मराठी नहीं सीखने पर छिन जाएगा ऑटो टैक्सी ड्राइवरों का परमिट
३ जून २०२६
महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के सभी ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों को मराठी सीखने के लिए 15 अगस्त तक का समय दिया है. इस पहल के तहत गैर-मराठी भाषी ड्राइवरों को मराठी सिखाने के लिए कोंकण मराठी साहित्य परिषद, महाराष्ट्र राज्य साहित्य संस्कृति मंडल और मुंबई मराठी साहित्य संघ जैसी संस्थाओं की मदद ली जा रही है.
सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य चालकों और यात्रियों के बीच संवाद को आसान बनाना है. इस अभियान की शुरुआत मुंबई से हुई है. मुंबई महानगर क्षेत्र में कुल 59 क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) हैं.
ऑटो और टैक्सी चालकों को चार दिन मराठी बोलने का प्रशिक्षण दिया जाएगा. इसके लिए ड्राइवरों को रोज एक घंटा निकालना है. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद चौथे दिन परीक्षा ली जाएगी. जो चालक इसमें सफल होते हैं, उन्हें आधिकारिक प्रमाणपत्र मिलेगा. सरकार इसे मराठी जानने के आधिकारिक प्रमाण के तौर पर मानेगी. इस प्रमाणपत्र को वे आरटीओ में जमा कर परमिट या अन्य संबंधित प्रक्रियाओं में इस्तेमाल कर सकते हैं.
क्या कहता है सरकार का नया नियम?
परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक का कहना है कि यह फैसला यात्रियों और चालकों के बीच बेहतर संवाद के लिए लिया गया है. इसके लिए कोई लिखित परीक्षा नहीं होगी. अधिकारियों की ओर से सिर्फ यह देखा जाएगा कि चालक मराठी समझ और बोल सकते हैं या नहीं.
सरनाईक कहते हैं, "कई विधायकों ने आरटीओ में अवैध परमिट और फर्जी दस्तावेजों को लेकर मुझे पत्र लिखे थे. असली मुद्दा यात्रियों और चालकों के बीच संवाद का है. ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी जानने की शर्त नई नहीं है. यह प्रावधान 1989 के महाराष्ट्र मोटर वाहन नियमों में पहले से मौजूद है और सरकार सिर्फ उसी नियम को लागू कर रही है."
महाराष्ट्र सरकार के प्रस्तावित बदलाव के अनुसार ड्राइविंग लाइसेंस और परमिट जारी करने से पहले आवेदक की मराठी भाषा की बुनियादी समझ की जांच की जाएगी. परमिट के नवीनीकरण के लिए भी इसी प्रक्रिया को फॉलो करना होगा. पहले यह शर्त सीमित रूप में बैज जारी करने तक लागू थी. यह बैज किसी आदमी को टैक्सी, ऑटो-रिक्शा या दूसरे सार्वजनिक वाहन चलाने की अनुमति देता है. अब सरकार इसे ज्यादा व्यवस्थित और सख्त बनाना चाहती है.
इस निर्देश का असर सिर्फ मुंबई में ही करीब 2.8 लाख ऑटो-रिक्शा और 20 हजार टैक्सी परमिट धारकों पर पड़ सकता है. इनमें बड़ी संख्या उन चालकों की है जो हिंदी भाषी राज्यों से आकर मुंबई में बसे हैं और सालों से मराठी जाने बिना ही शहर में अपनी आजीविका चला रहे हैं. मेरठ निवासी नरेंद्र सिंह को ऑटो-रिक्शा चलाते हुए दो दशक से ज्यादा समय हो चुका है.
नरेंद्र का कहना है कि नई भाषा सीखने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते इसे लोगों पर थोपा ना जाए. उनके मुताबिक यह फैसला सरकार से ज्यादा राजनीतिक दलों और संगठनों से प्रेरित होकर लिया गया है. डीडब्ल्यू से बातचीत में वह कहते हैं, "भाषा सीखने में एक से दो साल लग जाते हैं. हमें इसके लिए ज्यादा समय दिया जाना चाहिए.”
नरेंद्र अपना अनुभव साझा करते हैं. यात्रियों को रिक्शा चालक की भाषा से फर्क नहीं पड़ता. उन्होंने बताया, "यात्री बताता है कि उसे कहां जाना है और किराया देकर चले जाते हैं. मुझे कभी किसी ने मराठी में बात करने को नहीं कहा."
हालांकि, नरेंद्र मानते हैं कि मराठी सीखना फिर भी जरूरी है, खासकर सरकारी कामकाज के लिए. वह आगे कहते हैं, "समस्या तब आती है जब आरटीओ अधिकारी हमें रोकते हैं. वे मराठी में बात करते हैं. वे इतनी स्पीड से बोलते हैं कि कभी-कभी उनकी बात समझना मुश्किल हो जाता है. परमिट और लाइसेंस से जुड़ी प्रक्रिया वैसे भी अंग्रेजी या मराठी में होती है. इसलिए महाराष्ट्र में रहते हो, तो मराठी सीख लेनी चाहिए."
'एक वर्ग को निशाना ना बनाए सरकार'
छत्तीसगढ़ के भिलाई से साल 2012 में रोजगार की तलाश में मुंबई आए आसिम कुरैशी हर दिन 50 से 65 किलोमीटर ऑटो चलाते हैं. कभी-कभी वे किराए पर टैक्सी भी चलाते हैं. ऑटो परमिट हासिल करने से पहले उन्होंने अपना मूल निवास (डोमिसाइल) प्रमाणपत्र जमा कर दिया था.
उनका कहना है कि भाषा उनके काम में कभी बाधा नहीं बनी. उनके अधिकांश ग्राहक मराठी भाषी हैं. उन्हें उनसे संवाद करने में कोई दिक्कत नहीं होती. सालों के दौरान उन्होंने मराठी के कुछ आम शब्द और वाक्य सीख लिए हैं जिनकी मदद से वह यात्रियों से आसानी से बातचीत कर लेते हैं.
भाषा से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा यात्रियों की सुरक्षा का है. आसिम डीडब्ल्यू से कहते हैं, "यात्री ध्यान देते हैं कि ड्राइवर के साथ कितना सुरक्षित महसूस करते हैं और वह वाहन सही तरीके से चलाता है या नहीं. हां, राज्य में नगरपालिका से लेकर आरटीओ तक ज्यादातर काम मराठी में होते हैं. लेकिन इसके लिए एजेंट मौजूद हैं. हम उन्हें पैसे देते हैं. मुझे लगता है कि सरकार का यह फैसला सफल नहीं होगा."
आसिम सवाल उठाते हैं कि मुंबई में सालों से रह रहे बड़े कारोबारी और अमिताभ बच्चन जैसे अभिनेताओं से मराठी सीखने की अपेक्षा क्यों नहीं की जाती. यही सवाल कई ड्राइवरों के मन में भी है.
नरेंद्र अपना पक्ष रखते हैं, "ज्यादातर ड्राइवर उत्तर भारत से रोजगार के लिए मुंबई आते हैं. भाषा सीखने का बोझ सिर्फ ड्राइवरों पर डाला जा रहा है. जिन एमएनसी और कॉल सेंटर कर्मचारियों का रोज ग्राहकों से सीधा संपर्क होता है, उन पर भी समान नियम लागू किए जाने चाहिए.”
उन्होंने आगे कहा, "हमारा संविधान हर नागरिक को अपनी पसंद की भाषा में बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है. जो हिंदी में बात करता है उसका भी सम्मान किया जाना चाहिए. किसी भाषा को सीखना अच्छी बात है. मगर किसी व्यक्ति को उसकी भाषा के आधार पर नहीं परखा जाना चाहिए."
मराठी सिखाने की तैयारी
ड्राइवरों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए अप्रैल और मई में महाराष्ट्र सरकार की कई बैठकें हुईं. सुहासिनी कीर्तिकर मुंबई मराठी साहित्य संघ (एमएमएसएस) में मराठी भाषा पाठ्यक्रम की कोऑर्डिनेटर हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि ड्राइवरों से मराठी लिखने की अपेक्षा नहीं की जा रही है. प्रशिक्षण का मकसद सिर्फ उन्हें मराठी में बुनियादी बातचीत करना सिखाना है. इसके लिए सरल सवाल-जवाब और रोजमर्रा की बातचीत पर आधारित पाठ्यक्रम तैयार किया गया है.
सुहासिनी कीर्तिकर की संस्था ने मराठी सीखने के लिए पुस्तिकाएं तैयार कर मुंबई, ठाणे और पालघर में बांटी हैं. इन इलाकों में नए प्रशिक्षण केंद्र भी खोले गए हैं और प्रशिक्षकों की नियुक्ति की गई है. उन्होंने आरटीओ अधिकारीयों के साथ मिलकर यूनियन नेताओं से भी बातचीत की. उन्हें इस पहल के बारे में समझाया. सुहासिनी के अनुसार अब ड्राइवरों का रवैया सकारात्मक है और वे केंद्रों पर सीखने आ रहे हैं.
वह कहती हैं, "ड्राइवर अपने काम से फुर्सत मिलने के बाद दिन या रात किसी भी समय हमारे केंद्र आ सकते हैं. यह प्रशिक्षण पूरी तरह मुफ्त है. फिलहाल इसकी शुरुआत मुंबई से की जा रही है. आने वाले समय में इस पहल को महाराष्ट्र के अन्य जिलों में भी लागू किया जाएगा."
सुहासिनी कीर्तिकर का मानना है कि अन्य राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र का यह कदम असामान्य नहीं है. उनके अनुसार, "तमिलनाडु और केरलम में अधिकांश सरकारी सूचनाएं और नोटिस उनकी अपनी भाषा में होती हैं. मराठी सीखना उसके मुकाबले अपेक्षाकृत आसान है."
फैसले का विरोध
1960 के दशक के मध्य से, अविभाजित शिवसेना ने बाल ठाकरे के नेतृत्व में महाराष्ट्र में मराठी पहचान को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया. पार्टी मानती है कि बाहर से आने वाले लोग नौकरियां ले रहे हैं. इससे राज्य की जनसंख्या और सामाजिक संतुलन बदल रहा है.
अब राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिव सेना (यूबीटी) ने परिवहन मंत्री के इस फैसले का समर्थन किया है.
विपक्ष का कहना है कि इस फैसले से गैर-मराठी भाषी चालकों की आजीविका प्रभावित हो सकती है. कांग्रेस विधायक नाना पटोले ने सरकार के इस कदम की आलोचना की है.
मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, "सरकार अपने ही पतन का रास्ता तैयार करती दिख रही है. हम भारतीय हैं और हमारे देश की पहचान उसकी भाषा, धार्मिक व सामाजिक विविधता में है. भाषा के आधार पर महाराष्ट्र को बांटने और उसकी विरासत को नुकसान पहुंचाने की कोशिश एक मूर्खतापूर्ण विचार है."
मुंबई ऑटो रिक्शा और टैक्सीमैन यूनियन के अध्यक्ष शशांक राव ने मीडिया को दिए बयान में कहा है कि ड्राइवरों के लाइसेंस रद्द करने के किसी भी प्रयास का यूनियनें विरोध करेंगी. नई शर्त नए परमिट जारी करते समय लागू की जा सकती है. लेकिन जिन चालकों के पास पहले से परमिट हैं, उनके लाइसेंस रद्द ना किए जाएं.