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समंदर में तेल रिसाव का कैसे पता लगाया जाए?

२३ मार्च २०२५

समुद्रों में कच्चे तेल के लिए ड्रिलिंग और जहाजों से रिसाव की घटनाएं सामने आती रही हैं. यह जलीय जीवों के लिए जानलेवा है. अब वैज्ञानिक कुछ आधुनिक तकनीकों के जरिए रिसाव की छोटी-छोटी घटनाओं का पता लगा पा रहे हैं.

समुद्र में तेल रिसाव
दुनियाभर में ईंधन और औद्योगिक तरल ढोने के लिए बड़े-बड़े समुद्री टैंकर इस्तेमाल किए जाते हैं. अगर ये बीच समुद्र क्षतिग्रस्त होते हैं तो वह इलाका कुछ ऐसा दिखने लगता है. तस्वीर फिलिपींस के समुद्र में हुई एक तेल रिसाव घटना की है.तस्वीर: Jam Press/Noel Celis/Greenpeace/IMAGO

हमारे ग्रह का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा समुद्र है. लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक, हम अभी तक बहुत ही कम जानते हैं कि हमारे समुद्रों में क्या-क्या है. अब नई तकनीकें इस स्थिति को बदलने में मदद कर रही हैं. ये छिपे हुए तेल रिसाव को सामने ला रही हैं, नई प्रजातियों की खोज तेज कर रही हैं और पता लगा रही हैं कि प्रकाश प्रदूषण समुद्री जीवन को कैसे प्रभावित करता है.

मशीन लर्निंग और सैटेलाइट इमेजरी

सैटेलाइट इमेजरी से समुद्र में बड़े तेल रिसाव का पता आसानी से लगाया जा सकता है. जब कोई टैंकर टकराता है या पाइप फटता है तो वैज्ञानिकों को पता होता है कि उन्हें कहां देखने की जरूरत है. लेकिन छोटी मोटी घटनाओं में समुद्र की सतह पर एक पतली लकीर से ज्यादा कुछ नहीं दिखाई देता है. अमेरिकी एनजीओ स्काईट्रुथ के मिशेल दे लियोन बताते हैं, "पहले विश्लेषकों को एक छोटे पैमाने के तेल रिसाव का पता लगाने में महीनों नहीं तो हफ्तों लग जाते थे."

तेल से भरे बड़े समुद्री टैंकर के क्षतिग्रस्त हो जाने या खराब हो जाने पर रिसाव का खतरा बढ़ता है. छोटे स्तर के तेल रिसाव को साफ करने में भी कई हफ्तों का समय लग सकता है.तस्वीर: Maxim Grigoryev/TASS/picture alliance

अब यह संगठन मशीन लर्निंग का इस्तेमाल करके सैटेलाइट इमेजरी के बड़े डेटासेट को जांचता है और अनदेखे रह गए रिसाव का पता लगाता है. स्काईट्रुथ ने कुछ मौकों पर लाल सागर और भूमध्य सागर में रिसाव का खुलासा किया है. साथ ही रहस्यमय रूसी जहाजों से होने वाले प्रदूषण को उजागर करने में भी मदद की.

तेल रिसाव अगर समुद्र तटों तक फैल जाए तो वहां की मिट्टी और किनारों पर आश्रित जीवों और पक्षियों के जीवन पर संकट गहरा जाता है. तस्वीर: ANTONELLO VENERI/AFP via Getty Images

सिर्फ तेल रिसाव ही समस्या नहीं

हम लंबे समय से जानते हैं कि रात में आसमान को रोशन करने का हमारा जुनून तारों को देखने के अनुभव को धुंधला कर देता है और जमीन पर रहने वाले जीवों को भ्रमित करता है. लेकिन इसका समुद्र पर क्या असर होता है?

इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों को सैटेलाइट तस्वीरों की जरूरत पड़ती है, जो दिखाती हैं कि तटीय महानगरों से रोशनी कैसे फैलती है. ब्रिटेन की प्लाइमाउथ मरीन लैबोरेट्री के समुद्री बायोजियोकेमिस्ट्री विशेषज्ञ टिम स्मिथ ने बताया कि इसके लिए जटिल डेटा मॉडलों की भी जरूरत होती है जो यह गणना कर सकें कि प्रकाश समुद्र में कैसे दाखिल होता है.

समुद्र का पानी आम तौर पर लाल प्रकाश को ज्यादा सोखता है, लेकिन फाइटोप्लांकटन या ज्यादा गंदलापन होने की सूरत में यह स्थिति बदल सकती है. स्मिथ ने कहा, "हम कंप्यूटरों को इस तरह से प्रोग्राम कर सकते हैं कि हम पानी के नीचे प्रकाश क्षेत्र को ज्यादा सटीकता के साथ मॉडल कर सकें."

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उनके शोध से पता चला कि 20 लाख वर्ग किलोमीटर समुद्र यानी उत्तर प्रदेश के आकार से लगभग 9 गुना बड़ा क्षेत्र- दुनिया भर में प्रकाश प्रदूषण से प्रभावित है. इसके प्रभाव गहरे हैं. मछलियों और समुद्री पक्षियों के खानपान में बाधा डालने से लेकर, कोरल के प्रजनन और फाइटोप्लांकटन के पानी में ऊपर नीचे जाने तक, हर जगह प्रकाश प्रदूषण का असर दिख रहा है. हमारे पर्यावरण पर इसके दूरगामी परिणाम होंगे.

प्रकाश प्रदूषण से कैसे बचें

बायोजियोकेमिस्ट स्मिथ कहते हैं, "यह कुछ ऐसा है जिसके बारे में हम कुछ कर सकते हैं." उनके मुताबिक, बिलबोर्ड जैसी अनावश्यक रोशनी को बंद करना और आकाशीय "फैलाव" को घटाने के लिए लाइटों को फिर से डिजाइन करना- लागत और कार्बन उत्सर्जन घटाएगा. इससे जमीन और समुद्र में रहने वाले जीवों फायदा होगा. तकनीकी प्रगति और डिजाइन सुधारों ने हमें समुद्र की सबसे अंधेरी गहराइयों तक पहुंचने में सक्षम किया है. लेकिन वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हम अपने समुद्रों में रहने वाली सिर्फ 10 प्रतिशत प्रजातियों के बारे में ही जानते हैं.

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इंसान अब तक समुद्र की मात्र 10 प्रतिशत प्रजातियों के बारे में ही जान पाया हैं. इससे पहले कि हम जान पाएं, बहुत सी प्रजातियां ऐसी होंगी जो प्रदूषण की वजह से खत्म हो जाएंगी.तस्वीर: David Gray/AFP/Getty Images

ओशन सेंसस की मरीन बायोलॉजिस्ट और विज्ञान प्रमुख लूसी वूडॉल कहती हैं कि इससे पहले कि हम एक नई प्रजाति की मौजूदगी महसूस करें, "हम उस विविधता को खो रहे हैं." 2023 में शुरू किए गए वैज्ञानिकों के इस वैश्विक गठबंधन का लक्ष्य कोरल से लेकर केकड़ों तक, तमाम समुद्री प्रजातियों की खोज तेज करना है.

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इसका एक तरीका है हाई-टेक लैब वाले समुद्री रिसर्च जहाज, जहां शोधकर्ता जमा किए नमूनों पर तुरंत काम शुरू कर सकते हैं. वूडॉल कहती हैं कि "जिस काम के लिए 10 साल पहले जमीन पर ही महीनों लग जाते थे, वो अब फील्ड (समुद्री जहाज) में हो जाता है."

एक संभावित नई प्रजाति को खोजने से लेकर उसके वैज्ञानिक वर्णन तक औसतन करीब 13 साल से ज्यादा समय लगता है. इस परियोजना ने अब तक 800 से अधिक नई खोजों को दर्ज किया है जिसे ओपन-एक्सेस वाले एक जैव विविधता प्लेटफॉर्म पर साझा किया जाता है.

आरएस/ओएसजे (एएफपी)

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