समुद्रों में कच्चे तेल के लिए ड्रिलिंग और जहाजों से रिसाव की घटनाएं सामने आती रही हैं. यह जलीय जीवों के लिए जानलेवा है. अब वैज्ञानिक कुछ आधुनिक तकनीकों के जरिए रिसाव की छोटी-छोटी घटनाओं का पता लगा पा रहे हैं.
दुनियाभर में ईंधन और औद्योगिक तरल ढोने के लिए बड़े-बड़े समुद्री टैंकर इस्तेमाल किए जाते हैं. अगर ये बीच समुद्र क्षतिग्रस्त होते हैं तो वह इलाका कुछ ऐसा दिखने लगता है. तस्वीर फिलिपींस के समुद्र में हुई एक तेल रिसाव घटना की है.तस्वीर: Jam Press/Noel Celis/Greenpeace/IMAGO
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हमारे ग्रह का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा समुद्र है. लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक, हम अभी तक बहुत ही कम जानते हैं कि हमारे समुद्रों में क्या-क्या है. अब नई तकनीकें इस स्थिति को बदलने में मदद कर रही हैं. ये छिपे हुए तेल रिसाव को सामने ला रही हैं, नई प्रजातियों की खोज तेज कर रही हैं और पता लगा रही हैं कि प्रकाश प्रदूषण समुद्री जीवन को कैसे प्रभावित करता है.
मशीन लर्निंग और सैटेलाइट इमेजरी
सैटेलाइट इमेजरी से समुद्र में बड़े तेल रिसाव का पता आसानी से लगाया जा सकता है. जब कोई टैंकर टकराता है या पाइप फटता है तो वैज्ञानिकों को पता होता है कि उन्हें कहां देखने की जरूरत है. लेकिन छोटी मोटी घटनाओं में समुद्र की सतह पर एक पतली लकीर से ज्यादा कुछ नहीं दिखाई देता है. अमेरिकी एनजीओ स्काईट्रुथ के मिशेल दे लियोन बताते हैं, "पहले विश्लेषकों को एक छोटे पैमाने के तेल रिसाव का पता लगाने में महीनों नहीं तो हफ्तों लग जाते थे."
तेल से भरे बड़े समुद्री टैंकर के क्षतिग्रस्त हो जाने या खराब हो जाने पर रिसाव का खतरा बढ़ता है. छोटे स्तर के तेल रिसाव को साफ करने में भी कई हफ्तों का समय लग सकता है.तस्वीर: Maxim Grigoryev/TASS/picture alliance
अब यह संगठन मशीन लर्निंग का इस्तेमाल करके सैटेलाइट इमेजरी के बड़े डेटासेट को जांचता है और अनदेखे रह गए रिसाव का पता लगाता है. स्काईट्रुथ ने कुछ मौकों पर लाल सागर और भूमध्य सागर में रिसाव का खुलासा किया है. साथ ही रहस्यमय रूसी जहाजों से होने वाले प्रदूषण को उजागर करने में भी मदद की.
तेल रिसाव अगर समुद्र तटों तक फैल जाए तो वहां की मिट्टी और किनारों पर आश्रित जीवों और पक्षियों के जीवन पर संकट गहरा जाता है. तस्वीर: ANTONELLO VENERI/AFP via Getty Images
सिर्फ तेल रिसाव ही समस्या नहीं
हम लंबे समय से जानते हैं कि रात में आसमान को रोशन करने का हमारा जुनून तारों को देखने के अनुभव को धुंधला कर देता है और जमीन पर रहने वाले जीवों को भ्रमित करता है. लेकिन इसका समुद्र पर क्या असर होता है?
इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों को सैटेलाइट तस्वीरों की जरूरत पड़ती है, जो दिखाती हैं कि तटीय महानगरों से रोशनी कैसे फैलती है. ब्रिटेन की प्लाइमाउथ मरीन लैबोरेट्री के समुद्री बायोजियोकेमिस्ट्री विशेषज्ञ टिम स्मिथ ने बताया कि इसके लिए जटिल डेटा मॉडलों की भी जरूरत होती है जो यह गणना कर सकें कि प्रकाश समुद्र में कैसे दाखिल होता है.
समुद्र का सबसे खतरनाक प्राणी ओरका, ऐसे करता है व्हेल का शिकार
ओरका समुद्र के अल्फा-प्रिडेटर हैं. अल्फा-प्रिडेटर का मतलब है, किसी ईकोसिस्टम के शिखर पर बैठा सर्वोच्च शिकारी. हाल ही में पता चला कि किस तरह ओरका, व्हेल शार्क का शिकार करते हैं. ये तरीका क्रूर और बेहद हैरान करने वाला है.
तस्वीर: AllCanadaPhotos/SuperStock/IMAGO
दुनिया की सबसे बड़ी मछली
व्हेल शार्क, दुनिया की सबसे विशालकाय मछली है. वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फाउंडेशन के मुताबिक, इसकी लंबाई 60 फीट तक हो सकती है और वजन करीब 11 टन. उनका पसंदीदा खाना है, प्लैंक्टन. ओरका, जिसे किलर व्हेल भी कहते हैं, आकार (23 से 32 फीट तक) और वजन (छह टन तक) दोनों में व्हेल शार्क से कहीं कम होते हैं.
तस्वीर: Al Carrera/Zoonar/picture alliance
जायगेंटिजम: जीवों का आकार और दबदबा
जीवों का विशालकाय आकार ईकोसिस्टम में उन्हें बाकी जीवों पर स्वाभाविक बढ़त देता है. बड़े से बड़े शिकारी के लिए अपने से कहीं बड़े जानवर का शिकार करना और उन्हें खाना बड़ी चुनौती बन जाता है. यह उनकी ऊर्जा भी निचोड़ देता है. लेकिन ओरका अलग हैं. आकार और भार में कहीं उन्नीस होकर भी वो व्हेल शार्क का शिकार करते हैं और उनका मांस भी खाते हैं. वो ऐसा कैसे कर पाते हैं, यह अब तक एक रहस्य था.
तस्वीर: Alie Skowronski/AP Photo/picture alliance
छह साल के दौरान हुए शिकारों की पड़ताल
'फ्रंटियर्स इन मरीन साइंस' नाम के जर्नल में छपे एक शोध से ओरका के शिकारी हुनर के हैरान करने वाले ब्योरे सामने आए हैं. शोधकर्ताओं ने 2018 से 2024 के बीच ओरकाओं के झुंड द्वारा किए गए कुछ शिकारों को दर्ज किया. शिकार की ये सभी घटनाएं कैलिफोर्निया की खाड़ी में हुईं. फिन और शरीर के निशान जैसी मार्किंग्स से ओरकाओं की पहचान की गई.
तस्वीर: The Ocean Race /AP Photo/picture alliance
एकता की शक्ति
कई तस्वीरों और वीडियो की पड़ताल के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे कि ऐसे मौकों पर ओरका झुंड बनाकर व्हेल शार्क का शिकार करते हैं. शोधकर्ताओं ने पाया कि उनके देखे मामलों में चार मौके ऐसे थे, जब ओरकाओं के एक झुंड ने व्हेल शार्क को घेरा और बड़ी चालाकी से वार करते हुए उसे बेबस कर दिया.
तस्वीर: VALERY HACHE/AFP/Getty Images
गैंग बनाकर शिकार करते हैं ओरका
व्हेल शार्क धीमी रफ्तार से तैरते हैं. ओरकाओं का झुंड गैंग बनाकर उसे घेरता है और धक्के मारता है. जब व्हेल शार्क का संतुलन बिगड़ जाता है, तो ओरका उसे पलट देते हैं. कुछ यूं कि समंदर के पानी में व्हेल शार्क का ऊपरी हिस्सा नीचे और पेट का भाग ऊपर चला आता है. ये मुकाबले का निर्णायक पल साबित होता है.
तस्वीर: Gerald Nowak/Westend61/picture alliance
लाचार कर दिया जाता है व्हेल शार्क को
इस स्थिति में व्हेल शार्क बेबस हो जाते हैं. वो हिलडुल नहीं पाते, भाग नहीं पाते, पानी में नीचे नहीं जा पाते. व्हेल शार्क को इस हाल में लाने के बाद ओरका उसके पेट के निचले हिस्से पर वार करते हैं. उसे नोचते-खसोटते हैं. ढेर सारा खून बहने से व्हेल शार्क की मौत हो जाती है.
तस्वीर: Andrew Chin/ZUMA/picture alliance
...फिर ओरका शिकार का लीवर खाते हैं
इसके बाद ओरका उसके अंग खाते हैं. उसका वसा से भरपूर लीवर चबा जाते हैं. इतना ही नहीं, यह भी पता चला कि शोधकर्ताओं ने एक वयस्क नर ओरका की पहचान की. इसे "मोकटेजूमा" नाम दिया गया है. झुंड बनाकर शिकार करने की जो चार घटनाएं दर्ज की गईं, उनमें से तीन में मोकटेजूमा शामिल था.
तस्वीर: Peggy West-Stap
मुमकिन है, कोई खास शिकारी झुंड हो
चौथे शिकार में कुछ ऐसी मादा ओरका भी दिखीं, जो पहले भी मोकटेजूमा से साथ देखी गई थीं. शोधकर्ताओं के मुताबिक, मुमकिन है कि कैलिफोर्निया की खाड़ी में ओरकाओं का कोई खास झुंड हो, जो साथ मिलकर ऐसे बड़े शिकार करता हो. नैशनल जिओग्रैफिक के अनुसार भी यह झुंड विलक्षण हो सकता है क्योंकि दुनिया में कहीं और ओरकाओं द्वारा व्हेल शार्कों को इस तरह निशाना बनाए जाने की जानकारी नहीं है.
तस्वीर: VALERY HACHE/AFP/Getty Images
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समुद्र का पानी आम तौर पर लाल प्रकाश को ज्यादा सोखता है, लेकिन फाइटोप्लांकटन या ज्यादा गंदलापन होने की सूरत में यह स्थिति बदल सकती है. स्मिथ ने कहा, "हम कंप्यूटरों को इस तरह से प्रोग्राम कर सकते हैं कि हम पानी के नीचे प्रकाश क्षेत्र को ज्यादा सटीकता के साथ मॉडल कर सकें."
उनके शोध से पता चला कि 20 लाख वर्ग किलोमीटर समुद्र यानी उत्तर प्रदेश के आकार से लगभग 9 गुना बड़ा क्षेत्र- दुनिया भर में प्रकाश प्रदूषण से प्रभावित है. इसके प्रभाव गहरे हैं. मछलियों और समुद्री पक्षियों के खानपान में बाधा डालने से लेकर, कोरल के प्रजनन और फाइटोप्लांकटन के पानी में ऊपर नीचे जाने तक, हर जगह प्रकाश प्रदूषण का असर दिख रहा है. हमारे पर्यावरण पर इसके दूरगामी परिणाम होंगे.
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प्रकाश प्रदूषण से कैसे बचें
बायोजियोकेमिस्ट स्मिथ कहते हैं, "यह कुछ ऐसा है जिसके बारे में हम कुछ कर सकते हैं." उनके मुताबिक, बिलबोर्ड जैसी अनावश्यक रोशनी को बंद करना और आकाशीय "फैलाव" को घटाने के लिए लाइटों को फिर से डिजाइन करना- लागत और कार्बन उत्सर्जन घटाएगा. इससे जमीन और समुद्र में रहने वाले जीवों फायदा होगा. तकनीकी प्रगति और डिजाइन सुधारों ने हमें समुद्र की सबसे अंधेरी गहराइयों तक पहुंचने में सक्षम किया है. लेकिन वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हम अपने समुद्रों में रहने वाली सिर्फ 10 प्रतिशत प्रजातियों के बारे में ही जानते हैं.
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इंसान अब तक समुद्र की मात्र 10 प्रतिशत प्रजातियों के बारे में ही जान पाया हैं. इससे पहले कि हम जान पाएं, बहुत सी प्रजातियां ऐसी होंगी जो प्रदूषण की वजह से खत्म हो जाएंगी.तस्वीर: David Gray/AFP/Getty Images
ओशन सेंसस की मरीन बायोलॉजिस्ट और विज्ञान प्रमुख लूसी वूडॉल कहती हैं कि इससे पहले कि हम एक नई प्रजाति की मौजूदगी महसूस करें, "हम उस विविधता को खो रहे हैं." 2023 में शुरू किए गए वैज्ञानिकों के इस वैश्विक गठबंधन का लक्ष्य कोरल से लेकर केकड़ों तक, तमाम समुद्री प्रजातियों की खोज तेज करना है.
इसका एक तरीका है हाई-टेक लैब वाले समुद्री रिसर्च जहाज, जहां शोधकर्ता जमा किए नमूनों पर तुरंत काम शुरू कर सकते हैं. वूडॉल कहती हैं कि "जिस काम के लिए 10 साल पहले जमीन पर ही महीनों लग जाते थे, वो अब फील्ड (समुद्री जहाज) में हो जाता है."
एक संभावित नई प्रजाति को खोजने से लेकर उसके वैज्ञानिक वर्णन तक औसतन करीब 13 साल से ज्यादा समय लगता है. इस परियोजना ने अब तक 800 से अधिक नई खोजों को दर्ज किया है जिसे ओपन-एक्सेस वाले एक जैव विविधता प्लेटफॉर्म पर साझा किया जाता है.
आरएस/ओएसजे (एएफपी)
समंदर, धरती और हवा के बाशिंदों की कुछ अद्भुत तस्वीरें
हमारे एक ग्रह पर दो दुनिया बसती है. एक जमीन पर, दूसरी समंदर में. देखिए, दुनिया के इन दो रूपों में बसने वाले जीवों की कुछ अद्भुत तस्वीरें, 'ओशिआनिया फोटो कॉन्टेस्ट' 2024 के मार्फत.
दी नेचर कंजरवेंसी (टीएनसी) पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहा एक वैश्विक संगठन है. टीएनसी ने साल 2024 में पहले 'ओशिआनिया फोटो कॉन्टेस्ट' का आयोजन किया. इसमें सिर्फ चार देशों ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सोलोमन आइलैंड्स और पापुआ न्यू गिनी के फोटोग्राफर और प्रकृति प्रेमी हिस्सा ले सकते थे. प्रतियोगिता में करीब 2,000 तस्वीरें आईं. आगे की स्लाइडों में देखिए जीतने वाली कुछ चुनिंदा तस्वीरें.
तस्वीर: Scott Portelli/The Nature Conservancy Oceania Photo Contest
ग्रैंड विनर: पॉट-बेलीड सीहॉर्स
इसके फोटोग्राफर हैं, ऑस्ट्रेलिया के डैनियल स्लाई. सुबह का समय था, जब बेअर नाम के द्वीप पर समंदर के भीतर स्लाई ने एक पॉट-बेलीड सीहॉर्स को देखा. वो समुद्री ट्यूलिप के बीच ठौर पाने की कोशिश कर रहा था. इस जीव के पेट का निचला हिस्सा अपेक्षाकृत मोटा होता है, यही इसके नामकरण की कहानी है. प्रदूषण, ओवरफिशिंग और खत्म होता कुदरती आशियाना, ऐसी कई वजहों के कारण इनकी संख्या काफी कम होती जा रही है.
तस्वीर: Daniel Sly/The Nature Conservancy Oceania Photo Contest
टॉस ऑफ लाइफ: वाइल्डलाइफ में दूसरा स्थान
यह तस्वीर ली है, ऑस्ट्रेलिया के नायडू कुमापाटला ने. जगह: लेक ग्वेलप. इस चिड़िया का नाम है, बी-ईटर. कमाल की फुर्ती दिखाते हुए उसने ड्रैगनफ्लाई को उसकी उड़ान के बीच ही हवा में लपक लिया.
यह तस्वीर खींची है ऑस्ट्रेलिया के डेरेन वासेल ने. जगह है, किंग्स बीच. वासेल ने इस फ्रेम को चुनने की कहानी यूं बताई, "मुझे तूफानों का मौसम और प्रकृति की ताकत, उसकी खूबसूरती का चश्मदीद बनना बहुत पसंद है. वो कभी निराश नहीं करती." तस्वीर को देखकर लगता है, स्याह बादलों का एक बवंडर आसमान को मथ रहा हो, और इस सबके बीच बिजली की वो कौंधती रेखा जैसे आकाश और समुद्र के बीच संवदिया बन गई हो.
तस्वीर: Darren Wassell/The Nature Conservancy Oceania Photo Contest
सैंड फॉरेस्ट: जमीन की श्रेणी, दूसरा इनाम
"रेत का जंगल" शीर्षक की यह तस्वीर है न्यूजीलैंड के हामिश एस्टन की. जगह, गिजबन. एस्टन ने तस्वीर की कहानी यूं सुनाई, "सितंबर 2024. किसी प्रेरणा की तलाश में मैं समंदर किनारे टहल रहा था. मुझे एक यूट्यूब वीडियो की याद आई, जिसमें कहा गया था कि नीचे देखो, विस्तार को तलाशो. तो मैंने देखा और रेत में ये "पेड़" नजर आए." ये नीम-नीली आकृतियां, रेत से झांकते पेड़ हैं कि किसी ने कोई चित्र बनाया है!
यह तस्वीर खींची है, ऑस्ट्रेलिया के पीटर मग्गी ने. ऑस्ट्रेलिया में "कैबेज ट्री बे" नाम का एक संरक्षित समुद्री इलाका है. मग्गी को यहां समुद्र में असामान्य रूप से बड़ा जेलीफिश का झुंड दिखा. देखने से लगता है मानो अलग-अलग आकार के बुलबुले ऊपर उठकर सतह पर आ रहे हों.
तस्वीर: Peter McGee/The Nature Conservancy Oceania Photo Contest
रोर ऑफ एंगर: वाइल्डलाइफ, पहला इनाम
यह तस्वीर खींची है, ऑस्ट्रेलिया की श्याओपिंग लिन ने. इग्रेट नाम की चिड़िया मछली पकड़ रही थी. उसके हाथ लगी, इलोप्स साउरस (टेनपाउंडर) नाम की यह बड़ी मछली. इग्रेट उसे खा नहीं पाई. बड़े मलाल के साथ उसे मछली को छोड़ना पड़ा. बड़ा सा मुंह खोले मछली फुर्ती से पानी में जा रही है. सार: एक के मुंह लगकर भी खाना छूटा, दूसरे की जान बच गई.