15 साल रहने के दौरान विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, अभिव्यक्ति की आजादी पर दमन और असहमति पर दमन के आरोप लगे. उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे. लेकिन हसीना सरकार इन आरोपों को खारिज करती रही.
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विरासत में मिली राजनीति
शेख हसीना को राजनीति विरासत में मिली. उनके पिता शेख मुजीबुर्रहमान ने 1971 में पाकिस्तान से आजादी के लिए बांग्लादेश की लड़ाई का नेतृत्व किया था. 1975 में सैन्य तख्तापलट में उनके परिवार के अधिकांश लोगों के साथ उनकी हत्या कर दी गई थी. हसीना भाग्यशाली थीं कि उस समय वह यूरोप की यात्रा पर थीं. 1947 में दक्षिण-पश्चिमी बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) में जन्मी हसीना पांच बच्चों में सबसे बड़ी हैं.
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भारत में निर्वासित जीवन
शेख हसीना वर्षों तक भारत में निर्वासन में रहीं. फिर बांग्लादेश वापस चली गईं और अवामी लीग की प्रमुख चुनी गईं. उन्होंने 1973 में ढाका विश्वविद्यालय से बंगाली साहित्य में ग्रैजुएशन की और अपने पिता और उनके छात्र समर्थकों के बीच मध्यस्थ के रूप में राजनीतिक अनुभव हासिल किया.
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हसीना और आम चुनाव
शेख हसीना जनवरी, 2024 में लगातार चौथी बार चुनाव जीतीं. इस चुनाव का मुख्य विपक्षी दल और उनकी प्रतिद्वंद्वी बेगम खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने बहिष्कार किया था. इस चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप लगे.
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निरंकुश शासन के आरोप
बीएनपी और मानवाधिकार समूहों का कहना है कि हसीना की सरकार ने जनवरी, 2024 में हुए चुनाव से पहले 10,000 विपक्षी पार्टी कार्यकर्ताओं को झूठे आरोपों में गिरफ्तार किया था. इस चुनाव का विपक्ष ने बहिष्कार किया था. जैसे-जैसे समय बीतता गया, वह निरंकुश होती गईं और उनके शासन में राजनीतिक विरोधियों और कार्यकर्ताओं की सामूहिक गिरफ्तारी, जबरन गायब होना और न्यायेतर हत्याओं के आरोप लगे.
तस्वीर: Mohammad Ponir Hossain/REUTERS
शेख हसीना और खालिदा जिया के बीच संघर्ष
हसीना ने अपनी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बीएनपी की प्रमुख खालिदा जिया के साथ हाथ मिला लिया और लोकतंत्र के लिए एक विद्रोह का नेतृत्व किया, जिसने 1990 में सैन्य शासक हुसैन मोहम्मद इरशाद को सत्ता से उखाड़ फेंका. लेकिन जिया के साथ गठबंधन लंबे समय तक नहीं चला और दोनों महिलाओं के बीच तीखी प्रतिद्वंद्विता जारी रही.
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कमजोर हो चुकीं खालिदा जिया
शेख हसीना और खालिदा जिया के बीच कई सालों से राजनीतिक संघर्ष चला आ रहा है. 78 साल की जिया दो बार प्रधानमंत्री रह चुकी हैं और फरवरी 2018 में भ्रष्टाचार के एक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद से जेल में हैं. उनकी तबीयत बिगड़ती जा रही है और 2019 में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने 5 अगस्त, 2024 को जिया को रिहा करने का आदेश दिया.
तस्वीर: A.M. Ahad/picture alliance/AP Photo
हसीना के भारत के साथ संबंध
भारत और बांग्लादेश के बीच बेहद मजबूत संबंध हैं. जब कभी भी बांग्लादेश को जरूरत पड़ी तो भारत उसके साथ खड़ा नजर आया. दोनों देशों के बीच पिछले 53 सालों से द्विपक्षीय संबंध हैं. 2023 में भारत में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन में भारत ने बांग्लादेश को विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया था. हसीना के पीएम रहते हुए दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ा है.