ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक फैसले में कहा कि ट्रांस महिलाओं को जन्मजात महिलाओं की परिभाषा में शामिल नहीं किया जा सकता. इस फैसले को कई महिला अधिकार कार्यकर्ता एक जीत मान रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद फॉर वुमन स्कॉटलैंड के सदस्यों में खुशी की लहर दौड़ गई. वे ये कानूनी लड़ाई 2018 से लड़ रही थीं.तस्वीर: Maja Smiejkowska/REUTERS
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"आज जजों ने वही कहा जो सच है कि महिलाओं को सुरक्षा उनके जैविक सेक्स के आधार पर मिली है. सेक्स एक सच्चाई है और अब महिलाएं उन जगहों पर अधिक सुरक्षित महसूस कर पाएंगी जो जगहें उनके लिए बनी हैं.” यह कहना है 'फॉर वुमन स्कॉटलैंड' नाम की संस्था की सहसंस्थापक सुजैन स्मिथ का.
ब्रिटेन की अदालत ने हाल ही में अपने एक फैसले में महिलाओं की परिभाषा रेखांकित करते हुए कहा कि केवल जन्मजात महिलाएं ही, महिलाओं की परिभाषा में आती हैं. इसमें ट्रांस महिलाएं शामिल नहीं हैं.
ट्रांस महिलाएं उन महिलाओं को कहते हैं जो जन्म के समय मिले जेंडर से जुड़ा हुआ महसूस नहीं करतीं. मसलन अगर जन्म के समय उनका लिंग पुरुष था लेकिन वे खुद को एक महिला मानती हैं.
ब्रिटेन के ट्रांस अधिकार कार्यकर्ता चिंतित हैं. उनके मुताबिक यह फैसला उन्हें सामाजिक जीवन से दूर करेगा.तस्वीर: Thomas Krych/ZUMA Press Wire/picture alliance
किसी एक समूह की जीत नहीं है यह फैसला: सुप्रीम कोर्ट
ब्रिटेन की अदालत ने अपने फैसले में यह साफ किया की ब्रिटेन में समानता का कानून सिर्फ उन्हीं महिलाओं पर लागू होता है जो जन्मजात महिला हैं. इसमें ट्रांस महिलाएं शामिल नहीं हैं. हालांकि, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि उनका यह फैसला पूरी तरह समानता के इस कानून की परिभाषा पर आधारित है.
साथ ही कहा कि अदालत इस फैसले को किसी समूह की कीमत पर किसी दूसरे समूह की जीत के तौर पर नहीं देखती. फैसले में इस बात पर भी जोर दिया गया कि ट्रांस समुदाय को कानून के दूसरे प्रावधानों के तहत सुरक्षा पहले ही मिली हुई है.
ब्रिटेन ने 2004 में जेंडर रेकग्निशन एक्ट पास किया था ताकि ट्रांस समुदाय का जीवन कानूनी तौर पर बेहतर हो सके. इस एक्ट के बाद उन्हें सर्टिफिकेट दिया जाने लगा जिससे उनके लिए अपनी पहचान साबित करना आसान हो गया था. इसके बाद 2010 में सेक्स के आधार पर अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए इक्वलिटी एक्ट लाया गया. इन दोनों ही कानूनों का जिक्र अदालत ने अपने फैसले में किया है.
संयुक्त राष्ट्र की नई जेंडर स्नैपशॉट 2024 रिपोर्ट कहती है कि 2030 तक महिलाओं को दुनिया में बराबरी दिलाने का लक्ष्य दूर होता जा रहा है. देखिए, महिलाओं की गैरबराबरी का कितना नुकसान झेल रही है दुनिया.
तस्वीर: Dibyangshu Sarkar/AFP/Getty Images
100 खरब डॉलर का नुकसान
यूनेस्को डेटा के अनुसार युवाओं, खासकर लड़कियों की शिक्षा और प्रशिक्षण में निवेश न करने से दुनिया को 100 खरब डॉलर से अधिक का नुकसान हो रहा है. सब-सहारा अफ्रीका में यह लागत 210 अरब डॉलर है, जो इस क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 10 प्रतिशत से अधिक है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि डिजिटल लैंगिक अंतर को खत्म करना निम्न और मध्यम-आय वाले देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. इससे अगले पांच साल में अनुमानित 500 अरब डॉलर की बचत हो सकती है.
तस्वीर: Sergio Lima/AFP
घरेलू हिंसा रोकने का फायदा
जिन देशों में घरेलू हिंसा के खिलाफ कानून हैं, वहां जीवनसाथी के साथ हिंसा की दर पांच प्रतिशत पाई गई. जबकि, जिन देशों में ऐसे कानून नहीं हैं उनमें यह दर 16 प्रतिशत है.
अगर खेती-किसानी में मजदूरी के लैंगिक अंतर को खत्म कर दिया जाए, तो वैश्विक जीडीपी में लगभग 10 खरब डॉलर की वृद्धि हो सकती है. साथ ही, 4.5 करोड़ लोगों को खाद्य असुरक्षा से बचाया जा सकता है.
तस्वीर: Yui Mok/empics/picture alliance
प्रतिनिधित्व नहीं है
2024 में महिलाओं ने राष्ट्रीय संसदों में केवल 27 प्रतिशत और स्थानीय सरकारों में 35.5 प्रतिशत सीटें हासिल की थीं. 107 देश ऐसे हैं, जहां कभी भी महिला राष्ट्र प्रमुख नहीं रही.
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सिर्फ 56 कानूनी सुधार
2019 और 2023 के बीच 56 सकारात्मक कानूनी सुधार दर्ज किए गए. इनमें महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के लिए लैंगिक कोटा बनाना, नागरिकता कानूनों में लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना, श्रम कानूनों में भेदभाव कम करना, महिलाओं के लिए संपत्ति अधिकारों की गारंटी और घरेलू हिंसा कानून शामिल हैं.
तस्वीर: Sukhomoy Sen/Pacific Press Agency/IMAGO
120 देशों में कोई कानून नहीं
जिन 120 देशों का डेटा उपलब्ध है, उनमें से एक भी ऐसा नहीं है जहां भेदभाव को रोकने, हिंसा से बचाव करने, विवाह और तलाक में समान अधिकार सुनिश्चित करने, समान वेतन और यौन व प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पूर्ण पहुंच के लिए सभी आवश्यक कानून मौजूद हों.
अदालत ने अपने फैसले में भी कहा कि ट्रांस सुमदाय के लिए अलग से प्रावधान मौजूद हैं लेकिन यह देखना भी जरूरी हो जाता है कि क्या उन्हें वे सारे अधिकार भी मिले हुए हैं जो किसी जन्मजात महिला को प्राप्त हैं. समान प्रतिनिधित्व की लड़ाई दोनों ही समुदाय लड़ रहे हैं. हालांकि, तुलनात्मक रूप से आज भी ट्रांस समुदाय, जन्मजात महिलाओं के मुकाबले अधिक हाशिये पर नजर आता है.
इस फैसले को पश्चिमी देशों में मजबूत होते इस नैरेटिव से भी जोड़ा जा रहा है जो सिर्फ दो जेंडरों को ही मानता है. जैसा कि अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप के आने के बाद हुआ और जर्मनी के चांसलर इन मेकिंग मैर्त्स भी कह चुके हैं कि उनका भी मानना है कि जेंडर सिर्फ दो होते हैं.
ब्रिटेन के कानूनविदों का कहना है कि इस फैसले के बाद समानता के कानून में बदलाव जरूरी हैं ताकि ट्रांस समुदाय के अधिकारों को सुनिश्चित किया जा सके.
24 साल के स्विस गायक नीमो संगीत के इस यूरोपीय महामुकाबले के पहले नॉन-बाइनरी विजेता बने हैं. साल 1988 के बाद पहली बार स्विट्जरलैंड को ये खिताब मिला. उस साल यह खिताब मशहूर अंतरराष्ट्रीय गायिका सेलीन डियोन ने जीता था.
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स्विट्जरलैंड के नीमो ने जीता 2024 का यूरोविजन
स्वीडन के शहर माल्मो में आयोजित यूरोविजन सॉन्ग कॉन्टेस्ट (ईएससी) को स्विट्जरलैंड के नीमो ने जीत लिया है. उन्होंने मुकाबले में रैप और रॉक गीत "द कोड" गाया. यह गीत उनके नॉन-बाइनरी व्यक्तित्व को खोजने के सफर के बारे में है.
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जर्मनी रहा 12वें नंबर पर
मुकाबला कौन जीतेगा इसका फैसला यूरोप और दुनिया भर के टेलीविजन दर्शकों के वोटों से तय होता है. साथ ही हिस्सा लेने वाले 37 देशों में से हर देश के संगीतकारों की एक जूरी भी वोट करती है. इन दोनों वोटों को मिलकर विजेता का नाम तय होता है. कुल 25 फाइनलिस्टों में से जर्मनी के गायक इसाक अपने गीत "ऑलवेज ऑन द रन" के साथ 12वें स्थान पर रहे.
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संगीत मुकाबले पर इस्राएल युद्ध का साया
यूरोविजन वैसे तो हमेशा ही सुर्खियां बटोरता है लेकिन इस साल इस पर राजनीति का साया भी दिखा. मुकाबले में इस्राएल की गायिका ईडन गोलान की भागीदारी से नाराज हजारों फलस्तीन समर्थक और इस्राएल विरोधी प्रदर्शनकारी माल्मो की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.
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यूरोविजन पर पहले भी हावी रही है राजनीति
यूरोविजन के आयोजक 'यूरोपीय ब्रॉडकास्टिंग यूनियन' का दावा है कि राजनीति का यूरोविजन पर कोई खास असर नहीं रहता, लेकिन 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद रूस को इसमें हिस्सा नहीं लेने दिया गया था. बेलारूस को भी 2021 में मानवाधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता पर उसके रिकॉर्ड को लेकर बाहर कर दिया गया था. 2009 में जॉर्जिया को बाहर किया गया, जिनके गीत "वी डोंट वाना पुट इन" में रूस के विरोध की झलक थी.
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गायक को अचानक कर दिया बाहर
ग्रैंड फाइनल से कुछ ही घंटे पहले डच कलाकार यूस्ट क्लाइन को यूरोविजन से बाहर कर दिया गया. ईबीयू के मुताबिक, स्वीडन की पुलिस बैकस्टेज घटी एक घटना की छान-बीन कर रही है. प्रोडक्शन क्रू की एक महिला सदस्य ने क्लाइन के खिलाफ शिकायत दर्ज की है और जांच के दौरान क्लाइन को मुकाबले में हिस्सा नहीं लेने दिया जा सकता था. उन्हें इस साल के खिताब के लिए एक तगड़ा दावेदार माना जा रहा था.
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कब और कहां शुरू हुआ था यह मामला
हालांकि, अदालत का फैसला आते ही एक पक्ष इस फैसले की जीत का जश्न मनाता जरूर नजर आया. अदालत में यह मामला ‘फॉर वुमन स्कॉटलैंड' (एफडब्ल्यूएस) ही लेकर आई थी. यह संस्था स्कॉटलैंड के ‘जेंडर रिप्रेजेंटेशन ऑन पब्लिक बोर्ड्स एक्ट' में महिलाओं की परिभाषा में ट्रांस महिलाओं को शामिल करने के फैसले के खिलाफ थी.
इस मामले की शुरुआत हुई 2018 में जब स्कॉटलैंड की सरकार ने कहा था कि जेंडर रेकग्निशन सर्टिफिकेट के आधार पर ट्रांस महिलाओं को महिला ही माना जाना चाहिए. तब सरकार का मकसद था इन बदलावों के जरिये लैंगिक समानता और ट्रांस प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देना.
कई देशों ने लैंगिक पहचान बदलने के लिए मेडिकल या मनोवैज्ञानिक जांच की अनिवार्यता समाप्त कर दी है. जानिए किन किन देशों ने दिया आसानी से लैंगिक पहचान बदलने का अधिकार.
तस्वीर: Iulianna Est/Zoonar/picture alliance
संयुक्त राष्ट्र के 25 सदस्य
अंतरराष्ट्रीय लेस्बियन और गे एसोसिएशन के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र के कम से कम 25 सदस्य देश "निषेधात्मक अपेक्षाओं के बिना कानूनी रूप से लैंगिक पहचान की अनुमति देते हैं." लेकिन सिर्फ कुछ ही देश ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को एक सरल से बयान के आधार पर अपनी पहचान बदलने की इजाजत देते हैं.
तस्वीर: Michael M. Santiago/Getty Images
स्वीडन
स्वीडन 1972 में ही लैंगिक पहचान बदलने को कानूनी मान्यता देने वाला देश बन गया था. लेकिन हाल ही में वहां नाबालिगों के लिए रीअसाइनमेंट हॉर्मोन ट्रीटमेंट पर पाबंदियां लगाई गई हैं.
तस्वीर: Iulianna Est/Zoonar/picture alliance
अर्जेंटीना
अर्जेंटीना को ट्रांसजेंडर अधिकारों के क्षेत्र में अगुवाई के लिए जाना जाता है. वहां 2012 में सिर्फ एक बयान के आधार पर राष्ट्रीय पहचान पत्र में लैंगिक पहचान बदलने की इजाजत दे दी गई थी. इसके बाद कई लैटिन अमेरिकी देशों ने ऐसा किया, जिनमें बोलीविया, चिली, कोलंबिया, इक्वाडोर, पेरू और उरुग्वे शामिल हैं.
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चिली
चिली में ऑस्कर जीतने वाली फिल्म "अ फैंटास्टिक वुमन" की अंतरराष्ट्रीय सफलता ने एक लैंगिक पहचान कानून के लिए समर्थन जुटाने का काम किया. 2019 में यह कानून पास हो गया. फिल्म में मुख्य भूमिका ट्रांसजेंडर अभिनेत्री डैनिएला वेगा ने निभाई थी.
स्कॉटलैंड में हाल ही में लोगों के लिए अपनी लैंगिक पहचान खुद निर्धारित करना आसान बनाने के लिए एक कानून पारित किया गया था. लेकिन कानून स्वीकृति नहीं मिली.
तस्वीर: David Cheskin/empics/picture alliance
डेनमार्क
डेनमार्क 2014 में बिना मेडिकल या मनोवैज्ञानिक जांच कराए लैंगिक पहचान बदलने के लिए वयस्कों को आवेदन करने की अनुमति देने वाला पहला यूरोपीय देश बन गया था. उसके बाद बेल्जियम, आयरलैंड, माल्टा और नॉर्वे ने भी वैसा ही किया.
स्पेन ने फरवरी 2023 में बयान के आधार पर लैंगिक पहचान बदलने की अनुमति दे दी. इसे देश की 'बराबरी मंत्री' आइरीन मोंटेरो ने "आगे की तरफ एक विशाल कदम" बताया है. स्पेन ऐसा करने वाले यूरोप का सबसे बड़ा देश बन गया है. 14 साल तक के नाबालिग भी अपने माता-पिता या कानूनी अभिभावकों की इजाजत से आवेदन कर सकते हैं.
तस्वीर: Susana Vera/REUTERS
जर्मनी
जून 2022 में जर्मनी की सरकार ने निजी बयान के आधार पर लैंगिक पहचान बदलने की अनुमति देने की योजना की घोषणा की. देश में 2018 में ही जन्म प्रमाण पत्रों पर तीसरे जेंडर को शामिल करने को कानूनी मान्यता दे दी गई थी.
तस्वीर: lev dolgachov/Zoonar/picture alliance
फ्रांस
फ्रांस में भी ट्रांसजेंडर लोगों को अपनी लैंगिक पहचान बदलने की अनुमति है, लेकिन उन्हें अदालत से स्वीकृति लेनी होती है.
तस्वीर: Julien Mattia/Le Pictorium/IMAGO
भारत
भारत में 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने तीसरे जेंडर को मान्यता दी. पड़ोसी देशों में से बांग्लादेश में 2018 से ट्रांसजेंडर लोग तीसरे जेंडर के रूप में बतौर मतदाता अपना पंजीकरण करा पा रहे हैं. पाकिस्तान 2009 में तीसरे जेंडर को कानूनी मान्यता देने वाले पहले देशों में से एक बन गया था. नेपाल में 2013 में नागरिकता प्रमाणपत्रों में एक ट्रांसजेंडर श्रेणी जोड़ दी गई.
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ऑस्ट्रेलिया
ऑस्ट्रेलिया में 2013 में पासपोर्ट में एक तीसरी लैंगिक श्रेणी जोड़ने की अनुमति दे दी गई.
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अमेरिका
अमेरिका में 2021 में विदेश मंत्रालय ने ट्रांसजेंडर लोगों को पासपोर्ट में 'X' श्रेणी चुनने की इजाजत दे दी. (एएफपी)
तस्वीर: Ivy Ceballo/ZUMAPRESS/picture alliance
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हालांकि एफडब्ल्यूएस ने इसका विरोध किया. तब यह संस्था सरकार के खिलाफ स्कॉटलैंड की अदालतों में गई लेकिन वहां वह केस हार गई. अब ब्रिटेन की अदालत ने इनके पक्ष में यह फैसला सुनाया है.
अदालत भले ही इस फैसले को एक समूह की जीत के तौर पर ना देखती हो लेकिन एफडब्ल्यूएस ट्रांस महिलाओं को महिला अधिकारों में शामिल करने के हमेशा खिलाफ रहा है. उदाहरण के तौर पर इनकी आधिकारिक साइट पर लिखा है, "संस्था मानती है कि केवल दो सेक्स ही होते हैं. सेक्स वैकल्पिक नहीं है ना ही उसे बदला जा सकता है. महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा और निष्पक्षता का अधिकार है.” इससे यह नजर आता है कि संस्था महिला अधिकारों के समर्थन से अधिक ट्रांस अधिकारों के विरोध में काम कर रही है.
रूस की संसद ने लिंग परिवर्तन करने पर प्रतिबंध का प्रस्ताव पेश किया है. ऐसे कई देश हैं, जहां लिंग परिवर्तन अवैध है और ऐसा करने पर सजा का भी प्रावधान है.
तस्वीर: Subrata Goswami/DW
अमेरिका
अमेरिका में लिंग परिवर्तन एक विवादास्पद मुद्दा है. कई राज्यों में ऐसी सर्जरी अवैध है. जून में ही टेक्सस ने अवयस्कों के लिए लिंग परिवर्तन सेवा उपलब्ध कराने पर प्रतिबंध लगाया. करीब एक दर्जन राज्यों में ऐसे प्रतिबंध लागू हैं.
तस्वीर: Spencer Platt/Getty Images
पाकिस्तान
पाकिस्तानी न्यायपालिका ने इसी साल मई में एक फैसला दिया कि ट्रांसजेंडर लोगों को मिली कानूनी सुरक्षा इस्लामिक दृष्टि से अवैध है, इसलिए लागू नहीं होती. हालांकि पाकिस्तान में लोग अपने आपको थर्ड जेंडर के रूप में रजिस्टर करा सकते हैं. 2009 में पाकिस्तान ऐसा करने वाला पहला दक्षिण एशियाई देश बना था. उसके बाद 2014 में भारत ने भी ऐसा ही किया.
तस्वीर: Betsy Joles/Getty Images
स्वीडन
लैंगिक अधिकारों के मामले में सबसे उदारवादी देशों में से एक स्वीडन ने 1972 में ही लिंग परिवर्तन को कानूनन मान्य कर दिया था. लेकिन पिछले साल बच्चों के लिए उपलब्ध कुछ हॉर्मोन थेरेपी पर पाबंदियां लगनी शुरू हुईं. इसकी वजह ‘मांग में बहुत ज्यादा वृद्धि के कारण सावधानी’ को बताया गया. वहां लड़कियों के लिए स्तन हटवाना भी अवैध है.
समलैंगिक अधिकारों के मामले में फिनलैंड को दुनिया के सबसे आधुनिक और उदार देशों में गिना जाता है. लेकिन 2020 में फिनलैंड ने अवयस्कों के लिए हॉर्मोन थेरेपी पर रोक लगा दी थी.
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हंगरी
हंगरी में दक्षिणपंथी नेता विक्टर ओर्बन की सरकार आने के बाद से लिंगभेद को लेकर रवैया काफी अनुदार हुआ है. मई 2020 में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए पहचान पत्र पर अपना नाम और लिंग बदलना असंभव कर दिया गया.
तस्वीर: Frank Hoermann/Sven Simon/IMAGO
अर्जेन्टीना
ट्रांसजेंडर अधिकारों को लेकर अर्जेन्टीना ने काफी तरक्कीपसंद रवैया बरता है. 2012 में ही वहां पहचान पत्रों पर लिंग बदलना आसान किया गया. कई दक्षिण अमेरिकी देशों ने भी ऐसा ही किया है.
2014 में डेनमार्क यूरोप का पहला देश बना था, जहां वयस्कों को लिंग परिवर्तन के लिए बिना किसी जांच के अर्जी देने का अधिकार दिया गया. उसके बाद माल्टा, आयरलैंड, नॉर्वे, बेल्जियम और पुर्तगाल ने भी ऐसा ही किया.
इसी साल फरवरी में संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसके तहत 16 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को पहचान पत्र में लिंग परिवर्तन की इजाजत दी गई. 14 वर्ष से अधिक आयु के लोग अपने अभिभावकों की सहमति से ऐसा कर सकते हैं. अब जर्मनी भी ऐसा ही करने जा रहा है.
तस्वीर: Susana Vera/REUTERS
फ्रांस
फ्रांस में लोग बिना लिंग परिवर्तन कराए भी पहचान पत्र पर अपना लिंग बदल सकते हैं. इसके लिए उन्हें सर्जरी कराने की जरूरत नहीं है लेकिन कोर्ट से इजाजत लेनी होती है.
तस्वीर: CHARLY TRIBALLEAU/AFP
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महिला अधिकार बनाम ट्रांस अधिकार
ब्रिटेन की मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट के फैसले के बाद एफडब्ल्यूएस ने फंड इकट्ठा करने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाएं. संस्था को हैरी पॉटर की लेखिका जेके रोलिंग से भी आर्थिक मदद मिली. रोलिंग अपने ट्रांस विरोधी विचारों के लिए सोशल मीडिया पर जानी जाती हैं. ब्रिटेन की अदालत के फैसले के बाद सोशल मीडिया पर वह लिखती हैं कि ट्रांस अधिकार कार्यकर्ता जो इस फैसले को अन्याय के रूप में देख रहे हैं, सच्चाई ये है कि उन्होंने वे अधिकार खोए हैं जो उनके कभी थे ही नहीं.
इस फैसले ने कार्यकर्ताओं को दो खेमों में बांट दिया है. एक वह जो शुरू से यह मानता आया है कि ट्रांस महिलाओं को महिला अधिकारों में जगह नहीं मिलनी चाहिए. उनके लिए अलग से प्रावधान होने चाहिए. वहीं, दूसरा खेमा वह जो मानता है कि पूरी बहस ही इस बात पर टिकी है कि ट्रांस महिलाएं भी महिलाएं हैं. उन्हें जन्मजात महिलाओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता. ब्रिटेन की सांसद नादिया व्हिटोम इस फैसले के विरोध में लिखती हैं एक शोषित समूह के अधिकारों पर हमला करना नारीवाद की जीत नहीं है.
शुरुआत से ही कई महिला अधिकार संगठन ट्रांस महिलाओं को महिला मानने से इनकार करते आए हैं. खासकर यूके में हाल के कुछ सालों में ऐसे महिला अधिकार संगठन फ्रंट पर आकर इस बात की पैरवी अधिक करने लगे हैं कि महिला अधिकार सिर्फ जन्म के आधार पर मिले जेंडर तक ही सीमित होने चाहिए. लॉ फर्म शेक्सपियर मार्टिन्यू के कर्मचारी फिलिफ पेप्पर कहते हैं कि यह फैसला दो समुदायों के बीच पहले से मौजूद खाई को और गहरा कर देगा.
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ट्रांस अधिकारों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है यह फैसला?
हालांकि, इस फैसले का वास्ता सिर्फ पब्लिक सेक्टर के बोर्ड में महिलाओं के प्रतिनिधित्व तक ही नहीं है. महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का जो धड़ा जो ट्रांस महिलाओं को महिला मानने का विरोध करता आया है, उनकी दलील यह होती है कि ट्रांस महिलाएं अपना जेंडर बदलकर उन अधिकारों का फायदा उठाती हैं जो सिर्फ जन्मजात महिलाओं के लिए बने हैं.
क्वीयर अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था स्टोनवॉल ने इस फैसले पर चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि वे चिंतित हैं कि इस फैसले को किस तरीके से ट्रांस समुदाय के खिलाफ लागू किया जाएगा.
भारत में ट्रांसजेंडरों को रक्तदान की इजाजत क्यों नहीं है
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ब्रिटेन की सरकार ने भी कहा है कि इस फैसले से कई मामलों में पार्दरशिता आएगी. खासकर स्वास्थ्य, शरणार्थी जैसे मामलों. उदाहरण के तौर पर कई स्वास्थ्य सुविधाएं केवल महिलाओं के लिए मौजूद हैं, अब उन स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ जेंडर रेकग्निशन सर्टिफिकेट के आधार पर ट्रांस महिलाओं को नहीं मिलेगा. इन बुनियादी सुविधाओं की गैरमौजूदगी ट्रांस समुदाय को अधिक हाशिये पर धकेल सकती है.
यह फैसला छोटे स्तर पर एक नजीर की तरह भी काम कर सकता है. मसलन ट्रांस महिलाएं, महिलाओं के लिए बने शौचालय या चेंजिंग रूम का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगी. अगर उनके लिए अलग से सुविधाएं मौजूद ना हो जो अक्सर होता है तो इस सूरत में उनके विकल्प क्या होंगे. इसलिए, ब्रिटेन के एक ट्रांस समूह ‘ट्रांसएक्चुअल' ने बयान जारी कर कहा कि इस फैसले का मकसद साफ है, ट्रांस समुदाय को ब्रिटेन के सामाजिक जीवन में शामिल होने से रोकना.