2027 से पहले वाराणसी में विधान परिषद चुनाव में बीजेपी की हार
२९ अक्टूबर २०२६
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू कर दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी की जीत को बीजेपी के लिए राजनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है.
वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के मौजूदा विधान परिषद सदस्य लाल बिहारी यादव ने बीजेपी उम्मीदवार डॉक्टर प्रमोद कुमार मिश्रा को बड़े अंतर से हराया. उन्होंने लगातार दूसरी बार यह सीट जीती है. स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आशुतोष सिन्हा बीजेपी के केदार नाथ सिंह से बड़े अंतर से जीत गए हैं. हालांकि परिणाम काफी देर बाद घोषित हुए.
यही नहीं, यूपी में विधान परिषद की स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की जिन 11 सीटों के नतीजे आए हैं, वो भी बीजेपी के लिए किसी झटके से कम नहीं हैं और राजनीतिक हलकों में इस परिणाम को 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से जोड़कर देखा जा रहा है. बीजेपी ने छह सीटें जीतीं जरूर हैं लेकिन समाजवादी पार्टी की मजबूत चुनौती बहुत महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दे रही है.
वाराणसी के नतीजों का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है. हालांकि विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक सीटों के मतदाता आम मतदाताओं से अलग होते हैं, इसलिए इन चुनावों को पूरे वाराणसी या उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के रुझान का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता, फिर भी ये परिणाम स्थानीय संगठन, उम्मीदवारों की पकड़ और राजनीतिक दलों के प्रभाव के बारे में महत्वपूर्ण संकेत देते हैं.
उम्मीदवार चयन और अति-आत्मविश्वास पर सवाल
वाराणसी में वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह कहते हैं कि आमतौर पर बीजेपी जिन सीटों पर हारती है, वहां हार का समुचित पोस्टमॉर्टम करती है ताकि अगली बार कोई कसर न रह जाए. लेकिन वाराणसी में उसने ऐसा नहीं किया. उनके मुताबिक, जमीनी सच्चाई को नजरअंदाज करना और अति आत्मविश्वास भी इस हार का प्रमुख कारण है.
डीडब्ल्यू से बातचीत में अजय सिंह कहते हैं, "वैसे तो पिछली बार भी यही परिणाम था. दोनों ही सीटें सपा के पास थीं. लेकिन पिछली बार जिस उम्मीदवार को मतदाताओं ने नकारा था बीजेपी ने फिर उसी को टिकट दिया. यानी उसका ये आत्मविश्वास कि ‘जिसे टिकट दे देंगे, वो जीत जाएगा', पार्टी को ले डूबा. क्योंकि कार्यकर्ता पूरी तरह निष्क्रिय रहा. यूजीसी का मुद्दा, शिक्षा मित्रों की समस्याएं जैसे मुद्दों पर शिक्षक वर्ग और स्नातक बीजेपी से नाराज चल रहा है, फिर भी बीजेपी इन मुद्दों को इग्नोर करती रही. यानी एक बड़े वर्ग में नाराजगी दिखाई पड़ रही है और चुनावी नतीजों में परिलक्षित भी हो रही है.”
वाराणसी में विधान परिषद चुनाव के नतीजों के साथ ही 2024 के लोकसभा चुनाव की यादें एक बार फिर ताजा हो गई हैं. उस चुनाव में बीजेपी उत्तर प्रदेश में 2019 के मुकाबले काफी पीछे रह गई थी. बीजेपी राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से सिर्फ 33 सीटें ही जीत सकी जबकि समाजवादी पार्टी को 37 और कांग्रेस को छह सीटें मिलीं. 2019 में वाराणसी से नरेंद्र मोदी करीब 4.79 लाख वोटों के अंतर से जीते थे लेकिन 2024 में यह अंतर घटकर करीब 1.53 लाख रह गया. यही नहीं, कई राउंड तक वो कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय से पीछे रहे थे.
वाराणसी की दोनों सीटों पर सपा की जीत के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने अपनी स्थानीय संगठनात्मक चुनौतियों को पर्याप्त रूप से दूर किया है. हालांकि, विधान परिषद चुनाव के नतीजे अपने आप में केंद्रीय और राज्य नेतृत्व के बीच तालमेल की कमी साबित नहीं करते.
सपा की रणनीति और शिक्षक राजनीति
वाराणसी के नतीजे समाजवादी पार्टी के लिए भी महत्वपूर्ण हैं. लाल बिहारी यादव ने शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में अपनी जीत दोहराई है जिससे संकेत मिलता है कि शिक्षक मतदाताओं के बीच उनकी व्यक्तिगत पकड़ और सपा के समर्थन का मेल इस चुनाव में प्रभावी रहा.
शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनावों में रोजगार, सेवा शर्तें, पेंशन, शिक्षण संस्थानों से जुड़े सवाल और शिक्षा नीति जैसे मुद्दों की प्रमुख भूमिका रहती है और इन मुद्दों पर कहीं न कहीं बीजेपी बैकफुट पर दिख रही है. अजय सिंह कहते हैं वाराणसी के नतीजे सिर्फ दो सीट के नतीजे नहीं हैं बल्कि यह पूरे प्रदेश के राजनीतिक माहौल को बयां कर रहे हैं.
उनके मुताबिक, "सिर्फ वाराणसी का ही मामला नहीं है. स्नातक चुनाव में भी छह जिले आते हैं. इसलिए वाराणसी सीट को पूरे पूर्वांचल का मैंडेट समझा जाना चाहिए. अन्य सीटों पर भी जो नतीजे आए हैं वो बीजेपी के लिए झटका हैं. ये नतीजे दिखा रहे हैं कि बीजेपी को लेकर पूरे उत्तर प्रदेश में नाराजगी है.”
वाराणसी में अमर उजाला अखबार से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार नीलांबुज तिवारी भी युवाओं और छात्रों की नाराजगी को बीजेपी की हार में बड़ा कारण बताते हैं लेकिन उनका ये भी कहना है कि सपा के उम्मीदवार का पब्लिक कनेक्ट बीजेपी उम्मीदवार की तुलना में कहीं ज्यादा था. उनके मुताबिक, "आशुतोष सिन्हा का पब्लिक कनेक्ट और जन समस्याओं के प्रति गंभीरता लोगों को प्रभावित कर रही थी. बीजेपी इस सीट पर किसी दूसरे को भी उतारती, तब भी शायद यहां न जीतती.”
नीलांबुज तिवारी एक और खास बात का जिक्र करते हैं, "वोटिंग से ठीक पहले मोदी जी ने एयर शो तो यहां कराया लेकिन वह एयर शो बीजेपी पर ही भारी पड़ गया. तमाम बाहरी लोग टिकट और पास पा गए, शो देखने चले गए लेकिन वाराणसी के लोग जुगाड़ लगाते रहे. यहां तक कि बीजेपी के तमाम पदाधिकारी यह शो नहीं देख पाए. उनकी नाराजगी, विवशता और झुंझलाहट चुनाव के नतीजों की ओर इशारा कर रही थी और अब वह दिख भी गई.”
2027 के विधान सभा चुनाव के लिए ये चुनाव क्या संदेश दे रहे हैं?
उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनाव के नतीजे बीजेपी के लिए मिली-जुली तस्वीर पेश करते हैं. पार्टी ने 11 में से छह सीटें जीतीं जबकि समाजवादी पार्टी को पांच सीटों पर जीत मिली. वाराणसी की दोनों सीटों पर सपा की जीत ने इस मुकाबले को खास राजनीतिक महत्व दिया है.
वरिष्ठ पत्रकार विक्रांत दुबे के मुताबिक, कुछ सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवारों की जीत में संगठन के बजाय उनकी व्यक्तिगत पकड़ की भूमिका रही. वो कहते हैं, "गोरखपुर की सीट भी बीजेपी लगभग हार ही गई थी. शिक्षक सीट पर निवर्तमान विधायक को चुनाव से ठीक पहले पार्टी ने अपना सिंबल थमा दिया था. ध्रुव त्रिपाठी बीजेपी की बदौलत नहीं, बल्कि अपनी बदौलत जीते हैं.”
दुबे के मुताबिक, वाराणसी के अलावा कुछ दूसरी सीटों पर भी बीजेपी के प्रदर्शन से संगठन और उम्मीदवार चयन को लेकर सवाल उठते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में दोनों सीटें गंवाना इन सवालों को और अहम बनाता है.