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जर्मनी: चांसलर मैर्त्स का मुश्किल पहला साल

क्रिस्टोफ श्ट्राक
६ मई २०२६

जर्मनी की मौजूदा सरकार ने अपना एक साल पूरा कर लिया है, लेकिन इस दौरान वह कई मोर्चों पर एक साथ जूझ रही है. अंदरूनी और बाहरी, दोनों तरह की चुनौतियों उसके सामने खड़ी हैं.

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चांसलर मैर्त्स यूरोप को एकजुट करने में बहुत सक्रिय हैं, लेकिन घरेलू मोर्चे पर कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं.तस्वीर: Christoph Hardt/Panama Pictures/picture alliance

क्या जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स इन दिनों बड़े बड़े इंटरव्यू इसलिए दे रहे हैं क्योंकि उनको सत्ता में आए एक साल हो गया है या फिर इसलिए कि जिस सत्ताधारी गठबंधन का वह नेतृत्व कर रहे हैं, वो मुश्किल में है? इस गठबंधन में मैर्त्स की पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू), उनकी सहयोगी पार्टी क्रिश्चियन सोशल यूनियन (सीएसयू) और सोशल डेमोक्रेट्स (एसपीडी) शामिल हैं.

मैर्त्स ने रविवार को सरकारी टीवी चैनल एआरडी को दिए इंटरव्यू में कहा कि सीडीयू और सीएसयू में उन समझौतों को लेकर असंतोष बढ़ रहा है जो गठबंधन बनाने के लिए किए गए. खुद चांसलर लोकप्रियता के मामले में अभी बहुत नीचे चल रहे हैं.

वैसे मुश्किलों की शुरुआत मैर्त्स के सत्ता संभालने से पहले ही हो गई थी. 6 मई 2025 को ही चांसलर के तौर पर उनकी नियुक्ति के वक्त ही इतिहास बन गया था. संघीय जर्मन गणराज्य के इतिहास में पहली बार चांसलर पद के उम्मीदवार को संसद में हुए पहले दौर के मतदान में बहुमत नहीं मिला. देश के दसवें चांसलर के तौर पर उनके नाम की मुहर लगाने के लिए सदन में दोबारा मतदान कराना पड़ा. उनके गठबंधन को भले ही महागठबंधन कहा जाता है, लेकिन वह इतना भी बड़ा नहीं है. उसके पास संसद में मामूली सा बहुमत है.

सुधारों का वसंत

बीते साल मई में हुए चुनावों के बाद गर्मियों में, मैर्त्स ने कहा था कि आने वाला वसंत 'सुधारों का वसंत' होगा. इसके तहत जर्मनी के सामाजिक कल्याण ढांचे, पेंशन, स्वास्थ्य, नर्सिंग केयर और अफसरशाही को घटाने के लिए बड़े पैमाने पर बदलाव होंगे. लेकिन आने वाले महीनों में इनमें से कुछ भी खास नहीं हो पाया.  

जिस पर तेजी से फैसला हुआ, वो था बुनियादी ढांचे और जलवायु तटस्थता के लिए 2045 तक 500 अरब यूरो के फंड पर सहमति होना. इसका मकसद रेल नेटवर्क के आधुनिकीकरण और नए पुलों के निर्माण जैसी परियोजनाओं को आगे बढ़ाना है, क्योंकि जर्मनी लगातार जर्जर हो चुके इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्या से जूझ रहा है.

हालांकि, एसपीडी से संबंध रखने वाले वित्त मंत्री और वाइस चांसलर लार्स क्लिंगबाइल और सीडीयू कोटे से अर्थव्यवस्था मंत्री काथेरीना राइषे के बीच सहयोग लगातार टकराव का कारण बना हुआ है. राइषे कई ऐसे कदमों के पक्ष में हैं जो एसपीडी के नेतृत्व वाली पिछली सरकार में आर्थिक नीति और जलवायु संरक्षण को जोड़ने वाले फैसलों को पलट सकते हैं. साथ ही, उनकी पार्टी में नागरिक उपयोग के लिए परमाणु ऊर्जा फिर से शुरू करने की बढ़ती मांग भी दिख रही है, जिसे 2011 के बाद अंगेला मैर्केल के नेतृत्व वाली सरकार ने चरणबद्ध तरीके से खत्म कर दिया था.

एआरडी और और जर्मन पत्रिका डेयर श्पीगल से बातचीत में ऐसा लगा कि मैर्त्स का मानना है कि गठबंधन में समझौते का ज्यादा बोझ सीडीयू/सीएसयू पर ही है. उन्होंने इसे "एक बड़े और एक छोटे साझेदार वाला गठबंधन” बताया और कहा कि इसमें समझौते जरूरी हैं, लेकिन "समझौते एकतरफा नहीं होते.”

स्वास्थ्य सुधार 

सरकार को एक साल पूरा होने से कुछ दिन पहले ही गठबंधन ने अपना पहला बड़ा पैकेज पेश किया, स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की योजना. हालांकि, इस पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है. अब इस प्रस्ताव पर संसद में कई महीनों तक चर्चा होगी, जहां बदलाव की पूरी संभावना बनी रहेगी.

DW की मुख्य राजनीतिक संपादक मिषाएला कुइफनर ने मैर्त्स के पहले साल के दौरान उनके कई दौरों और सार्वजनिक कार्यक्रमों को करीब से देखा है. उनके मुताबिक, मैर्त्स की धीमी शुरुआत पूरी तरह नकारात्मक नहीं रही. कुइफनर का कहना है कि उनके पहले साल ने जर्मनी को ज्यादा स्थिर नहीं, बल्कि ज्यादा केंद्रित बनाया है.

उनके शब्दों में, "जैसे मैर्त्स को अपने गठबंधन सहयोगियों और अपनी ही पार्टी के साथ समझौते की सीमाएं समझनी पड़ीं, वैसे ही जर्मनी ने भी यह महसूस किया है कि बिना संरचनात्मक सुधारों के हालात वैसे ही नहीं चल सकते.”

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विदेशी मोर्च पर मैर्त्स

मौजूदा विदेश नीति की चुनौतियों को देखते हुए जर्मन गठबंधन सरकार के लिए अहम मुद्दों पर एकजुट रुख दिखाना बेहद जरूरी हो गया है. बार-बार इस बात को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं कि कहीं यूरोपीय संघ कमजोर न पड़ जाए, नाटो का भविष्य खतरे में न आ जाए और अमेरिका-यूरोप साझेदारी पर असर न पड़े. अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का रवैया भी इन चिंताओं को और बढ़ा देता है.

चांसलर या उनके विदेश मंत्री के विदेश दौरे, चाहे यूरोप में हों या अन्य क्षेत्रों में, रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाते हैं. खासकर इसलिए भी, क्योंकि मैर्त्स के पहले साल पर ट्रंप की नीतियों का काफी असर रहा. नवंबर 2020 में सीडीयू नेता मैर्त्स ने विश्वास जताया था कि उनकी और ट्रंप की आपसी समझ "काफी अच्छी” रहेगी, हालांकि अब यह बात काफी पुरानी लगती है.

चांसलर मैर्त्स ने अपने पहले साल में तीन बार व्हाइट हाउस का दौरा किया. कुछ दिन पहले तक ऐसा माना जा रहा था कि वे उन गिने-चुने यूरोपीय नेताओं में शामिल हैं, जिनकी ट्रंप से सीधी बातचीत और बेहतर तालमेल है. हालांकि, अब ऐसा नहीं है. खासकर जब मैर्त्स ने ईरान युद्ध को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप के रवैये की खुलकर आलोचना की. उन्होंने कहा कि अमेरिकी सरकार के पास "कोई ठोस रणनीति नहीं” है और बातचीत में ईरान ने अमेरिका को "झुका दिया”.

इस पर राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल के जरिए कड़ी प्रतिक्रिया दी. ट्रंप ने कहा कि मैर्त्स को पता ही नहीं कि वह क्या कह रहे हैं और उन्हें अपने "टूटे हुए देश” पर ध्यान देना चाहिए. उन्होंने जर्मनी की आर्थिक स्थिति को भी खराब बताया. साथ ही, ट्रंप ने जर्मनी से 5,000 अमेरिकी सैनिकों की वापसी और यूरोप से आने वाली कारों और ट्रकों पर टैरिफ बढ़ाने की घोषणा की. इस कदम से पहले से दबाव झेल रहे जर्मन ऑटो उद्योग को एक और झटका लगा.

यह घटनाक्रम चांसलर मैर्त्स के लिए नई चुनौती बन गया, जो हाल तक यह कहते रहे थे कि उनकी ट्रंप से नियमित बातचीत होती है. कुछ महीने पहले उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति को जर्मनी के उस शहर में आने का निमंत्रण भी दिया था, जहां से उनके पूर्वज अमेरिका जाकर बसे थे. एआरडी को दिए इंटरव्यू में मैर्त्स ने ताजा तनाव को "कठिन” बताया और उम्मीद जताई कि "हम इससे निकल जाएंगे.” उन्होंने जोर देकर कहा कि "ट्रांसअटलांटिक संबंध हम सभी के लिए बेहद मूल्यवान हैं.”

जहां तक यूरोपीय संघ का सवाल है, मैर्त्स अनिश्चित हालात के बावजूद सकारात्मकता बनाए रखना चाहते हैं. उनका कहना है कि "यूरोप को एकजुट रखना” बेहद जरूरी है, और इसी विश्वास के चलते वह यूरोपीय संघ के देशों के लगातार दौरे कर रहे हैं, ताकि इस एकता को बनाए रखा जा सके.

राजनीति कीमत

फ्रीडरिष मैर्त्स ने ट्रंप की सीधी आलोचना की, इसमें DW की मुख्य राजनीतिक संपादक मिषाएला कुइफनर ने एक उभरता हुआ पैटर्न देखती हैं. उनके मुताबिक, , दरअसल जर्मन चांसलर को "अक्सर अपनी जुबानी चूक की बड़ी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ती है.”

अब सवाल यह है कि "क्या अकसर राजनीतिक ‘आत्मघाती गोल' करने चांसलर अपनी मानी हुई आर्थिक विशेषज्ञता को वास्तविक राजनीतिक कार्रवाई में बदल पाएंगे?” कुइफनर के लिए एक बात साफ है, "दुनिया के मौजूदा हालात को देखते हुए, जर्मनी और यूरोपीय संघ के लिए सबसे कम बर्दाश्त करने वाली चीज़ यही होगी कि जर्मन सरकार एक बार फिर से अस्थिर हो जाए या टूट जाए.”

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