जैसे ही कोई महिला गर्भवती होती है, उसे चारों तरफ से नसीहतें मिलने लगती हैं कि ये खाओ, वो खाओ, इतना खाओ, उतना खाओ. सिर्फ घर वाले ही नहीं डॉक्टर भी खाने के लिए बहुत कुछ दे देते हैं. कोई डॉक्टर ढेर सारी सप्लीमेंट की गोलियां पकड़ा देता है, तो कोई टॉनिक की शीशी. लेकिन जच्चा बच्चा को क्या वाकई इतनी खुराक की जरूरत होती है? ब्रिटेन में हुई एक रिसर्च दिखाती है कि अधिकतर मामलों में यह सिर्फ पैसे की बर्बादी है.
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इस शोध के अनुसार दवा बनाने वाली कंपनियां गर्भवती महिलाओं को "सॉफ्ट टारगेट" के रूप में इस्तेमाल करती हैं. कंपनियां जानती हैं कि गर्भवती महिला दवाएं नहीं ले सकती, इसलिए उन्हें सप्लीमेंट बेचने के तरीके निकाले जाते हैं. अधिकतर सप्लीमेंट आप बिना डॉक्टर की रसीद दिखाए भी केमिस्ट से खरीद सकते हैं. बाजार में इनकी भरमार है और हर कंपनी अपने प्रोडक्ट को दूसरे से बेहतर साबित करने में लगी रहती है.
होने वाले बच्चे के स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है कि गर्भावस्था के दौरान कुछ जरूरी बातों का ख्याल रखा जाए. इनसे मां और बच्चे दोनों को फायदा होता है.
तस्वीर: Fotolia/photo 5000गर्भावस्था के दौरान मां कैसा महसूस कर रही है यह बहुत जरूरी है, इससे होने वाले बच्चे की सेहत पर भी असर पड़ता है. मां के लिए उसका बच्चा दुनिया की सबसे बड़ी खुशियों में से एक होता है. जरूरी है कि वह इस खुशी के एहसास को मरने न दे.
तस्वीर: Fotolia/Subbotina Annaमां औप बच्चे के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी घर के दूसरे सदस्यों पर भी होती है. शरीर में हार्मोन परिवर्तन के कारण मां का मूड पल भर में बदल सकता है. ऐसे में बाकियों को सहयोग बनाकर चलना जरूरी है, खासकर पति को.
तस्वीर: imago/CTK Photoसुबह नहाते समय हल्के गुनगुने पानी का इस्तेमाल करें. इसके बाद जैतून के तेल से मालिश मां के लिए फायदेमंद है, यह सलाह है जर्मन दाई हाएके सोयार्त्सा की.
तस्वीर: fotolia/diegoa8024मां के शरीर में हो रहे हार्मोन परिवर्तन के कारण त्वचा संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं. हफ्ते में एक दिन चेहरे पर मास्क का इस्तेमाल अच्छा है. एक चम्मच दही में कच्चा एवोकाडो मिलाकर लगाएं और दस मिनट बाद धो दें.
तस्वीर: picture-alliance/ dpaगर्भावस्था के दौरान कसरत जरूरी है. आसन लगाकर पेट के निचले हिस्से से सांस खींचकर छोड़ना तनाव दूर करता है. इस दौरान दिमाग में एक ही ख्याल हो, "यह सांस मेरे बच्चे को छू कर गुजर रही है."
तस्वीर: Fotolia/Robert Kneschkeसुबह बहुत कुछ खा सकना आसान नहीं, अक्सर सुबह के वक्त मां को उल्टी की शिकायत रहती है. हर्बल चाय या फिर हल्का फुल्का बिस्कुट या टोस्ट खाना बेहतर है. नाश्ते में इस बात पर ध्यान दें कि वह फाइबर वाला खाना हो. फल खाना और भी अच्छा है.
अक्सर गर्भावस्था के दौरान बाल रूखे और बेजान हो जाते हैं. बालों के लिए इस दौरान हल्के केमिकल वाले शैंपू का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. हफ्ते में एक दिन एक चम्मच जैतून के तेल में दही और अंडे का पीला भाग मिलाकर लगाने से बालों की नमी लौट आती है. गर्भावस्था में हेयर कलर का इस्तेमाल ना करें.
तस्वीर: Fotolia/Massonशरीर और दिमाग के स्वस्थ होने के साथ दोनों के बीच संतुलन बहुत जरूरी है. गर्भावस्था के दौरान पैदल चलना भी फायदेमंद है. स्वीमिंग के दौरान पानी से कमर को काफी राहत मिलती है.
तस्वीर: imago/emil umdorfमां के लिए दांतों को साफ रखना भी जरूरी है, दिन में दो बार ब्रश करें लेकिन नर्म ब्रश से. शुरुआती छह महीनों में दांतों का खास ख्याल रखें और डेंटिस्ट से भी नियमित रूप से मिलते रहें.
तस्वीर: imago/CHROMORANGEविशेषज्ञों के मुताबिक बच्चे के लिए हरी सब्जियां और आयोडीन युक्त भोजन फायदेमंद है. बच्चे को खूब आयरन और कैल्शियम की भी जरूरत होती है. ध्यान रहे कि खानपान में इन चीजों की कमी नहीं होनी चाहिए. नियमित रूप से डॉक्टर के पास जाना भी जरूरी है.
तस्वीर: DWदिन में करीब दो लीटर पानी पीना स्वस्थ जीवनशैली का हिस्सा है. ज्यादा पानी पीने से मां का शरीर चुस्त महसूस करता है.
तस्वीर: Fotolia/photo 5000
इन गोलियों में कई बार 20 से भी अधिक तरह के विटामिन और मिनरल मौजूद होते हैं. कमाल की बात यह है कि इन चीजों को कॉम्बिनेशन में लिया जाना जरूरी होता है ताकि वे अपना असर दिखा सकें. मिसाल के तौर पर आयरन को विटामिन सी के साथ लेना जरूरी होता है, नहीं तो वह खून में मिल ही नहीं पाता. इसके विपरीत आयरन को यदि कैल्शियम के साथ लिया जाए, तो उसका कोई असर नहीं हो पाता. लेकिन इन गोलियों में सभी चीजें एक साथ मौजूद होती हैं. इसलिए इस बात पर भी सवाल उठते हैं कि क्या ये वाकई असर करती भी हैं.
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गर्भवती महिलाओं को पहले तीन महीने 400 एमजी फॉलिक एसिड लेने की सलाह दी जाती है. इसी तरह पूरी गर्भावस्था के दौरान 10 एमजी विटामिन डी भी जरूरी बताया जाता है. लेकिन अधिकतर पश्चिमी देशों में आटे में फॉलिक एसिड पहले से ही मिला होता है. इस तरह से ब्रेड खा कर ही फॉलिक एसिड की जरूरत पूरी हो जाती है. वहीं भारत में जहां साल भर सूरज चमकता है, शरीर को धूप के जरिये ही विटामिन डी मिल जाता है.
जीवन का पहला साल बच्चे के विकास के लिए बेहद अहम होता है. बच्चे अपने आस पास की चीजों को समझना और पहले शब्द बोलना सीखते हैं. इस दौरान माता पिता कई सवालों से गुजरते हैं. यदि आप भी उनमें से हैं, तो इन टिप्स का फायदा उठाएं.
तस्वीर: Maksim Bukovski - Fotolia.comभारत में बच्चों की मालिश का चलन नया नहीं है. लेकिन माता पिता अक्सर इस परेशानी से गुजरते हैं कि बच्चे की मालिश कब और कैसे की जाए. शिशु को दूध पिलाने के बाद या उससे पहले मालिश ना करें. घी या बादाम तेल को हल्के हाथ से बच्चे के पूरे शरीर पर मलें. नहलाने से पहले मालिश करना अच्छा होता है.
नवजात शिशुओं की त्वचा बेहद नाजुक होती है. बहुत ज्यादा देर तक पानी में रहने से वह सूख सकती है. ध्यान रखें कि पानी ज्यादा गर्म ना हो. शुरुआती तीन हफ्ते में गीले कपड़े से बदन पोंछना काफी है. अगर आप बेबी शैंपू का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो एक हाथ से बच्चे की आंखों को ढक लें. नहाने के बाद बच्चे बेहतर नींद सो पाते हैं.
तस्वीर: Fotolia/S.Koboldब्रिटेन की शिशु रोग विशेषज्ञ डॉन केली बताती हैं कि माता पिता बच्चों को सुलाने से पहले उन्हें कपड़ों की कई परतें पहना देते हैं, "खास कर रात को, वे उन्हें बेबी बैग में भी डाल देते हैं और उसके ऊपर से कंबल भी ओढ़ा देते हैं." केली बताती हैं कि इस सब की कोई जरूरत नहीं. बहुत ज्यादा गर्मी बच्चे के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है.
तस्वीर: Fotolia/st-fotografबच्चे रोते हैं और इसमें परेशान होने वाली कोई बात नहीं है. जच्चा बच्चा सेहत पर किताब लिख चुकी अमेरिका की जेनिफर वॉकर कहती हैं, "बच्चे रोने के लिए प्रोग्राम्ड होते हैं. उनके रोने का मतलब यह नहीं कि आप कुछ गलत कर रहे हैं, बल्कि यह उनका आपसे बात करने का तरीका है." मुंह में पैसिफायर लगा हो, तो बच्चे कम रोते हैं.
तस्वीर: Yuri Arcurs/Fotoliaन्यूयॉर्क स्थित डेंटिस्ट सॉल प्रेसनर कहती हैं कि कई बार मां बाप बहुत देर में बच्चों के हाथ में ब्रश थमाते हैं. दूध के दांत बहुत नाजुक होते हैं और इन्हें बहुत ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है. प्रेसनर का कहना है कि जब दांत आने लगें, तो बच्चे को ठीक सोने से पहले दूध पिलाना बंद कर दें. अगर ब्रश कराना शुरू नहीं किया है, तो दूध पिलाने के बाद गीले कपड़े से दांत साफ करें.
तस्वीर: colourboxबच्चों को जितना हो सके कुदरत के साथ जोड़ें. आज के हाई टेक जमाने में माता पिता बच्चों को मोबाइल, टेबलेट और टीवी के साथ ही बढ़ा करने लगे हैं. अमेरिका की अकेडमी ऑफ पीडिएट्रिक्स का कहना है कि कम से कम दो साल की उम्र तक बच्चों को स्क्रीन से दूर रखना चाहिए.
तस्वीर: Fotolia/Boris Bulychevबच्चों के आसपास रंग होना अच्छा है. आठ से नौ महीने के होने पर बच्चे अलग अलग तरह के रंग, सुगंध, शोर और स्पर्श को पहचानने लगते हैं. यही उन्हें सिखाने का सही समय भी है.
तस्वीर: Fotowerk - Fotolia.comबच्चे खेल खेल में नई चीजें सीखते हैं. सिर्फ वस्तुओं को पहचानना ही नहीं, बल्कि खुशी और गुस्से जैसे भावों को भी समझने लगते हैं. बच्चों से बात करते हुए मुस्कुराएं और उनकी आंखों से संपर्क बना कर रखें. याद रखें कि बच्चे बोल नहीं सकते, इसलिए आंखों के जरिए संवाद करते हैं.
तस्वीर: Fotolia/Ana Blazic Pavlovicबच्चे के साथ बातें करें. जब वह कोई आवाजें निकाले, तो उन्हें दोहराएं और उसके साथ कुछ शब्द जोड़ दें. इस तरह बच्चे का जल्द ही भाषा के साथ जुड़ाव बन सकेगा. किताबों से पढ़ कर कहानियां सुनाने के लिए बच्चे के स्कूल पहुंचने का इंतजार ना करें. छोटे बच्चे इन कहानियों के जरिए नई आवाजें और शब्द सीखते हैं.
तस्वीर: Fotolia/Oksana Kuzminaबच्चों को नई नई चीजें सिखाने का सबसे अच्छा तरीका है उनके साथ वही चीज करना. बच्चे देख कर वही चीज दोहराते हैं. इसी तरह से आप उन्हें कसरत करना भी सिखा सकते हैं. शुरुआत में ध्यान लगने में वक्त लग सकता है लेकिन बाद में बच्चे नई चीजें करने में आनंद लेने लगते हैं.
तस्वीर: Fotolia/detailblickजब तक बच्चे चलना नहीं सीख लेते उन्हें जूतों की जरूरत नहीं होती. इन दिनों फैशन के चलते माता पिता नवजात शिशुओं के लिए भी जूते खरीदने लगे हैं. शिशुओं के लिए मोजे ही काफी हैं. ये उनके लिए आरामदेह भी होते हैं.
तस्वीर: Fotolia/deber73बच्चे वयस्कों की तरह पार्टी नहीं कर सकते. वे जल्दी थक जाते हैं और भीड़ से ऊब भी जाते हैं. इसे ध्यान में रखते हुए अपने बच्चे की पहली बर्थडे पार्टी को एक से दो घंटे तक ही सीमित रखें ताकि पार्टी बच्चे की मुस्कराहट का कारण बने, आंसुओं का नहीं.
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ऐसे में रिसर्च यह दावा करती है कि सप्लीमेंट की जरूरत सिर्फ तब पड़नी चाहिए जब डॉक्टरी जांच में पता चले कि शरीर में किसी चीज की कमी है. इस तरह से लोगों को पैसे बर्बाद करने से बचाया जा सकता है. पश्चिमी यूरोप में गर्भवती महिलाएं इन सप्लीमेंट पर औसतन महीने के 30 यूरो यानी करीब दो से ढाई हजार रुपये खर्च करती हैं.
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रिसर्च के अनुसार जरूरत से ज्यादा सप्लीमेंट बच्चे की सेहत के लिए हानिकारक भी हो सकता है, खास कर विटामिन ए. ऐसे में यह सुझाव दिया गया है कि महिलाओं को सप्लीमेंट से ज्यादा पौष्टिक आहार पर ध्यान देना चाहिए. भारत समेत जिन देशों में अनाज से बनी चीजों में फॉलिक एसिड नहीं मिला होता है, वहां गर्भवती महिलाओं के लिए फॉलिक एसिड लेना जरूरी है. अगर शरीर में किसी भी चीज की कमी है, तो सप्लीमेंट के जरिये उसे पूरा करें, अन्यथा अच्छे खानपान के जरिये अपना और अपने बच्चे का ख्याल रखें.
ईशा भाटिया (एएफपी)
तस्वीर: Fotolia/st-fotograf जन्म के समय जिन बच्चों का वजन चार किलोग्राम या उससे ज्यादा होता है, वह बड़े हो कर मोटापे का शिकार हो सकते हैं. इसीलिए इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि गर्भवती महिलाएं अत्यधिक खानपान से दूर रहें, कसरत करती रहें और उन्हें डायबिटीज न हो.
बच्चे मां का स्पर्श, उसकी खुशबू को पहचानते हैं. अक्सर कहा जाता हैं कि मां बच्चे की रुलाई पिता से बेहतर पहचानती है. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं, मां और बाप दोनों अपने बच्चे की रोने की आवाज यकीन के साथ और समान रूप से पहचान सकते हैं.
तस्वीर: Fotolia/Marcitoहर बच्चे की नींद का पैटर्न अलग होता है, लेकिन कुल मिला कर नवजात शिशुओं को करीब 16 घंटे की नींद की जरूरत होती है. जैसे जैसे उम्र बढ़ती है यह कम होती जाती है.
तस्वीर: Gabees/Fotoliaसंयुक्त राष्ट्र के अनुसार जन्म के बाद छह महीने तक तो बच्चे को केवल मां का दूध ही पिलाना चाहिए. थाईलैंड में सिर्फ पांच फीसदी महिलाएं बच्चों को अपना दूध पिलाती हैं. भारत अभी भी इससे बचा है. यूनिसेफ ने कहा कि इस मामले में दुनिया को भारत से सीख लेनी चाहिए.
तस्वीर: AFP/Getty Imagesइन दिनों बहुत कम उम्र के बच्चों के लिए भी कंप्यूटर और स्मार्टफोन पर ऐप उपलब्ध हैं, जो बच्चों के विकास में मददगार हैं. पहले दो सालों में दिमाग का आकार तीन गुना बढ़ जाता है, जो कि चीजों को छूने, फेंकने, पकड़ने, काटने, सूंघने, देखने और सुनने जैसी गतिविधियों से मुमकिन होता है.
तस्वीर: Fotolia/bellaगर्भावस्था के समय कई बातों का सीधा असर पैदा होने वाले बच्चे और उसके आगे के जीवन पर पड़ता है. यदि गर्भवती महिला तनाव में है तो बच्चे तक पोषक तत्व नहीं पहुंचते. इसी तरह जन्म के बाद भी मां का अपनी सेहत पर ध्यान देना जरूरी है.
तस्वीर: picture-alliance/dpaछोटे बच्चों को अक्सर दवाओं से दूर रखने की कोशिश की जाती है. खास तौर से एंटीबायोटिक का इस्तेमाल बच्चों के लिए हानिकारक होता है. इनसे शरीर के फायदेमंद जीवाणु मर जाते हैं. मोटापा, दमा और पेट की बीमारियां बढ़ती हैं.
तस्वीर: Fotowerk - Fotolia.comबच्चों के लिए दुनिया बेहतर बन रही है. पिछले एक दशक में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में 50 फीसदी तक की गिरावट आई है.
तस्वीर: Fotolia/st-fotograf