1. कंटेंट पर जाएं
  2. मेन्यू पर जाएं
  3. डीडब्ल्यू की अन्य साइट देखें
कानून और न्यायभारत

प्रदर्शन का हक बनाम पुलिस की पाबंदी, क्या कहता है संविधान

समीरात्मज मिश्र
६ अक्टूबर २०२६

भारत में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन संविधान से मिला मौलिक अधिकार है, लेकिन पुलिस की अनुमति व प्रतिबंध को लेकर सवाल उठ रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की रोशनी में आखिर प्रदर्शन रोकने के लिए पुलिस के पास कितने अधिकार हैं?

नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन
तस्वीर: AICC/ANI

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल के प्रदर्शनों में पुलिस की अनुमति, बैरिकेडिंग, हिरासत और प्रदर्शनकारियों को निर्धारित जगह तक पहुंचने से रोकने को लेकर सवाल उठ रहे हैं. गांधी जयंती के दिन यानी दो अक्टूबर को चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शन के लिए दिल्ली पुलिस ने अनुमति नहीं दी थी. नई दिल्ली जिले में बीएनएस की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू थी. लुटिएंस दिल्ली में भी सुरक्षा बढ़ा दी गई थी.

इसके बावजूद प्रदर्शनकारी अलग-अलग रास्तों और स्थानों से जुटने की कोशिश करते रहे और यह सिलसिला लगातार चल रहा है. मामला अदालत गया और पांच अक्टूबर यानी सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति दिए जाने की मांग से जुड़ी एक याचिका को सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई. हालांकि अदालत ने अभी इस याचिका के गुण-दोष यानी मेरिट पर कोई फैसला नहीं दिया है.

दरअसल, भारत में सरकार या किसी संवैधानिक संस्था के फैसले के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से अपनी असहमति जताना नागरिकों के मौलिक अधिकारों में शामिल है. संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक और बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है.

लेकिन इन अधिकारों के साथ कुछ संवैधानिक सीमाएं भी जुड़ी हैं. अनुच्छेद 19(3) सार्वजनिक व्यवस्था, भारत की संप्रभुता और अखंडता के हित में उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है. और यही वह जगह है जहां मौजूदा बहस शुरू होती है.

सवाल यह है कि यदि देश का संविधान शांतिपूर्ण सभा और विरोध प्रदर्शन का अधिकार देता है तो किसी प्रदर्शन को अनुमति देने या रोकने के लिए पुलिस किन कानूनी आधारों का इस्तेमाल कर सकती है?

नई दिल्ली में छह अक्टूबर को प्रदर्शन रोकने के लिए भारी संख्या में फोर्स तैनात की गई थी.तस्वीर: Sumit/ANI

मौलिक अधिकार संविधानसम्मत, लेकिन असीमित नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में साफ किया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार मौलिक अधिकार है, लेकिन यह पूर्ण या असीमित अधिकार नहीं है और विभिन्न परिस्थितियों में इस पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.

साल 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़े विवाद पर विस्तार से विचार किया था. कोर्ट के सामने एक तरफ प्रदर्शनकारियों का अधिकार था और दूसरी तरफ आस-पास के इलाकों में रहने वाले लोगों की परेशानी, यातायात और सार्वजनिक व्यवस्था का सवाल था.

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन और सभा का अधिकार संविधान के तहत मौलिक अधिकार है, लेकिन इसके साथ ही यह भी कहा कि एक अधिकार को इस तरह प्राथमिकता नहीं दी जा सकती कि दूसरे लोगों का अधिकार पूरी तरह खत्म हो जाए. कोर्ट ने इस मामले में दोनों पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दिया था.

इस मामले में अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि जंतर-मंतर लंबे समय से प्रदर्शनों के लिए इस्तेमाल होता रहा है और प्रशासन ने इसे प्रदर्शन स्थल के तौर पर स्वीकार किया था. इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं था कि प्रदर्शन से परेशानी हो रही है या नहीं, बल्कि यह था कि उस परेशानी को कम करने के लिए क्या नियमन किया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील दुष्यंत पाराशर कहते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के कई ऐतिहासिक फैसलों में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि सिर्फ कानून-व्यवस्था बिगड़ने की अस्पष्ट आशंका, डर या जन असंतोष का बहाना बनाकर राज्य शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक नहीं लगा सकता.

डीडब्ल्यू से बातचीत में दुष्यंत पाराशर कहते हैं, "प्रतिबंध तभी जायज ठहराया जा सकता है जब राज्य के पास ठोस आधार हो. यानी प्रदर्शन से किसी तरह के हिंसक व्यवधान या खतरे की आशंका हो. असहमति या विरोध जताना लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है, जिसे केवल प्रशासनिक असुविधा या आशंका के आधार पर दबाया नहीं जा सकता.”

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद भी कुछ बिंदुओं पर असमंजस बरकरारतस्वीर: picture-alliance/NurPhoto/N. Kachroo

पुलिस किन आधारों पर प्रदर्शन रोक सकती है?

प्रदर्शन के लिए पुलिस की अनुमति की व्यवस्था अपने आप में नई नहीं है. सार्वजनिक स्थान पर बड़ी संख्या में लोगों के जुटने से यातायात, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े व्यावहारिक सवाल स्वाभाविक तौर पर पैदा हो सकते हैं लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब अनुमति देने या रोकने की प्रक्रिया में स्पष्ट और पारदर्शी मानदंड न हों.

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त मामले, जिसे शाहीन बाग मामले के रूप में भी जाना जाता है, में स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक रास्तों और जगहों पर अनिश्चित काल तक कब्जा नहीं किया जा सकता.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर से जुड़े 2018 के फैसले का भी उल्लेख किया और कहा कि प्रदर्शन के लिए अनुमति मांगने वाले प्रत्येक मामले को उसके संभावित प्रभाव के आधार पर देखा जाना चाहिए. इसमें यातायात में बाधा, सार्वजनिक रास्तों के इस्तेमाल और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जा सकता है. लेकिन बार-बार ऐसे आदेश जारी करना, जिनका व्यावहारिक परिणाम सार्वजनिक सभाओं और प्रदर्शनों पर लगातार रोक बन जाए, समस्या पैदा कर सकता है.

यानी कानूनी सवाल यह भी है कि क्या प्रशासन किसी खास प्रदर्शन से पैदा होने वाली वास्तविक और ठोस आशंका के आधार पर प्रतिबंध लगा रहा है या केवल सामान्य आशंका के आधार पर?

यूपी के पूर्व डीजीपी और रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी डॉक्टर वीएन राय कहते हैं, "कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रदर्शन को नियंत्रित करने की जरूरत पड़ सकती है. लेकिन संवैधानिक सवाल यह है कि प्रतिबंध आवश्यक, कारणसंगत और अनुपातिक हैं या नहीं. यदि किसी प्रदर्शन में हिंसा की वास्तविक आशंका है तो पुलिस प्रदर्शनकारियों की संख्या सीमित कर सकती है, समय और स्थान तय कर सकती है, रास्ता बदल सकती है या कुछ शर्तें लगा सकती है, लेकिन यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकने का आधार केवल सामान्य या अस्पष्ट आशंका हो, तो मामला मौलिक अधिकारों के संरक्षण का सवाल बन जाता है.”

कितना पारदर्शी है पुलिस का प्रदर्शनों की अनुमति देने या ना देने का तरीका?तस्वीर: Bhawika Chhabra/REUTERS

दिल्ली में प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर ही क्यों?

जंतर-मंतर दिल्ली में दशकों से राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का प्रमुख केंद्र रहा है. संसद और केंद्रीय सरकारी संस्थानों के नजदीक होने के कारण यहां प्रदर्शन करने का प्रतीकात्मक महत्व भी है.

दूसरी तरफ इस इलाके में आवासीय क्षेत्र, सरकारी और गैर-सरकारी दफ्तर भी हैं. साल 2018 के मामले में स्थानीय निवासियों ने प्रदर्शन के कारण होने वाली परेशानी और सार्वजनिक स्थान के इस्तेमाल को लेकर आपत्ति जताई थी. सुप्रीम कोर्ट ने इसी वजह से प्रदर्शनकारियों और आसपास रहने वाले लोगों के अधिकारों के बीच संतुलन की जरूरत बताई थी.

इसका मतलब स्पष्ट है कि संवैधानिक अधिकार होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी स्थान पर, किसी भी संख्या में और किसी भी तरीके से प्रदर्शन किया जा सकता है. दुष्यंत पाराशर कहते हैं कि इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है, कि सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर ऐसा प्रतिबंध भी नहीं लगाया जा सकता जिसका परिणाम शांतिपूर्ण विरोध की जगह को ही खत्म कर देना हो.

प्रदर्शनों के अधिकार के साथ ही प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई भी सवालों मेंतस्वीर: ANI/IMAGO

दिल्ली से बाहर भी यही सवाल

यह बहस केवल दिल्ली या जंतर-मंतर तक सीमित नहीं है बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रशासन की ओर से प्रदर्शन के लिए निश्चित स्थान, संख्या, समय और शर्तें तय करने की व्यवस्था मौजूद है. मुंबई के आजाद मैदान समेत देश के दूसरे प्रदर्शन स्थलों पर भी प्रदर्शन के लिए समय, संख्या और गतिविधियों से जुड़ी पाबंदियां लगती रही हैं.

मौजूदा प्रदर्शनों का एक दिलचस्प पहलू तकनीक का इस्तेमाल भी है. प्रदर्शनकारी अब केवल पोस्टर, नारे और सोशल मीडिया पर निर्भर नहीं हैं बल्कि इंटरनेट या मोबाइल नेटवर्क के जरिए भी बड़ी संख्या में लोगों को जोड़ते हैं और अपनी बातों को पहुंचाते हैं. लेकिन हाल के दिनों में प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट या तो बंद कर दिया जाता है या फिर बाधित कर दिया जाता है. यहां तक कि ऐसी स्थिति में संवाद बनाए रखने वाली दूसरी तकनीकों को भी बाधित किया जा रहा है.

भारत सरकार ने हटवाया ऐप स्टोर से बिटचैटतस्वीर: Algi Febri Sugita/SOPA Images/Sipa USA/picture alliance

इंटरनेट और संचार साधनों पर पाबंदी

इसी संदर्भ में बिटचैट (Bitchat) का मामला सामने आया है. यह एक विकेंद्रीकृत संदेश भेजने वाला ऐप है जो ब्ल्यू टुथ आधारित मेश नेटवर्किंग के जरिए इंटरनेट या मोबाइल नेटवर्क के बिना नजदीकी उपकरणों के बीच संदेश भेजने के लिए बनाया गया है.

लेकिन हाल ही में भारत के App Store और Google Play से Bitchat के हटने की खबर सामने आई. रिपोर्टों के मुताबिक, Apple ने भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की मांग के बाद इसे भारत में App Store से हटा दिया. हालांकि, इस कार्रवाई के विस्तृत कारण सरकार की ओर से सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किए गए हैं.

दरअसल, लोकतंत्र में विरोध सिर्फ सरकार के खिलाफ नारा लगाने का नाम नहीं है बल्कि यह नागरिकों के लिए सत्ता और संस्थाओं तक अपनी असहमति पहुंचाने का एक माध्यम भी है. लेकिन दूसरी ओर, सार्वजनिक स्थान किसी एक समूह के नहीं होते बल्कि वहां रहने वाले लोगों, यात्रियों, दुकानदारों और दूसरे नागरिकों के अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं. इसीलिए सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण पूर्ण स्वतंत्रता या पूर्ण प्रतिबंध के बजाय संतुलन का रहा है.

मौजूदा विवाद में भी असली सवाल यही है कि प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश तो की गई लेकिन उन्हें इसके लिए कोई वैकल्पिक जगह दी गई और क्या अनुमति से इनकार के कारण लिखित और स्पष्ट हैं? यही सवाल ये भी तय करेंगे कि क्या पुलिस और प्रशासन के ऐसे फैसले न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर टिक सकते हैं?

डीडब्ल्यू की टॉप स्टोरी को स्किप करें

डीडब्ल्यू की टॉप स्टोरी

डीडब्ल्यू की और रिपोर्टें को स्किप करें

डीडब्ल्यू की और रिपोर्टें