सलमान रुश्दी का नया उपन्यास छपने के लिए तैयार है. न्यूयॉर्कर पत्रिका ने ‘बोरा भर बीज' नाम से इन अंशों को प्रकाशित किया है. जिस अंक में ये अंश प्रकाशित हुए हैं, वह 12 दिसंबर को बाजार में आएगा. इस उपन्यास का शीर्षक ‘विक्ट्री सिटी' है जो पेंग्विन रैंडम हाउस प्रकाशन से अगले साल फरवरी में प्रकाशित होना है. यह उनका 15वां उपन्यास होगा.
विवादित लेखक सलमान रुश्दी पर इसी साल न्यूयॉर्क मेंएक युवक ने चाकू से हमला कर दिया था जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे. यह हमला उनके खिलाफ जारी एक फतवे का नतीजा था, जो ईरान के धार्मिक नेता अयातोल्लाह खोमैनी ने उनकी किताब "शैतानी आयतें" (Satanic Verses) के प्रकाशन के बाद 14 फरवरी 1989 को जारी किया था.
राजस्थान में जैसलमेर के किले को भारत के इकलौते "जीवित किले" के रूप में जाना जाता है. सत्यजीत रे की "सोने का किला" नाम की किताब और फिल्म इसी किले पर आधारित हैं.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWजैसलमेर किले को सन 1156 में राजपूत राजा रावल जैसल ने बनवाया था. जैसलमेर शहर का नाम भी उन्हीं के नाम पर है. यह देश का इकलौता "जीवित किला" है, यानी ऐसा किला जिसके अंदर आज भी लोग रहते हैं.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWयह इस इलाके में पाए जाने वाले रेतीले पत्थर से बना है जो पीले रंग का होता है. सूरज की रोशनी पड़ते ही यह पत्थर सोने जैसा चमकने लगता है. इसी वजह से सत्यजीत रे ने अपनी किताब और अपनी फिल्म में इसे "सोनार किला" नाम दिया था.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWहर साल इस किले को देखने हजारों देशी और विदेशी पर्यटक आते हैं. राजस्थान पर्यटन के लिए भी जाना जाता है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWइस किले में करीब 2,000 लोग रहते हैं. इनके पूर्वजों को राजा से यहां रहने की अनुमति मिली थी. यही लोग किले का रखरखाव करते हैं.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWइसी मकान को "सोने का किला" फिल्म में मुख्य किरदार मुकुल का घर दिखाया गया था. यह मकान कुछ साल पहले पूरी तरह से टूट गया था, लेकिन यहां के गाइड आज भी मुकुल का घर दिखाने पर्यटकों को यहां लेकर आते हैं.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWआज भी राजा का राजतिलक इसी सिंहासन पर किया जाता है. मौजूदा राजा की उम्र सिर्फ 25 साल है. भारत में कभी कई रजवाड़े थे, लेकिन दशकों पहले राजशाही को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया था. लेकिन राजपूत आज भी शाही खानदान को सम्मान देते हैं. जैसलमेर में भी आज तक राजतिलक होता है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWयह किले के अंदर स्थित राजा का आवास है. यहां होली और दिवाली जैसे त्यौहार आज भी मनाए जाते हैं. राजा सभी त्योहारों में हिस्सा लेते हैं.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWकिले के अंदर कई मंदिर हैं. इस मंदिर को सत्यजीत रे की फिल्म में दिखाया गया था.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWकिले के अंदर कई दुकानें हैं, जिनमें स्थानीय दुकानदार राजस्थानी हस्तशिल्प का सामान बेचते हैं. स्थानीय लोक गायक यहां किले की दीवार के पास लोक गीत सुनाते हैं.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWकिले के अंदर ही कई होटल और होमस्टे हैं. किले के अंदर स्थित इस होटल में रुकना एक अलग ही तजुर्बा है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWराजपूत आज भी अपने शाही झंडे रखते हैं, जिन्हें राजस्थान के हर किले के ऊपर देखा जा सकता है. राजा जैसल का झंडा आज भी जैसलमेर किले के ऊपर लहरा रहा है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWजैसलमेर में सिर्फ किला ही नहीं बल्कि लगभग हर मकान रेतीले पत्थर का बना है, जिसकी वजह से एक तरह से पूरा शहर ही सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सोने सा चमकता है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWस्थानीय लोगों का मानना है कि इस इलाके में एक समुद्र हुआ करता था, जो बाद में सूख गया और उसकी जगह रेगिस्तान ने ले ली. यहां के रेतीले पत्थरों में अभी भी समुद्री जीव जंतुओं के जीवाश्म मिलते हैं. इन पत्थरों से बने बर्तनों में खाना खाने को स्वास्थ्यप्रद माना जाता है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWजैसलमेर के लोगों की कमाई मुख्य रूप से पर्यटन की वजह से ही होती है. शहर में लगभग सभी सत्यजीत रे के बारे में जानते हैं. उनका मानना है कि रे की फिल्म ने इस शहर की जिंदगी ही बदल दी.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DWवैसे तो किला रेगिस्तान के बीच में ही स्थित है, लेकिन रेत के टीलों को देखने के लिए आपको करीब 40 किलोमीटर दूर जाना पड़ेगा. वहां से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित है भारत-पाकिस्तान सीमा. सीमा भी रेगिस्तान के बीचोबीच है.
तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW उन पर और उपन्यास के प्रकाशन और वितरण में मदद देने वाले लोगों पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गया. उनके जापानी अनुवादक हितोशी इगाराशी की तो हत्या ही कर दी गई. इटैलियन अनुवादक और नॉर्वे के प्रकाशक हमले में बाल-बाल बचे थे.
क्या है विक्ट्री सिटी?
रुश्दी की नई किताब विक्ट्री सिटी 14वीं सदी के एक भूभाग के बारे में है जो अब भारत का हिस्सा है. यह एक औरत की कहानी है.
न्यूयॉर्कर में अंशों के प्रकाशन की पुष्टि करते हुए रुश्दी ने ट्वीट भी किया है, जो अगस्त में हमले के बाद से उनका पहला ट्वीट है.
न्यूयॉर्कर में प्रकाशित अंश कुछ यूं शुरू होता है, "शहर की कहानी 14वीं सदी के साझा युग में उसके दक्षिणी हिस्से में आरंभ होती है जिसे हम आज इंडिया या भारत या हिंदुस्तान कहते हैं.”
औरतों को तो सरहदें लांघ कर ही आगे जाना हैः गीतांजली श्री
कहानी जिस महिला की है, उस किरदार का नाम पांपा कंपाना है. उसका जिक्र इस तरह आता है, "पंपा कंपाना ने यह सब होते हुए देखा. ऐसा प्रतीत होता था मानो ब्रह्मांड उसे एक संकेत भेज रहा था कि सुनो, ग्रहण करो और सीखो. वह नौ साल की थी और अपनी आंखों में आंसु भरकर, अपनी मां का हाथ पूरे जोर से पकड़े हुए थी, जिसकी आंखें एकदम सूखी थीं. जितनी महिलाओं को वह जानती थी, उसने सबको अग्नि में प्रवेश करते हुए देखा.”
रुश्दी का जीवन
1988 में सैटनिक वर्सेस प्रकाशित होने के बाद सेरुश्दी ने अपनी अधिकतर जिंदगी डर के साये में गुजारी है. 12 साल तक वह ब्रिटेन में सुरक्षाकर्मियों की सुरक्षा में रहे. साल 2000 में वह अमेरिका चले गए थे औरअब अमेरिकी नागरिक हैं. 2002 से उन्हें सुरक्षा तो हासिल नहीं है लेकिन सुरक्षाकर्मी उनके सार्वजनिक आयोजनों पर साथ होते हैं. हालांकि वह अब भी अल कायदा और इस्लामिक स्टेट की हिटलिस्ट पर हैं.
बुकर पुरस्कार को विश्व साहित्य की दुनिया का ऑस्कर भी कहा जाता है. 1997 की विजेता अरुंधति रॉय से लेकर 2020 के विजेता डगलस स्टुअर्ट तक, जानिए किस किस ने जीता इस पुरस्कार को.
तस्वीर: Martyn PICKERSGILL/thebookerprizes/AFPअरुंधति रॉय ने 1997 में अपनी किताब 'द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स' से तहलका मचा दिया था. यह केरल में राजनीतिक उथल पुथल के बीच जुड़वां भाई-बहन रहेल और एस्था के बड़े होने की कहानी है. कहानी 1960 के दशक की है और इसमें भारत की जाति व्यवस्था, धार्मिक विविधता और पेचीदा सामाजिक वर्गीकरण की तस्वीर है.
तस्वीर: Picture-Alliance /dpa/Photoshot1992 में माइकल ओंदात्ये द्वारा लिखा गया नॉवेल 'द इंग्लिश पेशेंट' द्वितीय विश्व युद्ध के अंत होने के समय की कहानी है. यह इटली के एक विला में एक बुरी तरह से जल चुके ब्रिटिश मरीज, एक थकी हुई नर्स, एक अपंग चोर और एक सैन्य इंजीनियर के तजुर्बे की कहानी है. 1996 में इस किताब पर आधारित एक फिल्म भी बनाई गई थी, जिसने नौ ऑस्कर जीते.
तस्वीर: Imago/ZUMA Press/R. Tangकैनेडियन लेखक मार्गरेट ऐटवुड को 1985 में लिखी गई उनकी किताब 'द हैंडमेड्स टेल' के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है लेकिन उन्होंने सबसे पहली बार अपनी किताब 'ब्लाइंड अस्सासिन' के लिए 2000 में बुकर जीता. यह एक बुजुर्ग महिला की कहानी है जो अपनी लेखक बहन की कम उम्र में हुई रहस्मयी मौत और उसके बाद हुए विवाद के बारे में सोचती है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/D.Calabreseहिलेरी मैंटेल बुकर पुरस्कार एक नहीं बल्कि दो बार जीतने वाली पहली महिला और पहली ब्रिटिश लेखक हैं. पहले उनके नॉवेल 'वुल्फ हॉल' को बुकर मिला और फिर उसकी उत्तरकथा 'ब्रिंग अप द बॉडीज' को भी बुकर से नवाजा गया. यह इंग्लैंड के ट्यूडर काल की कहानी है जिसमें हेनरी अष्टम और उनकी पत्नी ऐन बोलिन को पुत्र ना होने की वजह से राजसिंहासन के उत्तराधिकारी को लेकर संकट खड़ा हो जाता है.
तस्वीर: APऑस्ट्रेलियाई लेखक रिचर्ड फ्लैनगन की किताब 'द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ' को 2014 में बुकर मिला था. यह एक जापानी युद्ध बंदी की कहानी है जिसमें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान थाईलैंड-बर्मा की मौत की ट्रेन का विवरण किया गया है.
तस्वीर: Verlag Piperअमेरिकी लघु कथा लेखक जॉर्ज सॉन्डर्स का पहले नॉवेल 'लिंकन इन द बार्डो' एक प्रयोगात्मक किताब थी जिसे 2017 में बुकर दिया गया. इसमें 1862 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन वॉशिंगटन की एक कब्रिस्ता में अपने 11 साल के बेटे की लाश को देखने जाते हैं, जिसकी आत्मा अभी भी जिंदा है.
तस्वीर: picture-alliance/ZUMAPRESS/R. Tangबर्नान्डिन एवरिस्तो 2019 में बुकर जीतने वाली पहली अश्वेत लेखक बनीं. अपनी किताब 'गर्ल, वुमन, अदर' में उन्होंने इंग्लैंड में 12 ऐसे लोगों के बड़े लोगों की कहानी सुनाई जिनमें अधिकांश महिलाएं थीं, अश्वेत थीं और अलग अलग पीढ़ियों और सामाजिक वर्गों से आती थीं.
तस्वीर: picture-alliance/Photoshot2020 का बुकर जीतने वाली किताब 'शुग्गी बैन' को लिखने में डगलस स्टुअर्ट को 10 साल लगे और उसे 32 बार अस्वीकार भी किया गया. लेकिन 2020 में बुकर की निर्णायक मंडली को इस किताब को चुनने में सिर्फ एक घंटा लगा. यह उनका पहला नॉवेल था और 1980 में ग्लासगो में एक समलैंगिक के तौर पर बिताए गए उनके अपने जीवन पर आधारित था.
तस्वीर: Martyn PICKERSGILL/thebookerprizes/AFP रुश्दी ने 2012 में छपी अपनी आत्मकथा "जोसेफ एंटन" में अपनी भूमिगत जिंदगी के बारे में लिखा है. जोसेफ एंटन भूमिगत काल के दौरान उनका छद्म नाम था. जिंदगी के अनुभवों ने आजादी को उनकी जीवन का मुद्दा बना दिया.
रुश्दी ने 2015 में डीडब्ल्यू से एक इंटरव्यू में कहा था, "हमें अपनी कीमती और कड़े संघर्ष से पायी गयी आजादी की रक्षा करनी चाहिए." उन्होंने बार बार अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में आवाज उठायी है, शार्ली एब्दो पर खूनी हमले के बाद, फ्रैंकफर्ट किताब मेले में और बर्लिन के अंतरराष्ट्रीय साहित्य महोत्सव में. "बोलने की आजादी का उसी तरह इस्तेमाल होना चाहिए जैसे हवा का जिसमें हम सांस में लेते हैं, स्वाभाविक रूप से."
रिपोर्टः विवेक कुमार