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कानून और न्यायभारत

भारत: 50 की उम्र के बाद मां बनने का अधिकार मांगती महिलाएं

२७ अप्रैल २०२६

बॉम्बे हाई कोर्ट में 50 साल से अधिक उम्र में आईवीएफ पर लगी रोक को दो महिलाओं ने चुनौती दी है. अदालत इस मामले में मेडिकल रिस्क और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर सुनवाई कर रहा है. मामले की अगली सुनवाई 19 जून को होगी.

जर्मन राजधानी बर्लिन में आईवीएफ को माइक्रोस्कोप से देखता एक रिसर्चर
फर्टिलिटी सेंटर में आईवीएफ के दौरान अंडे के निषचन की प्रक्रिया इलेक्ट्रोमाइक्रोस्कोप से ऐसी दिखती हैतस्वीर: Jens Kalaene/dpa/picture alliance

हाल ही में भारत में महिलाओं के मां बनने के अधिकार और कानून की तय उम्र की सीमाओं के बीच टकराव का एक अहम मामला सामने आया है. बॉम्बे हाई कोर्ट में दो महिलाओं ने आईवीएफ से जुड़े कानून को चुनौती दी है. याचिकाकर्ताओं ने एआरटी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 में तय अधिकतम उम्र सीमा पर सवाल उठाया है.

इस मामले में 53 और 55 वर्ष की दो महिलाओं ने अपने पक्ष में स्त्रीरोग विशेषज्ञों के प्रमाणपत्र पेश किए हैं. जिनमें यह पुष्टि की गई है कि वे गर्भधारण करने और बच्चे को जन्म देने में सक्षम हैं. दोनों ने अदालत का रुख करते हुए इस कानून की धारा 21(g) को रद्द करने की मांग की है. यह 21 से 50 वर्ष की उम्र की महिलाओं को ही आईवीएफ जैसी तकनीकों की अनुमति देता है. उनकी वकील कल्याणी तुलांकर का कहना है कि यह प्रावधान संविधान के भाग तीन में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है.

उनका तर्क है कि केवल उम्र के आधार पर आईवीएफ ट्रीटमेंट से रोकना समानता के अधिकार के खिलाफ है. मां बनने का निर्णय निजी होता है. यह हर महिला का व्यक्तिगत फैसला होना चाहिए. सुनवाई के दौरान जस्टिस रविंद्र वी. घुगे और जस्टिस अभय जे. मंत्री की बेंच ने कहा कि भले ही मेडिकल सर्टिफिकेट दिए गए हैं. लेकिन याचिका में कोई ठोस वैज्ञानिक या शोध-आधारित डाटा नहीं है. जो यह साबित कर सके कि 50 साल की उम्र में महिलाएं सुरक्षित रूप से गर्भधारण कर सकती हैं.

आईवीएफ के लिए महिलाओं की उम्र की सीमा पर विवाद

अधिवक्ता कल्याणी तुलांकर ने अदालत में दलील दी कि राज्य सरकार के एआरटी नियमों में पुरुष डोनर की उम्र 55 साल तक तय की गई है. लेकिन जिस महिला को उसी डोनर के जरिए गर्भधारण करना है, यह उसकी उम्र 50 साल तक ही सीमित कर देता है.

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सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में बढ़ती उम्र में प्रजनन से जुड़े जोखिम होते हैं. केवल डॉक्टर की व्यक्तिगत राय काफी नहीं होती. भरोसेमंद मेडिकल रिसर्च पर आधारित मूल्यांकन जरूरी है.मामले की जटिलता को देखते हुए अदालत ने एक निष्पक्ष कानूनी विशेषज्ञ की मदद लेने का फैसला किया है. सीनियर अधिवक्ता आशुतोष कुम्भकोणी को 'अमिकस क्यूरी' नियुक्त किया है, जो मामले के कानूनी और चिकित्सीय पहलुओं को समझने में अदालत की मदद करेंगे.

स्त्रीरोग विशेषज्ञ और आईवीएफ एक्सपर्ट डॉ. अर्चना धवन बजाज ने डीडब्ल्यू से इस मुद्दे पर बात की. वह बताती हैं कि 50 साल के बाद, जब महिला मेनोपॉज में होती है, उस दौरान हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, ऑस्टियोपोरोसिस और लिपिड (कोलेस्ट्रॉल) से जुड़ी समस्याओं का खतरा काफी बढ़ जाता है.

अमृतसर, पंजाब के उम्रदराज दंपति दो साल तक आईवीएफ की कोशिश करने के बाद 2016 में पहली बार 70 और 79 की उम्र में माता-पिता बने थेतस्वीर: imago/Xinhua

वह आईवीएफ ट्रीटमेंट के लिए उम्र की सीमा तय करने का कारण समझाती हैं, "माता-पिता का बच्चे के साथ रहना जरुरी होता है. बच्चे की परवरिश उनकी जिम्मेदारी का ही हिस्सा है. करीब दस साल पहले बिहार से एक डॉक्टर दंपति आईवीएफ के लिए आए थे. महिला 65 साल की थीं और पति 67 साल के. मेडिकल जांच में सब ठीक था. उनकी उम्र को देखते हुए मैंने उन्हें सरोगेसी की सलाह दी. इसके बावजूद उन्होंने आईवीएफ का विकल्प चुना. उनके जुड़वा बच्चे हुए. दो साल बाद मां का निधन हो गया. उस समय पिता लगभग 70 साल के थे. ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि माता-पिता की अनुपस्थिति में बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी किसकी होगी और उनकी देखभाल कौन करेगा?"

क्या 50 साल की महिला आईवीएफ से मां बन सकती है?

गर्भावस्था के दौरान शरीर में कमजोरी, एनीमिया, मेटाबॉलिज्म और शुगर लेवल में उतार-चढ़ाव जैसे कई तरह के बदलाव होते हैं. 20 से 30 साल की उम्र में शरीर इन बदलावों को ज्यादा आसानी से संभाल पाता है. लेकिन 50 साल की उम्र में इन बदलावों का असर ज्यादा गंभीर हो सकता है. शरीर के लिए इन्हें झेलना कठिन हो जाता है. स्वास्थ्य जोखिम और मृत्यु की संभावना बढ़ जाती है.

मां बनने से सचमुच बदल जाता है महिला का दिमाग

डॉ. अर्चना का मानना है कि अदालत को इस मामले में याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला देने से पहले अच्छे से विचार करना चाहिए. मेडिकल टेस्ट यह पूरी तरह नहीं बता सकते कि 50 साल की उम्र में कोई महिला सुरक्षित रूप से मां बन पाएगी या नहीं. उस उम्र में गर्भधारण से दिल से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं.

वह कहती हैं, "उम्र बढ़ने पर दिल और नसें कमजोर हो जाती हैं. एंजियोग्राम से महिला की किडनी या दिल पर असर पड़ सकता है. शरीर के अंगों की भी प्राकृतिक उम्र घटने लगती है. सिर्फ तकनीक के आधार पर 50 साल के बाद आईवीएफ से बच्चे पैदा करने में कोई तर्क नहीं है."

इस मुद्दे के सामाजिक पहलू भी हैं. डॉ. अर्चना के मुताबिक, बच्चे को अधिक उम्र के माता-पिता के साथ बड़ा होना पड़ता है. इसका असर उसके रोजमर्रा के अनुभवों पर पड़ सकता है. बाकी बच्चों के माता-पिता युवा होते हैं. वह ध्यान दिलाती हैं कि बच्चे को अपने माता- पिता के साथ पीटीएम या बाहर जाना थोड़ा अजीब या असहज लगने लगता है.

साल 2008 में आईवीएफ की मदद से 70 की उम्र में पहली बार मां बनी थीं हरियाणा की राजो देवीतस्वीर: STRDEL/AFP/Getty Images

किसी भी उम्र में मां बनने का फैसला लेने का महिला को कितना हक?

सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता स्नेहा सिंह महिला और बच्चों के मामलों की जानकार हैं. उनका कहना है कि 50 साल की उम्र की सीमा को हटाने के पीछे कोई ठोस और तर्कसंगत वजह होनी चाहिए. तभी इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है. लेकिन अगर मेडिकल कारण मजबूत हैं, तो कोर्ट सीमा को सही भी ठहरा सकता है.

मां बनने की सही उम्र

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स्नेहा डीडब्ल्यू से बातचीत में बताती हैं, "महिला को अपने शरीर और प्रजनन से जुड़े फैसले लेने का पूरा हक है. मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) कानून के मामलों में कोर्ट ने माना है कि गर्भ रखना या नहीं रखना, यह फैसला महिला का होता है. इसे उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा माना गया है."

हालांकि इस मामले में राज्य की भूमिका को पूरी तरह बाहर नहीं रखा जा सकता और उसका दखल भी होगा. मां बनने पर महिला को सरकारी अस्पताल, स्वास्थ्य सेवाएं, पोषण योजनाएं और मातृत्व लाभ मिलते हैं. बच्चे के जन्म के बाद भी टीकाकरण, पोषण और शिक्षा जैसी योजनाओं में सरकार की जिम्मेदारी रहती है. स्नेहा का कहना है कि इसलिए मां बनने का फैसला निजी जरूर है. मगर इससे  समाज और सरकार दोनों की भूमिका भी जुड़ी हुई है. मामले की अगली सुनवाई 19 जून को होगी.

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