पैकिंग से डिलीवरी तक, सब करेगा रोबोट
४ जनवरी २०१८
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लंदन के साइंस म्यूजियम में रोबोट्स नाम की प्रदर्शनी एक अनूठा प्रयोग है. इस प्रदर्शनी में पांच सदियों के रोबोट्स दिखे हैं. आप भी देखिए...
रोबोट्स के 500 साल की झलक
लंदन के साइंस म्यूजियम में रोबोट्स नाम की प्रदर्शनी एक अनूठा प्रयोग है. इस प्रदर्शनी में पांच सदियों के रोबोट्स दिखे हैं. आप भी देखिए...
एनिमाट्रोनिक बेबी
यह रोबोट कहीं से भी किसी इंसानी बच्चे से अलग नहीं दिखता. हालांकि यह बस हाथ और पांव ही हिला पाता है लेकिन ऐसा अहसास होता है कि यह सांस ले सकता है. कभी कभार छींक भी देता है. इस तरह के रोबोट्स फिल्मों के लिए बनाए जा रहे हैं.
ऑटोमेटन मंक
रोबोट शब्द का इस्तेमाल 1920 में शुरू हुआ लेकिन इंसान की कल्पनाओं में मशीनी मानव का वजूद सदियों से है. जैसे यह मशीनी साधू जिसे 1560 में स्पेन में बनाया गया था. यह चाबी से चलता है.
सिल्वर स्वान
1773 में बनाया गया है हंस किसी अजूबे से कम नहीं. चाबी घुमाने पर यह हिलता है, मछली पकड़ता है. इसके बारे में उपन्यासकार मार्क ट्वेन ने लिखा था कि यह इंसान की अक्लमंदी का जीता जागता सबूत है.
लौहे के हाथ
रोबोट तो बहुत बाद में बनने लगे. पर कटे अंगों की जगह नकली अंगों का इस्तेमाल मानव ने बहुत पहले शुरू कर दिया था. ये हाथ और बाजू मिस्र में एक ममी से मिले थे, जो 950-710 ईसा पूर्व की थी.
ये हैं पहले रोबोट
1920 में चेक लेखक कारेल कापेक ने एक साइंस फिक्शन नाटक लिखा था. आर. यू. आर. यानी रोसम्म यूनिवर्सल रोबोट्स नाम के इस नाटक से रोबोट शब्द का इस्तेमाल शुरू हुआ. चेक भाषा में रोबोटा शब्द का मतलब है बेगार.
सिनेमा में कदम
सिनेमा का पहला रोबोट एक महिला थी. 1927 में आई साइंस फिक्शन फिल्म मेट्रोपोलिस से रोबोट ने सिनेमा में कदम रखा था. यह फिल्म 2026 के वक्त की कहानी थी.
टर्मिनेटर
हम रोबोट्स को जिस तरह सोचते समझते हैं, वह धारणा मूलतः कापेक के नाटक से ही आई है. लेकिन काल्पनिक रोबोट्स के मामले जेम्स कैमरून की फिल्म द टर्मिनेटर शायद सबसे चर्चित कृति है.
फिल्में भी
रोबोट्स किस तेजी से जिंदगी में शामिल हो रहे हैं, यह दिखाने के लिए प्रदर्शनी में वे फिल्में भी दिखाई गईं जो रोबोट्स पर आधारित हैं. जैसे 2001 की फिल्म आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और 2015 की फिल्म एक्स माकिना.
इंसान क्यों करे
हाल के सालों में यह अवधारणा तेजी से मजबूत हुई है कि इंसान बोरियत भरे मशीनी काम क्यों करे, जबकि रोबोट से वे काम लिए जा सकते हैं. तस्वीर में आप बैक्सटर को देख रहे हैं तो कुछ ही मिनट काम सीख जाता है. इसकी कीमत है करीब 25 हजार डॉ़लर.
खबरनवीस
जापान की कोडोमोरोएड न्यूज रीडिंग रोबोट है. 2014 से यह खबरें पढ़ रही है. कई भाषाओं में खबरें पढ़ सकती है और हंसी-मजाक भी कर लेती है. बस थोड़ी अकड़ू सी दिखती है. रिपोर्ट: एलिजाबेथ ग्रेनियर/वीके