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नया रक्षा बैंक क्यों बनाना चाहता है नाटो का सदस्य कनाडा

ओंकार सिंह जनौटी रॉयटर्स, एएफपी, एपी
३ जुलाई २०२६

रूस का खतरा, ट्रंप का खराब मूड और बढ़ती रक्षा जरूरतें. इन चुनौतियों के बीच कनाडा 133 अरब डॉलर का एक वैश्विक रक्षा बैंक शुरू करना चाहता है. नाटो शिखर सम्मेलन में इसकी पहली परीक्षा होगी.

कनाडा के पीएम मार्क कार्नी
तस्वीर: Toby Melville/REUTERS

कनाडा, 7-8 जुलाई को तुर्की में होने वाले नाटो शिखर सम्मेलन में एक नई पहल की घोषणा करना चाहता है. इसका मकसद सहयोगी देशों की रक्षा क्षमता बढ़ाने के लिए सस्ती वित्तीय मदद जुटाना है. कनाडा की योजना एक वैश्विक रक्षा बैंक बनाने की है. इसका नाम 'डिफेंस, सिक्योरिटी एंड रेजिलिएंस बैंक' यानी DSRB रखा गया है. कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी इस परियोजना को ऐसे समय आगे बढ़ा रहे हैं, जब अमेरिकी नेतृत्व वाली पारंपरिक वैश्विक व्यवस्था कमजोर पड़ रही है. कार्नी जोर देते हुए कह रहे हैं कि मध्यम शक्तियों वाले देशों को मिलकर नई साझेदारियां बनानी चाहिए.

ट्रंप को साधने के लिए क्या क्या कर रहे हैं दुनियाभर के नेता

इस पहल के लिए कनाडा की प्रमुख वार्ताकार इसाबेल हुडों ने कहा कि अगले सप्ताह होने वाला नाटो सम्मेलन एक अहम पड़ाव है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स से हुडों ने कहा, "हम संस्थापक सदस्य देशों की लिस्ट घोषित करना चाहते हैं." कनाडा को उम्मीद है कि शुरुआत में करीब 10 देश इससे जुड़ेंगे. हुडों के मुताबिक शुरुआती सदस्य देशों में कनाडा व ज्यादातर यूरोपीय देश होंगे. हालांकि उन्होंने इन देशों के नाम नहीं बताए. हुडों कहा कि अंतिम घोषणा अब भी बातचीत के नतीजों पर निर्भर करेगी. फिलहाल निवेश को लेकर बातचीत जारी है.

अमेरिका पर कम निर्भर एक नई व्यवस्था पर बार बार जोर दे रहे हैं कनाडा के पीएम मार्क कार्नीतस्वीर: Carlos Osorio/REUTERS

133 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य

इस बैंक का उद्देश्य सहयोगी देशों की सुरक्षा मजबूत करना है. इसके लिए करीब 100 अरब पाउंड यानी 133 अरब डॉलर तक की सस्ती वित्तीय व्यवस्था बनाने की योजना है. हुडों ने कहा कि प्रधानमंत्री कार्नी, शुरुआत में पूर्णता के बजाए रफ्तार पर जोर दे रहे हैं.

अब तक सार्वजनिक रूप से केवल यूरोपीय देश लक्जमबर्ग ने इस पहल का समर्थन किया है. लक्जमबर्क चाहता है कि वह बैंक का यूरोपीय केंद्र बने. पहल की प्रमुख वार्ताकार हुडों के मुताबिक दक्षिण कोरिया के साथ बातचीत सकारात्मक रही है. उन्होंने कहा कि भविष्य में सोल के शामिल होने की संभावना 50-50 है. फिलहाल अन्य जी7 देशों के जुड़ने की संभावना कम नजर आ रही है.

अमेरिका और नाटो के यूरोपीय साझेदारों के बीच बढ़ रहे हैं मतभेदतस्वीर: Joeran Steinsiek/Steinsiek.ch/IMAGO

कौन कौन शामिल हो सकता है इस प्रोजेक्ट में

ब्रिटेन स्थित दुनिया के सबसे पुराने रक्षा थिंक टैंक, रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट के विश्लेषक लिनस टेरहॉर्स्ट का कहना है कि तुर्की का शिखर सम्मेलन इस परियोजना की असली परीक्षा होगा. उनके मुताबिक इस पहल को यूरोप की अन्य रक्षा परियोजनाओं से भी मुकाबला करना है. इनमें यूरोपीय संघ का सेफ कार्यक्रम भी शामिल है.

ब्रिटेन अब तक इस बैंक में शामिल होने से बचता रहा है. वह नीदरलैंड्स और फिनलैंड के साथ अपनी अलग सिक्योरिटी फाइनेंस योजना (MDM) पर काम कर रहा है. हालांकि दोनों परियोजनियों को जोड़ने की संभावना पर बातचीत हुई है. कार्नी ने कहा कि वह नए ब्रिटिश प्रधानमंत्री के साथ इस विषय पर चर्चा करना चाहते हैं. शुरुआत में दूरी बनाने वाला जर्मनी भी अब पर्यवेक्षक के रूप में बातचीत में शामिल हो चुका है और प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है.

रॉयटर्स ने कई सूत्रों के हवाले से कहा है कि इटली, स्पेन, तुर्की, बेल्जियम और यूक्रेन भी इस योजना में दिलचस्पी ले रहे हैं. नाटो शिखर सम्मेलन के मेजबान तुर्की ने इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है. लेकिन सूत्रों का कहना है कि अंकारा भी इस पर नजर बनाए हुए है. वहीं नीदरलैंड्स ने साफ कर दिया है कि वह इस परियोजना में शामिल नहीं होगा. 

नाटो के भीतर बढ़ती खटपट

DSRB का विचार 2024 में नाटो के पूर्व सलाहकारों, वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और बैंकरों के एक समूह ने पेश किया था. हाल के बरसों में यूक्रेन युद्ध, रूस के साथ तनाव और चीन की बढ़ती सैन्य ताकत ने पश्चिमी देशों पर रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव डाल दिया है. नाटो में सबसे बड़ी फौज और सबसे ज्यादा पैसा खर्च करने वाला देश अमेरिका, बाकी सदस्य देशों से कम खर्च से चिढ़ा हुआ है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नाराजगी के कारण जून 2025 में नाटो ने फैसला किया कि सदस्य देश 2035 तक अपनी जडीपी का 5 फीसदी हिस्सा, रक्षा और सुरक्षा पर खर्च करेंगे.

नाटो के अधिकारियों को चिंता है कि अंकारा के सम्मेलन में ईरान युद्ध का मुद्दा हावी हो सकता है. ट्रंप, नाटो के यूरोपीय सदस्यों पर ईरान युद्ध में साथ न देने का आरोप लगाते हैं. ट्रंप नाटो को "कागजी शेर" तक कहने के साथ ही गठबंधन छोड़ने की धमकी भी दे चुके हैं. वहीं यूरोपीय देश ट्रंप की कारोबारी नीतियों और ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की धमकियों से मायूसी झेल चुके हैं. 2025 का नाटो शिखर सम्मेलन में ग्रीनलैंड विवाद काफी हद तक थाया रहा.

2025 में अमेरिका और यूरोपीय साझेदारों के बीच महीनों तक ग्रीनलैंड पर विवाद छिड़ा रहातस्वीर: Odd Andersen/AFP

अमेरिका और यूरोपीय देशों के नजरिए में बड़ा अंतर

नाटो के यूरोपीय नेता अब भी रूस को सबसे बड़े खतरे के रूप में देखते हैं. नाटो महासचिव मार्क रुटे ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि रूस अपने सरकारी बजट का लगभग 50 फीसदी हिस्सा रक्षा पर खर्च कर रहा है. उन्होंने कहा कि नाटो को मॉस्को को लेकर गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए. हाल ही में नीदरलैंड्स की खुफिया एजेंसी ने भी चेतावनी देते हुए कहा कि यूक्रेन खत्म होने के बाद, रूस साल भर के भीतर किसी नाटो देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर सकता है.

दूसरी तरफ ट्रंप चाहते हैं कि यूरोपीय देश अब अपनी रक्षा का बड़ा हिस्सा खुद संभालें. वह अमेरिका का पूरा ध्यान चीन व हिंद-प्रशांत क्षेत्र  पर लगाना चाहते हैं. इससे जुड़े कुछ बदलाव शुरू भी हो चुके हैं. मसलन, अमेरिका ने संकट की स्थिति में नाटो को उपलब्ध सैन्य संसाधनों का दायरा कम करने का फैसला किया है. वॉशिंगटन, जर्मनी में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या में पांच हजार की कटौती करने का एलान भी कर चुका है. अब तक अमेरिका की सुरक्षा गारंटी में रहे यूरोपीय देशों को इन अमेरिकी कदमों से घबराहट हो रही है.

अटलांटिक महासागर के आर पार बसे सहयोगियों के बदलते नजरिए के बीच यूरोपीय देश चाहते हैं कि नाटो, चार साल से भी ज्यादा समय से रूसी हमले का सामना कर रहे यूक्रेन की और ज्यादा मदद करे. वहीं ट्रंप यूक्रेन की और ज्यादा मदद करने में मूड में नहीं दिखते हैं.

इन समीकरणों के बीच अंकारा शिखर सम्मेलन में सिर्फ एक नए रक्षा बैंक का भविष्य तय होगा, बल्कि इस बार का सम्मेलन, नाटो की एकता, यूरोप की रक्षा क्षमता और अमेरिका के साथ उसके रिश्तों का भी इम्तिहान लेगा.

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