इतिहास बन जाएंगी भारत में ‘शक्ति का प्रतीक’ रहीं इमारतें
२८ अगस्त २०२५
इन दोनों इमारतों में सिर्फ महत्वपूर्ण मंत्रालयों के दफ्तर ही नहीं थे बल्कि देश के इतिहास का एक अभिन्न हिस्सा भी इन इमारतों में समाहित है. छह अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर कर्तव्य भवन-3 का उद्घाटन किया था. इसके साथ ही कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों और केंद्र सरकार के दूसरे दफ्तरों की शिफ्टिंग की प्रक्रिया भी शुरू हो गई. जो दफ्तर अब तक लुटियंस जोन की अलग-अलग इमारतों में थे उन्हें सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत बनाए जा रहे कर्तव्य भवनों में शिफ्ट किया जा रहा है.
सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत ही संसद भवन की नई इमारत बनाई गई है. इसी परियोजना के तहत दिल्ली के अलग-अलग भवनों में बिखरे केंद्र सरकार के सभी मंत्रालय और विभाग अब जल्द ही कर्तव्य भवनों में दिखेंगे जो कर्तव्य पथ के दोनों तरफ बन रहे हैं. कर्तव्य भवन-3 कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरियेट यानी सीएसएस की दस इमारतों में पहली इमारत है जिसका प्रधानमंत्री ने उद्घाटन किया था. ऐसे ही कुल दस कर्तव्य भवन बनने हैं जिनमें मंत्रालयों और विभागों के दफ्तर होंगे.
नए भवन में गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय जैसे कई मंत्रालय और विभागों के दफ्तर हैं जिनमें से कुछ तो शिफ्ट हो चुके हैं और कुछ की शिफ्टिंग अभी चल रही है. अभी तक इनमें से तमाम मंत्रालय और दूसरे दफ्तर शास्त्री भवन, कृषि भवन, निर्माण भवन और उद्योग भवन में थे. ये सभी भवन 1950-70 के दशक में बने थे.
शहरी विकास मंत्री मनोहर लाल खट्टर के मुताबिक, अगले महीने यानी सितंबर तक कर्तव्य भवन-1 और कर्तव्य भवन-2 भी बनकर तैयार हो जाएंगे, जबकि बाकी सात भवन 2027 तक बनकर तैयार होंगे.
इनमें जिन दो भवनों के दफ्तर शिफ्ट होने वाले हैं वे अब तक देश की शक्ति के केंद्र यानी पॉवर सेंटर के तौर पर जाने जाते रहे हैं. ये हैं- साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक. ये दोनों इमारतें रायसीना हिल्स पर बने राष्ट्रपति भवन के पास उसके दाहिनी और बाईं ओर हैं. साउथ ब्लॉक में प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ, रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालयों के दफ्तर हैं जबकि नॉर्थ ब्लॉक में गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के दफ्तर हैं.
ऐतिहासिक घटनाओं की गवाह
इन दोनों इमारतों का निर्माण साल 1931 में हुआ और अपने निर्माण के बाद से ही ये दोनों ब्लॉक सरकार के प्रमुख प्रशासनिक केंद्र रहे. औपनिवेशिक काल से लेकर अब तक ये दोनों इमारतें सत्ता और निरंतरता का प्रतीक रही हैं. इन इमारतों में मौजूद मंत्रालय और दफ्तर आंतरिक सुरक्षा से लेकर आर्थिक नियोजन तक शासन के महत्वपूर्ण पहलुओं और नीति-निर्धारणों का गवाह रहे हैं और एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक विरासत में समेटे हुए हैं. लेकिन जल्दी ही इन इमारतों से ये दफ्तर दूसरी जगह जाने वाले हैं.
1971 की जंग में साउथ ब्लॉक में ही एक 'वॉर रूम' बनाया गया था जहां युद्ध संबंधी पूरी रणनीति तय की जाती थी और युद्ध पर नजर रखी जाती थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के साथ यहीं कई महत्वपूर्ण बैठकें की थीं. यही नहीं, हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साउथ ब्लॉक के ही दफ्तर में अफसरों के साथ महत्वपूर्ण बैठकें की थीं.
ये दोनों इमारतें आजादी के वक्त की तमाम ऐतिहासिक घटनाओं का भी गवाह रही हैं. प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू साउथ ब्लॉक के अपने दफ्तर में कर्मचारियों के साथ रात-दिन काम में लगे रहते थे ताकि आजादी और विभाजन की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा सके. वहीं दूसरी ओर, गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल नॉर्थ ब्लॉक के अपने दफ्तर में 562 से ज्यादा रियासतों के भारतीय संघ में एकीकरण को सुनिश्चित करने में लगे रहते थे.
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह लंबे समय तक इन इमारतों में मौजूद मंत्रालयों को कवर करते रहे और आते-जाते रहते हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में अरविंद कुमार सिंह कहते हैं कि ये मजबूत इमारतें हैं जो अभी पांच सौ साल तक कमजोर होने वाली नहीं थीं. इन इमारतों को जगह नई इमारतों में मंत्रालयों को शिफ्ट करने की प्रक्रिया को वो करदाताओं के पैसों की बर्बादी भी मानते हैं.
परियोजना पर सवाल
अरविंद कुमार सिंह कहते हैं, "यहां भारत सरकार के सबसे शुरुआती दौर के दफ्तर हैं. ये इतनी मजबूत इमारतें हैं कि कम से कम पांच सौ साल तक ये गिरने वाली नहीं हैं. इनमें ना तो सरकार का किराया जा रहा है और ना ही कोई दिक्कत है. पत्थरों की बनी इमारतें हैं लेकिन समय-समय पर इनका आधुनिकीकरण भी किया गया है और सब जगह एसी वगैरह लगे हैं. दिल्ली का सबसे सुरक्षित इलाका है. आज तक इन इमारतों में आग लगने की घटनाएं नहीं हुई हैं. फिर भी नई इमारतें क्यों बनाई जा रही हैं, ये समझ से परे है.”
अरविंद कुमार सिंह बताते हैं, "इन इमारतों की डिजाइन एडवर्ड लुटियन्स और हर्बर्ट बेकर ने तैयार की थी जो उस वक्त के मशहूर आर्किटेक्ट थे. इन इमारतों का निर्माण 1929 में पूरा हुआ और जिन बिल्डरों को इन्हें बनाने के ठेके दिए गए थे उनमें शोभा सिंह भी शामिल थे. पूरी इमारत धौलपुर के लाल बलुए पत्थरों से बनी है. दिलचस्प बात यह भी है कि पत्थरों को यहां तक पहुंचाने के लिए निजामुद्दीन स्टेशन से संसद भवन के गेट तक रेल लाइन बिछाई गई थी. बाद में रेल लाइन को डिसमेंटल कर दिया गया.”
नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक, ये दोनों ही ब्लॉक चार मंजिला हैं और इनमें करीब एक हजार कमरे हैं. इनका आधार लाल रंग का है जबकि दीवारें और गुंबद बलुए रंग की हैं. इनके निर्माण में प्राचीन भारतीय तत्वों, मुगल वास्तुकला के साथ-साथ यूरोपीय कला का भी इस्तेमाल किया गया है.
पुरानी इमारतों में बनेगा संग्रहालय
हालांकि इस बदलाव से केंद्रीय सचिवालय सेवा के अधिकारी और कर्मचारी बहुत खुश नहीं हैं. सीसीएस फोरम के महासचिव यतेंद्र चंदेल ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जाहिर की है. पत्र में कहा गया है कि कर्तव्य भवन-3 में ऑफिस की बनावट ऐसी है कि कर्मचारियों की गोपनीयता और कार्य कुशलता पर असर पड़ रहा है. यही नहीं, उनके मुताबिक, सीसीएस अधिकारियों को काम करने के लिए जो जगह दी गई है, वो कम भी है और नियमों के खिलाफ है.
यहां से मंत्रालयों के दफ्तर हटने के बाद सरकार की योजना है कि ‘युगे युगीन भारत' नामक विशेष परियोजना के तहत नॉर्थ और साउथ ब्लॉक को एक भव्य म्यूजियम में तब्दील किया जाए. इस संग्रहालय में पांच हजार साल की भारतीय सभ्यता, संस्कृति और इतिहास को आधुनिक तकनीक के साथ प्रस्तुत किया जाएगा.