जहां महाराष्ट्र में इन दिनों मराठा समुदाय दलित उत्पीड़न रोकथाम कानून के दुरुपयोग का हवाला देते हुए इसे रद्द करने की मांग कर रहा है वहीं ताजा आंकड़े बताते हैं कि राज्य में दलित उत्पीड़न की स्थिति में कोई सुधार नहीं हो पाया है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक पिछले डेढ़ साल में दलितों के विरुद्ध हिंसा के लगभग साढ़े तीन हजार मामले दर्ज किए गए.
जारी हैं दलितों के खिलाफ अत्याचार
इस साल के शुरुआती 6 महीने में ही महाराष्ट्र में 1100 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं. महाराष्ट्र के गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2015 में दलितों की हत्या के 97 जबकि बलात्कार के 331 मामले दर्ज किए गए. वहीं, इस साल जून के अंत तक बलात्कार के 142 और हत्या के 36 मामले सामने आ चुके हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के अनुसार 2015 में राज्य में अनुसूचित जाति के सदस्यों के खिलाफ हुए अपराध के 1800 से ज्यादा मामले दर्ज किये गए जबकि अनुसूचित जनजाति के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या तब 483 थी.
सवाल पूछिए, क्या उच्च शिक्षा केवल अमीरों के लिए है
दुनिया भर में 10 से 24 साल की उम्र के सबसे अधिक युवाओं वाले देश भारत में उच्च शिक्षा अब भी गरीबों की पहुंच से दूर लगती है. फिलहाल विश्व की तीसरी सबसे बड़ी शिक्षा व्यवस्था में सबकी हिस्सेदारी नहीं है.
तस्वीर: imago/imagebrokerभारत में नरेंद्र मोदी सरकार ने मेडिकल और इंजीनियरिंग के और भी ज्यादा उत्कृष्ट संस्थान शुरू करने की घोषणा की है. आईआईएम जैसे प्रबंधन संस्थानों के केन्द्र जम्मू कश्मीर, बिहार, हिमाचल प्रदेश और असम में भी खुलने हैं. लेकिन बुनियादी ढांचे और फैकल्टी की कमी की चुनौतियां हैं. यहां सीट मिल भी जाए तो फीस काफी ऊंची है.
तस्वीर: APदेश के कई उत्कृष्ट शिक्षा संस्थानों और केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में भी फिलहाल 30 से 40 फीसदी शिक्षकों की सीटें खाली पड़ी हैं. नासकॉम की रिपोर्ट दिखाती है कि डिग्री ले लेने के बाद भी केवल 25 फीसदी टेक्निकल ग्रेजुएट और लगभग 15 प्रतिशत अन्य स्नातक आईटी और संबंधित क्षेत्र में काम करने लायक होते हैं.
तस्वीर: picture-alliance/dpaकोटा, राजस्थान में कई मध्यमवर्गीय परिवारों के लोग अपने बच्चों को आईआईटी और मेडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए भेजते हैं. महंगे कोचिंग सेंटरों में बड़ी बड़ी फीसें देकर वे बच्चों को आधुनिक युग के प्रतियोगी रोजगार बाजार के लिए तैयार करना चाहते हैं. इस तरह से गरीब बच्चे पहले ही इस प्रतियोगिता में बाहर निकल जाते हैं.
तस्वीर: Reutersभारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने फ्रांस दौरे पर युवा भारतीय छात्रों के साथ सेल्फी लेते हुए. सक्षम छात्र अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा पाने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और तमाम दूसरे देशों का रूख कर रहे हैं. लेकिन गरीब परिवारों के बच्चे ये सपना नहीं देख सकते. भारत में अब भी कुछ ही संस्थानों को विश्वस्तरीय क्वालिटी की मान्यता प्राप्त है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/C. Blumbergमार्च 2015 में पूरी दुनिया में भारत के बिहार राज्य की यह तस्वीर दिखाई गई और नकल कराते दिखते लोगों की भारी आलोचना भी हुई. यह नजारा हाजीपुर के एक स्कूल में 10वीं की बोर्ड परीक्षा का था. जाहिर है कि पूरे देश में शिक्षा के स्तर को इस एक तस्वीर से आंकना सही नहीं होगा.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photoराजस्थान के एक गांव की कक्षा में पढ़ते बच्चे. 2030 तक करीब 14 करोड़ लोग कॉलेज जाने की उम्र में होने का अनुमान है, जिसका अर्थ हुआ कि विश्व के हर चार में से एक ग्रेजुएट भारत के शिक्षा तंत्र से ही निकला होगा. कई विशेषज्ञ शिक्षा में एक जेनेरिक मॉडल के बजाए सीखने के रुझान और क्षमताओं पर आधारित शिक्षा दिए जाने का सुझाव देते हैं.
तस्वीर: picture-alliance/Robert Hardinउत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी जैसे दल खुद को दलित समुदाय का प्रतिनिधि और कल्याणकर्ता बताते रहे हैं. चुनावी रैलियों में दलित समुदाय की ओर से पार्टी के समर्थन में नारे लगवाना एक बात है, लेकिन सत्ता में आने पर उनके उत्थान और विकास के लिए जरूरी शिक्षा और रोजगार के मौके दिलाना बिल्कुल दूसरी बात.
तस्वीर: DW/S. Waheedभारत के "मिसाइल मैन" कहे जाने वाले पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम देश में उच्च शिक्षा के पूरे ढांचे में "संपूर्ण" बदलाव लाने की वकालत करते थे. उनका मानना था कि युवाओं में ऐसे कौशल विकसित किए जाएं जो भविष्य की चुनौतियों से निपटने में मददगार हों. इसमें एक और पहलू इसे सस्ता बनाना और देश की गरीब आबादी की पहुंच में लाना भी होगा.
तस्वीर: AP/Ajit Kumar वैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार और आंध्र प्रदेश के मुकाबले महाराष्ट्र में दलित उत्पीड़न के मामले काफी कम हैं. 2015 में उत्तर प्रदेश में 8 हजार से ज्यादा मामले सामने आए जबकि राजस्थान में लगभग 7 हजार दलित उत्पीड़न के मामले दर्ज किए गए. दलित उत्पीड़न के लिहाज से बिहार की स्थिति भी अच्छी नहीं है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार यहां दलित उत्पीड़न के लगभग साढ़े छह हजार मामले दर्ज किए गए. गुजरात में दलित विरोधी घटनाओं में पिछले कुछ महीनों में तेजी आई है. खासतौर पर उना हमले के बाद मरे हुए जानवरों को उठाने से इनकार करने पर दलितों की पिटाई के मामले सामने आए हैं.
खैरलांजी हत्याकांड के 10 साल
29 सितम्बर 2006 को महाराष्ट्र के खैरलांजी में एक दलित परिवार के चार लोगों की क्रूरतापूर्ण हत्या कर दी गई थी. हत्या से पहले चारों सदस्यों को निर्वस्त्र कर घुमाया और उसके बाद उनके अंग काट डाले गए थे. इसके बाद पूरे राज्य में भड़के दलित आन्दोलन के बाद सरकार ने दलितों के विरुद्ध अत्याचार के मामलों को गंभीरता से लेने और त्वरित कार्रवाई का भरोसा दिलाया था. लेकिन पिछले 10 साल का रिकॉर्ड देखने से ऐसा नहीं लगता कि दलितों के विरुद्ध अपराध करने वालों में कानून का कोई भय है. दलित समुदाय के विजय वाहने कहते हैं कि सरकार दलित उत्पीड़न को रोक पाने में असफल रही है. विजय कहते हैं कि खैरलांजी जैसे मामले होते रहते हैं लेकिन दलित अब भी ऊंची जातियों के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने की हिम्मत नहीं करता.
तस्वीरों में: ये हैं भारत के बीफ खाने वाले
भारत में खानपान की आदतें केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं बल्कि धर्म, जाति, क्षेत्र और आय पर आधारित एक जटिल समीकरण से जुड़ी हैं. देखिए सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में कौन लोग गाय या भैंस का मांस खाते हैं.
तस्वीर: APराष्ट्रीय सैंपल सर्वे ऑफिस एनएसएसओ के 2011-12 के आंकड़ें दिखाते हैं कि भारत में करीब 8 करोड़ लोग बीफ या भैंस का मीट खाता है.
तस्वीर: Shaikh Azizur Rahmanआंकड़ों के अनुसार बीफ यानि गौमांस और भैंस का मीट खाने वाले ये लोग सभी धर्मों और राज्यों में पाये जाते हैं. इन 8 करोड़ लोगों में करीब सवा करोड़ हिन्दू हैं.
तस्वीर: Getty Images/P. Guellandएनएसएसओ के आंकड़ों से हाल के सालों में मीट की खपत बढ़ने का पता चलता है. इस सर्वे में करीब एक लाख लोगों से आंकड़ें इकट्ठे किए गए. देखा गया कि हफ्ते और महीने की औसत अवधि में एक परिवार खाने की किन चीजों पर कितना खर्च करता है.
तस्वीर: DW/S.Waheedविश्व में मांस की खपत का लेखाजोखा करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था एफएओ की 2007 में जारी 177 देशों की सूची में भारत को अंतिम स्थान मिला. 43 किलो के विश्व औसत के मुकाबले भारत में प्रति व्यक्ति सालाना मांस की खपत मात्र 3.2 किलो दर्ज हुई.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/dpawebएफएओ बताता है कि दुनिया भर में लोगों की क्रय क्षमता बढ़ने, शहरीकरण और खानपान की आदतें बदलने के कारण मांस की खपत बढ़ी है. भारत में खपत विश्व औसत से काफी कम है लेकिन वह बीफ, भैंस के मांस और काराबीफ का सबसे बड़ा निर्यातक है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/U. Baumgartenभारत में धर्म के आधार पर गाय या भैंस का मांस खाने वाला सबसे बड़ा समुदाय 6 करोड़ से अधिक मुसलमानों का है. संख्या के मामले में इसके बाद सबसे अधिक हिन्दू समुदाय आता है. जबकि प्रतिशत के अनुसार मुसलमानों के बाद ईसाई आते हैं.
तस्वीर: DW/S.Waheedमुसलमानों के अलावा अनुसूचित जाति और जनजाति (एससी/एसटी) गाय या भैंसों का मीट खाने वाला सबसे बड़ा तबका है. हिन्दुओं में इसे खाने वाले 70 फीसदी से अधिक लोग एससी/एसटी, 21 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग और करीब 7 फीसदी उच्च जातियों से आते हैं.
तस्वीर: S. Rahman/Getty Images उत्पीड़न रोकथाम कानून पर सवाल
महाराष्ट्र में चल रहे मराठा समुदाय के आन्दोलन की आड़ में दलित उत्पीड़न रोकथाम कानून के समीक्षा की बात कही जा रही है. मराठा समुदाय की मांग है कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है. केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री रामदास आठवले की उपयोगिता और आवश्यकता जताते हुए कहा है कि वह दलित उत्पीड़न कानून को रद्द नहीं होने देंगे. वह कहते हैं, "यदि आवश्यक संशोधन सुझाया गया, तो मंत्रालय निश्चित ही उस पर विचार करेगा." वहीं मराठा आन्दोलन को अपना समर्थन देने वाले एनसीपी मुखिया शरद पवार ने भी साफ किया है कि वह दलित उत्पीड़न कानून के खिलाफ नहीं बल्कि कानून के दुरुपयोग को रोके जाने के पक्ष में हैं. उन्होंने कहा, "दलित इस कानून का दुरुपयोग नहीं करते बल्कि आपसी रंजिश के चलते सवर्ण ही एक दूसरे के खिलाफ किसी दलित का इस्तेमाल कर एट्रोसिटी ऐक्ट का दुरुपयोग करते हैं."
दलित युवा अनिल जाधव कहते हैं कि दलित समुदाय के जो भी अपराधी है उनको कड़ी सजा दी जानी चाहिए लेकिन कुछ दलितों के अपराध के आधार पर कानून में बदलाव की बात करना उचित नहीं है. दलित समुदाय को लगता है कि इस कानून की जरूरत अभी भी है. इस कानून के सहारे उन्हें अपनी शिकायत दर्ज कराने में थोड़ी आसानी होती है. दलित उत्पीड़न के मामले को उजागर करने में यह कानून सहायक साबित हुआ है.
रिपोर्ट: विश्वरत्न