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जर्मनी में युवा यहूदी अब क्यों पहले से ज्यादा सतर्क रहते हैं

क्रिस्टोफ श्ट्राक अनुवाद: ऋतिका पाण्डेय
२७ जनवरी २०२६

7 अक्टूबर 2023 के बाद से बर्लिन में यहूदी लोगों के अनुभव काफी अलग-अलग रहे हैं. इस बारे में डीडब्ल्यू से बात करने वाले कई लोगों ने कहा कि उन्होंने यहूदी-विरोधी घटनाओं में बढ़त देखी है और वे पहले से ज्यादा सतर्क हो गए हैं.

Deutschland Berlin 2023 | Solidaritätsdemonstration für Israel vor dem Brandenburger Tor
तस्वीर: IPON/IMAGO

बवेरिया के 21 वर्षीय यहूदी छात्र टिम कुरॉकिन कहते हैं कि वह 7 अक्टूबर, 2023 को हमास के इस्राएल पर आतंकी हमले के दिन से कुछ ही पहले बर्लिन चले आए थे. वह डीडब्ल्यू को बताते हैं कि तब से उनके कुछ यहूदी दोस्तों पर "सिर्फ इसलिए शारीरिक हमला किया गया क्योंकि यह साफ था कि वे यहूदी हैं.”

अपनी आदतों के बारे में कुरॉकिन खुद को "दिखाई देने वाले तौर पर यहूदी नहीं” बताते हैं, क्योंकि वह न तो किप्पा, यहूदी पुरुषों के लिए पारंपरिक सिर ढकने वाला टोपी, पहनते हैं और न ही दाऊद का सितारा.

कुरॉकिन बर्लिन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड लॉ में पढ़ाई करते हैं. इसके अलावा वह कई यहूदी संगठनों में सक्रिय हैं, जिनमें हिलेल-आंदोलन शामिल है, जो दुनिया भर के यहूदी छात्रों के बीच संपर्क को बढ़ावा देता है, और जर्मनी के यहूदी छात्र संघ (जेएसयूडी) के साथ भी जुड़े हैं.

कुरॉकिन कहते हैं कि बर्लिन में रहते हुए वह "बाहर निकलते समय बहुत सतर्क रहते हैं” और "कई लोगों” को यह बताने से बचते हैं कि वह यहूदी हैं. फिर भी वह जोर देकर कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि वह शहर में "लगातार डर के साथ” चलते हों. लेकिन वह ऐसी जगहों से जरूर बचते हैं जहां यहूदी-विरोधी नारे या ऐसी चीजों का खुला प्रदर्शन हो.

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पुलिस की बढ़ी मौजूदगी

कई दशकों से बर्लिन में यहूदी संस्थानों को पुलिस सुरक्षा मिली हुई है. हालांकि अक्टूबर 2023 के बाद से जर्मन राजधानी में माहौल थोड़ा अधिक तनावपूर्ण हो गया है. मिसाल के तौर पर, दिसंबर में हानुका पर्व के लिए आयोजित सार्वजनिक मोमबत्ती जलाने के समारोह के दौरान कड़ी सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई. यह समारोह बर्लिन के ऐतिहासिक ब्रांडेनबुर्ग गेट पर हुआ, जबकि कुछ ही साल पहले राहगीर इस उत्सव को करीब से देख सकते थे. बढ़ी हुई सुरक्षा सिर्फ सार्वजनिक आयोजनों तक सीमित नहीं है. व्यापक सुरक्षा उपायों का एक और संकेत बर्लिन के विभिन्न जिलों में यहूदी सांस्कृतिक केंद्रों के सामने अब लगाए गए भारी कंक्रीट बैरियर भी हैं.

7 अक्टूबर, 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमलों में 1,200 से अधिक लोग मारे गए और लगभग 250 लोगों को बंधक बनाया गया था. इसके बाद शुरू हुए गाजा युद्ध के चलते स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस्राएली सेना द्वारा कम से कम 70,000 फलस्तीनियों की मौत हुई, बर्लिन में खतरे बढ़ गए, जिससे अधिकारियों को सुरक्षा उपाय और कड़े करने पड़े.

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कुरॉकिन जैसे कुछ यहूदी लोग शहर में अपने जीवन के बारे में खुलकर बात करते हैं, जबकि कुछ इस पर चुप रहते हैं. ऐसे भी कुछ युवा यहूदी हैं जो कहते हैं कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से नफरत और भेदभाव का सामना नहीं किया है. नाजीवाद के पीड़ितों की स्मृति के दिन के दिन 27 जनवरी को कुरॉकिन "सच्चे शोक का दिन” मानते हैं. लेकिन जर्मनी में होलोकॉस्ट की स्मृति को मनाने के कुछ तरीकों में उन्हें बहुत कम अर्थ नजर आता है. उनके मुताबिक अकसर यह "वही सोशल मीडिया पोस्ट बनकर रह जाता है, जिसमें लोग या तो ‘नेवर अगेन' लिखते हैं या आउशवित्स यातना शिविर की ब्लैक एंड वाइट फोटो शेयर करते हैं.” 

वो कहते हैं, "यह काफी नहीं है. यहूदी-विरोध के खिलाफ कुछ ठोस कीजिए. जर्मनी के कुछ हिस्सों में अब एक धुर-दक्षिणपंथी पार्टी दूसरे स्थान पर, कभी-कभी पहले स्थान पर भी पहुंच रही है. हम वामपंथी उग्रवाद को बढ़ते हुए देख रहे हैं. इस्राएल से जुड़ा यहूदी-विरोध बढ़ रहा है, और कुल मिलाकर यहूदी-विरोध में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. राजनेताओं के प्रयास काफी नहीं हैं.” वह आगे यह भी जोड़ते हैं कि "दक्षिणपंथी रूढ़िवादी हलकों” के भीतर दक्षिणपंथी उग्रवादियों के साथ राजनीतिक सहयोग के खिलाफ लंबे समय से मौजूद "फायरवॉल” अब "धीरे-धीरे टूट रहा है.” जर्मनी के लिए एएफडी नाम की धुर-दक्षिणपंथी पार्टी का उभार उन्हें गहरी चिंता से भरता है.

बर्लिन में रहने वाले कुल यहूदी लोगों की तादाद ठीक-ठीक जानना मुश्किल है. शहर के आधिकारिक आंकड़ों के हिसाब से यहां के यहूदी समुदाय में लगभग 10,000 सदस्य हैं, लेकिन वास्तविक संख्या इससे काफी ज्यादा है. यूक्रेन पर रूस के हमले और उसके बाद हुए युद्ध से भागकर आए यूक्रेनी यहूदियों के आने से यह तादाद और बढ़ी है. अनुमान है कि बर्लिन में 5,000 से 30,000 के बीच तो केवल इस्राएली नागरिक ही हैं.

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सोशल मीडिया से दूरी रखना

20 साल की लिलाख सोफर पॉट्सडाम में पढ़ाई करती हैं और बर्लिन में रहती हैं. वह बताती हैं कि सोशल मीडिया पर वह काफी समय से राजनीतिक टिप्पणियां पोस्ट करने से बच रही हैं. उनका कहना है, "कॉमेंट्स बहुत जल्दी अपमानजनक हो जाते थे.” सोफर की मां इस्राएली और पिता जर्मन हैं.

वो इस बात पर जोर देती हैं कि बर्लिन में जीवन आम तौर पर "काफी सामान्य” रहता है. ऐसा नहीं कि उन्हें यूनीवर्सिटी जाने से डर लगता हो लेकिन बाहर कहीं भी वो सतर्क रहती हैं. एक बार उनके दोस्तों को सड़क पर हिब्रू बोलने के कारण किसी ने चाकू दिखाकर धमकाया था, तबसे किसी भी सार्वजनिक जगह पर वो जोर से हिब्रू बोलने से बचती हैं. 

वहीं डाविड गोरेलिक जैसे लोग भी हैं जिनको नफरत का निशाना बनाए जाने का खतरा हर दिन सताता है. गोरेलिक कहते हैं कि अक्टूबर 2023 के बाद से उनका जीवन "बहुत, बहुत ज्यादा बदल गया है.” 21 साल के गोरेलिक "मीट ए ज्यू” नामक प्रोजेक्ट से जुड़े हैं. इसमें यहूदी और गैर-यहूदी लोगों के बीच व्यक्तिगत मेल मिलाप के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और इसे जर्मनी की केंद्रीय यहूदी परिषद इसका संचालन करती है.

हम साथ खड़े रहना चाहते हैं' 

वह जोर देते हैं कि पिछले पांच सालों में जर्मनी में यहूदी जीवन "काफी बढ़ा है” और अब उसे "वाकई अच्छी बुनियादी संरचना” का फायदा मिल रहा है. जर्मनी के हर राज्य की राजधानी में अब एक सिनेगॉग (यहूदियों का पूजाघर) है, जर्मन सेना, बुंडेसवेयर ने एक यहूदी सैन्य पादरी व्यवस्था स्थापित की है, और बर्लिन में उनके यहूदी समुदाय ने एक शबाड-यहूदी कैंपस शुरू किया है, जो पूरे समाज के लिए खुला है. 

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हालांकि गोरेलिक मानते हैं कि इस्राएल या मध्य पूर्व पर कुछ बातचीत में वह अब पहले से अधिक सतर्क रहते हैं. लेकिन साथ ही वह सार्वजनिक रूप से अपनी पहचान जताने का एक उदाहरण भी देते हैं. अक्टूबर की घटना के बाद से उन्होंने यहूदी पुरुषों द्वारा पहने जाने वाले एक खास धार्मिक वस्त्र को बिल्कुल खुलकर पहनने का फैसला किया, "क्योंकि यहूदी-विरोधी हमें छिपने के लिए मजबूर करना चाहते हैं.” 

21 साल के गोरेलिक उम्मीद जताते हैं कि ऐसे ज्यादा से ज्यादा मौके हों जिनमें गैर यहूदी लोग, यहूदियों से मिल सकें, हर मुद्दे पर संवाद कर सकें, और उनके रोजमर्रा के जीवन के बारे में सही सही जान सकें. गोरेलिक कहते हैं कि अगर कभी वो जर्मनी छोड़कर इस्राएल जाने का निर्णय लेंगे तो उसका कारण "यहूदी विरोध नहीं, बल्कि राजनीतिक होगा.” यानी अगर कभी जर्मनी में एएफडी पार्टी का एक चांसलर बन जाए.

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