दुनियाभर में कमजोर हो रहा है लोकतंत्र, बढ़ रही है तानाशाही
१९ मार्च २०२४
दुनिया में लोकतंत्र लगातार कम हो रहा है और तानाशाही सरकारों की संख्या बढ़ रही है. जर्मनी के बर्टल्समान फाउंडेशन ने एक अध्ययन के बाद जारी रिपोर्ट में यह बात कही है.
लोकतंत्र को वोट से बचाया जा सकता हैः रिपोर्टतस्वीर: Dipa Chakraborty/eyepix via ZUMA/picture alliance
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जर्मन विशेषज्ञों ने एक रिपोर्ट जारी कर कहा है कि दुनिया में लोकतांत्रिक सरकारें कम हो रही हैं. खासकर विकासशील और नए उभरते देशों में तो लोकतंत्र अल्पसंख्य हो गया है. बर्टल्समान फाउंडेशन की ओर से जारी इस रिपोर्ट में लोकतंत्र की स्थिति का अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण किया गया है.
इस रिपोर्ट को जर्मन चांसलर ओलाफ शॉल्त्स को भी सौंपा जाएगा. मंगलवार को जारी इस रिपोर्ट के लिए विशेषज्ञों ने 63 लोकतांत्रिक देशों की तुलना 74 ऐसे देशों से की जहां तानाशाही प्रवृत्ति की सरकारें हैं. इन लोकतांत्रिक देशों में तीन अरब लोग रहते हैं जबकि तानाशाही सरकारें लगभग 4 अरब लोगों पर राज कर रही हैं.
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अधिकारों में कटौती
पिछले 20 साल में यह बर्टल्समान की दसवीं रिपोर्ट है. इस साल रिपोर्ट का शीर्षक हैः दुनिया में लगातार कम हो रही है लोकतंत्र की जमीन. इसके साथ ही बर्टल्समान फाउंडेशन ने ‘ट्रांसफॉर्मेशन इंडेक्स 2024‘ भी जारी किया है, जो बताता है कि कहां लोकतंत्र किस तेजी से बढ़ या घट रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में संसदीय कार्यवाही और परंपराओं में कई बदलाव देखने को मिले हैं. लेकिन पिछली लोकसभाओं के मुकाबले 17वीं लोकसभा के कार्यकाल के बारे में क्या कहते हैं आंकड़े?
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सबसे कम बैठकें
जून, 2019 से फरवरी, 2024 तक चली 17वीं लोकसभा में अपना कार्यकाल पूरा करने वाली सभी लोकसभाओं के मुकाबले सबसे कम बैठकें हुईं. इस लोकसभा में सिर्फ कुल 174 बैठकें हुईं. सालाना औसत रहा 55. 13वीं से 16वीं लोकसभा की बैठकों का सालाना औसत 82, 66, 71 और 66 था. यह आंकड़े गैर संस्कारी संस्था पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अध्ययन से निकले हैं.
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नहीं मिला डिप्टी स्पीकर
यह भारत के इतिहास में पहली लोकसभा थी जिसमें डिप्टी स्पीकर का पद खाली रहा. संविधान के अनुच्छेद 13 के अनुसार लोकसभा के गठन के साथ ही सदन को "जितनी जल्दी हो सके" स्पीकर और डिप्टी स्पीकर चुन लेना चाहिए.
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कम हुई चर्चा
इन पांच सालों में लोकसभा से कुल 221 विधेयक पारित हुए, लेकिन इनमें से कई विधेयकों पर बहुत कम चर्चा हुई. सबसे ज्यादा (35 प्रतिशत) विधेयकों पर एक घंटे से भी कम चर्चा हुई. 16वीं लोकसभा में ऐसे विधेयकों की संख्या सिर्फ 15 प्रतिशत थी. 15वीं लोकसभा में इनकी संख्या 36 प्रतिशत थी.
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समितियों को भी कम भेजे गए विधेयक
इस लोकसभा में सिर्फ 16 प्रतिशत विधेयक संसदीय समितियों को अध्ययन के लिए भेजे गए. 14वीं, 15वीं और 16वीं लोकसभाओं में 60 प्रतिशत, 71 प्रतिशत और 28 प्रतिशत विधेयक समितियों को भेजे गए थे.
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सबसे कम विधेयक हुए रद्द
पीआरएस के मुताबिक इस लोकसभा में रद्द होने जाने वाले विधेयकों की संख्या सबसे कम रहेगी. सिर्फ चार विधेयक पारित नहीं हो पाए जिसकी वजह से वो रद्द हो जाएंगे. 13वीं से 16वीं लोकसभाओं में ऐसे विधेयकों की संख्या 43, 39, 68 और 46 थी.
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अच्छा चला प्रश्नकाल
17वीं लोकसभा में प्रश्नकाल तय किए गए समय की 60 प्रतिशत अवधि तक चला. 13वीं से 16वीं लोकसभाओं में यह आंकड़ा 68, 64, 39 और 67 प्रतिशत था.
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रिपोर्ट में हर देश के बारे में विस्तार से बताया गया है कि कहां किस तरह का बदलाव आ रहा है. खासतौर पर राजनीतिक प्रतिभागिता, चुनावों की निष्पक्षता, आंदोलन और विरोध करने की आजादी, अभिव्यक्ति और मीडिया की आजादी जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई है. रिपोर्ट कहती है कि विभिन्न देशों में इन अधिकारों में लगातार कटौती हो रही है.
रिपोर्ट में कहा गया, "शक्तियों का विभाजन लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है और सिविल सोसायटी के लिए जगह सिकुड़ रही है.”
जिन 74 देशों में तानाशाही प्रवृत्ति की सरकारें हैं, उनमें से रिपोर्टे के मुताबिक 49 देशों की सरकारें "कट्टर तानाशाही” प्रवृत्ति की हैं. इनमें रूस भी शामिल है.
रिपोर्ट कहती है, "पिछले दो सालों में ही 25 देशों के चुनाव पहले से कम निष्पक्ष हुए. 32 देशों में आंदोलन करने के अधिकारों में कटौती हुई जबकि 39 देशों में अभिव्यक्ति की आजादी कम हुई. इस तरह लोकतंत्र का लगातार क्षरण तानाशाही के लिए रास्ता तैयार कर सकता है, जो हमने बांग्लादेश, मोजांबिक और तुर्की में देखा है.”
कुछ देशों की तारीफ
रिपोर्ट में बाल्टिक देशों, ताइवान, दक्षिण कोरिया, कोस्टा रिका, चिली और उरुग्वे की तारीफ करते हुए कहा गया है कि ये देश लोकतंत्र के लिए उम्मीद हैं और इन्होंने दिखाया है कि कैसे बदलाव लाया जा सकता है.
एडलमैन ट्रस्ट बैरोमीटर के मुताबिक मलयेशिया के लोगों का अपनी सरकार पर भरोसा पिछले एक साल में सबसे ज्यादा बढ़ा जबकि ब्रिटेन में सबसे ज्यादा घटा. और भारत में क्या हुआ? जानिए...
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सबसे ऊपर सऊदी अरब
एडलमैन ट्रस्ट ने 28 देशों में सर्वे के बाद पाया कि सऊदी अरब और चीन के लोग अपनी सरकारों पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं. चीन और सऊदी अरब में बस एक अंक का फर्क है लेकिन सऊदी अरब 2022 के मुकाबले 2023 में 3 पॉइंट्स ऊपर गया जबकि चीन 3 अंक नीचे आया.
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भारत में बदलाव नहीं
भारत में इस साल आम चुनाव होने जा रहे हैं और सर्वे के मुताबिक बीजेपी सरकार में लोगों के भरोसे में 2022 के मुकाबले कोई बदलाव नहीं हुआ है. 76 अंकों के साथ भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर है.
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विकासशील देशों में ज्यादा भरोसा
रिपोर्ट कहती है कि विकसित देशों में लोगों का भरोसा अपनी सरकारों में सबसे कम है जबकि विकासशील देशों में सबसे ज्यादा. अंकों में देखा जाए तो विकासशील देशों को 63 अंक मिले जबकि विकसित देशों को 49.
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मलयेशिया में भरोसा सबसे ज्यादा बढ़ा
इंडेक्स में देखा गया कि मलयेशिया में सरकार पर लोगों का भरोसा 2022 के मुकाबले 13 अंक बढ़ गया. सूची में चौथे नंबर पर मौजूद मलयेशिया में 2022 में आम चुनाव हुए थे और अनवर इब्राहिम प्रधानमंत्री बने.
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युनाइटेड किंग्डम में सबसे ज्यादा गिरावट
युनाइटेड किंग्डम में लोगों का भरोसा अपनी सरकार में सबसे ज्यादा 7 अंक गिरा और वह सूची में 13वें नंबर पर है. 11वें नंबर पर मौजूद अमेरिका में भी भरोसे में 3 अंकों की गिरावट देखी गई, जहां इस साल आम चुनाव होने हैं.
तस्वीर: James Manning/AP/picture alliance
आमतौर पर बदलाव नहीं
अगर वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो हर देश में औसतन 1,150 लोगों के सर्वे पर आधारित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि लोगों का सरकारों पर भरोसा ना बढ़ा है, ना घटा है बल्कि औसतन लोग अपनी सरकारों पर उतना ही भरोसा करते हैं, जितना वे 2022 में करते थे.
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बर्टल्समान फाउंडेशन के वरिष्ठ विशेषज्ञ हाउके हार्टमान ने कहा, "तानाशाही को बैलट बॉक्स के जरिए रोका जा सकता है.इसके लिए सिविल सोसायटी को चुनावों के पहले एकजुट होना होगा और चुनावों के बाद कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाना होगा.”
रिपोर्ट कहती है कि भले ही तानाशाही शासक बेहतर प्रशासन देने का दावा करते हैं लेकिन बीटीआई ने अपने अध्ययन में पाया है कि सक्षमता के मामले में सबसे निचले 45 देशों में तानाशाही प्रवृत्ति की हैं और वहां भ्रष्टाचार सबसे ज्यादा है. इनमें कंबोडिया से लेकर वेनेजुएला और जिम्बाब्वे तक वे तमाम देश शामिल हैं, जहां लोकतंत्र कमजोर हुआ है.