दक्षिण अमेरिकी देशों के समूह 'मर्कोसुर' और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौते पर सहमति बन गई है. हालांकि, फ्रांस और पोलैंड समेत यूरोप भर के किसान इस समझौते के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं.
पोलैंड की राजधानी वारसॉ में मर्कोसुर डील का विरोध करते किसान और ट्रेड यूनियनतस्वीर: Artur Widak/Anadolu Agency/IMAGO
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यूरोपीय संघ ने दक्षिण अमेरिकी देशों के समूह मर्कोसुर के साथ करीब 25 साल से अटके बड़े व्यापार समझौते को आखिरकार हरी झंडी दे दी. शुक्रवार को ब्रसेल्स में राजदूतों की बैठक के बाद यूरोपीय संघ के 27 देशों में से ज्यादातर ने इस समझौते का समर्थन किया. मर्कोसुर लैटिन अमेरिकी अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है जिसमें अर्जेंटीना, ब्राजील, पराग्वे और उरुग्वे शामिल हैं. अर्जेंटीना के मुताबिक, इस समझौते पर 17 जनवरी को पराग्वे में दस्तखत किए जाएंगे.
ईयू के कारोबारी समूहों ने इस समझौते की तरफदारी की है. समर्थक इस करार को निर्यात बढ़ाने, यूरोपीय महाद्वीप की सुस्त अर्थव्यवस्था को सहारा देने और वैश्विक अनिश्चितता के दौर में राजनयिक रिश्तों को बढ़ावा देने के नजरिए से अहम मानते हैं. हालांकि यूरोपीय किसानों ने मर्कोसुर समझौते को तगड़ा विरोध किया है. पूरे फ्रांस और ईयू के मुख्यालय ब्रसेल्स में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए हैं.
वैश्विक अनिश्चितता के बीच बड़ी सफलता
यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला फॉन डेय लाएन ने कहा कि यह समझौता,"इस बात का सबूत है कि यूरोप अपना रास्ता खुद तय करता है और एक भरोसेमंद साथी के तौर पर खड़ा है."
जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने कहा कि इस करार ने "हमारी रणनीतिक संप्रभुता और कदम उठाने की क्षमता का एक अहम संकेत" भेजा है. स्पेन ने भी जर्मनी के नजरिए से सहमति जताई है. मर्कोसुर समूह की तरफ से ब्राजील के राष्ट्रपति लुइस इनासियो लूला दा सिल्वा ने इसे "बहुपक्षवाद के लिए एक ऐतिहासिक दिन" बताया.
आयरलैंड में मर्कोसुर ट्रेड डील के विरोध में प्रदर्शन करते किसानतस्वीर: Cillian Sherlock/PA Wire/empics/picture alliance
फ्रांस समेत पांच देश विरोध में
मर्कोसुर समूह से बातचीत करने वाला यूरोपीय आयोग, संघ के सभी सदस्य देशों को एक साथ लाने में कामयाब नहीं हो सका. ईयू की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था फ्रांस में तमाम राजनीतिक खेमे, मर्कोसुर समझौते के खिलाफ हैं. किसानों के साथ राजनेताओं को भी डर है कि इससे देश के प्रभावशाली कृषि क्षेत्र को काफी नुकसान होगा.
आयरलैंड, पोलैंड, हंगरी और ऑस्ट्रिया ने भी इस समझौते के खिलाफ वोट दिया है. हालांकि, यह विरोध समझौते को रोकने के लिए काफी नहीं था क्योंकि अब तक विरोध कर रहे इटली ने आखिर में समझौते का समर्थन कर दिया.
ईयू के मुताबिक, इस समझौते से यूरोपीय कंपनियां हर साल चार अरब यूरो का शुल्क बचा पाएंगी. साथ ही लैटिन अमेरिकी देशों को वाहन, मशीनरी, वाइन और शराब निर्यात करने में आसानी होगी.
थिंक टैंक 'यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस' से जुड़ीं अगाथ दुमाराए मानती हैं कि यह समझौता ईयू को रेयर अर्थ मैटिरियल के लिए चीन पर अपनी निर्भरता घटाने में भी मदद करेगा. उन्होंने कहा, "ईयू-मर्कोसुर व्यापार समझौते का पूरा होना यूरोप की वैश्विक भू-राजनीतिक और आर्थिक ताकत के लिए बहुत बड़ी खबर है."
रीड ग्लास विंग्ड सिकाडा नाम का एक कीट जर्मनी में आलू और दूसरी सब्जियों के लिए महामारी फैला रहा है. कुछ किसानों की तो पूरी फसल ही चौपट हो गई है. जर्मनी के लोगों पर इसका क्या असर होगा?
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कीट का खतरा
दिखाई नहीं देता लेकिन बेहद खतरनाक है. रीड ग्लास विंग्ड सिकाडा पौधों में तेजी से फैल रही स्टोल्बर बीमारी के पीछे है. दक्षिणी जर्मनी के बाडेन वुर्टेमबर्ग के कृषि मंत्रालय के मुताबिक आलू, सब्जियों, चुकंदर की सप्लाई के लिए पहले ही "गंभीर खतरा" मान लिया गया है. यह कीट जर्मनी के लोअर सैक्सनी और सेक्सनी अनहाल्ट राज्यों तक फैल गया है.
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किसानों की फसल हो रही है चौपट
सिगाडा एक बैक्टीरियम को पौधों तक पहुंचाता है जिनकी वजह से आलू के पौधे मुरझा जाते हैं और चुकंदर नरम हो जाता है. इसके नतीजे में भारी नुकसान होता है. कृषि वैज्ञानिक सब्जियों के नमूने और सिकाडा के लार्वा तैयार कर रहे हैं जिससे कि प्रयोगशाला में उन पर प्रयोग किए जा सकें.
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खतरे की घंटी
नमूनों को कड़ी बारीकी से माइक्रोस्कोप के जरिए परखा जा रहा है. शुगर बीट ग्रोअर्स एसोसिएशन के चेयरमैन के मुताबिक रीड ग्लास विंग्ड सिकाडा ने यूरोपीय संघ में भोजन की आपूर्ति के लिए अब तक का सबसे बड़ा खतरा पैदा किया है, इसमें कोई संदेह नहीं है. किसान ने असरदार मदद के लिए तुरंत कदम उठाने की मांग की है.
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सब्जियां खराब होंगी
सिकाडा अपने साथ कैंडिडेटस फाइटोप्लाज्मा सोलानी बैक्टिरियम लेकर आता है. जो पौधों में अपने डंक मारने के साथ छोड़ देते हैं. इसकी वजह से अकसर स्टोलबर बीमारी पैदा होती है. इस कारण पौधे या तो मुर्झा जाते हैं या फिर उनका जड़ खराब हो जाता है. सब्जियों को स्टोर करना मुश्किल हो जाता है, फसल घट जाती है और उनका स्वाद बिगड़ जाता है. इसकी वजह है उनमें मिठास का कम होना.
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केवल आलू के लिए नहीं है संकट
प्याज, पत्तागोभी, गाजर, मिर्च, रुबाब जैसी कई और सब्जियां इस बीमारी की चपेट में आती हैं. ये वैज्ञानिक रूबाब के खेतों में सिकाडा के संक्रमण के कारण हुए नुकसान का विश्लेषण कर रहे हैं.
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जलवायु परिवर्तन को दोष
इस तरह के अवांछित कीटों के बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं, खासतौर से मौसम. जलवायु परिवर्तन गर्मियों का ताप बढ़ा रहा है और ठंड को उतना सर्द नहीं होने दे रहा. ऐसा वातावरण कीटों के पनपने के लिए काफी अनुकूल है. यह उनकी सक्रियता का दौर बढ़ा देता है, प्रजनन को तेज करता है और उन्हें ज्यादा इलाकों तक पहुंचने में मदद करता है. इसकी वजह से खतरा और बढ़ता है.
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घट जाएगी स्थानीय उपज
पौधों को जाली से ढक कर इस बीमारी को कुछ हद तक रोकने में मदद मिल सकती है. अधिकारियों के मुताबिक स्टोल्बर से इंसानों की सेहत को कोई खतरा नहीं है. आलू या दूसरी सब्जियों में अगर उनके खराब होने के निशान दिख जाएं तो उन्हें बेचने की वैसे भी अनुमति नहीं है. हालांकि अगर यह बीमारी इसी तरह फैलती रही तो पतझड़ के मौसम में स्थानीय सब्जियों की कमी जरूर हो जाएगी.
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कितनी सब्जियां चाहिए जर्मनी को
जर्मन लोग अमूमन प्रतिदिन 600 ग्राम तक सब्जियां खाते हैं. बीते 20 सालों में सब्जियों की इस खपत में 24 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. जर्मनी सब्जियों के अपने कुल उपभोग का लगभग 36 फीसदी हिस्सा ही उगा पाता है. बाकी की सब्जियां उसे दूसरे देशों से आयात करनी पड़ती है. सब्जियां तो यहां कई सारी उगाई जाती हैं लेकिन सबसे ज्यादा गाजर, प्याज और पत्तागोभी उगाया जाता है.
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आलू की खपत
दूसरे यूरोपीय देशों की तरह ही जर्मनी में भी आलू की खपत काफी ज्यादा है. औसत रूप से हर आदमी यहां एक साल में 60 किलो तक आलू खा जाता है. आलू सिर्फ सब्जी के तौर पर ही नहीं बल्कि कई बार रोटी चावल की तरह भी खाई जाती है. ऐसे कई पकवान हैं जिन्हें आलू के साथ खाया जाता है. 2021 में जर्मनी में 1.07 करोड़ टन आलू पैदा हुआ था. देश में पैदा होने वाले आलू का बड़ा हिस्सा जर्मन लोग खुद खा जाते हैं.
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किसान नाराज, अब आगे क्या?
फ्रांस समेत इस समझौते के अन्य आलोचकों ने चिंता जताई है कि उनके किसानों को कृषि दिग्गज ब्राजील और उसके पड़ोसियों से आने वाले मांस, चीनी, चावल, शहद और सोयाबीन जैसे सस्ते उत्पादों से नुकसान होगा.
हालांकि, फ्रांस की कृषि मंत्री एनी जिनेवा ने कहा है कि यह "कहानी का अंत नहीं है", क्योंकि यूरोपीय संसद में इस डील पर अभी भी वोटिंग होनी है. डील की घोषणा होने के बाद कई यूरोपीय देशों में किसानों ने प्रदर्शन किया है.
पोलैंड की राजधानी वारसॉ में विरोध मार्च निकाला गया, वहीं फ्रांस और बेल्जियम में सड़कें जाम कर दी गईं. इटली के मिलान में नाराज किसानों ने अपने ट्रैक्टरों से यातायात बाधित किया, और क्षेत्रीय परिषद की इमारत के सामने भूसा बिखेर दिया और दूध जमीन पर बहा दिया.
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