बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के मुखिया प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस के इस्तीफा देने की इच्छा जाहिर करने से देश की राजनीति में गहरी हलचल पैदा हो गई है.
मोहम्मद यूनुस अब समर्थकों से भी विरोध झेल रहे हैंतस्वीर: Bangladesh CA Press Wing
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पिछले कुछ दिनों से तेजी से बदले घटनाक्रम में, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार मोहम्मद प्रोफेसर यूनुस ने राजनीतिक दलों और अन्य पक्षों के असहयोग का हवाला देते हुए सरकार छोड़ने की इच्छा जताई है. यह बात एनसीपी (नेशनल सिटीजन्स पार्टी) के संयोजक नाहिद इस्लाम ने यूनुस से मुलाकात के बाद सार्वजनिक की. नाहिद के अनुसार, "मुख्य सलाहकार ने कहा कि जब किसी को मुझ पर भरोसा नहीं है, तो मैं सरकार कैसे चला सकता हूं.”
यूनुस के इस रुख ने पहले से ही विभिन्न संकटों से जूझ रही सरकार को और मुश्किल में डाल दिया है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नाहिद ने उन्हें इस्तीफा देने के निर्णय पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया है.
सियासी समर्थन में दरार
शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बनी इस अंतरिम व्यवस्था को जिन छात्रों और दलों ने समर्थन दिया था, उनके बीच अब मतभेद गहराते जा रहे हैं. बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) पहले इस सरकार की समर्थक थी, लेकिन अब सड़कों पर उतरकर विरोध कर रही है. उसका आरोप है कि सरकार एनसीपी के प्रति नरमी बरत रही है और बीएनपी की जायज मांगों को नजरअंदाज कर रही है.
मोहम्मद यूनुस: बांग्लादेश के 'गरीबों का बैंकर'
मोहम्मद यूनुस बांग्लादेश में अंतरिम सरकार का नेतृत्व करेंगे. बांग्लादेश के इकलौते नोबेल विजेता यूनुस को देश में हीरो माना जाता है, लेकिन शेख हसीना सरकार के कार्यकाल में उन पर 100 से भी ज्यादा मुकदमे थोपे गए.
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अमेरिका में पढ़ाई
मोहम्मद यूनुस को "सबसे गरीब लोगों का बैंकर" के रूप में जाना जाता है. उनका जन्म 1940 में चिट्टागोंग के एक समृद्ध परिवार में हुआ. बड़े होकर उन्हें अमेरिका में पढ़ाई करने के लिए फुलब्राइट स्कॉलरशिप मिली. बांग्लादेश की आजादी के तुरंत बाद ही वो वापस आ गए.
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अकाल से मिली प्रेरणा
वापस आने पर उन्हें चिट्टागोंग विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया लेकिन एक भयानक अकाल से गुजर रहे उनके देश की हालत उनसे देखी नहीं गई. उन्होंने खुद कहा था कि उन हालात में उन्हें अर्थशास्त्र के सिद्धांत पढ़ना बहुत कठिन लग रहा था और वो कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे लोगों की तुरंत मदद हो सके.
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एक अनोखे बैंक की स्थापना
उन्होंने गरीबी की वजह से पारंपरिक लोन के लिए अयोग्य पाए जाने वाले लोगों को लोन दिलाने के कई तरीकों पर प्रयोग करने के बाद 1983 में ग्रामीण बैंक की स्थापना की. आज इस बैंक के 90 लाख से ज्यादा ग्राहक हैं, जिनमें से 97 प्रतिशत महिलाएं हैं.
तस्वीर: Abdul Saboor/REUTERS
महिलाओं के जरिए बदलाव
'ग्रामीण बैंक' के जरिए यूनुस ने ग्रामीण महिलाओं को बहुत ही छोटे लोन देने का अभियान शुरू किया. इन महिलाओं को कृषि उपकरण या व्यापार उपकरण खरीदने और अपनी कमाई बढ़ाने के लिए लोन की जरूरत थी.
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'गरीबों का बैंकर'
ग्रामीण बैंक की बांग्लादेश में तेजी से हुए आर्थिक विकास को गति देने के लिए दुनियाभर में सराहना की गई. बाद में बैंक के इस काम को बीसियों विकासशील देशों में अपनाया गया. यूनुस और ग्रामीण बैंक को 2006 में गरीबी को कम करने में मदद करने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया.
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समझा गया प्रतिद्वंदी
लेकिन बांग्लादेश में उनकी लोकप्रियता की वजह से वो तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की आंखों में खटकने लगे. हसीना ने उन पर गरीबों का "खून चूसने" का आरोप लगाया. 2007 में यूनुस ने "नागरिक शक्ति" नाम की अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने की योजना की घोषणा की. बाद में उन्होंने कुछ ही महीनों में अपनी इस योजना को वापस भी ले लिया, लेकिन उनकी इस योजना को एक चुनौती की तरह लिया गया.
यूनुस के खिलाफ 100 से भी ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज किए गए. सरकार की एक इस्लामिक एजेंसी ने उनपर समलैंगिकता को बढ़ावा देने का आरोप भी लगाया और उन्हें बदनाम करने की पूरी कोशिश की. 2011 में सरकार ने उन्हें जबरन ग्रामीण बैंक से भी निकलवा दिया. यूनुस ने इस फैसले को चुनौती दी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को सही ठहराया.
तस्वीर: Syed Mahamudur Rahman/AFP
जेल की सजा
जनवरी, 2024 में ढाका की एक श्रम अदालत ने उन्हें और उनके तीन साथियों को उनकी एक कंपनी में श्रमिक कल्याण कोष नहीं बनाने का दोषी ठहराया और छह महीने की जेल की सजा सुनाई. हालांकि उन्हें फैसले को चुनौती देने तक जमानत पर बरी भी कर दिया.
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सत्य की जीत
इन चारों ने उन पर लगे आरोपों से इनकार किया. उस समय बांग्लादेश की अदालतों पर हसीना सरकार के फैसलों पर मोहर लगाने के आरोप लग रहे थे. इस मामले की भी इसी आधार पर आलोचना की गई. दुनियाभर में कई लोगों और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे संस्थानों ने भी इस फैसले की आलोचना की. छह अगस्त को ढाका की एक अदालत ने यूनुस को बरी कर दिया. - सीके/एए (एएफपी)
तस्वीर: Mortuza Rashed/DW
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एनसीपी की ओर से भी तीखे तेवर अपनाए गए हैं. पार्टी ने सरकार के तीन प्रमुख सलाहकारों प्रोफेसर आसिफ नजरूल (कानूनी), सलाहुद्दीन अहमद (वित्त) और डॉ. वाहिद उद्दीन महमूद (योजना) को 'बीएनपी का प्रवक्ता' बताते हुए धमकी दी है कि अगर सरकार सुधार संबंधी सिफारिशें लागू नहीं करती, तो उन्हें इस्तीफा देना होगा.
सेना और चुनाव पर दबाव
दक्षिण एशिया के इस देश में जारी राजनीतिक गतिरोध के बीच, सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान ने कहा है कि दिसंबर 2025 तक आम चुनाव कराए जाने चाहिए. उन्होंने स्पष्ट किया कि देश का भविष्य तय करना केवल एक निर्वाचित सरकार का अधिकार है.
हालांकि सरकार ने अब तक कोई निश्चित चुनाव तिथि घोषित नहीं की है. मोहम्मद यूनुस ने संकेत दिया था कि दिसंबर 2025 से जून 2026 के बीच कभी भी चुनाव हो सकते हैं, लेकिन कोई ठोस टाइमलाइन नहीं दी गई.
इसी बीच, अंतरिम सरकार के भीतर भी मतभेद सतह पर आ गए हैं. विदेश सचिव जसीम उद्दीन ने यूनुस और विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन के साथ तालमेल की कमी का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया. उनकी नियुक्ति सिर्फ आठ महीने पहले हुई थी. मीडिया में ऐसी खबरें आ रही हैं कि अमेरिका में बांग्लादेश के राजदूत असद आलम सियाम उनके संभावित उत्तराधिकारी हो सकते हैं.
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तालमेल और संवाद की अपील
बीएनपी जहां सरकार पर हमलावर है, वहीं तीसरी बड़ी पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने मौजूदा संकट से निकलने के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाने की अपील की है. अमीर शफीकुर्रहमान ने एक फेसबुक पोस्ट में यह मांग उठाई, जो इससे पहले अन्य दलों के साथ हालात पर चर्चा कर चुके हैं.
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राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर धीमान बनर्जी का कहना है, "बीएनपी और एनसीपी के बीच कड़वाहट और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति ने अंतरिम सरकार को एक अस्थिर स्थिति में ला खड़ा किया है. साथ ही अब सेना का रवैया भी पहले जैसा तटस्थ नहीं रह गया है.”
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं, "अब मोहम्मद यूनुस के पास विकल्प सीमित हैं. या तो वह इस्तीफा दें, या फिर जल्द चुनाव की तारीख घोषित करें. जो भी राह वह चुनेंगे, वही देश के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करेगी.”