उड़ी हमले के तीन दिन बाद भी भारत तय नहीं कर पाया है कि पाकिस्तान को वह क्या जबाव दे, जबकि पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल राहील शरीफ कह चुके हैं कि वो हर खतरे का मुकाबला करने को तैयार हैं.
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भारत में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो अपने 18 सैनिकों की मौत का बदला चाहते हैं. पाकिस्तान की सरकार भले ही कितना इनकार करे, उड़ी हमले के लिए ज्यादातर भारतीयों की नजर में वही जिम्मेदार है. भारत सरकार भी यही बात कर रही है, लेकिन बात जब ‘पाकिस्तान को सबक सिखाने की' आती है, तो विकल्प बहुत ही सीमित हैं और शायद कोई स्पष्ट फैसला में देरी की वजह भी यही है. वरना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक पर इतने ताने सुनने को नहीं मिलते.
यह भी देखिए, पाकिस्तान में दहशत के 10 साल
पाकिस्तान: दहशत के दस साल
अफगानिस्तान पर 2001 में तालिबान के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई के बाद से पाकिस्तान में इस्लामी कट्टरपंथियों ने हजारों लोगों की जान ली है. यहां तस्वीरों में पिछले एक दशक के कुछ प्रमुख कट्टरपंथी हमले.
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2017- शाहबाज कलंदर की मजार पर हमला
सिंध प्रांत के सेहवान में 16 फरवरी 2017 को एक सूफी संत शाहबाज कलंदर की मजार को निशाना बनाया जिसमें 70 से ज्यादा लोग मारे गए. आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट ने हमले की जिम्मेदारी ली है.
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2016 - क्वेटा पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज
24 अक्टूबर को क्वेटा के पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज पर तीन आतंकवादियों ने हमला किया. इस हमले में 60 से ज्यादा कैडेटों की मौत हो गई. इस साल के सबसे भयानक हमलों में से एक में तीनों आत्मघाती हमलावरों को मार डाला गया.
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2016 - क्वेटा में अस्पताल पर हमला
आतंकवादियों ने 8 अगस्त 2016 को क्वेटा के सरकारी अस्पताल पर आत्मघाती हमला किया. फायरिंग और उसके बाद हुए आत्मघाती हमले में 70 लोग मारे गए. निशाना वकीलों को बनाया गया था जो अस्पताल में बार एसोसिएशन के प्रमुख बिलाल अनवर कासी की लाश के साथ आए थे. उन्हें अज्ञात लोगों ने गोली मार दी थी.
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2016 - लाहौर में पार्क पर हमला
27 मार्च 2016 को लाहौर में एक लोकप्रिय पार्क पर आत्मघाती हमला हुआ जिसमें 75 लोग मारे गए. हमला ईसाई समुदाय पर लक्षित था जो ईस्टर मना रहे थे. मृतकों में 14 लोगों की शिनाख्त ईसाइयों के रूप में हुई, बाकी मुसलमान थे. तहरीके तालिबान से जुड़े गुट जमात उल अहरार ने जिम्मेदारी ली.
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2015 - कराची में एक बस को बनाया निशाना
कराची में सफूरा गोठ में 8 बंदूकधारियों ने एक बस पर हमला किया. फायरिंग में 46 लोग मारे गए. मरने वाले सभी लोग इस्माइली शिया समुदाय के थे. प्रतिबंधित उग्रपंथी गुट जुंदलाह ने हमले की जिम्मेदारी ली. हमले की जगह इस्लामिक स्टेट को समर्थन देने वाली पर्चियां भी मिली.
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2014 - पेशावर में बच्चों पर क्रूर हमला
16 दिसंबर 2014 को तहरीके तालिबान से जुड़े 7 बंदूकधारियों ने पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमला किया. आतंकियों ने बच्चों और स्टाफ पर गोलियां चलाईं और 154 लोगों को मार दिया. उनमें 132 बच्चे थे. यह पाकिस्तान में होने वाला अब तक का सबसे खूनी आतंकी हमला था.
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2013 - पेशावर में चर्च पर हमला
पेशावर में 22 सितंबर 2013 को ऑल सेंट चर्च पर हमला हुआ. यह देश के ईसाई अल्पसंख्यकों पर सबसे बड़ा हमला था. इस हमले में 82 लोग मारे गए. हमले की जिम्मेदारी तहरीके तालिबान पाकिस्तान से जुड़े एक इस्लामी कट्टरपंथी गुट जुंदलाह ने ली.
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2011 - चारसद्दा में पुलिस पर हमला
13 मई 2011 को खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के चारसद्दा जिले में शाबकदर किले पर दोहरा हमला हुआ. दो आत्मघाती हमलावरों ने एक पुलिस ट्रेनिंग सेंटर के बाहर दस दिन की छुट्टी के लिए बस पर सवार होते कैडेटों पर हमला किया और 98 लोगों की जान ले ली. कम से कम 140 लोग घायल हो गए.
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2010 - कबायली इलाके पर दबिश
उत्तर पश्चिम के मोहमंद जिले में एक आत्मघाती हमलावर ने व्यस्त बाजार पर हमला किया और 105 लोगों की जान ले ली. केंद्र शासित कबायली इलाके में ये हमला 9 जुलाई को हुआ. माना जाता है कि हमले का लक्ष्य कबायली सरदारों की एक मीटिंग थी. जिम्मेदारी तहरीके तालिबान पाकिस्तान ने ली.
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2010 - लाहौर नरसंहार
मई 2010 के आतंकी हमले को लाहौर नरसंहार के नाम से भी जाना जाता है. 28 मई को जुम्मे की नमाज के दौरान अल्पसंख्यक अहमदिया संप्रदाय की दो मस्जिदों पर एक साथ हमले हुए. 82 लोग मारे गए. हमले की जिम्मेदारी तहरीके तालिबान पाकिस्तान ने ली.
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2010 - वॉलीबॉल मैच को बनाया निशाना
पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी जिले बन्नू के एक गांव में वॉलीबॉल मैच चल रहा था. आतंकवादियों ने इस मैच को भी शांति में नहीं होने दिया. उस पर कार में रखे बम की मदद से आत्मघाती हमला हुआ. हमले में 101 लोग मारे गए. खेल का मैदान कत्लेआम का गवाह बना.
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2009 - लाहौर का बाजार बना निशाना
दिसंबर 2009 में लाहौर के बाजार में दो बम धमाके किए गए और देश के दूसरे सबसे बड़े शहर के भीड़ भरे बाजार में फायरिंग भी की गई. हमलों में कम से कम 66 लोग मारे गए. मरने वालों में सबसे ज्यादा तादाद महिलाओं की थी. इस हमले के साथ देश का प्राचीन शहर आतंकियों की जद में आ गया था.
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2009 - नया निशाना पेशावर
पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर में बसे शहर पेशावर के मीना बाजार में एक कार बम का धमाका किया गया. इस धमाके में 125 लोग मारे गए और 200 से ज्यादा घायल हो गए. पाकिस्तान की सरकार ने हमले के लिए तालिबान को जिम्मेदार ठहराया. लेकिन तालिबान और अल कायदा दोनों ने ही हमले में हाथ होने से इंकार किया.
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2008-राजधानी में लक्जरी होटल पर हमला
कट्टरपंथी आम लोगों पर हमले के तरह तरह के तरीके ईजाद कर रहे थे. एक ट्रक में विस्फोटक भर कर उन्होंने 20 सितंबर 2008 को राजधानी इस्लामाबाद के मैरियट होटल के सामने उसे उड़ा दिया. कम से कम 60 लोग मारे गए और 200 से ज्यादा घायल हो गए. मरने वालों में 5 विदेशी नागरिक भी थे.
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2008-पाकिस्तान की हथियार फैक्टरी पर हमला
वाह में 21 अगस्त 2008 को पाकिस्तान की ऑर्डिनेंस फैक्टरी पर दोहरा आत्मघाती हमला किया गया. हमलों में कम से कम 64 लोग मारे गए. यह पाकिस्तानी सेना के इतिहास में उसके संस्थान पर हुआ अब तक का सबसे खूनी हमला है. तहरीके तालिबान पाकिस्तान के एक प्रवक्ता ने हमले की जिम्मेदारी ली.
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2007- बेनजीर की वापसी पर बम हमला
सैनिक तानाशाह परवेज मुशर्रफ ने 2008 में चुनाव कराकर सत्ता के बंटवारे का रास्ता चुना था. दो बार प्रधानमंत्री रही बेनजीर भुट्टो चुनाव में भाग लेने निर्वासन से वापस लौटीं. करांची में उनके काफिले पर बम हमला हुआ. वे बाल बाल बची. लेकिन दो महीने बाद 27 दिसंबर को रावलपिंडी में भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया.
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लेकिन भारत की यही कशमकश पाकिस्तान और खास कर पाकिस्तानी सेना के हक में जाती है. भारत तय भी नहीं कर पाया है कि वो पाकिस्तान को क्या जबाव देगा, लेकिन जनरल राहील शरीफ ने हर कीमत पर देश की रक्षा का वादा कर फिर पाकिस्तानी लोगों का जरूर दिल जीत लिया होगा. हीरो तो लोग उन्हें पहले से ही मानते हैं. पाकिस्तान में मीडिया और सोशल मीडिया तो छोड़िए, ट्रकों तक पर राहील शरीफ के पोर्ट्रेट बने आपको मिल जाएंगे. पाकिस्तान में कहने को अभी लोकतंत्र है, लेकिन ‘राहील शरीफ अब तो आ जाओ' की फरियाद के साथ उनसे देश की सत्ता अपने हाथ में लेने की गुजारिश करने वालों की कमी नहीं है.
वैसे बात सिर्फ राहील शरीफ की नहीं है, बल्कि पाकिस्तानी सेना की है, जिस पर जनता को राजनेताओं से ज्यादा भरोसा रहा है. ज्यादातर लोगों की नजर में राजनेता भ्रष्ट हैं जबकि देश की असली रक्षक पाकिस्तान की सेना है. भारत जैसे पड़ोसी का डर हमेशा सेना पर लोगों के भरोसे को मजबूत करता है. भारत में जब भी किसी बड़े हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की बात उठती है, तो सबको यहीं चिंता सताती है कि जंग कहीं परमाणु युद्ध में न तब्दील हो जाए. पाकिस्तानी जनता के लिए भारत अगर उनके देश पर हमला करने से पहले सौ बार सोचता है तो इसकी वजह सिर्फ सेना और उसके बनाए परमाणु हथियार हैं. पाकिस्तानी लोग परमाणु बम तैयार करने का श्रेय किसी राजनेता से कहीं ज्यादा सेना को देंगे.
याद कीजिए, पेशावर का वह सिसकता स्कूल
पेशावर का सिसकता स्कूल
पाकिस्तान के पेशावर शहर में जिस स्कूल पर मंगलवार को तालिबान ने आतंकवादी हमला किया था, बुधवार को उसकी शक्ल किसी भूतहे घर की तरह लग रही थी. रिपोर्टरों ने स्कूल जाकर वहां का जायजा लिया.
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प्रवेश पर सुरक्षा
पाकिस्तानी सेना का एक जवान स्कूल के मुख्य द्वार पर पहरा देता हुआ. आलीशान दरवाजे से उस खतरनाक चेहरे का अंदाजा भी नहीं लग पा रहा है, जो आने वाली तस्वीरों में दिखने वाला है. कैसे बच्चों के एक स्कूल को तालिबान ने श्मशान में बदल दिया.
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चारों तरफ तहस नहस
नोटिस बोर्ड के आस पास दहशत के निशान मौजूद हैं. सेना के जवान उन जगहों को देख रहे हैं, जहां तालिबान के हमले से भारी नुकसान हुआ है. दीवार की ईंटें निकल चुकी हैं. गमले उलटे पड़े हैं. यह तस्वीर किसी स्कूल की तो नहीं लगती.
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ब्लैकबोर्ड की दीवार
स्कूल की इस दीवार पर कभी ब्लैकबोर्ड लगा होता होगा. लेकिन अब यह गोलियों से छलनी है. एक स्थानीय रिपोर्टर जब इस दीवार के पास से गुजरी, तो कुछ ऐसी तस्वीर बनी. मालूम पड़ता है कि मानो कोई जलजला आया हो.
तस्वीर: Reuters/F. Aziz
ये कैसा क्लासरूम
किताबें बिखरी पड़ी हैं, छात्रों का कोई नामोनिशान नहीं. गोलियां और बम खाकर पीछे की जख्मी दीवार काली पड़ चुकी है. इस सैनिक को बिखरी हुई किताबों के बीच रास्ता निकालना मुश्किल हो रहा है. सिर्फ 24 घंटे पहले यहां बच्चों से रौनक थी.
तस्वीर: AFP/Getty Images/A Majeed
आतंक की निशानी
पीछे की दीवार पर शायद स्कूल के प्रिंसिपलों की लिस्ट लगी है. लेकिन नजर उसके चारों ओर ज्यादा जा रही है, जो गोलियों से भुन चुका है. बोर्ड के चारों ओर के सुर्ख लाल धब्बे वो सब कुछ कह रहे हैं, जो मंगलवार को इस स्कूल में हुआ.
तस्वीर: Reuters/F. Aziz
अपनों की याद
कराची के एक स्कूल में दुआओं में खड़ा यह छात्र शायद अपने उन साथियों के अहसास को महसूस करने की कोशिश कर रहा है, जो तालिबान के कायराना हमले में मारे गए. पूरे पाकिस्तान के स्कूलों में मासूम बच्चों को श्रद्धांजलि दी गई.
तस्वीर: Reuters/A. Soomro
महिलाओं की श्रद्धांजलि
मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट की महिला सदस्यों ने भी मंगलवार की रात मारे गए बच्चों को श्रद्धांजलि दी और उनकी याद में मोमबत्तियां जलाईं. हमले में कम से कम 140 लोगों की मौत हो गई और तालिबान ने कई महिला टीचरों को जिंदा जला दिया.
तस्वीर: AFP/Getty Images/R. Tabassum
अपनों का गम
हमले की जगह पहुंचते हुए एक महिला अपनी सिसकियों को नहीं रोक पाई. हमले के वक्त स्कूल में कम से कम 500 बच्चे थे. इनमें से लगभग 125 बच्चे मारे गए, जबकि इतने ही और घायल हो गए. पाकिस्तान के इतिहास में यह सबसे क्रूर हमलों में गिना जा रहा है.
तस्वीर: AFP/Getty Images/A. Majeed
एहतेजाज की याद
पेशावर की इस घटना ने हंगू के युवा छात्र एहतेजाज की भी याद ताजा कर दी, जिसने जनवरी में अपने स्कूल में घुस रहे एक आत्मघाती हमलावर को गेट के बाहर दबोच लिया था. हमलावर ने विस्फोटक को उड़ा दिया, जिससे उसकी और एहतेजाज की मौत हो गई. लेकिन स्कूल में मौजूद सैकड़ों बच्चे बच गए.
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फिलहाल पाकिस्तान की बागडोर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के हाथ में है, लेकिन इस बात से किसी को इनकार नहीं कि देश की रक्षा और विदेश नीति से जुड़े सभी फैसले रावलपिंडी के सेना मुख्यालय में लिए जाते हैं. और ऐसा अब नहीं, बल्कि हमेशा से होता आया है. कई बार सैन्य जनरलों ने देश की बाकायदा बागडोर अपने हाथ में ली है, और जब सत्ता सीधे तौर पर उनके हाथ में नहीं होती है, तब भी बड़े फैसले उनकी मर्जी के बिना नहीं होते. देश के संसाधनों पर पहला हक सेना का माना जाता है. और इस सबके पीछे सिर्फ भारत से डर का मनोविज्ञान दिखाई पड़ता है.
जहां सेना का शासन में इतना दखल होगा, वहां लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत नहीं हो सकतीं. इसलिए पाकिस्तान के मामले में भारत की चुनौती नवाज शरीफ नहीं बल्कि राहील शरीफ है. वैसे भी मोदी और नवाज शरीफ ने तो शुरू शुरू में एक दूसरे से खूब दोस्ती गांठने की कोशिश की. लेकिन फिर, पहले पठानकोट और अब उड़ी के हमले ने तय कर दिया है कि भारत-पाकिस्तान रिश्तों की गाड़ी फिलहाल तो आगे नहीं बढ़ रही है.
मिलिए, पाकिस्तान की पहली लड़ाकू पायलट से
पाकिस्तान की पहली लड़ाकू पायलट
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आयशा फारूख पाकिस्तान की वह पहली महिला पायलट हैं जिन्होंने लड़ाकू विमान उड़ाने के लिए अंतिम परीक्षा भी पास कर ली.
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26 साल की आयशा को अपने पुरुष साथियों के साथ काम करने में जरा भी अलग महसूस नहीं होता. वह कहती हैं सब का काम एक जैसा है तो फर्क कैसा.
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पाकिस्तानी समाज में लड़कियों के लिए लड़ाकू विमान उड़ाने के सपने देखना अनोखी बात है.
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पारिवारिक दबाव और पुरुषों का प्रभाव अक्सर महिलाओं को इस बात के लिए मजबूर करता है कि वे इस तरह के किसी करियर को अपनाने का सपना भी ना देखें.
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पाकिस्तानी वायु सेना में इस समय 316 महिलाएं काम करती हैं. हालांकि युद्ध में महिलाओँ की भागीदारी पर पाबंदी है.
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आयशा उन 19 महिलाओं में से हैं जिन्होंने बीते 10 साल में वायुसेना में ट्रेनिंग ली, लेकिन लड़ाकू विमान उड़ाने वाली वह पहली हैं.
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आयशा मानती हैं कि पाकिस्तान के भौगोलिक और राजनैतिक हालात देखते हुए यह बहुत जरूरी है कि हर समय देश की रक्षा के लिए तैयार रहा जाए.
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अपने और पुरुष साथियों के सामने नाजुक दिखने वाली आयशा ने वायु सेना में शामिल होने का फैसला अपने परिवार के विरूद्ध जाकर लिया था.
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पाकिस्तान सेना में वैसे तो करीब चार हजार महिलाएं काम करती हैं, लेकिन उनके जिम्मे केवल डेस्क पर किए जाने वाले काम ही आते हैं.
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भारत में पाकिस्तान के खिलाफ जंग की आवाजें जितनी बुलंद होगी, पाकिस्तानी सेना के हाथ उतने मजबूत होंगे, और पाकिस्तान सरकार के कमजोर. ये बात दोतरफा रिश्तों में आड़े आती है. आजादी के बाद भारत में जहां लोकतांत्रिक संस्थाओं की जड़ें लगातार गहरी हुई हैं, वहीं पाकिस्तान में चुनी हुई सरकारों को हमेशा सेना की पसंद नापसंद का ख्याल रखना पड़ता है. आखिर में, कुछ पाकिस्तानी दोस्तों का जुमला याद आ रहा है जो मजाक में कहते हैं कि ‘हर देश के पास एक सेना होती है, लेकिन पाकिस्तान में सेना के पास एक देश है'.