एजुकेशन लोन: नौकरी मिलने से पहले ही युवाओं पर कर्ज का बोझ
२२ अगस्त २०२५
इशिका* तीन साल बाद भारत लौटी हैं. उन्हें उम्मीद है कि उनके पिता अगले कुछ महीने उनकी एजुकेशन लोन की किस्त भरने में उनकी मदद कर देंगे. तब तक वह भारत से ही यूनाइटेड किंगडम में कोई अच्छी नौकरी खोजने की कोशिश कर रही हैं. उन्होंने इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स से इंटरनेशनल रिलेशन्स में अपनी मास्टर्स डिग्री की थी.
इसके लिए उन्होंने एक प्राइवेट बैंक से 36 लाख का एजुकेशन लोन लिया है. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "मैं हर महीने 60,000 रुपये लोन की किस्त भरती हूं.” उन्हें 14 प्रतिशत की ब्याज दर पर यह लोन मिला था. डिग्री पूरी होने के कई महीनों बाद बहुत मुश्किल से उन्हें एक पार्ट-टाइम जॉब मिली थी. उन्होंने बताया, "टैक्स वगैरह सब काटने के बाद मुझे हर महीने बस 1,700 पाउंड (लगभग 1,80,000 रुपये) ही हाथ में आते थे.” इन्हीं पैसों में उन्हें अपने घर का किराया, लोन की किस्त और बाकी खर्चे भी उठाने पड़ते थे.
कर्ज का जाल: शिक्षा या स्वास्थ्य पर नहीं ब्याज पर हो रहा खर्च
उनके माता-पिता चाहते हैं कि वह भारत में ही नौकरी करें. लेकिन इशिका कहती हैं कि यहां अच्छी से अच्छी कंपनी में भी शुरुआती सैलरी बस 50,000 के आस-पास ही है. ऐसे में वह अपना लोन कैसे चुका पाएंगी और बाकी खर्चे, जिनका कोई हिसाब ही नहीं है.
भारत में एजुकेशन लोन
2024 में राज्य सभा में एक सवाल के जवाब में वित्त राज्य मंत्री, पंकज चौधरी ने बताया कि भारत में 2023-24 में सरकारी बैंकों ने लगभग 28,699 करोड़ रुपये के एजुकेशन लोन दिए. वहीं निजी बैंकों ने करीब 7,749 करोड़ रुपये के लोन वितरित किए.
साल 2023 तक भारत में कुल बकाया एजुकेशन लोन की रकम लगभग 90,000 करोड़ रुपये थी. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अनुसार, यह रकम भारत के कुल बैंक लोन का सिर्फ 0.7 फीसदी है. यानी कुल मिलाकर, बैंकों द्वारा दिए गए सभी लोन में से एजुकेशन लोन का हिस्सा बहुत छोटा है — सिर्फ एक से दो फीसदी. सरकारी बैंकों में एजुकेशन लोन का हिस्सा कुल लोन का लगभग डेढ़ से दो फीसदी है जबकि निजी बैंकों में यह हिस्सा और भी कम है, यानी सिर्फ आधे से एक फीसदी तक.
एजुकेशन लोन क्यों है महंगा
भारत में एजुकेशन लोन और होम लोन दोनों ही बड़े खर्चों को पूरा करने का जरिया हैं. लेकिन इनकी शर्तों और ब्याज दरों में बड़ा अंतर होता है. होम लोन पर आमतौर पर 8.5 से 11.5 फीसदी तक ब्याज देना पड़ता है. इसकी वजह यह है कि घर बैंक के लिए गिरवी बन जाता है. अगर लोन लेने वाला पैसे नहीं चुका पाए तो बैंक के पास घर बेचकर पैसा वसूलने का विकल्प होता है. इसके अलावा, होम लोन लेने वाला व्यक्ति आमतौर पर पहले से कमाने वाला होता है, जिसकी आय स्थिर होती है. इससे बैंक का रिस्क कम हो जाता है.
वहीं दूसरी तरफ, एजुकेशन लोन की ब्याज दर कहीं ज्यादा होती है — लगभग 16 फीसदी तक. इसकी कई वजहें हैं जैसे कि एजुकेशन लोन ज्यादातर बिना गारंटी दिया जाता है, यानी बैंक के पास कोई संपत्ति नहीं होती जिसे वह वापस ले सकें, पढ़ाई करने वाला छात्र उस समय आमतौर पर कमाने वाला नहीं होता, उसकी आय की गारंटी नहीं होती, लोन की अवधि भी काफी लंबी होती है, कई बार 7–10 साल तक, जिससे बैंक का रिस्क और बढ़ जाता है.
साथ ही, मंहगाई और ऑपरेशनल खर्च को पूरा करने के लिए भी बैंक ब्याज दरें ऊपर रखते हैं. यानी जहां होम लोन बैंक के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित है, वहीं एजुकेशन लोन बैंक के लिए ज्यादा रिस्की निवेश माना जाता है. और यह रिस्क सीधा छात्र पर भारी ब्याज के रूप में डाला जाता है. आज भारत में एजुकेशन लोन का कुल बाजार करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये का है.
माता-पिता भी लोन की चपेट में
ऋषभ*, नोएडा की एक रिसर्च फर्म में काम करते हैं. दो साल पहले कोयम्बटूर के एक बिजनेस स्कूल से उन्होंने अपनी एमबीए पूरी की थी. जिसके लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से उन्होंने दस लाख का लोन लिया था. आज भी वह 10,000 रुपये प्रति माह की किस्त चुका रहे है. उन्होंने बताया कि वह अपने दभारत में कानून का उल्लंघन करते चीनी लोन ऐप्सम पर अपनी पढ़ाई करना चाहते थे लेकिन उनके लोन के लिए एक गारंटर अनिवार्य था.
गारंटर यानी ऐसा व्यक्ति जो बैंक को वादा करे कि लोन लेने वाला इंसान अगर किसी भी हालात में लोन नहीं भर पाता है तो गारंटर बैंक का लोन भरने की जिम्मेदारी लेता है. ऋषभ के गारंटर उनके पिता बने और उनका एक जॉइंट अकाउंट खोला गया. जिसके बाद पहले दिन से, जिस दिन ऋषभ का लोन पास हुआ. उस दिन से ही उस पर ब्याज लगाना शुरू हो गया. ऋषभ ने डीडब्ल्यू को बताया, "ऐसे विकल्प होते हैं, जिसके जरिये आप पर पहले दिन से ब्याज नहीं लगेगा लेकिन उन्हें इस बार में सूचित नहीं किया गया था.”
लोन से सपनों की लड़ाई
ऋषभ बैंगलोर में अपनी पसंदीदा कंपनी में नौकरी करना चाहते थे. लेकिन बैंगलोर में रहने और खाने पीने का खर्च इतना अधिक था कि वहां रहना और लोन की किस्त भरना, दोनों एक साथ कर पाना उनके लिए लगभग नामुमकिन था. ऋषभ ने बताया, "इसलिए मैं दिल्ली आ गया. यहां मेरे माता-पिता का घर था और किराया भरने की टेंशन भी नहीं थी.”
इसके बाद बारी आती है लोन भरने की है. ऋषभ बताते हैं कि नौकरी लगने के दो साल बाद भी वह बस न्यूनतम किस्त ही भर पा रहे हैं. हालांकि यह विकल्प होता है कि आप जितना जल्दी लोन भर देंगे, आपको उतना ही कम ब्याज भरना पड़ेगा. लेकिन उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "पढ़ाई पूरी होने के चार-पांच साल तो कम से कम स्ट्रगल ही चलता है. ऐसे में सोच भी पाना की जल्दी लोन भर दे मुश्किल हो जाता है और इस बीच ब्याज का दर बढ़ता चला जाता है और लोन की किस्त भारी होने लग जाती है.” उन्होंने कहना है कि दो साल की पढ़ाई के लिए 20 साल तक लोन की किस्त भरना कितना सही है. यह बात उनकी समझ के बाहर है.
कर्ज में डूबे अमेरिकी छात्रों को कितनी राहत मिलेगी
इंश्योरेंस कंपनी, डिजिट के अनुसार 2025 में भारत के टॉप शहरों में रहने का खर्चा कई गुना बढ़ गया है. बैंगलोर, दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में मामलू जीवन जीने के लिए बभी कम से कम 50 से 60 हजार तक का खर्च है. वहीं विदेशों में रहना भी अच्छा खासा महंगा हो चुका है. दुबई में एक बीएचके का हर महीने किराया 4,904 एईडी यानी करीब सवा लाख भारतीय रुपये से शुरू होता है. टोक्यो में तो यह 1,50,000 येन (यानी लगभग 90,000 भारतीय रुपये) तक है. और बर्लिन में करीब 900 से 1,200 यूरो (लगभग एक लाख रुपये) के नीचे रहने लायक जगह मिलना ही मुश्किल है.
बेहतर भविष्य के लिए फाइनेंस की समझ जरूरी
ऋषभ मानते हैं कि सबसे बड़ी दिक्कत नासमझी है. आप समझ नहीं पाते हैं कि इसमें भी ब्याज दर होती है. इसमें भी किस्त और ब्याज बढ़ाने-घटाने के तरीके होते हैं. फाइनेंसियल लिटरेसी के अभाव में कई सारे फैसले कर लेते हैं जो कि बाद में भारी पड़ते हैं. ऋषभ कहते हैं, "बाकी तरह के लोन में लोग फंसते हैं. वो गलत है. लेकिन एजुकेशन लोन में भी फंसना उतना ही गलत है. सरकार को मुद्रा लोन की तरह स्टूडेंट्स के लिए भी आसान और जागरूक लोन सुविधा शुरू करनी चाहिए.”
इशिका बताती हैं कि कई बार लोन देने वाले उनके पिता को फोन करके परेशान करते हैं. इशिका कहती हैं, "यह लोन मेरे जीवन की सबसे बड़ी गलती साबित हो रही है.”
*गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदले गए हैं.