भारत में वोट का अधिकार साबित करना एक बड़ी चुनौती बन रहा है?
२१ अक्टूबर २०२६
दिल्ली की एक झुग्गी में रहने वाली 39 साल की लाडली खातून पीले रंग के एक थैले से एक के बाद एक दस्तावेज निकाल रही हैं. उनकी बस यही उम्मीद है कि इनमें से कोई एक कागज उनकी पहचान बचाने के लिए काफी हो, ताकि उनका नाम भारत की वोटर लिस्ट में बना रहे.
मीडिया रिपोर्ट और विपक्ष की ओर से कोर्ट में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया के तहत अब तक 13.3 करोड़ से ज्यादा नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं, जिनमें 28 लाख लोगों को मृत बताया गया है. इस बड़े बदलाव के विरोध में नई दिल्ली में प्रदर्शन भी हुए हैं, जहां प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है. उनका आरोप है कि यह पूरी कवायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए की जा रही है. भारत के निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि यह संशोधन पूरी तरह कानून के मुताबिक है.
'सच साबित करने का दबाव'
इस पूरी कवायद को 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' यानी एसआईआर कहा जा रहा है. इसके तहत वोटरों को यह साबित करना होता है कि वे या उनके माता-पिता या दादा-दादी साल 2002-03 की वोटर लिस्ट का हिस्सा थे, जब आखिरी बार इस तरह की कड़ी समीक्षा हुई थी.
लाडली खातून 2002 में वोट देने की उम्र की नहीं थीं, इसलिए उन्हें अब अपने माता-पिता या दादा-दादी के नाम उस दौर की लिस्ट में खोजने हैं. वह बताती हैं, "मेरे माता-पिता तब गुजर गए थे जब मैं बहुत छोटी थी. वे गरीब और अनपढ़ लोग थे जो अपने पीछे कोई दस्तावेज नहीं छोड़ गए."
लाडली जैसी मुश्किल का सामना आज भारत में लाखों लोग कर रहे हैं. कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज कहती हैं, "महिलाएं, अल्पसंख्यक, हाशिए पर जीने वाले और सबसे गरीब लोग इस प्रक्रिया से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि उनके लिए ऐसे दस्तावेज पेश करना बहुत मुश्किल है जो उनकी नागरिकता साबित कर सकें."
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पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा का कहना है कि पहले चुनाव आयोग घर-घर जाकर योग्य मतदाताओं के नाम जोड़ता था और उसका नारा था 'कोई मतदाता पीछे ना छूटे'. लेकिन अब यह प्रक्रिया बदल चुकी है. लवासा कहते हैं, "तरीका हमेशा घर घर जाकर फिजिकल वेरिफिकेशन का रहा है... ऐसा कभी नहीं हुआ कि आपने लोगों से अचानक से अपनी पात्रता फिर से साबित करने को कह दिया हो, जबकि वे पहले ही तय प्रक्रिया के तहत लिस्ट में शामिल हो चुके थे."
मुसलमान सबसे ज्यादा प्रभावित
दिल्ली में एक बेघर महिला सूरजमुखी, जिनकी झुग्गी 30 साल बाद तोड़ दी गई थी, उनका नाम भी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाकर 'अनट्रेसेबल' (पता ना चलने वाला) कर दिया गया. मलबे के ढेर पर खड़ी सूरजमुखी सवाल करती हैं, "मेरे पास 2002 की वोटर लिस्ट से खुद को जोड़ने के लिए कोई दस्तावेज नहीं है, क्योंकि उस समय मैं वोटर नहीं थी और मेरे माता पिता बहुत पहले मर चुके हैं. मैंने इसके बाद कई बार वोट दिया है, खुद अधिकारी हमारे घर आए थे और हमारा नाम वोटर के रूप में दर्ज किया था. अचानक क्या बदल गया है?"
यही नहीं, ऑटोमेटेड सिस्टम्स यानी सॉफ्टवेयर के जरिए लाखों लोगों को 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' (तार्किक विसंगतियों) के नाम पर एक्स्ट्रा जांच के लिए चिह्नित किया गया है. इसमें नाम मेल नहीं खाने और परिवार की जानकारी में अंतर जैसी बातें शामिल हैं.
स्वतंत्र विश्लेषण बताते हैं कि इस स्थिति में मुसलमानों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है. 'द हिंदू' अखबार की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जिन मतदाताओं को संदिग्ध पाया गया, उनमें करीब 20 प्रतिशत मुसलमान थे, जबकि कुल मतदाताओं में उनकी हिस्सेदारी 13.6 प्रतिशत है. कोलकाता के थिंक टैंक 'सबार इंस्टीट्यूट' के अनुसार, पश्चिम बंगाल में यह अंतर और भी ज्यादा था.
42 साल की सड़क सफाईकर्मी शहीदा को भी एक नोटिस मिला क्योंकि उनकी मां की उम्र उनसे सिर्फ 15 साल ज्यादा थी, जिसे सॉफ्टवेयर ने संदिग्ध मान लिया. शहीदा कहती हैं, "मैं क्या उम्मीद करूं, क्या मैं वापस समय में जाकर अपने मरे हुए दादा-दादी से पूछूं कि उन्होंने मेरी मृत मां की शादी इतनी कम उम्र में क्यों कर दी थी? सच्चाई यह है कि उस समय गरीबों में बाल विवाह आम बात थी."
24 साल के राष्ट्रीय रग्बी खिलाड़ी और अभिनेता असलम का वोटर रजिस्ट्रेशन भी इसलिए संदिग्ध बता दिया गया क्योंकि उनके मृत पिता से छह अन्य लोग जुड़े हुए थे. असलम कहते हैं, "यह साफ तौर पर उन वोटरों को निशाना बनाने के लिए है जो बीजेपी को वोट नहीं देते. ऐसा लगता है कि इसका मकसद दोयम दर्जे के नागरिकों की एक श्रेणी तैयार करना है."
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क्या देश छोड़ने का मंडरा रहा है डर?
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी बीजेपी लंबे समय से यह दावा करती रही है कि पड़ोसी देश बांग्लादेश से आने वाले अवैध अप्रवासी (खास तौर पर मुस्लिम) अवैध तरीके से वोटर लिस्ट में घुसपैठ करते हैं.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि वोटर लिस्ट से नाम कट जाने भर से यह साबित नहीं होता कि कोई विदेशी नागरिक है. इसके बावजूद, पश्चिम बंगाल से ऐसे मामले सामने आए हैं जहां वोटर लिस्ट से बाहर किए गए लोगों पर अवैध अप्रवासी होने का आरोप लगा, उन्हें हिरासत में लिया गया और कई मामलों में सीमा पार धकेल दिया गया.
लाडली खातून जैसी महिलाओं के लिए यही भय उनके इस संघर्ष को और डरावना बना देता है. वह कहती हैं, "मैंने एक के बाद एक कई दस्तावेज दिए हैं, मेरे पास जो कुछ भी था, सब दे दिया. लेकिन क्या होगा अगर वे फिर भी हमसे देश छोड़ने को कहेंगे?"