जब बच्चे बीमार पड़ते हैं, तो अक्सर सही दवाएं मिल ही नहीं पातीं. खास बच्चों को ध्यान में रखकर बनाई जाने वाली दवाओं की कमी है. डोज में भी अंतर है. ऊपर से, कई दवाएं बच्चों के लक्षणों के लिए मंजूर ही नहीं हैं. ऐसे में फार्मेसी को गोलियां पीसकर, डोज बदलकर किसी तरह काम चलाना पड़ता है.