चीन ने तिब्बत में दुनिया का सबसे बड़ा बांध बनाने की योजना को मंजूरी दी है. यह बांध अब तक के सबसे बड़े बांध से तीन गुना ज्यादा बड़ा होगा. भारत और बांग्लादेश इस योजना से खुश नहीं हैं.
चीन और भारत के बीच विवाद की वजह है तिब्बत में हो रहा विकासतस्वीर: Arun Sankar/AFP/Getty Images
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चीन ने तिब्बत के यारलुंग जांगबो नदी पर दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोपावर बांध बनाने की मंजूरी दे दी है. यारलुंग जांगबो को भारत में ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है. यह बांध तिब्बत पठार के पूर्वी छोर पर बनेगा और हर साल 300 अरब किलोवाट-घंटा बिजली का उत्पादन करेगा. यह वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े थ्री गॉर्ज डैम की तुलना में तीन गुना से भी अधिक क्षमता वाला होगा.
चीन का कहना है कि यह बांध चीन के कार्बन न्यूट्रल बनने के लक्ष्य को पूरा करने में मदद करेगा. इसके अलावा, यह तिब्बत में नौकरियां पैदा करेगा और वहां के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को भी तेज करेगा. लेकिन भारत और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों ने इस परियोजना पर चिंता जताई है.
क्यों खास है ये डैम?
यारलुंग जांगबो नदी अपने 50 किलोमीटर के छोटे से हिस्से में 2000 मीटर की ऊंचाई से गिरती है. यह खड़ी ढलान इसे पनबिजली उत्पादन के लिए बेहद खास बनाती है. हालांकि, इस तरह की परियोजना को बनाने में बड़ी इंजीनियरिंग चुनौतियां भी होंगी.
दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क
रेल तकनीक के मामले में भी चीन दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है. भारत से बहुत पीछे रहने के बावजूद उसने ऐसी कामयाबी पाई कि अब दुनिया में चीन के रेल नेटवर्क का बोलबाला है. एक नजर चीन के ग्लोबल रेल नेटवर्क पर.
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तंजानिया-जाम्बिया रेल नेटवर्क
ताजारा कहा जाने वाले इस प्रोजेक्ट के जरिये 1976 में चीन ने पूर्वी अफ्रीका को मध्य और दक्षिणी अफ्रीका से जोड़ा. 1,860 किलोमीटर लंबे नेटवर्क को खड़ा करने के लिए चीन ने 50,000 कामगारों की मदद ली. पूरी योजना चीन की ही आर्थिक मदद से चली.
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तिब्बत तक
एक जुलाई 2006 के दिन तिब्बत की राजधानी ल्हासा तक ट्रेन पहुंचाकर विश्व को हैरान कर दिया. ट्रेन में खुद तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ भी सवार थे. समुद्र से 5,027 मीटर की ऊंचाई पर बना यह दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे नेटवर्क है.
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जर्मनी तक
अक्टूबर 2013 में चीन की मालगाड़ी, ट्रांस साइबेरियन रूट का इस्तेमाल करते हुए 9,820 किलोमीटर का सफर कर जर्मनी के पोर्ट शहर हैम्बर्ग पहुंची. उस वक्त यह रिकॉर्ड था. इस तरह चीन ने अपने हार्बिन शहर को जर्मनी के कारोबारी शहर हैम्बर्ग से जोड़ा.
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तुर्की में
जनवरी 2014 में चीन ने तुर्की में हाई स्पीड रेलवे नेटवर्क का काम पूरा कर दिया. अब इंस्ताबुल और अंकारा के बीच हाई स्पीड ट्रेनें चलती हैं.
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स्पेन तक
दिसंबर 2014 में चीन की 82 बोगियों वाली मालगाड़ी स्पेन की राजधानी मैड्रिड पहुंची. 18 नंबवर को यिवु शहर से चली यह मालगाड़ी 13,000 किलोमीटर लंबा सफर कर 9 दिसंबर को मैड्रिड पहुंची. ट्रेन, रूस, जर्मनी और फ्रांस समेत 8 देशों को पार करते हुए गई. आज चीन और यूरोप के बीच नियमित रूप से मालगाड़ियां आती जाती हैं.
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म्यामांर तक
2015 में चीन ने म्यामांर की राजधानी यांगोन और कुनमिंग शहर को रेल सेवा से जोड़ने का काम शुरू किया. प्रोजेक्ट 2020 में पूरा होगा. 1,920 किलोमीटर लंबे इस रास्ते पर 140 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से ट्रेनें चलेंगी.
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अंगोला में
2015 में चीन ने अंगोला में 1,344 किलोमीटर का रेल नेटवर्क तैयार कर चालू कर दिया. चाइना रेल कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन द्वारा बनाया गया यह रेल ढांचा देश का सबसे अहम आर्थिक गलियारा है.
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तेहरान तक
15 फरवरी 2016 को 32 बोगियों वाली चीनी मालगाड़ी ईरान की राजधानी तेहरान पहुंची. मालगाड़ी झेंगजियांग प्रांत से कजाखस्तान और तुर्कमेनिस्तान होते हुए ईरान पहुंची.
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फिर से सिल्क रूट का सफर
तेहरान तक ट्रेन पहुंचाकर चीन ने सैकड़ों साल पुराने सिल्क रूट के पैदल रास्ते को फिर से जीवित कर दिया.
नाइजीरिया में
जुलाई 2016 में चीन की मदद से बने रेल नेटवर्क पर नाइजीरिया में पहली ट्रेन चली. ट्रेन में खुद नाइजीरिया के राष्ट्रपति सवार थे. 186 किलोमीटर लंबा ट्रैक राजधानी अबूजा को काडुना शहर से जोड़ता है. ट्रैक की उच्चतम रफ्तार 150 किलोमीटर प्रतिघंटा है.
तस्वीर: picture-alliance/dpaMarthe van der Wolf
अफगानिस्तान तक
सितंबर 2016 में चीन ने अफगानिस्तान को जोड़ने वाले रेलवे ट्रैक का काम खत्म कर वहां भी मालगाड़ी पहुंचा दी.
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अदिस अबाबा-जिबूती रेल नेटवर्क
अफ्रीका के पांच देशों में भी चीन का रेल नेटवर्क है. अक्टूबर 2016 में अदिस अबाबा-जिबूती में चीन ने 120 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार वाला 752.7 किलोमीटर लंबा ट्रैक बना दिया. चीन इथियोपिया की राजधानी अदिस अबाबा में मेट्रो रेल नेटवर्क शुरू भी कर चुका है.
तस्वीर: picture-alliance/dpaMarthe van der Wolf
पाकिस्तान तक
दिसंबर 2016 में चीन ने पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची तक मालगाड़ी पहुंचा दी. मालगाड़ी पर 500 टन माल लदा था. ट्रेन के जरिये कुनमिंग से कराची तक परिवहन का खर्चा 50 फीसदी घट जाएगा. ट्रेन नियमित रूप से चलेगी.
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मोम्बासा-नैरोबी ट्रैक
चीन ने केन्या में 480 किलोमीटर लंबा रेल नेटवर्क बनाया है. इसका काम 2014 में शुरू हुआ था. 2,935 किलोमीटर लंबा ट्रैक राजधानी नैरोबी से मोम्बासा के बीच है. इस ट्रैक पर यात्री ट्रेनें 120 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से चल सकती हैं. देर सबेर इस ट्रैक के जरिये यूगांडा, रवांडा, बुरुंडी और साउथ सूडान को जोड़ा जाएगा.
तस्वीर: picture-alliance/dpa
नेपाल तक
चीन अब नेपाल तक रेल नेटवर्क का विस्तार करना चाहता है. नेपाल और चीन के बीच इस मसले पर बातचीत भी हो रही है. चीन चाहता है कि वह काठमांडू होते हुए पोखरा और लुम्बिनी तक रेल पहुंचाये. चीन नेपाल को तिब्बत से भी जोड़ना चाहता है.
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भारत तक
चीन चाहता था कि तिब्बत व नेपाल को जोड़ने वाले रेलवे ट्रैक से भारत भी जुड़े. ऐसा हुआ तो भारत का रेल नेटवर्क भी ग्लोबल नेटवर्क से जुड़ जाएगा. बीजिंग की कोशिश है कि तिब्बत को भारत, चीन और नेपाल के बीच व्यापारिक केंद्र की तरह इस्तेमाल किया जाए. हालांकि भारत ने अभी तक इस नेटवर्क के बारे में कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa
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इस बांध का निर्माण खर्च थ्री गॉर्ज डैम से भी ज्यादा होने की संभावना है. थ्री गॉर्ज डैम पर करीब 254.2 अरब युआन (34.83 अरब डॉलर) खर्च हुए थे. इस परियोजना में 14 लाख लोगों को विस्थापित किया गया था. तिब्बत के इस नए बांध के लिए कितने लोग विस्थापित होंगे, यह अभी साफ नहीं है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक चीन के अधिकारियों का कहना है कि यह परियोजना पर्यावरण पर बड़ा असर नहीं डालेगी. साथ ही, इससे नदी के पानी के बहाव पर भी ज्यादा असर नहीं होगा. लेकिन स्थानीय पारिस्थितिकी और विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है.
चीन के दक्षिण एशियाई पड़ोसियों भारत और बांग्लादेश ने इस परियोजना पर गंभीर सवाल उठाए हैं. दोनों देशों का कहना है कि बांध से नदी का प्राकृतिक बहाव बदल सकता है. इससे भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम में कृषि और जल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है.
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यारलुंग जांगबो का महत्व
यारलुंग जांगबो नदी तिब्बत से निकलकर भारत में ब्रह्मपुत्र नदी बनती है. इसके बाद यह बांग्लादेश में गंगा के साथ मिलती है. यह नदी भारत और बांग्लादेश के लाखों लोगों के लिए जीवनरेखा है.
चीन पहले ही इस नदी के ऊपरी हिस्से पर पनबिजली उत्पादन शुरू कर चुका है. अब वह और भी बांध बनाने की योजना बना रहा है. यह पड़ोसी देशों के लिए चिंता का विषय बन गया है.
तिब्बत में चीन अपनी पकड़ लगातार मजबूत कर रहा हैतस्वीर: ZED
यह बांध चीन द्वारा तिब्बत में बड़े पैमाने पर किए जा रहे ढांचागत विकास का हिस्सा है. चीन ने पिछले कुछ दशकों में तिब्बत में सड़कों, रेलवे और हवाई अड्डों का जाल बिछाया है. "गो वेस्ट" अभियान के तहत 1999 से यह काम तेजी से हो रहा है.
2021 तक तिब्बत में 1,18,000 किलोमीटर लंबी सड़कें बन चुकी थीं. इसके अलावा, नई रेल लाइनों और एक्सप्रेसवे का निर्माण भी जारी है. यह न केवल तिब्बत की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है, बल्कि भारत के साथ सीमा पर चीन की पकड़ भी मजबूत करता है. 2021 में चीन की बुलेट ट्रेन अरुणाचल प्रदेश की सीमा तक पहुंच गई थी.
तनाव की वजह
चीन का यह नया बांध पर्यावरण, पड़ोसी देशों और तिब्बत के लोगों पर गहरा असर डाल सकता है. हालांकि, चीन इसे अपनी कार्बन न्यूट्रल नीति का हिस्सा बताकर सही ठहरा रहा है.
ब्रह्मपुत्र पर भिड़ते भारत, चीन और बांग्लादेश
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बांध से तिब्बत में नौकरियों और बिजली उत्पादन के अवसर जरूर बढ़ेंगे. लेकिन विस्थापन, पर्यावरणीय नुकसान और भारत-बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के साथ तनाव भी बढ़ सकता है. चीन ने पहले भी तिब्बत में ऐसे प्रोजेक्ट शुरू किए हैं, जो न केवल आर्थिक बल्कि रणनीतिक उद्देश्यों को भी पूरा करते हैं.
यह डैम भारत और चीन के पहले से तनावपूर्ण संबंधों को और जटिल बना सकता है. दोनों देशों के बीच सीमा विवाद पहले से ही एक बड़ा मुद्दा है.