अफगानिस्तान के बामियान प्रांत में पहाड़ियों में उकेरी गईं बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं सदियों से वहां मौजूद थीं. लेकिन 2001 में तालिबान ने इन्हें तबाह कर दिया था. अब बहस हो रही है कि इन्हें फिर से बनाया जाए.
तस्वीर: AP
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इस इलाके में रहने वाले लोगों के लिए ये प्रतिमाएं बरसों तक उनकी जिंदगी का हिस्सा रही हैं. इन्हें नष्ट किए जाने के लगभग 15 साल बाद अब ये लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं कि प्रतिमाएं फिर से बनाई जाएंगी. लेकिन इस बार में जानकारों की राय बंटी हुई है. कुछ लोगों का कहना है कि प्रतिमाएं फिर से बनाने की बजाय जो कुछ वहां बचा है, उसे संरक्षित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए.
मध्य अफगानिस्तान में बामियान में इस जगह पर काम करने वाले पुरातत्वविदों की जर्मनी के म्यूनिख में एक बैठक हो रही है. इनमें अफगान, जर्मन, फ्रांसीसी और जापानी पुरातत्वविद् शामिल हैं. बैठक में तय होगा कि आगे क्या किया जाएगा.
सभी अफगान और खास तौर से इन पहाड़ियों के सामने मौजूद खेतों में काम करने वाले किसानों को इस विरासत के नष्ट होने का बहुत दुख है. इनमें सबसे अहम दो प्रतिमाएं थीं. सबसे बड़ी सालसाल 56 मीटर ऊंची थी जबकि दूसरी प्रतिमा शमामा की ऊंचाई 38 मीटर थी. तालिबान ने 2001 में बम से उन्हें उड़ा दिया. इसके साथ ही उसने बामियान में रहने वाले शिया समुदाय हजारा के हजारों लोगों की हत्या कर दी थी.
देखिए ऐसे होते हैं अफगान
ऐसे होते हैं अफगान
जर्मन फोटोग्राफर येंस उमबाख ने उत्तरी अफगानिस्तान का दौरा किया. इस इलाके में जर्मन सेना तैनात रही है और लोग जर्मन लोगों से अपरिचित नहीं हैं.
मजार-ए-शरीफ के चेहरे
ये बुजुर्ग उन 100 से ज्यादा अफगान लोगों में से एक हैं जिन्हें जर्मन फोटोग्राफर येंस उमबाख ने मजार-ए-शरीफ शहर के हालिया दौरे में अपने कैमरे में कैद किया है.
असली चेहरे
उमबाख ऐसे चेहरों को सामने लाना चाहते थे जो अकसर सुर्खियों के पीछे छिप जाते हैं. वो कहते हैं, “जैसे कि ये लड़की जिसने अपनी सारी जिंदगी विदेशी फौजों की मौजूदगी में गुजारी है.”
नजारे
उमबाख 2010 में पहली बार अफगानिस्तान गए और तभी से उन्हें इस देश से लगाव हो गया. उन्हें शिकायत है कि मीडिया सिर्फ अफगानिस्तान का कुरूप चेहरा ही दिखाता है.
मेहमानवाजी
अफगान लोग उमबाख के साथ बहुत प्यार और दोस्ताना तरीके से पेश आए. वो कहते हैं, “हमें अकसर दावतों, संगीत कार्यक्रमों और राष्ट्रीय खेल बुजकाशी के मुकाबलों में बुलाया जाता था.”
सुरक्षा
अफगानिस्तान में लोगों की फोटो लेना आसान काम नहीं था. हर जगह सुरक्षा होती थी. उमबाख को उनके स्थानीय सहायक ने बताया कि कहां जाना है और कहां नहीं.
नेता और उग्रवादी
उमबाख ने अता मोहम्मद नूर जैसे प्रभावशाली राजनेताओं की तस्वीरें भी लीं. बाल्ख प्रांत के गवर्नर मोहम्मद नूर जर्मनों के एक साझीदार है. उन्होंने कुछ उग्रवादियों को भी अपने कैमरे में कैद किया.
जर्मनी में प्रदर्शनी
उमबाख ने अपनी इन तस्वीरों की जर्मनी में एक प्रदर्शनी भी आयोजित की. कोलोन में लगने वाले दुनिया के सबसे बड़े फोटोग्राफी मेले फोटोकीना में भी उनके फोटो पेश किए गए.
फोटो बुक
येंस उमबाख अपनी तस्वीरों को किताब की शक्ल देना चाहते हैं. इसके लिए वो चंदा जमा कर रहे हैं. वो कहते हैं कि किताब की शक्ल में ये तस्वीरें हमेशा एक दस्तावेज के तौर पर बनी रहेंगी.
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27 साल के हकीम सफा अफगान संस्कृति मंत्रालय के एक कर्मचारी हैं और बामियान के इस ऐतिहासिक स्थल पर टिकट बेचते हैं. वो कहते हैं, "हमारे लिए ये माता पिता की तरह थीं. मुझे तो लगता है कि मेरा परिवार मुझसे अलग हो गया है." वहीं बामियान यूनिवर्सिटी में पुरातत्व विभाग में प्रोफेसर रसूल चोजई कहते हैं, "आसपास के गावों के लोग तो बहुत चाहते हैं कि इन प्रतिमाओं को फिर से बनाया जाए.. वे बराबर हमसे कहते हैं कि आप कब से काम शुरू कर रहे हो?"
लेकिन इन प्रतिमाओं को इतनी बुरी तरह ध्वस्त किया गया है कि ये भी साफ नहीं है कि उन्होंने फिर बनाया जा सकता है या नहीं. यूनेस्को और पुरातत्वविदों ने वहां से अलग अलग आकार के पत्थर और चट्टानें जमा की हैं. लेकिन अब ये जगह लगभग मलबे का ढेर बन कर रह गई है.
अफगानिस्तान में फ्रेंच पुरातत्वविद् प्रतिनिधिमंडल के निदेशक जुलिओ बेंदेजु सारमिंतो कहते हैं, "महान बुद्ध को पूरी तरह से तबाह कर दिया गया है." वो बताते हैं कि इन पहाड़ियों में बहुत सी सुंदर गुफाएं थीं जो सीढ़ियों से एक दूसरे के साथ जुड़ी थीं. पुराने समय में बौद्ध संन्यासी इनका इस्तेमाल करते थे. लेकिन तालिबान अफगानिस्तान के बौद्ध इतिहास को मिटाना चाहता था और इसी मकसद से उनसे बामियान की प्रतिमाओं को ध्वस्त किया. बमबारी से इन चट्टानों में बहुत दरारें पड़ गईं. ऐसे में, जुलिओ बेंदेजु सारमिंतो चट्टानों के ध्वस्त हो जाने का खतरा भी बताते हैं.
इन्हें अफगानिस्तान ने फोटोग्राफर बना दिया
अफगानिस्तान ने फोटोग्राफर बना दिया
जापान के युवा फोटोग्राफर युजुके सुजुकी की तस्वीरें झकझोर देती हैं. बर्लिन फोटो फेस्टिवल में इस युवा फोटोग्राफर को सम्मानित किया गया है. एक नजर सुजुकी की तस्वीरों पर.
तस्वीर: USK Photography
सर्वनाश
युजुके सीरिया के शहर अलेप्पो पहुंचे. वहां उन्होंने "सिटी ऑफ कियोस" नाम की फोटो सीरीज बनाई. यह तस्वीर उन्हीं में से एक है. युजुके के मुताबिक, "जब मैं अलेप्पो पहुंचा तो मैंने महसूस किया कि वहां पानी, गैस, बिजली, दवाएं, स्कूल, नौकरियां और बेबी मिल्क कुछ भी नहीं था."
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हड्डियां जमाने वाली सर्दी
जनवरी में कड़ाके की सर्दी के दौरान जब अलेप्पो में लोगों को कंबल बांटे गए तो वहां छीना झपटी जैसी स्थिति हो गई. युजुके के मुताबिक, "एक कंबल पाने के लिए लोग चीख रहे थे. बहुत ही ज्यादा ठंडी सर्दियां काटने के लिए लोगों के पास गैस भी नहीं थी."
तस्वीर: USK Photography
दोस्त
फ्री सीरियन आर्मी के इस युवक के जरिये जापानी फोटोग्राफर सीरिया पहुंचे. दोनों जल्द दोस्त बन गए. इस संपर्क के कारण ही युजुके बियाबान पड़े चुके शहरों तक पहुंचे.
तस्वीर: USK Photography
लड़ाई के मैदान पर
फोटोग्राफर फ्री सीरियन आर्मी के साथ लड़ाई के मैदान तक पहुंचे. युजुके कहते हैं, "हमने अक्सर चाय पी और चुटकुले भी चलते रहे. कभी कभी तो वे फायर भी करते थे और साथ में चुटकुला भी सुनाते थे." लेकिन जैसे ही लड़ाई तेज हुई, सबका मूड बदल गया. युजुके समेत सबको मौत का डर सताने लगा.
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जैसे तैसे पहुंच गए
शरणार्थी संकट को सामने लाने के लिए युजुके ग्रीस के लेसबोस द्वीप भी पहुंचे. युजुके के मुताबिक, "वहां हर दिन शरणार्थियों से ठसाठस भरी 20 से 25 नावें आती थीं."
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गमगीन करने वाले दृश्य
लेसबोस में युजुके सुजुकी का सामना कई झकझोर देने वाले लम्हों से हुआ. लोगों का दर्द देख वह विचलित भी हो उठे. कभी कभी उन्हें लगा कि तस्वीर नहीं लेनी चाहिए. लेकिन फिर यह अहसास भी हुआ कि इन लोगों की कहानी किसी को तो कहनी चाहिए.
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अफगानिस्तान का प्रोजेक्ट
2006 में मात्र 21 साल की उम्र में युजुके सुजुकी पहली बार अफगानिस्तान गए. उस यात्रा ने उन्हें बदल दिया. गिटारवादक बनने की चाह रखने वाले युजुके ने अफगानिस्तान ट्रिप के बाद फोटोग्राफर बनने का फैसला किया.
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हिंसा के बीच आम जिंदगी
अफगानिस्तान पहुंचने से पहले युजुके को शांति और युद्ध के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थीं. अफगानिस्तान यात्रा के दौरान उनके मन में कई सवाल उठे. तभी उन्होंने महसूस किया कि लड़ाई और खूनखराबे के बीच भी आम जिंदगी की सुंदरता बची रहती है. यह तस्वीर उसी का जिक्र करती है.
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अवॉर्ड जीतने वाली फोटोग्राफी
युजुके सुजुकी कहते हैं, "मैं युद्ध का मतलब समझना चाहता था. मैं देखना चाहता था, सुनना चाहता था और युद्ध में रह रहे लोगों की जिंदगी महसूस करना चाहता था." बर्लिन फोटो फेस्टिवल बीनियाले में उन्हें यंग एमर्जिंग टैलेंट का अवॉर्ड दिया गया.
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बामियान में यूनेस्को के प्रतिनिधि गुला रजा मोहम्मदी बताते हैं, "यूनेस्को का पूरा ध्यान बचे हुए अवशेषों के संरक्षरण पर है." लेकिन पुनर्निर्माण का कुछ काम भी चल रहा है. इस काम में लगे जर्मन विशेषज्ञ तो बुद्ध की छोटी प्रतिमा का पांव भी तैयार कर चुके हैं जो लगभग दस मीटर लंबा है. एक जर्मन कला इतिहासकार बेर्ट प्राक्सेनथालेर का कहना है, "हमारे पास मूल बुद्ध के कुछ हिस्से हैं."
2003 से बामियान में काम कर रहे प्राक्सेनथालेर कहते हैं, "बेशक ये प्रतिमा बहुत से छेदों और कमियों वाली होगी, लेकिन इतिहास को लेकर एक पहली सम्मानजक सोच होगी. अगर हमें अच्छी आर्थिक मदद मिले तो ये काम पांच साल में पूरा किया जा सकता है." लेकिन बेंदेजु सारमिंतो कहते हैं कि इसकी जरूरत क्या है. उनके मुताबिक, "इतिहास में, इतना कुछ गायब हो गया है. लेकिन फिर भी हम उसे याद रखते हैं ना. बुद्ध भी हमारी स्मृति में रहेंगे."