यूएसबी स्टिक, हार्ड ड्राइव या मैग्नेटिक टेप. इंसान का डाटा सेव करने के लिए अरबों ऐसी डिवाइसेस चाहिए. लेकिन दो युवा वैज्ञानिक डाटा स्टोरेज की दुनिया में क्रांति लाने में जुटे हैं.
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फिल्में देखने के शौकीन लोग कई बार अपनी पसंद की फिल्मों की कॉपी यूएसबी स्टिक या हार्ड डिस्क में रख लेते हैं. लेकिन एक टेराबाइट वाली हार्ड डिस्क भी कोई 250 फिल्मों से भर जाती है. अगर आपको किसी ऐसे स्टोरेज डिवाइस का पता चले, जिसमें आज तक दुनिया भर में बनी सारी फिल्में स्टोर की जा सकें, तो? कैलिफोर्निया के दो रिसर्चर ह्युजुन पार्क और नाथानियल रोक अथाह जानकारी को जमा करने का ऐसा अनोखा तरीका ढूंढ रहे हैं, जो डाटा स्टोरेज की दुनिया में क्रांति ला सकता है.
माइक्रोबायोलॉजिस्ट ह्युजुन पार्क कहते हैं, "अगर आप इसे डीएनए में स्टोर करें, तो हम सब के शरीर में इतने डीएनए हैं कि ये सारी सूचना स्टोर हो जाएगी.” ह्युनजुन पार्क और उनके साथी नाथानियल रोक अथाह डाटा को डीएनए में जमा करना चाहते हैं. एन्जाइमों की मदद से वे डीएएनए स्टोरेज वाले बिल्डिंग ब्लॉक्स बनाना चाहते हैं. ऐसे पैटर्न, जिनमें खास जानकारी जमा की जा सके.
इंटरनेट में कैसे रहें सतर्क
आप इंटरनेट में इस वक्त इस वेबसाइट पर ये तस्वीरें देख रहे हैं, यह बात सिर्फ आप ही नहीं जानते. इंटरनेट में मौजूद हैकर भी आपको यह करते देख रहे हैं. जानिए कैसे रहें इंटरनेट में सतर्क.
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अमेरिकी खुफिया एजेंसी एनएसए ने केवल अमेरिकी नागरिकों और नेताओं की ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के लोगों की जासूसी की. जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल के मोबाइल फोन की जासूसी पर काफी बवाल खड़ा हुआ.
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फेसबुक, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनियों के पास आपकी अलग अलग जानकारी होती है. पूरी जानकारी को कंपनी का हर सदस्य नहीं देख सकता है. उनके पास आपका नियमित डाटा होता है, वे आपके मेसेज नहीं खोल सकते हैं.
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लेकिन जब खुफिया एजेंसी के पास आपके कंप्यूटर पर चल रहे माइक्रोसॉफ्ट प्रोसेसर से लेकर आपके गूगल, फेसबुक और दूसरे अहम अकाउंट की जानकारी होती है तो उनके पास सब कुछ होता है.
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इन एजेंसियों के पास ऐसे सॉफ्टवेयर होते हैं कि वे जब चाहें आपके कंप्यूटर से खुद अपने कंप्यूटर को जोड़ कर आपकी हर हरकत का पता कर सकते हैं.
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हालांकि अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित कानून के अनुसार केवल जिस व्यक्ति पर शक है, उसके अकाउंट से जुड़ी जानकारी के लिए खुफिया एजेंसी को पहले अदालत से अनुमति लेनी होती है. इसके आधार पर उन्हें इंटरनेट कंपनियां सर्वर तक की पहुंच देती हैं.
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थोड़ी बहुत इंटरनेट जासूसी सभी देशों की सरकार करती है. यह देश की सुरक्षा के लिए अहम भी है. इसमें कंप्यूटर के डाटा के साथ साथ आपके फोन की सारी जानकारी भी मौजूद है.
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बड़े कैमरे से कोई आप पर नजर रखे तो आप उस से बच भी सकते हैं, लेकिन जासूसी ऐसे स्तर पर हो रही है कि आईक्लाउड और एयर एंड्रॉयड जैसे सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल भी सुरक्षित नहीं है.
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ऐसा नहीं है कि ये मामले यहीं थम जाएंगे. ऐसे सिस्टम की कमी है जो निजता को पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए आश्वस्त कर सके.
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माइक्रोबायोलॉजिस्ट नाथानियल रोक एक छोटी सी ट्यूब दिखाते हैं जिसमें एक किलोबाइट इनफॉर्मेशन बड़े आराम से आ जाती है. उन्होंने इसमें एक कविता की लाखों कॉपियां रखी हैं. वह बताते हैं, "अक्षरों के बीच की जगह में एक 8 बिट नंबर है. हम इसे डीएनए पर इनकोड करते हैं. हम शून्य और एक के बीच के स्ट्रिंग को AGCTA के स्ट्रिंग में बदलते हैं. हम एक सॉफ्टवेयर बना रहे हैं जिसमें यह मैपिंग होगी, वैसे हम असल में डीएनए बना रहे हैं.”
रिसर्चर इस सिस्टम के फायदों को लेकर उत्साहित हैं. रोक बताते हैं. "आप अथाह जानकारी एक छोटी सी जगह पर स्टोर कर सकते हैं. विश्वसनीयता की बात करें तो अगर आप डीएनए को फ्रीज करें तो यह बहुत ही लंबे समय तक सुरक्षित रहेगा, शायद लाखों साल तक. इसीलिए हम एक हिमहाथी के जीनों की सिक्वेंसिंग कर सकते हैं जो 60 हजार साल से बर्फ में दबा है. डीएनए आसानी से कॉपी भी हो जाता है."
फिलहाल, यह भविष्य की योजना है. अपनी रिसर्च की बदौलत दोनों ने एक बायोटेक स्टार्ट अप कंपनी खोली है. हर हफ्ते वे निवेशकों को बताते हैं कि काम कितना आगे बढ़ा है.
फिंगरप्रिंट का सबक: अनोखा है हर इंसान
125 साल पहले अर्जेंटीना के अपराध विज्ञानियों ने कैदियों के फिंगरप्रिंट लिये. तब से अब तक कैसा रहा है पहचान और शिनाख्त की वैज्ञानिक दुनिया का सफर.
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125 साल बाद भी आधुनिक
1891 में अर्जेंटीना के अपराध विज्ञानी खुआन वुसेटिच ने मॉर्डन स्टाइल फिंगरप्रिंट आर्काइव बनाना शुरू किया. तब से फिंगरप्रिंट को अहम सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. इस तस्वीर में चोरी के बाद पुलिस अफसर दरवाजे के हैंडल को साफ कर रहा है, ताकि फिंगरप्रिंट साफ दिखाई पड़ें.
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सहेजना और तुलना करना
मौके से फिंगरप्रिंट जुटाने के लिए एक चिपचिपी फिल्म का इस्तेमाल किया जाता है. अचूक ढंग से फिंगरप्रिंट जुटाने में कई घंटे लग जाते हैं. एक बार फिंगरप्रिंट जुटाने के बाद जांचकर्ता उनकी तुलना रिकॉर्ड में संभाले गए निशानों से करते हैं. इन दिनों तेज रफ्तार कंप्यूटर ये काम बड़ी तेजी से कर देते हैं.
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स्याही की जरूरत नहीं
पहले फिंगरप्रिंट जुटाना बहुत ही मुसीबत भरा काम होता था, स्याही से हाथ भी गंदे हो जाते थे. लेकिन अब स्कैनर ने स्याही की जगह ले ली है. स्कैन करती ही डाटा सीधे बायोमैट्रिक डाटा बैंक को भेज दिया जाता है.
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क्यों खास है फिंगरप्रिंट
कंप्यूटर अंगुली की बारीक लाइनों और उनके पीछे के उभार को पहचान लेता है. अंगुली के केंद्र से अलग अलग लाइनों की मिलीमीटर के बराबर छोटी दूरी, उनकी घुमावट, उनकी टूटन सब दर्ज हो जाती है. दो लोगों के फिंगरप्रिंट कभी एक जैसे नहीं हो सकते, भले ही वे हूबहू दिखने वाले जुड़वा क्यों न हों.
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कहां कहां इस्तेमाल
नाइजीरिया में चुनावों में धांधली रोकने के लिए अधिकारियों ने फिंगरप्रिंट स्कैनर का इस्तेमाल किया. यही वजह है कि सिर्फ रजिस्टर्ड वोटर ही वोट डाल पाए वो भी सिर्फ एक बार.
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कौन कहां से कब आया
शरणार्थी संकट का सामना करते यूरोप में भी अधिकारी फिंगरप्रिंट का सहारा ले रहे हैं. यूरोपीय संघ के जिस भी देश में शरणार्थी पहली बार पहुंचेगा, उसका फिंगरप्रिंट वहीं लिया जाएगा. फिंगरप्रिंट लेने के लिए स्थानीय पुलिसकर्मियों को ट्रेनिंग दी गई है, उन्हें स्कैनर भी दिये गए हैं.
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ये मेरा डाटा है
अब कई स्मार्टफोन फिंगरप्रिंट डिटेक्शन के साथ आ रहे हैं. आईफोन और सैमसंग में टच आईडी है. फोन को सिर्फ मालिक ही खोल सकता है, वो भी अपनी अंगुली रखकर. अगर फोन खो जाए या चोरी भी हो जाए तो दूसरे शख्स को फोन का डाटा नहीं मिल सकता.
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ATM बैंकिंग
स्कॉटलैंड के डुंडी शहर में ऑटोमैटिक टेलर मशीन (एटीएम). इस मशीन से सिर्फ असली ग्राहक पैसा निकाल सकते हैं. फिंगरप्रिंट के जरिये मशीन कस्टमर की बायोमैट्रिक पहचान करती है. यह मशीन फर्जीवाड़े की संभावना को नामुमकिन कर देती है.
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पासपोर्ट की सेफ्टी
जर्मनी समेत कई देशों ने 2005 से पासपोर्ट में डिजिटल फिंगरप्रिंट डाल दिया. पासपोर्ट में एक RFID (रेडियो फ्रीक्वेंसी कंट्रोल्ड आईडी) चिप होती है. चिप के भीतर बायोमैट्रिक फोटो होती है, यह भी फिंगरप्रिंट की तरह अनोखी होती है.
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चेहरे की बनावट से पहचान
फेशियल रिकॉगनिशन सॉफ्टवेयर भी पहचान को बायोमैट्रिक डाटा में बदलता है. कंप्यूटर और उससे जुड़े कैमरे की मदद से संदिग्ध को भीड़ में भी पहचाना जा सकता है. इंटरनेट और कंप्यूटर कंपनियां भी अब फेशियल रिकॉगनिशन सॉफ्टवेयर का काफी इस्तेमाल कर रही हैं.
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जेनेटिक फिंगरप्रिंट के जनक
एलेक जेफ्रीज ने 1984 में किसी संयोग की तरह डीएनए फिंगरप्रिंटिंग की खोज की. उन्होंने जाना कि हर इंसान के डीएनए का पैटर्न भी बिल्कुल अलग होता है. डीएनए फिंगरप्रिंटिंग की उन्होंने एक तस्वीर तैयार की जो बारकोड की तरह दिखती है.
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हर इंसान के लिये बारकोड
जर्मनी की फेडरल क्रिमिनल पुलिस ने 1998 से अपराधियों का डीएनए फिंगरप्रिंट बनाना शुरू किया. जेनेटिक फिंगरप्रिंट की मदद से जांचकर्ता अब तक 18,000 से ज्यादा केस सुलझा चुके हैं.
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निर्दोष की मदद
परिस्थितिजन्य सबूतों या वैज्ञानिक सबूतों के अभाव में कई बार निर्दोष लोग भी फंस जाते हैं. घटनास्थल की अच्छी जांच और बायोमैट्रिक पहचान की मदद से निर्दोष लोग झेमेले से बचते हैं. किर्क ब्लड्सवर्थ के सामने नौ साल तक मौत की सजा खड़ी रही. अमेरिका में डीएनए सबूतों की मदद से 100 से ज्यादा बेकसूर लोग कैद से बाहर निकले.
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पीड़ित परिवारों को भी राहत
डीएनए फिंगरप्रिंटिंग का पहली बार बड़े पैमाने पर इस्तेमाल स्रेब्रेनित्सा नरसंहार के मामले में हुआ. सामूहिक कब्रों से शव निकाले गए और डीएनए तकनीक की मदद से उनकी पहचान की गई. डीएनए फिंगरप्रिंट को परिजनों से मिलाया गया. पांच साल की एमा हसानोविच को तब जाकर पता चला कि कब्र में उनके अंकल भी थे. 6,000 मृतकों की पहचान ऐसे ही की गई.
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फोन और कंप्यूटर में बायोमैट्रिक डाटा
बायोमैट्रिक डाटा के मामले में काफी काम हो रहा है. वैज्ञानिक अब आवाज के पैटर्न को भी बायोमैट्रिक डाटा में बदलने लगे हैं. वॉयस रिकॉगनिशन सॉफ्टवेयर की मदद से धमकी देने वालों को पहचाना जा सकता है. फिंगरप्रिंट की ही तरह हर इंसान के बोलने के तरीका भी अलग होता है. मुंह से निकलती आवाज कई तरंगों का मिश्रण होती है और इन्हीं तरंगों में जानकारी छुपी होती है.
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ह्युनजुन पार्क को यह बताते हुए खुशी हो रही है कि वे पहले किलोबाइट को इनकोड कर चुके हैं. माइक्रोसॉफ्ट जैसी दिग्गज कंपनी ने भले ही इससे ज्यादा डाटा स्टोर करने में सफलता पा ली हो, लेकिन इन युवा वैज्ञानिकों को लगता है कि वह तरीका बेहद महंगा साबित होगा, क्योंकि उसमें स्टोरेज मॉलिक्यूल स्टेप बाय स्टेप बनते हैं. उनके मुताबिक यह रूबिक क्यूब पर एक एक कर ब्लॉक रखने जैसा है.
नाथानियल रोक कहते हैं, "हमारा तरीका दूसरा है. हम पहले से तैयार डीएनए का समूह बनाते हैं. डीएनए जो अपने मूल रूप में भी मौजूद हैं. लेकिन ये अवस्था मायने नहीं रखती. फिर हम कॉम्बिनेशनल एन्जाइमैटिक रिएक्शंस करते हैं ताकि डीएनए उस मैसेज में बदल जाए, जिसे हम इनकोड करना चाह रहे हैं.”
ये तरीका बहुत सस्ता है, लेकिन फिलहाल उन्हें निवेशकों को भरोसा दिलाते रहना है कि यह डाटा स्टोरेज का सबसे क्रांतिकारी तरीका होगा.