किडनी प्रत्यारोपण के लिए भारत में क्यों है लंबा इंतजार?
२ जून २०२६
30 मार्च 2026 को उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में पुलिस ने एक किडनी रैकेट का भंडाफोड़ किया. इसकी जांच में पता चला कि यह नेटवर्क सिर्फ कानपुर तक ही सीमित नहीं था बल्कि नोएडा, लखनऊ, मेरठ और दिल्ली से लेकर देहरादून तक इसकी जड़ें फैली हुईं थी. देश भर के अलग-अलग हिस्सों से लोगों को बरगलाकर, उनसे किडनी लेकर अवैध तरीके से जरूरतमंद लोगों को बेची जा रही थी.
भारत में 13.8 करोड़ मरीज
क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) से दुनिया भर में 78.8 करोड़ लोग जूझ रहे हैं. भारत में यह संख्या 13.8 करोड़ है, जो चीन के बाद दुनिया में किसी देश की दूसरी सबसे बड़ी संख्या है. यह भी कहा जा सकता है कि भारत के लगभग हर 10 में से एक व्यक्ति को किडनी से जुड़ी किसी ने किसी तरह की बीमारी है. लगभग दो लाख नए मरीज हर साल एंड स्टेज रीनल डिजीज (ईएसआरडी) की चपेट में आ रहे हैं. यह अवस्था तब आती है जब किडनी लगभग काम करना बंद कर देती है.
1990 से 2016 के बीच भारत में क्रॉनिक किडनी डिजीज से होने वाली मौतें 5.2 लाख से बढ़कर 11.8 लाख हो गईं थीं. द मिलियन डेथ स्टडी शोध पत्र के अनुसार, 2015 में ही सिर्फ किडनी फेल होने से भारत में एक लाख 36 हजार लोगों की मौत हुई.जाहिर है कि भारतीय लोगों के स्वास्थ्यसे जुड़े बड़े खतरों में किडनी की बीमारी भी शामिल हो गई है.
जो दो लाख मरीज किडनी की बीमारी की गंभीर स्थिति में पहुंचते हैं, उनमें से कितनों का किडनी ट्रांसप्लांट हो पाता है? इस सवाल के जवाब में 2024 के आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ष भारत में कुल 18 हजार 911 ऑर्गन ट्रांसप्लांट हुए थे, जिनमें सिर्फ 13 हजार 476 किडनी ट्रांसप्लांट था. बाकी बचे लोग या तो डायलिसिस पर होते हैं या फिर उनकी मौत हो जाती है, और यहीं से शुरुआत होती है अवैध ट्रांसप्लांट के रैकेट की.
अंगदान की कमी
नेशनल ऑर्गन एंड टिशु ट्रांसप्लांट यूनिट (नोट्टो) के 2023 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में ब्रेन डेड या मौत के बाद अंगदान करने वालों से महज 1,099 अंगदान हुए. इनमें पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या ज्यादा है. अंगदान के 90% मामले भी केवल पांच दक्षिणी राज्यों के हैं. उत्तर प्रदेश में सिर्फ तीन लोगों के परिवार ने मौत के बाद उनके अंगदान की मंजूरी दी, जबकि देश की आबादी में सबसे बड़ा हिस्सा इसी राज्य का है. 2024 में इस राज्य में कुल 447 किडनी ट्रांसप्लांट हुए. से में उत्तर प्रदेश की स्थिति और भी ज्यादा विकराल दिखती है.
डॉ राजेश हर्षवर्धन खनऊ के संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट में कार्यरत हैं. वह हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन के प्रमुख और ऑर्गन एंड टिशु ट्रांसप्लांट यूनिट (सोट्टो) के नोडल अधिकारी भी हैं. वह कहते हैं, "क्रॉनिक किडनी डिजीज को ‘साइलेंट डिजीज' भी कहा जाता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इसके लक्षण काफी बाद में दिखाई पड़ते हैं. किडनी की कार्यक्षमता 60 से 70% तक गिरने के बाद ही इस बीमारी के संकेत सामने आते हैं."
क्रॉनिक किडनी डिजीज के लक्षणों में पैरों और चेहरे पर सूजन, थकान, भूख का खत्म होना, पेशाब में झाग या खून और रात को बार-बार उठना जैसी बातें शामिल होती हैं. इस बीमारी के संभावित कारणों में लगातार खराब जीवनशैली, प्रदूषित पानी का अधिक समय तक उपयोग, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या बार-बार किडनी में संक्रमण होना हो सकता है. डॉ हर्षवर्धन का कहना है कि भारत में पर्चे के यानी ओवर द काउंटर दर्द निवारक दवाएं आसानी से मिल जाती हैं. इनका लंबे समय तक उपयोग भी किडनी को प्रभावित करता है.
किडनी के रोगियों का इलाज
डॉ हर्षवर्धन बताते हैं कि किडनी के गंभीर रोगियों के लिए डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट, यही दो इलाज हैं. डायलिसिस वह प्रक्रिया है जो एक मशीन के जरिए किडनी का काम करती है. डायलिसिस की प्रक्रिया भारत जैसे विकासशील देश में एक आम व्यक्ति के लिए आसान नहीं है.
किडनी फेल होने की स्थिति में सप्ताह में दो से तीन बार और हर प्रक्रिया में तीन से चार घंटे का समय मरीज को अस्पताल में बिताना पड़ता है. एक निजी केंद्र में डायलिसिस की एक प्रक्रिया में 2,200 रुपए से 5,200 रुपए तक का खर्च आता है. इस लिहाज से प्रति व्यक्ति सालाना ढाई लाख से सात लाख रुपए तक का खर्च सिर्फ डायलिसिस की प्रक्रिया पर आता है. एक अनुमान के अनुसार, 2018 में एक लाख 75 हजार मरीज क्रॉनिक डायलिसिस पर थे. इनमें से दो तिहाई मरीज बिना इलाज के ही मर गए.
किडनी ट्रांसप्लांट के बारे में डॉ हर्षवर्धन का कहना है, "किडनी मरीजों के लिए ट्रांसप्लांट हमेशा से ही एक बेहतर विकल्प रहा है. इससे न केवल जीवन की अवधि बढ़ती है पर साथ ही क्वालिटी आफ लाइफ में भी सुधार होता है."
इसके अलावा ट्रांसप्लांट पर सरकारी व्यवस्था में खर्च भी लगभग आधा हो जाता है. डॉ हर्षवर्धन के अनुसार, अगर दो वर्ष के किडनी के इलाज के खर्च की तुलना की जाए तो डायलिसिस पर लगभग पांच लाख रुपए सरकारी व्यवस्था में खर्च हो जाता है. वहीं, ट्रांसप्लांट पर सिर्फ 3.5 लाख रुपए का खर्च आता है. इस लिहाज से किडनी ट्रांसप्लांट जीवन की गुणवत्ता को संवारने के साथ ही आर्थिक बोझ भी कम करता है.
भारत में अंगदान की स्थिति
भारत में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए मरीजों के इंतजार पर डॉ हर्षवर्धन काफी अहम जानकारी साझा करते हैं. वह कहते हैं कि भारत में परिवार के सदस्यों की ओर से अगर ट्रांसप्लांट के लिए किडनी मिल जाए तो एक से तीन महीने में किडनी ट्रांसप्लांट संभव है. कैडेवर डोनेशन यानी मृत व्यक्तियों के अंगदान से मिले किडनी के लिए मरीज को छह महीने से कई वर्षों तक इंतजार करना पड़ सकता है.
नोट्टो के आंकड़े बताते हैं कि 2020 से 2024 के बीच देशभर में किडनी ट्रांसप्लांट की प्रतीक्षा सूची में शामिल दो हजार 850 मरीजों की मृत्यु हो गई. दिसंबर 2025 तक देश में 60 हजार 590 किडनी के मरीज प्रतीक्षा सूची में थे. 2024 में मृत-दाताओं (डिसीज्ड डोनर) की संख्या सिर्फ 1,128 थी, जबकि इस साल सड़क दुर्घटना में 1.73 लाख लोग मारे गए.
डॉ. हर्षवर्धन कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में कैडेवर डोनेशन अभी भी ना के बराबर है. इसलिए यहां पर मरीज को काफी ज्यादा इंतजार करना पड़ता है और इसी के कारण अवैध ट्रांसप्लांट के रैकेट तेजी से बढ़ते हैं." नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2022 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में ऑर्गन ट्रैफिकिंग से जुड़े 150 केस दर्ज हुए. औसतन हर साल दो से पांच किडनी के अवैध रैकेट मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आते हैं.
पीजीआई के लखनऊ निदेशक डॉक्टर आरके धीमन और डॉक्टर हर्षवर्धन ने अंगदान की व्यवस्था पर एक रिसर्च रिपोर्ट भी प्रकाशित किया है. जर्नल ऑफ इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में प्रकाशित इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि भारत में मरने वालों के अंगदान की सबसे बड़ी रुकावट ब्रेन डेड मरीजों की पहचान ना हो पाना और परिवार को सही काउंसलिंग ना मिलना है.
ब्रेन डेड का अर्थ होता है कि व्यक्ति का मस्तिष्क काम करना बंद कर देना. हालांकि इस स्थिति में भी किडनी और लिवर जैसे अंग मशीनों की मदद से कुछ समय तक सही सलामत रहते हैं और वह ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त होते हैं.
जमीनी हकीकत यह है कि देश के अधिकांश आईसीयू में कार्यरत विशेषज्ञ मरीज के ब्रेन डेड होने की घोषणा की प्रक्रिया के बारे में नहीं जानते हैं. ब्रेन डेड घोषित करने के लिए न्यूरोलॉजिस्ट समेत चार डॉक्टरों की एक स्वतंत्र टीम होती है, जो इस बात की जांच करती है. अगर मरीज को देर से ब्रेन डेड घोषित किया जाए तो ऑर्गन फेल होने की वजह से शरीर के अंग ट्रांसप्लांट के लायक नहीं रह जाते.
स्वास्थ्य विभाग की कुछ कमियां देती हैं अवैध रैकेट को जन्म
किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के ऑर्गन ट्रांसप्लांट यूनिट के कॉर्डिनेटर पीयूष श्रीवास्तव कहते हैं कि एक व्यक्ति के ब्रेन डेड होने की स्थिति में सबसे जरूरी होता है- परिवार के सदस्यों को इस बात के लिए मनाना कि उनके शरीर के अंग किसी और की जिंदगी बचा सकते हैं. इसे समझाने की जिम्मेदारी निभाते हैं प्रशिक्षित काउंसलर. हालांकि उत्तर भारत के अधिकांश जिला और सामुदायिक अस्पतालों में काउंसलर के पद या तो खाली है या फिर कभी भरे ही नहीं गए. इसके कारण दाता अंगदान की प्रक्रिया तक नहीं पहुंच पाते.
डॉक्टर हर्षवर्धन कहते हैं कि जब 60 हजार से अधिक मरीज प्रतीक्षा सूची में हों और हर साल दो लाख नए मरीज गंभीर श्रेणी में पहुंच रहे हैं तो अवैध ट्रांसप्लांट के रैकेट से जुड़े अपराधी इसे अपने फायदे का जरिया बना लेते हैं. इस रैकेट में शामिल लोग डायलिसिस केंद्रों में जाने वाले मरीजों को अपना निशाना बनाते हैं और उन्हें जल्दी ट्रांसप्लांट करवाने की आशा देते हैं. उनकी हामी के बाद गरीब दाताओं को खोज कर मरीज के साथ फर्जी रिश्तेदारी के दस्तावेज तैयार किए जाते हैं. ज्यादातर ऑपरेशन रात को होते हैं और मरीज से बड़ी रकम वसूली जाती है.
अवैध रैकेट के खिलाफ बना है कानून
भारत में 1994 में ट्रांसप्लांटेशन आफ ह्यूमन ऑर्गन एंड टिश्यू एक्ट (टीएचओए) बनाया गया है जिसमें अंग व्यापार को अपराध घोषित किया गया है और ब्रेनडेथ को कानूनी मान्यता दी गई है. अंग व्यापार के दोषियों पर 20 लाख रुपए तक के जुर्माने के साथ 10 साल की जेल का प्रावधान है. हालांकि कम ही अपराधी पकड़े या भी दोषी करार दिए जाते हैं.
डॉ हर्षवर्धन कहते हैं कि भारत की समस्या केवल अवैध रैकेट नहीं है. वह कहते हैं, "भारत दुनिया में तीसरा सबसे अधिक ट्रांसप्लांट करने वाला देश है लेकिन प्रति 10 लाख की जनसंख्या पर अंगदान की दर स्पेन से भी 60 गुना कम है. यहां साल भर में 1.73 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं लेकिन उनके अंग किसी की जान बचाने के काम नहीं आते हैं. कानून मजबूत है लेकिन प्रशासनिक कमेटी जवाबदेह नहीं है."