भारत के एक अखबार की खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एसआईआर, नए मतदाताओं के पंजीकरण और फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर चुनाव आयोग में सहमति नहीं थी. तो क्या मुख्य चुनाव आयुक्त स्वतंत्र निर्णय ले सकते हैं?
निर्वाचन आयोग के भीतर नए मतदाताओं का पंजीकरण, एसएआर और फॉर्म-6 में बदलावों को लेकर असहमति थी तस्वीर: Ishant Chauhan/Hindustan Times/Sipa USA/picture alliance
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देश के कई राज्यों में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बीच चुनाव आयोग के कामकाज और फैसला लेने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं. अखबार द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक एसआईआर को पूरे देश में लागू करने की जिम्मेदारी तीनों चुनाव आयुक्तों की है. अखबार के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार लिखित रूप से आपत्ति दर्ज की है.
ये आपत्तियां निर्वाचन आयोग के सबसे महत्वपूर्ण कामों से जुड़ी थीं, जैसे नए मतदाताओं का पंजीकरण, विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाना और हटाए गए नामों को दोबारा जोड़ना और नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील दायर करना.
एक लिखित आपत्ति में संधू ने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग ने दो चुनाव आयुक्तों की लिखित सलाह के खिलाफ जाकर कार्रवाई की. उन्होंने इस कार्रवाई को “अनाधिकृत और गैरकानूनी” बताया. फॉर्म 6 को लेकर भी आयुक्तों में मतभेद थे. नए फॉर्म में आवदेक से पूछा जा रहा था कि क्या उसका, उसके माता-पिता और दादा-दादी का नाम पिछली मतदाता सूची में था या नहीं.
चुनाव आयोग की निष्पक्षता और एसआईआर के तरीके को लेकर 2026 में विपक्षी सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी. हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना इतना आसान नहीं है.
1991 के कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की अलग प्रक्रिया तय नहीं थी. संविधान के तहत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर नियुक्तियां करते थे. मार्च 2023 में अनूप बर्नवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की समिति की सिफारिश पर नियुक्ति का निर्देश दिया. न्यायालय ने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति केवल सरकार के नियंत्रण में नहीं होनी चाहिए और निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखना जरूरी है.
बाद में बाद में 2023 के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) कानून में सीजेआई की जगह प्रधानमंत्री के नामित केंद्रीय मंत्री को चयन समिति में शामिल किया गया.
इस कानून के जरिए 1991 के कानून में कई अहम बदलाव किए गए. संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की है. नए कानून में निर्वाचन आयोग में एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और अन्य निर्वाचन आयुक्त (ईसी) होंगे जिनकी संख्या राष्ट्रपति तय करेंगे. इन सभी की नियुक्ति राष्ट्रपति, चयन समिति की सिफारिश पर करते हैं.
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है.
आलोचकों का कहना है कि चुनाव आयोग कोई सामान्य सरकारी संस्था नहीं बल्कि संवैधानिक संस्था है. उसका काम स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना है. कांग्रेस नेता जया ठाकुर ने इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी डाली थी. उनकी चिंता थी कि इस समिति में सरकार के दो सदस्य और विपक्ष का केवल एक सदस्य है. इसलिए उनके अनुसार सरकार के पास चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में अधिक प्रभाव हो सकता है. पहले सीजेआई की मौजूदगी सरकार और विपक्ष के बीच एक स्वतंत्र और न्यायिक संतुलन बनाती थी.
अध्यक्ष होने का यह अर्थ नहीं है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त अकेले सभी निर्णय ले सकते हैं. निर्वाचन आयोग अपने काम और फैसले नियमित बैठकों के माध्यम से करता है और जरूरत पड़ने पर कागजों या प्रस्तावों को आपस में भेजकर भी निर्णय लेता है. आयोग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, सभी निर्वाचन आयुक्तों को निर्णय लेने में समान अधिकार हैं. किसी के पास 'वीटो पावर' नहीं होती.
भारत में आने वाले समय में लोक सभा के चुनाव होने हैं. निर्वाचन आयोग के मुताबिक इस चुनाव में लगभग 97 करोड़ लोग मतदान करने के पात्र होंगे.
तस्वीर: Satyajit Shaw/DW
भारत में कितने मतदाता
भारतीय निर्वाचन आयोग के मुताबिक आगामी आम चुनावों में 96.88 करोड़ मतदाता वोट डाल पाएंगे. आयोग के मुताबिक रजिस्टर्ड मतदाताओं की संख्या के हिसाब से यह विश्व का सबसे बड़ा मतदाता समूह है.
तस्वीर: UNI
रजिस्टर्ड मतदाताओं में छह फीसदी की बढ़ोतरी
लोकसभा चुनाव 2019 के बाद से पंजीकृत मतदाताओं में छह प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
तस्वीर: MANJUNATH KIRAN/AFP
बढ़ी युवा मतदाताओं की संख्या
डाटा के मुताबिक लोक सभा चुनावों के लिए मतदाता सूची में 18-29 आयु वर्ग के दो करोड़ से अधिक युवा मतदाताओं को जोड़ा गया है.
तस्वीर: Reuters/R. De Chowdhuri
महिला मतदाता पीछे नहीं
स्पेशल समरी रिवीजन यानी विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एसएसआर) के दौरान महिला मतदाताओं का पंजीकरण पुरुष मतदाताओं को पार कर गया. एसएसआर 2024 के मुताबिक 2.63 करोड़ नए मतदाताओं ने रजिस्ट्रेशन कराया, जिनमें से लगभग 1.41 करोड़ महिला मतदाता हैं. जबकि पुरुषों की संख्या 1.22 करोड़ है.
तस्वीर: Manish Kumar/DW
लैंगिक समानता
मतदाताओं का लैंगिक अनुपात 2023 में 940 के मुकाबले 2024 में बढ़कर 948 हो गया है. मतलब एक हजार पुरुष मतदाताओं के मुकाबले 948 महिला मतदाता हैं.
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किस वर्ग के कितने वोटर
आयोग के मुताबिक देश में रजिस्टर्ड पुरुष वोटर्स की संख्या 2024 में 49.7 करोड़, महिला मतदाताओं की संख्या 47.1 करोड़, तीसरे लिंग के वोटर्स 48,057 और 88.35 लाख दिव्यांग वोटर्स हैं.
तस्वीर: Prabhjot Gill/AP Photo/picture alliance
बुजुर्ग मतदाता
आयोग के डाटा के मुताबिक देश में बुजुर्ग मतदाताओं की संख्या भी अच्छी खासी है. 80 साल से ऊपर वाले मतदाताओं की संख्या 1.86 करोड़ और सौ साल से ऊपर वाले वोटरों की संख्या 2.40 लाख हैं.
तस्वीर: Satyajit Shaw/DW
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इस बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग में निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं. यदि मुख्य निर्वाचन आयुक्त किसी एक राय के पक्ष में हों और जबकि दोनों निर्वाचन आयुक्त दूसरी राय के पक्ष में हों, तो 2-1 के बहुमत वाली राय आयोग का निर्णय होगी. इसलिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त का मत कोई अतिरिक्त या निर्णायक मत नहीं होता.
एसएस धनोआ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया
चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना नया नहीं है. अक्टूबर 1989 में लोकसभा चुनावों की घोषणा से महज 10 दिन पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने दो नए चुनाव आयुक्त . वी.एस सीगल और एस.एस धनोआ की नियुक्ति की.
उस समय ऐसी अटकलें थीं कि सरकार चाहती थी कि राष्ट्रपति चुनाव की नामांकन प्रक्रिया इस तरह तय हो कि ज्ञानी जैल सिंह के दोबारा चुनाव लड़ने की संभावना प्रभावित हो. सीईसी आर.वी.एस पेरी शास्त्री ने सरकार के अनुरूप कदम नहीं उठाया. बाद में वी.पी. सिंह सरकार ने इस फैसले को वापस ले लिया. इसके कारण चुनाव आयुक्तों के दोनों पद समाप्त हो गए और पांच साल पूरे होने से पहले ही आयुक्तों का कार्यकाल भी समाप्त हो गया.
धनोआ ने इसे अदालत में चुनौती दी. उनका कहना था कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है इसलिए सरकार इस तरह पद समाप्त करके चुनाव आयुक्तों को नहीं हटा सकती. अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति जरूरत के अनुसार चुनाव आयुक्त के पद बना या समाप्त कर सकते हैं. केवल मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों की तुलना में विशेष सुरक्षा दी गई है.
अंगुली पर फिरी स्याही का निशान! आपने वोट डाला, इसका ऐसा पक्का सबूत कि निशान मिटते-मिटते कई दिन लग जाते हैं. इस स्याही की कहानी क्या है? क्या ये इंकपेन वाली स्याही है?
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87 साल पुरानी एक कंपनी
कर्नाटक के मैसूर शहर में एक कंपनी है, मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड (एमपीवीएल). साल 1937 में इस कंपनी की नींव रखी थी कृष्णराज वाडियार चतुर्थ ने. वह मैसूर रियासत के शासक थे. मुमकिन है आप कृष्णराज के एक और मशहूर योगदान 'मैसूर सेंडल सोप' से भी वाकिफ हों.
तस्वीर: Rakesh Nair/REUTERS
बस यही कंपनी बनाती है खास स्याही
अब ये कंपनी कर्नाटक सरकार के नियंत्रण में है. एमपीवीएल आमतौर पर सार्वजनिक परिवहन की गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाला पेंट बनाती है, लेकिन ये भारत की इकलौती कंपनी है जिसे चुनावी स्याही बनाने का अधिकार है.
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चुनाव से पुराना नाता
पिछले करीब छह दशकों से मतदान की स्याही यहीं बनाई जा रही है. इस स्याही की मुख्य सामग्री है, सिल्वर नाइट्रेट. धूप पड़ने पर स्याही का रंग त्वचा पर गाढ़ा हो जाता है और नाखून पर बैंगनी रंग उतर आता है. बताया जाता है कि इसे मिटाना नामुमकिन है और इसका निशान करीब दो हफ्ते तक बना रहता है.
तस्वीर: Mahesh Kumar A./picture alliance/AP
बहुत पक्का निशान
कई लोग नींबू/पपीते के रस, मेकअप रिमूवर वगैरह से निशान मिटाने की कोशिश करते हैं और अक्सर नाकाम रहते हैं. कंपनी के प्रबंध निदेशक मुहम्मद इरफान ने रॉयटर्स को बताया कि ऐसी कोशिशों से निपटने के लिए मतदान अधिकारियों को चाहिए कि वो इंक लगाने से पहले वोटर की अंगुली को अच्छी तरह पोछ लें.
तस्वीर: Rakesh Nair/REUTERS
अब तक का सबसे बड़ा ऑर्डर
इस लोकसभा चुनाव में करीब 97 करोड़ लोग बतौर मतदाता पंजीकृत हैं. ऐसे में एमपीवीएल को चुनाव आयोग से अब तक का सबसे बड़ा ऑर्डर मिला है. हर शीशी में 10 मिलीग्राम स्याही होती है और इतना इंक लगभग 700 मतदाताओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
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रिकॉर्ड मात्रा में स्याही का उत्पादन
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, 2024 की शुरुआत से अबतक कंपनी स्याही की लगभग 27 लाख शीशी चुनाव आयोग को भेज चुकी है. यह रिकॉर्ड उत्पादन है.
तस्वीर: Rakesh Nair/REUTERS
सबसे ज्यादा स्याही कहां गई?
सबसे बड़ी खेप उत्तर प्रदेश भेजी गई है, वहीं 110 शीशीयों का सबसे छोटा ऑर्डर लक्षद्वीप का है. चुनाव आयोग प्रति शीशी एमपीवीएल को 174 रुपये का भुगतान करेगा.
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कई अन्य देशों को भी निर्यात
एमपीवीएल के पास कई अन्य एशियाई देशों की ओर से भी चुनावी इंक बनाने का ऑर्डर है. टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में एमपीवीएल कंबोडिया, फिजी और सियरा लिओन जैसे देशों में इस स्याही को निर्यात कर चुकी है. उसके पास मंगोलिया और मलेशिया के भी ऑर्डर हैं.
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टी.एन शेषन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया
यह आज के संदर्भ में सबसे जरूरी फैसला है. टी. एन शेषन को 12 दिसंबर 1990 को भारत का 10वां मुख्य चुनाव आयुक्त चुना गया.
1993 में चुनाव आयोग को फिर से तीन-सदस्यीय बनाया गया. एम.एस गिल और जी.वी. जी. कृष्णमूर्ति को चुना गया. तब पी.वी. नरसिंह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी.
शेषन ने इसे अदालत में चुनौती दी. 1995 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में टी.एन. शेषन ने आरोप लगाया कि सख्त आचार संहिता लागू करने और चुनाव स्थगित करने के उनके फैसलों से केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार नाराज थी. उनका दावा था कि पर्याप्त पुलिस और कर्मचारियों की उपलब्धता नहीं होने पर उन्होंने कुछ उपचुनाव स्थगित किए. खासकर त्रिपुरा में चुनाव स्थगित होने से कांग्रेसको राजनीतिक नुकसान हुआ. शेषन के अनुसार, सरकार उन पर अपने मुताबिक फैसले लेने का दबाव बना रही थी. उनके इनकार के बाद आयोग को बहु-सदस्यीय बनाकर उनकी शक्तियां सीमित करने का प्रयास किया.
सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने साफ किया कि यदि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच किसी निर्णय को लेकर मतभेद हो, तो बहुमत का फैसला माना जाएगा. कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सेवा की शर्तें और उन्हें हटाने की सुरक्षा अन्य निर्वाचन आयुक्तों से अलग हैं, यह नहीं माना जा सकता कि वे अन्य निर्वाचन आयुक्तों से ऊंचे पद पर हैं.
यह फैसला आज तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच शक्ति-संतुलन और निर्णय लेने की व्यवस्था को स्पष्ट करता है.
भारत की छह राष्ट्रीय पार्टियों ने 2023-24 में करीब 5,800 करोड़ रुपये कमाए. एक नई रिपोर्ट दिखा रही है कि पार्टियां कमाई के एक मोटे हिस्से के बारे में जानकारी नहीं दे रही हैं. जानिए किस पार्टी ने, कहां से, कितने करोड़ कमाए.
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एक साल में 5,800 करोड़ रुपये
भारत की छह राष्ट्रीय पार्टियों ने 2023-24 में कुल 5820.912 करोड़ रुपये कमाए. यह जानकारी एसोसिएशन फॉर डेमोक्रैटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने इकठ्ठा की है. रिपोर्ट के लिए संस्था ने बीजेपी, कांग्रेस, सीपीएम, बीएसपी, आप और एनपीईपी (नेशनल पीपल्स पार्टी) द्वारा सार्वजनिक की गई जानकारी का अध्ययन किया.
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ज्ञात स्रोतों से कितना मिला
रिपोर्ट के मुताबिक इन पार्टियों को ज्ञात स्रोतों (यानी चंदे में) से 2544.278 करोड़ रुपये मिले. इसकी जानकारी पार्टियों ने चुनाव आयोग को दी है. यह उनकी कुल रकम का 43.71 प्रतिशत है.
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अन्य ज्ञात स्रोत
चंदे के अलावा पार्टियां सदस्यता शुल्क, बैंक ब्याज, अखबार-पत्रिकाओं की बिक्री, संपत्ति की बिक्री आदि से भी पैसे कमाती हैं. इस माध्यम से 2023-24 में इन पार्टियों ने 553.12 करोड़ रुपये कमाए. यह उनकी कुल कमाई का 9.502 प्रतिशत है. इसके अलावा पार्टियों ने चुनावी बॉन्ड से 2524.136 करोड़ कमाए, जो उनकी कमाई का 43.363 प्रतिशत है.
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अज्ञात स्रोतों से कमाई
इन छह पार्टियों ने बताया है कि उन्होंने 199.6383 करोड़ रुपये अज्ञात स्रोतों से कमाए हैं. यह उनकी कुल कमाई का 3.425 प्रतिशत है. एडीआर के विश्लेषण के मुताबिक, अगर 2004-05 से 2023-24 तक के आंकड़े देखें, तो इस अवधि में इन सभी पार्टियों ने मिल कर 10,753.09 करोड़ रुपये अज्ञात स्रोतों से कमाए. यानी औसत हर साल 550 करोड़ से भी ज्यादा.
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कैसे अज्ञात स्रोत
एडीआर के मुताबिक अज्ञात स्रोत से मिली आय कमाई के उस हिस्से को कहते हैं जो पार्टियों को 20,000 रुपयों से कम के चंदे में मिली. इसमें 'कूपनों की बिक्री', 'राहत कोष', 'अन्य आय' आदि से मिली रकम शामिल होती है.
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कोई दूध का धुला नहीं
अज्ञात स्रोतों से कमाई सभी पार्टियां कर रही हैं. रिपोर्ट के मुताबिक 2023-24 में अज्ञात स्रोतों से सबसे ज्यादा कमाई घोषित करने वाली पार्टी सीपीएम रही, जिसने करीब 82 करोड़ रुपये कमाए. कांग्रेस ने करीब 78 करोड़, बीजेपी ने करीब 37 करोड़, आप ने 93 लाख और एनपीईपी ने 2.8 लाख रुपये कमाए.
तस्वीर: Satyajit Sahaw/DW
बीएसपी का अलग मामला
बीएसपी का कहना है कि उसकी अज्ञात स्रोतों से जरा भी कमाई नहीं हुई. उसने प्रतिभूतियों पर ब्याज से 5,000 करोड़, बैंक ब्याज से करीब 38 करोड़ और सदस्यता शुल्क से करीब 26 करोड़ रुपये कमाए.
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पूरा हिसाब नहीं देती पार्टियां
एडीआर का कहना है कि 2013 में ही केंद्रीय सूचना आयोग ने आदेश दिया था कि राजनीतिक पार्टियों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाया जाए, लेकिन पार्टियों ने अभी तक इस फैसले का पालन नहीं किया है. एडीआर का कहना है कि हर पार्टी को खुद ही अपनी कमाई के एक एक पैसे का हिसाब देना चाहिए.