अंधेरे में डूबे शहरों से दुनिया को क्या फायदा होगा
१९ सितम्बर २०२२
उर्जा संकट की वजह से जर्मनी में लोग शहरों के प्रमुख इमारतों, स्मारकों और सिटी हॉल, संग्रहालय और पुस्तकालय जैसी प्रमुख जगहों की बिजली रात को बुझा दे रहे हैं.
राजधानी बर्लिन में विक्ट्री कॉलम और बर्लिन कथीड्रल जैसी 200 प्रमुख जगहें सूरज ढलने के बाद अंधेरे में ही रहेंगे.
1 सितंबर से, बिजली बचाने संबंधी अध्यादेश के तहत सार्वजनिक इमारतों के बाहर भी बिजली के बल्ब जलाना या रोशनी करना प्रतिबंधित कर दिया गया है. इस बीच नियॉन साइनबोर्ड केवल कुछ घंटों के लिए ही जलाए जा सकते हैं.
मध्य जर्मनी के वाइमर शहर में गर्मी के मौसम में स्ट्रीट लाइटें पहले की तुलना में शाम को तीस मिनट देर से जलाई जा रही है और तीस मिनट पहले बुझा दी जाती है. बिजली की कम खपत करके बिजली और पैसा दोनों की बचत होती है लेकिन ऐसा करने के और भी कई फायदे हैं- जलवायु और जैवविविधता के लिहाज से.
बिजली बुझाना वायु प्रदूषण से भी निजात दिलाता है
अमेरिका के एक गैर सरकारी संगठन इंटरनेशनल डार्क-स्काई एसोसिएशन का अनुमान है कि इमारतों के बाहर रात के वक्त जलने वाली करीब एक-तिहाई रोशनी से कोई फायदा नहीं होता है.
वैश्विक ऊर्जा संकट और बिजली की बढ़ती कीमतों से पहले भी अनुमान लगाया गया था कि इस तरह से बिजली की बचत करके हर साल करीब तीन अरब डॉलर की बचत की सकती है और वायु प्रदूषण को कम करने में भी इससे मदद मिलेगी. इसके अलावा बिजली के इन उपकरणों से निकलने वाली हानिकारक किरणों से जलवायु परिवर्तन को होने वाला नुकसान भी कम किया जा सकता है.
उत्तर प्रदेश में रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय में जलवायु परिवर्तन के विशेषज्ञ पवन कुमार बताते हैं कि भारत में रोशनी की अधिकता हर साल 12 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करती है. कार्बन डाइऑक्साइड की यह मात्रा भारत में हर साल हवाई और समुद्री परिवहन से होने वाले उत्सर्जन की करीब आधी है.
आज दुनिया भर में करीब 80 फीसदी लोग प्रकाश प्रदूषित आसमान के नीचे रह रहे हैं. यूरोप और अमेरिका में यह आंकड़ा 99 फीसदी से भी ज्यादा है. इसका मतलब यह हुआ कि इन लोगों को वास्तविक अंधेरे का कोई अनुभव ही नहीं है.
सिंगापुर में तो रातें इतनी चमकदार और रोशनीभरी होती हैं कि लोग वास्तविक अंधेरे को महसूस करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
हमें अंधेरे की जरूरत क्यों है
पर्यावरण के लिएरात में अंधेरा रहना फायदेमंद तो है ही, रात के वक्त पर्याप्त अंधेरा मानव स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा होता है. रिसर्च से पता चला है कि कृत्रिम रोशनी का आंखों में घाव, अनिद्रा, मोटापा और कई तरह के अवसाद का सीधा संबंध है.
अंधेरे की कमी से होने वाली बीमारियों के पीछे मिलेटोनिन नाम का हॉर्मोन है जो कि अंधेरा होने पर ही निकलता है. जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जियोसाइंस के वैज्ञानिक क्रिस्टोफर क्याबा कहते हैं, "जब हमें यह हॉर्मोन नहीं मिलता या फिर जो लोग शिफ्ट में काम करने वाले होते हैं, तब बॉयोलॉजिकल क्लॉक सिस्टम बिगड़ जाता है और उसकी वजह से समस्याएं खड़ी होने लगती हैं.”
अमेरिका में साल 2020 में हुए एक रिसर्च से पता चलता है कि कृत्रिम प्रकाश की अधिकता में रहने वाले बच्चों और किशोरों को नींद कम आती है और आगे चलकर वे कई मानसिक बीमारियों के शिकार होते हैं. क्याबा कहते हैं कि जैवमंडल में हमने जो बदलाव लाए हैं उनमें कृत्रिम प्रकाश सबसे बड़ा नाटकीय बदलाव है.
वो कहते हैं, "जैव विकास के दौरान पर्यावरण से एक स्थिर संकेत मिलता रहा है यानी रात और दिन का फर्क पता चलता रहा है. जिन जगहों पर प्रकाश प्रदूषण ज्यादा है वहां इस संकेत में नाटकीय बदलाव आया है.”
वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारी धरती हर साल दो फीसदी ज्यादा चमकदार होती जा रही है.
इसलिए सड़कों की बिजली यानी स्ट्रीट लाइटों को मद्धिम करने या कुछ समय के लिए बुझा देने से प्रकाश प्रदूषण रोकने की दिशा में यह पहला कदम हो सकता है. हालांकि ऐसी भी धारणा है और इंग्लैंड और वेल्स में इस पर रिसर्च भी हुए हैं कि अंधेरे की वजह से सड़कों पर दुर्घटनाएं और अपराध बढ़ते हैं, फिर भी प्रकाश प्रदूषण को कम करने का प्रयास होना चाहिए.
जानवरों और पौधों को भी अंधेरा पसंद है
रात में कृत्रिम प्रकाश में रहने के लिए दूसरे जीवों को भी संघर्ष करना पड़ता है. उदाहरण के लिए, मूंगे प्रजनन नहीं कर पाते, प्रवासी पक्षी अपने घूमने की प्रवृत्ति को खो सकते हैं और तुरंत निकले घड़ियाल कई बार समुद्र में जाने की बजाय जमीन पर टहलने लगते हैं जिससे उनकी मौत भी हो जाती है.
इतना ही नहीं, कीड़े भी कृत्रिम प्रकाश से परेशान रहते हैं. एक अध्ययन के मुताबिक, जर्मनी में गर्मी के मौसम में कृत्रिम प्रकाश की वजह से हर साल रात में उड़ने वाले करीब 100 अरब कीड़ों की मौत हो जाती है.
अपनी दिनचर्या के लिए चंद्रमा की स्थितियों पर निर्भर रहने वाले कुछ कीड़े सड़कों पर जलने वाली सफेद रोशनी से इतने विचलित हो जाते हैं कि वे उसी के इर्द-गिर्द सारी रात उड़ते रहते हैं. इस वजह से वो कई अन्य जीवों के शिकार बन जाते हैं.
हाल ही में हुए कई रिसर्च ये बताते हैं कि स्ट्रीट लाइटों के आस-पास उगने वाले पौधों में रात के वक्त कम परागण होता है और इस वजह से उनमें फल भी कम होते हैं. जबकि यही पौधे अंधेरे की वजह से ज्यादा फल देते हैं. यहां तक बड़े-बड़े वृक्षों पर भी रात में सड़कों की रोशनी का विपरीत प्रभाव पड़ता है- उनमें कलियां पहले ही निकलने लगती हैं और पत्ते बाद में झड़ते हैं.