दिल्ली में किराए पर एक मकान की तलाश कर रहे रौफ को दो महीनों से मकान नहीं मिला है. लेकिन यह कहानी अकेले दिल्ली की नहीं है. शहरों में मकान देने में भेदभाव की दशकों पुरानी समस्या बढ़ती जा रही है.
शहरी आवास में भेदभावतस्वीर: Abdul Rauoof Ganie/DW
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रविवार का दिन है. सुबह के 11 बज रहे हैं. दिल्ली के मालवीय नगर मोहल्ले में एक पार्क के पास खड़े अब्दुल रौफ गनइ मकान किराए पर दिलाने वाले एक एजेंट का इंतजार कर रहे हैं. 28 साल के रौफ कई दिनों से दक्षिणी दिल्ली में रहने के लिए किराए पर एक मकान की तलाश कर रहे हैं.
एजेंट ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि आज फ्लैट मिल ही जाएगा. एजेंट आता है और रौफ को साथ लेकर पास ही में स्थित एक मकान पर लेकर जाता है. घंटी बजाने के दो मिनट बाद मकान का मालिक खुद आ कर दरवाजा खोलता है और प्राथमिक पूछताछ वहीं पर शुरू कर देता है.
क्या दिल्ली क्या मुंबई, सभी शहरों में मुस्लिमों को मकान किराए पर नहीं मिलतेतस्वीर: Francis Mascarenhas/REUTERS
ज्यादा बातचीत की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि रौफ का नाम सुनते ही मकान का मालिक पूछता है, "मोहम्मडन हो?" और जवाब "हां" में मिलते ही बेझिझक रौफ से कह देता है, "हम मोहम्मडनों को मकान किराए पर नहीं देते." साथ ही एजेंट को यह कह कर डांट भी देता है कि उसे इस बारे में बताया भी था, फिर वो क्यों "एक मोहम्मडन" को यहां ले कर आया.
शरणार्थियों के लिए ही बने थे मोहल्ले
एजेंट मकान मालिक और रौफ दोनों से माफी मांगता है और फिर रौफ को ले कर अगले मकान की तरफ बढ़ जाता है. धीरे धीरे छुट्टी का दिन बीत जाता है लेकिन रौफ की तलाश पूरी नहीं हो पाती.
मालवीय नगर मोहल्ले को विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आए शरणार्थियों को पनाह देने के लिए बसाया गया था. यहां के अधिकांश मकान मालिकों की यही पृष्ठभूमि है. सरकार ने लगभग 100 गज के जमीन के टुकड़े इन्हें दिए जिस पर इन्होने धीरे धीरे तीन-चार मंजिलों की इमारतें बना लीं.
लेकिन सात दशक पहले जिन जमीन के टुकड़ों पर विभाजन के मारे लोगों को शरण मिली उन्हीं पर बने ये मकान आज अपने ही देश में गुजर बसर करने की कोशिश में लगे हुए लोगों को पनाह नहीं दे पा रहे हैं.
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28 साल के रौफ ने मीडिया के अध्ययन में पीएचडी की हुई है और दिल्ली में डीडब्ल्यू के लिए वीडियो जर्नलिस्ट के रूप में काम करते हैं. अमूमन मकान किराए पर देने के लिए किसी व्यक्ति को विश्वसनीय साबित करने के लिए इतना काफी होना चाहिए, लेकिन अगर आप मुस्लिम हैं तो ऐसा नहीं है.
सभी शहरों का एक ही हाल
रौफ के साथ तो दोहरी समस्या है. वो मुस्लिम होने के साथ साथ कश्मीरी भी हैं और शहरों में यह एक और पैमाना है मकान किराए पर नहीं मिलने का. रौफ बताते हैं कि उन्होंने कई साल पहले मुस्लिमों के खिलाफ इस तरह के भेदभाव के बारे में सिर्फ ट्विटर पर पढ़ा था. तब उन्हें यह नहीं पता था कि एक दिन उनके साथ भी यही होगा.
2018 में हैदराबाद में पहली बार उन्हें इस भेदभाव का सामना करना पड़ा, जब शहर के एक हिंदू बहुल इलाके में एक मकान मालिक ने उनसे कहा कि वो उन्हें अपना मकान नहीं देंगे, क्योंकि वो मुस्लिम हैं.
रौफ कहते हैं. "मैं बहुत डर गया था. मैं पहली बार कश्मीर से बाहर निकला था और यह मेरी पहली नौकरी थी. एक दिन तो मैंने यहां तक तय कर लिया था कि आज शाम तक अगर मकान नहीं मिला तो मैं यह शहर और नौकरी दोनों को छोड़ कर वापस कश्मीर चला जाऊंगा."
दिल्ली के कई इलाके तो शरणार्थियों को पनाह देने के लिए ही बने थेतस्वीर: Abdul Rauoof Ganie/DW
शहर और नौकरी छोड़ने की नौबत नहीं आई. रौफ ने हैदराबाद में पहले से रह रहे कुछ कश्मीरी लोगों से संपर्क किया और फिर उनकी मदद से उन्हें रहने के लिए जगह मिल ही गई. इस बात को चार साल बीत चुके हैं. यह शहर भी दूसरा है लेकिन रॉफ फिर से उसी मुसीबत का सामना कर रहे हैं.
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अब बहाने भी नहीं बनाए जाते
रौफ इस समस्या का सामना करने वाले पहले मुस्लिम नहीं हैं. यह दशकों पुराना चलन है और शहरों में किराए पर मकान खोज रहे हर मुस्लिम व्यक्ति और परिवार की कहानी है. इसे लेकर कई अध्ययन भी किए गए हैं.
'द हाउसिंग डिस्क्रिमिनेशन प्रोजेक्ट' के तहत कानून, मनोविज्ञान आदि जैसे विविध क्षेत्रों से जुड़े शोधकर्ताओं ने 2017 से 2019 तक दिल्ली और मुंबई के 14 मोहल्लों में करीब 200 एजेंटों, 31 मकान मालिकों और करीब 100 मुस्लिम किरायेदारों से बात की.
अध्ययन में न सिर्फ यह साबित हुआ कि यह एक बड़ी समस्या है बल्कि यह भी सामने आया कि किराए पर मकान दिलाने की व्यवस्था की कुंजी माने जाने वाले एजेंटों में से भी कई इस भेदभाव से ग्रसित हैं.
दिल्ली दंगे: तब और अब
दिल्ली दंगों के एक साल बाद दंगा ग्रस्त इलाकों में लगता है कि पीड़ित परिवार आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन क्या इस तरह की हिंसा का दर्द भुलाना आसान है? तब और अब के बीच के फर्क की पड़ताल करती डीडब्ल्यू की कुछ तस्वीरें.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
दहशत का एक साल
दिल्ली दंगों के एक साल बाद, क्या हालात हैं दंगा ग्रस्त इलाकों में.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
चेहरे पर कहानी
एक दंगा पीड़ित महिला जिनसे 2020 में पीड़ितों के लिए बनाए गए एक शिविर में डीडब्ल्यू ने मुलाकात की थी. अपनों को खो देने का दर्द उनकी आंखों में छलक आया था.
तस्वीर: DW/S. Ghosh
एक साल बाद
यह महिला भी उसी शिविर में थी और कुछ महीने बाद अपने घर वापस लौटी. अब वो और उनका परिवार अपने घर की मरम्मत करा उसकी दीवारों पर नए रंग चढ़ा रहा है, लेकिन उनकी आंखों में अब भी दर्द है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
आगजनी
दंगों में हत्याओं के अलावा भारी आगजनी भी हुई थी. शिव विहार तिराहे पर स्थित इस गैराज और उसमें खड़ी गाड़ियों को भी आग के हवाले कर दिया गया था.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
एक साल बाद
एक साल बाद गैराज किसी और को किराए पर दिया जा चुका है. स्थानीय लोगों का दावा है बीते बरस नुकसान झेलने वालों में से किसी को भी अभी तक हर्जाना नहीं मिला है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
दहशत
गैराज पर हमला इतना अचानक हुआ था कि उसकी देख-रेख करने वाले को बर्तनों में पका हुआ खाना छोड़ कर भागना पड़ा था. दंगाइयों ने पूरे घर को जला दिया था.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
एक साल बाद
कमरे की मरम्मत कर उसे दोबारा रंग दिया गया है. देख-रेख के लिए नया व्यक्ति आ चुका है. फर्नीचर नया है, जगह वही है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
बर्बादी
दंगों में इस घर को पूरी तरह से जला दिया गया था. तस्वीरें लेने के समय भी जगह जगह से धुआं निकल रहा था.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
एक साल बाद
साल भर बाद भी यह घर उसी हाल में है. यहां कोई आया नहीं है. मलबा वैसे का वैसा पड़ा हुआ है. दीवारों पर कालिख भी नजर आती है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
सब लुट गया
दंगाइयों ने यहां से सारा सामान लूट लिया था और लकड़ी के ठेले को आग लगा दी थी. जाने से पहले दंगाइयों ने वहां के घरों को भी आग के हवाले कर दिया था.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
एक साल बाद
जिंदगी अब धीरे धीरे पटरी पर लौट रही है. नया ठेला आ चुका है और उसे दरवाजे के बगल में खड़ा कर दिया गया है. अंदर एक कारीगर काम कर रहा है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
सड़क पर ईंटों की चादर
दंगों के दौरान जाफराबाद की यह सड़क किसी जंग के मैदान जैसी दिख रही थी. दो दिशाओं से लोगों ने एक दूसरे पर जो ईंटों के टुकड़े और पत्थर फेंके थे वो सब यहां आ गिरे थे.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
एक साल बाद
आज यह कंक्रीट की सड़क बन चुकी है. जन-जीवन सामान्य हो चुका है. आगे तिराहे पर भव्य मंदिर बन रहा है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
दुकान के बाद दुकान लूटी गई
मुस्तफाबाद में एक के बाद एक कर सभी दुकानें लूट ली गई थीं. हर जगह सिर्फ खाली कमरे और टूटे हुए शटर थे.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
एक साल बाद
आज उस इलाके में दुकानें फिर से खुल गई हैं. लोग आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन मुश्किल से गुजर-बसर हो रही है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
बंजारे भी नहीं बच पाए
इस दीवार के सहारे झुग्गी बना कर और वहां चाय बेचकर यह बंजारन अपना जीविका चला रही थी. दंगाइयों ने इसकी चाय की छोटी सी दुकान को भी नहीं छोड़ा था.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
एक साल बाद
उसी लाल दीवार के सहारे बंजारों ने नए घर बना तो लिए हैं, लेकिन वो आज भी इस डर में जीते हैं कि रात के अंधेरे में कहीं कोई फिर से आग ना लगा दे.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
टायर बाजार
गोकुलपुरी का टायर बाजार दंगों में सबसे बुरी तरह से प्रभावित जगहों में था. लाखों रुपयों का सामान जला दिया गया था.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
एक साल बाद
टायर बाजार फिर से खुल चुका है. वहां फिर से चहलकदमी लौट आई है लेकिन दुकानदार अभी तक दंगों में हुए नुक्सान से उभर नहीं पाए हैं.
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जंग का मैदान
जाफराबाद, मुस्तफाबाद, शिव विहार समेत सभी इलाकों की शक्ल किसी जंग के मैदान से कम नहीं लगती थी. जहां तक नजर जाती थी, सड़क पर सिर्फ ईंट, पत्थर और मलबा था.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
एक साल बाद
साल भर बाद यह सड़क किसी भी आम सड़क की तरह लगती है, जैसे यहां कुछ हुआ ही ना हो. लेकिन लोगों के दिलों के अंदर दंगों का दर्द और मायूसी आज भी जिंदा है. (श्यामंतक घोष)
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW
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लेखक, फिल्मकार और अपनी 'हेरिटेज वॉक' के जरिए दिल्ली के इतिहास के बारे में लोगों को बताने वाले सोहेल हाशमी बताते हैं कि उन्होंने इस भेदभाव का सामना पहली बार 1980 के दशक में किया था.
घेटो बनने की वजह
फर्क बस इतना था कि वो कहते हैं कि उस समय लोगों की "नजर में शर्म" थी जिस वजह से कोई सीधा यह नहीं कहता था कि मकान मुस्लिम होने की वजह से नहीं दिया जाएगा.
हाशमी कहते हैं कि सीधा कहने की जगह "आप लोग तो मांस खाते होंगे" या "हम तो आप ही को मकान देने वाले थे लेकिन अचानक मेरे भाई ने न्यूयॉर्क से वापस आने का फैसला कर लिया" जैसे बहाने दे दिए जाते थे.
इसी समस्या ने घेटोकरण को भी बढ़ावा दिया है. खुद भी इस भेदभाव का सामना कर चुके वरिष्ठ पत्रकार महताब आलम कहते हैं, "आज आप जिन मोहल्लों को मुस्लिमों से जोड़ कर उन्हें मुस्लिम घेटो कहते हैं वो मोहल्ले बसे ही इसी वजह से क्योंकि उन मुस्लिमों को दूसरे मोहल्लों में रहने वालों ने अपने मकान दिए ही नहीं."
बहरहाल, दक्षिणी दिल्ली में अपने दफ्तर के करीब मकान ढूंढते ढूंढते रौफ को करीब दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन वो आज भी एक दोस्त के मकान में रहने को मजबूर हैं. थक हार कर उन्होंने कुछ दिनों की छुट्टी ले कर कश्मीर चले जाने का और वापस आने के बाद नए सिरे से मकान ढूंढने का फैसला किया है. यानी तलाश अभी भी जारी है.
यहां मुसलमान कारीगर बनाते हैं दुर्गा के बाल
पश्चिम बंगाल के कोलकाता के पास पार्वतीपुर में कई मुस्लिम कारीगर मां दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं के सिर के बाल बनाते हैं. देखिए, किस तरह से इस बार दुर्गा पूजा की तैयारी हो रही है.
तस्वीर: Subrata Goswami/DW
दुर्गा के बाल
हावड़ा के पार्वतीपुर गांव की सड़क की दोनों ओर रंग-बिरंगे जूट की कतारें आप देख सकते हैं. ये वास्तव में जूट के बाल हैं. दुर्गा पूजा करीब है और इसलिए काम जोरों पर चल रहा है.
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आमदनी का जरिया
इस आजीविका से पार्वतीपुर गांव के 80 घर जुड़े हुए हैं. गांव के करीब 80 से 100 लोग इस तरह से देवी के बाल बनाने का काम करते हैं.
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शफीक भी बनाते हैं बाल
शेख शफीक अली 70 साल के हो चुके हैं. एक समय उन्होंने इसी काम से अपने परिवार का पेट पाला और अपने बच्चों की परवरिश की. शफीक इस कारोबार के भविष्य को लेकर बहुत आशावादी नहीं हैं. उन्होंने कहा, "सुबह मस्जिद से अजान होते ही मेरी बीवी उठकर जूट सुखाती थी. अब हमारे बेटे की बहू नौ बजे उठती है."
तस्वीर: Subrata Goswami/DW
जूट से बनते हैं बाल
बाल बनाने के लिए मुख्य कच्चा माल जूट है. इसको साफ करने के बाद पक्के रंग में उबाल कर सुखाया जाता है.
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दुर्गा पूजा में बढ़ जाती है मांग
दुर्गा पूजा के दौरान इन कारीगरों की मांग अपने चरम पर होती है. दुर्गा पूजा के पहले इन कारीगरों पर काम का दबाव भी होता है साथ ही बालों को बारिश के पानी से बचाने का भी.
तस्वीर: Subrata Goswami/DW
भविष्य का डर
एक और कारीगर शेख राशिद अली ने कहा जूट के बालों का यह व्यवसाय उनके पूर्वजों के हाथों पार्वतीपुर में स्थापित किया गया था. उन्होंने कहा, "अगली पीढ़ी को इस तरह की मेहनत वाले काम में कोई दिलचस्पी नहीं है."
तस्वीर: Subrata Goswami/DW
क्या अगली पीढ़ी इस पेशे को छोड़ देगी?
फरीद-उल इस्लाम के तीन बेटे और एक बेटी है. फरीद-उल नहीं चाहते कि उनकी अगली पीढ़ी इस पेशे में आए. उन्होंने कहा, "मैंने कड़ी मेहनत करके उन्हें सिखाने की कोशिश की है, अगर वे कुछ और कर सकते हैं तो बेहतर होगा."