क्या ट्रंप के नए टैरिफ से चीन की जेब पर असर पड़ेगा?
स्वाति मिश्रा रॉयटर्स, एएफपी, एपी
१३ जनवरी २०२६
ईरान की अर्थव्यवस्था पहले ही प्रतिबंधों के कारण पस्त है. बदहाल इकॉनमी सरकार से नाराजगी की बड़ी वजह साबित हुई है. सैंक्शन्स के बावजूद चीन, ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है. क्या ट्रंप के नए टैरिफ चीन पर असर डालेंगे?
टैरिफ की घोषणा के जवाब में चीन ने कहा कि वह अपने अधिकारों और हितों की रक्षा करेगातस्वीर: Reuters/J. Nazca
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अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों पर 25 फीसदी टैरिफ लगाने की घोषणा की है. सोशल मीडिया पर यह एलान करते हुए ट्रंप ने लिखा कि टैरिफ तत्काल प्रभाव से लागू होगा.
ईरान एक तेल उत्पादक देश है और ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन है. इसके अलावा तुर्की, इराक, भारत और यूएई भी ईरान के प्रमुख व्यापारिक सहयोगियों में हैं.
सोशल पोस्ट में ट्रंप ने लिखा कि ईरान के साथ कारोबार करने वाले किसी भी देश को संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ सभी बिजनेस पर 25 फीसदी टैरिफ देना होगा. उन्होंने लिखा कि यह फैसला निर्णायक है और टैरिफ तत्काल प्रभावी होगातस्वीर: Andrew Caballero-Reynolds/AFP/Getty Images
टैरिफ की घोषणा के जवाब में चीन ने कहा कि वह अपने अधिकारों और हितों की रक्षा करेगा. ट्रंप के लगाए गए टैरिफ के बाबत पूछे जाने पर चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ नियंग ने कहा, "हम हमेशा से मानते आए हैं कि टैरिफ वॉर में कोई विजेता नहीं होता, और चीन दृढ़ता से अपने वैध अधिकारों और हितों की रक्षा करेगा."
चीन कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है. वह वेनेजुएला के तेल का सबसे बड़ा ग्राहक और रूसी तेल का भी टॉप खरीदार है. पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच इन देशों से तेल खरीदने के कारण चीन को बड़ा आर्थिक फायदा होता रहा है. सस्ता तेल खरीदने की वजह से हालिया सालों में उसकी भारी बचत होती रही है.
ईरान 'ऑर्गनाइजेशन ऑफ दी पेट्रोलियम प्रोड्यूसिंग कंट्रीज' (ओपीईसी) का सदस्य हैतस्वीर: AFP/Getty Images/J. Bugeja
ईरान से कितना तेल खरीदता है चीन?
डेटा और एनालिटिक्स फर्म 'केप्लर' के साल 2025 के आंकड़े बताते हैं कि जहाज के मार्फत ईरान से भेजे जाने वाले तेल का 80 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा चीन खरीदता है. अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरानी तेल के सीमित खरीदार हैं. सैंक्शन्स के बावजूद ईरान से तेल खरीदना चीन को सस्ता भी पड़ता है.
केप्लर के मुताबिक, बीते साल चीन ने औसतन 13.80 लाख बैरल प्रति दिन (बीपीडी) ईरानी तेल खरीदा. समुद्र के रास्ते चीन ने जितना तेल आयात किया, उसकी कुल मात्रा करीब 1.02 करोड़ बीपीडी है. यानी, इस इंपोर्ट में ईरान से खरीदे गए तेल की हिस्सेदारी 13 फीसदी से ज्यादा रही.
पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच रूस, वेनेजुएला और ईरान से सस्ता तेल खरीदकर चीन को हालिया सालों में आर्थिक फायदा होता रहा हैतस्वीर: Young Ho/Yonhap/Sipa USA/picture alliance
चीन में ईरानी क्रूड के मुख्य ग्राहक कौन हैं?
ईरान से निकले कच्चे तेल का चीन में सबसे बड़ा ग्राहक है, टीपॉट्स. ये दरअसल चीन की कुछ छोटी तेल रिफाइनरियां हैं, जो अमेरिकी प्रतिबंध के बावजूद ईरानी तेल खरीदती रही हैं. कम कीमत पर ईरान से क्रूड खरीदकर ये उसे प्रॉसेस करती हैं. जितना सस्ता तेल, टीपॉट्स के लिए उतना मुनाफा.
कारोबारियों और विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन की बड़ी सरकारी तेल कंपनियां 2018-19 से ही ईरानी तेल खरीदना बंद कर चुकी हैं. हालांकि, चीन में रिफाइनिंग की कुल क्षमता का करीब एक चौथाई हिस्सा टीपॉट्स के पास है.
डॉनल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात पर दुनियाभर की नजरें थीं. मीटिंग के सबसे अहम एजेंडा में रेअर अर्थ भी शामिल था. क्या है रेअर अर्थ? दुनिया को इसकी इतनी ज्यादा जरूरत क्यों है, और सप्लाई की चाबी चीन के पास क्यों है?
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17 धातुओं का एक समूह है रेअर अर्थ
डॉनल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की ताजा मुलाकात से दो चर्चित हासिल निकले. एक, टैरिफ घटाने का एलान. और दूसरा, रेअर अर्थ देने पर चीन की रजामंदी. रेअर अर्थ, या दुर्लभ खनिज संपदा 17 एलिमेंट्स का एक समूह है. इनमें ज्यादातर हैवी-मैटल हैं.
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सभी 17 रेअर अर्थ एलिमेंट्स के नाम
पीरियॉडिक टेबल के क्रम अनुसार इन तत्वों के नाम हैं: स्कैंडियम, इट्रियम, लैंथनम, सेरियम, प्रेजियोडिमियम, नियोडिमियम, प्रॉमीथियम, समैरियम, यूरोपियम, गैडोलिनियम, टेर्बियम, डिस्प्रोजियम, होल्मियम, एर्बियम, थूलियम, इटैर्बियम और लूटीशियम.
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कहां मिलता है ये?
हमारी पृथ्वी की तीन परतें हैं: क्रस्ट, मैंटल और कोर. क्रस्ट सबसे बाहरी परत है. ये सख्त चट्टानों और खनिजों से बनी है. रेअर अर्थ इसी हिस्से में पाया जाता है. यूनाइटेड स्टेट्स जिओलॉजिकल सर्वे का अनुमान है कि हमारी दुनिया में तकरीबन 110 मिलियन मीट्रिक टन रेअर अर्थ का भंडार है. इसमें से 44 मिलियन मीट्रिक टन अकेले चीन के पास है. वही इसका सबसे बड़ा उत्पादक है.
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इतना बड़ा भंडार, फिर रेअर क्यों कहते हैं
आमतौर पर ऐसा कुछ जो बहुत कम या असामान्य हो, दुर्लभ कहलाता है. रेअर अर्थ इस आशय में रेअर नहीं हैं. लेकिन, ये पृथ्वी के क्रस्ट में छोटी-छोटी मात्रा में फैले हैं. ऊपर से, ये दूसरे खनिजों के साथ मिले होते हैं. ऐसे में, कोयले की तरह एक जगह पर इनका विशाल भंडार मिलना मुश्किल है. नतीजतन, इसकी माइनिंग महंगी पड़ती है.
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किन चीजों में जरूरत पड़ती है?
रेअर अर्थ या उनसे बने रेअर अर्थ मैग्नेट, जरूरत की ऐसी ढेरों चीजों के लिए चाहिए जो बड़ी जरूरी हैं. इनमें रोजमर्रा की जरूरत की चीजें भी हैं, जैसे कि आईफोन, वॉशिंग मशीन, इलेक्ट्रिक गाड़ियां.
तस्वीर: Ronny Hartmann/AFP
इनकी सप्लाई ना मिले, तो क्या होगा?
काफी उन्नत उपकरण और मशीनरी में भी इनकी जरूरत है. जैसे कि मिसाइल, रेडार सिस्टम, मेडिकल उपकरण, तेल की रिफाइनिंग. इनकी उपलब्धता ना हो, तो सप्लाई चेन रुक जाएगी. मसलन, इस साल अप्रैल में जब चीन ने इनके निर्यात पर मुट्ठी बंद की, तो कई कार निर्माताओं को अपना उत्पादन रोकना पड़ा.
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कब से हो रही है इनकी माइनिंग?
दिलचस्प है कि रेअर अर्थ्स को बाकी खनिजों से अलग करने और उनसे अशुद्धियां-मिलावट दूर करने की प्रक्रिया विकसित करने में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने मदद की. ये बात है 1950 के दशक की. लेकिन, 1980 के दशक से ही चीन का इस इंडस्ट्री में दबदबा बनने लगा. इसकी कई वजहें थीं. जैसे कि कम लागत, पर्यावरण संबंधी कमजोर नियम और सरकारी मदद.
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रेअर अर्थ्स की माइनिंग से पर्यावरण पर क्या असर?
रेअर अर्थ्स की प्रॉसेसिंग में अक्सर बहुत भारी रसायन इस्तेमाल होते हैं. इनसे निकला विषैला कचरा मिट्टी, पानी और आबोहवा को प्रदूषित कर सकता है. अब ज्यादा ईको-फ्रेंडली तकनीकें विकसित की जा रही हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल बहुत कम ही होता है. प्रदूषण संबंधी चिंताओं के कारण कई देशों में इस सेक्टर को विकसित करने की राह में पर्यावरण कानूनों की अड़चन आती है.
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अभी बना रहेगा चीन का दबदबा
आज दुनिया में खनन के हिसाब से जितना उत्पादन होता है, उसका 60 फीसदी हिस्सा चीन में होता है. रिफाइन्ड प्रॉडक्शन और रेअर अर्थ मैग्नेट उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग 90 प्रतिशत है. वैकल्पिक सप्लाई चेन विकसित करने के लिए अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में नई परियोजनाएं चल रही हैं. लेकिन इन्हें संतोषजनक उत्पादन शुरू करने में कई साल लगेंगे. और, इस वजह से रेअर अर्थ में अभी चीन का दबदबा बरकरार रहेगा.
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कितना सस्ता पड़ता है ईरान का तेल?
ईरान का लाइट क्रूड, आईसीई ब्रेंट से काफी सस्ता पड़ता है. आईसीई ब्रेंट, कच्चे तेल की कीमतों का एक ग्लोबल बेंचमार्क है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कारोबारियों के हवाले से बताया कि दिसंबर से, ईरानी लाइट क्रूड आईसीई ब्रेंट की तुलना में करीब 8 से 10 डॉलर बैरल कम पर चीन को डिलिवर होता रहा है.
तुलना के लिए, ओमान के तेल पर पश्चिमी देशों का आर्थिक प्रतिबंध नहीं है. चीनी रिफाइनर ओमान क्रूड ना खरीदकर ईरान से लाइट क्रूड खरीदें, तो इसक मतलब है प्रति बैरल 8 से 10 डॉलर तक की बचत.
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क्या अमेरिकी प्रतिबंधों का असर होगा?
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को हतोत्साहित करने के लिए अमेरिका ने 2018 में तेहरान पर फिर से आर्थिक प्रतिबंध लगाए. जनवरी 2025 में अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से अब तक राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के तेल कारोबार पर कई और प्रतिबंध लगा चुके हैं.
चीन, ईरान का अहम सहयोगी है. वह ईरान के साथ व्यापार को वैध बताता है और प्रतिबंधों को सही नहीं मानता है. हालांकि, चीन के सीमा शुल्क के आंकड़ों में जुलाई 2022 से समुद्र के रास्ते ईरान से आए तेल का कोई रिकॉर्ड नहीं है. मगर, टीपॉट्स के माध्यम से ईरानी तेल का बड़ा हिस्सा चीन जरूर पहुंच रहा है.
दिसंबर 2025 में आई रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, टीपॉट्स कंपनियां 'बॉन्डेड स्टोरेज टैंक्स' के मार्फत ईरानी क्रूड खरीद रही हैं. ऐसे टैंक्स या वेअरहाउस, आयातकों को तत्काल कोई टैक्स या ड्यूटी चुकाए बिना इंपोर्ट किए गए सामान को सुरक्षित तरीके से जमा रखने का जरिया देते हैं. रॉयटर्स ने कारोबारी सूत्रों के हवाले से बताया कि यहां भंडार करके रखे गए कच्चे तेल को प्रॉसेसिंग प्लांट तक पहुंचाने में कुछ ही दिन लगते हैं और यह विकल्प सस्ता भी पड़ता है.