ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क के मुताबिक जर्मनी ने पूरे साल के प्राकृतिक संसाधान मई के महीने में ही खत्म कर दिए हैं. पर्यावरण पर काम करने वाली संस्थाओं के मुताबिक ऐसा जीवाश्म ईंधन के अत्यधिक इस्तेमाल के कारण हुआ है.
आंकड़े बताते हैं कि अगर सभी लोग जर्मनी के लोगों की तरह प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करता रहा तो इंसानों को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए पृथ्वी जैसे तीन और ग्रहों की जरूरत पड़ेगी.तस्वीर: Marc Vorwerk/picture alliance
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आने वाली 10 मई तक जर्मनी उन सारे प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कर चुका होगा जो सैद्धांतिक रूप से पूरे साल चलने चाहिए थे. अंतरराष्ट्रीय संस्था 'ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क' के पारिस्थितिक शोधकर्ताओं के यह अनुमान लगाया है. यह संगठन सभी देशों के साथ-साथ पूरी पृथ्वी के लिए वार्षिक रूप से 'अर्थ ओवरशूट डे' की गणना करता है.
शोधकर्ताओं ने जर्मनी के बारे में यह भी कहा कि अगर पृथ्वी पर हर कोई जर्मनी की तरह प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग करे और उतनी ही कार्बन-डाइऑक्साइड उत्सर्जित करे, तो पृथ्वी की सालाना जैव-क्षमता साल की पहली तिहाई के भीतर ही समाप्त हो जाएगी.
जर्मन एसोसिएशन फॉर द एनवायरमेंट एंड नेचर कंजर्वेशन के अनुसार, जर्मनी मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन के अधिक इस्तेमाल के कारण बहुत अधिक प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग करता है. इसके मुख्य कारणों में औद्योगिक क्षेत्र, भवन निर्माण क्षेत्र, सड़क परिवहन और औद्योगिक पशुपालन शामिल हैं. संस्था ने कहा कि इस आदत के नतीजे लंबे समय से सूखे, भारी बारिश या शहरों में बढ़ती गर्मी के माध्यम से महसूस किए जा रहे हैं.
मई में ही साल भर के प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल के पीछे सबसे बड़ी वजह जर्मनी में जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपभोग है.तस्वीर: Ina Fassbender/AFP
संस्था के प्रमुख ओलाफ बान्ट ने कहा, "हमारी वर्तमान जीवनशैली और आर्थिक मॉडल टिकाऊ नहीं हैं. नवीकरणीय ऊर्जा की ओर रुख करने के बजाय, हम कोयले, तेल और गैस पर निर्भर रहना जारी रखे हुए हैं. बान्ट ने इस बात का भी जिक्र किया कि इसके उलट सौर और पवन ऊर्जा से बिजली, हीट पंप और हल्के, कॉम्पैक्ट और किफायती इलेक्ट्रिक गाड़ियां स्वतंत्रता, योजना सुरक्षा और जलवायु सुरक्षा प्रदान करेंगे."
2025 में, जर्मनी का 'अर्थ ओवरशूट डे' 3 मई को आया था, जो इस साल की गणना से एक सप्ताह पहले था. हालांकि, संगठन ने कहा कि ऐसा पिछले 12 महीनों में कम पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली का संकेत देने के बजाय, मुख्य रूप से अपडेट किए गए डेटा और गणना के तरीकों में बदलाव के कारण हुआ था. 2024 में भी मई की शुरुआत में ही जर्मनी ने सारे संसाधन इस्तेमाल कर लिए थे. तब कहा गया था कि अगर सभी लोग जर्मनी के लोगों की तरह प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करता रहा तो इंसानों को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए पृथ्वी जैसे तीन और ग्रहों की जरूरत पड़ेगी.
जर्मनी में इस साल के मार्च ने सूखे रहने के मामले में रिकॉर्ड बनाया बनाया है. जर्मन पर्यावरण मंत्री स्टेफी लेमके ने चेतावनी दी है कि सूखे की वजह से जंगल में आग का खतरा बढ़ने की आशंका है.
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जर्मनी में अब तक का सबसे सूखा मार्च
जर्मनी में इस बार वसंत ऋतु धूप से धुली हुई है और असामान्य रूप से सूखी भी. जर्मन मौसम विभाग के हालिया डेटा के अनुसार 1881 में सबसे पहले जलवायु का आकलन शुरू हुआ. तब से लेकर अब तक जर्मनी समेत कई अन्य यूरोपीय देशों में इस बार अभी तक का सबसे सूखा मार्च रहा. मिट्टी की ऊपरी परतों में पानी की मात्रा,खासकर उत्तर जर्मनी में, दीर्घकालीन न्यूनतम मात्रा से 20% तक कम है.
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सूखे का डटकर सामना कर रहे नन्हे पौधे
ये नन्हे पौधे कई महीनों से सूखे का डटकर सामना कर रहे हैं: लेकिन मार्च कभी इतना सूखा नहीं था. फरवरी में थोड़ी बहुत बारिश हुई. अप्रैल के महीने में भी पहले हफ्ते में बिल्कुल भी बारिश नहीं हुई, जिसकी उम्मीद नहीं की गई थी. जर्मन मौसम विभाग के मार्सेल श्मिट का कहना है कि आने वाले दिनों में भी “ज्यादा से ज्यादा” यहां वहां थोड़ी बहुत बूंदा-बांदी ही होगी
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एल्बे नदी भी सूखे का शिकार
एसोसिएशन ऑफ जर्मन सिटीज के प्रमुख हेल्मुट डेडी ने जर्मन नागरिकों से पानी बचाकर चलने की गुहार लगाई है. रिडाक्सियॉन नेट्सवर्क से बात करते हुए उन्होंने कहा, “जलवायु परिवर्तन दिन-ब-दिन और ज्यादा नजर आने लगा है.” हालांकि फिलहाल जर्मनी में पीने के पानी की कोई कमी नजर नहीं आ रही.
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तालाबों का पानी भी कम
स्विट्जरलैंड की सीमा पर स्थित लेक कॉन्स्टांस में पानी का स्तर पिछले कुछ समय से कम है. राइशेनाओ द्वीप पर अभी भी इतना पानी है कि ये जहाज वहां तैरते रहें, लेकिन लेक के एक और हिस्से जिसे उंटर सी कहा जाता है, वहां स्थित बंदरगाह पहले ही सूख चुका है. और लेक कॉन्स्टांस का सबसे छोटा द्वीप होय, जो तट से लगभग 100 मीटर दूर है, अब वहां पैदल चलकर भी पहुंचा जा सकता है.
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बारिश का इंतजार
नॉर्थ राइन-वेस्टफेलिया के ग्लाडबेक में किसान बर्न्ड इम विंकेल तस्वीर में दिखा रहे हैं कि उनकी जमीन कितनी सूख गई है. जर्मन किसान संघ के प्रमुख योआखिम रुकवीड ने कहा, "हम मौजूदा मौसम की स्थिति को लेकर चिंतित हैं. हमें बारिश का बेसब्री से इंतजार है.”
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हवा में धूल
जर्मन मौसम विभाग के आंद्रेयास ब्रोएमजर ने "इस समय के लिए मिट्टी में असामान्य रूप से कम नमी" की पुष्टि की है, लेकिन कहा है कि अभी भी गहराई में जाएंगे तो अच्छा खासा पानी मौजूद है. उन्होंने कहा कि अगर कुछ हफ्ते लगातार अच्छी बारिश हो जाये तो सूखे की दिक्कत से निपटा जा सकता है. "फिलहाल, हम ये मानकर नहीं चल सकते कि गर्मियों में बेशक सूखा पड़ ही जायेगा.”
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जंगल में आग लगने का खतरा बढ़ा
जर्मन मौसम विभाग के अनुसार, जंगल में आग लगने का खतरा काफी बढ़ गया है. यहां जाउरलांड के इलाके में, फायर ब्रिगेड ने दो दिनों के भीतर दो जगह बड़े पैमाने पर लगी आग पर काबू पाया है. सूखे ने पेड़ों को भी कमजोर कर दिया है, जिससे उन्हें कीटों के संक्रमण से बचने में मुश्किल आ रही है.
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जलवायु का गहराता प्रभाव
मंगलवार को पर्यावरण मंत्री स्टेफी लेमके ने कहा, "वसंत ऋतू के हिसाब से भी देखें तो इस समय बहुत सूखा पड़ रहा है.” उन्होंने आगे कहा, "कृषि और वानिकी समेत हम सभी जलवायु संकट के परिणामों को साफ तौर पर महसूस कर रहे हैं.” उन्होंने कहा कि अगर ऐसे ही सूखा पड़ता रहा, तो फसल प्रभावित हो सकती है.
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राहत की उम्मीद
पूर्वानुमानों में अगले हफ्ते के लिए अच्छी खबर है - कम से कम पश्चिमी जर्मनी के लिए. फ्राइबुर्ग और कोलोन जैसी जगहों पर बारिश होने की उम्मीद है, जिससे राइन नदी में पानी का स्तर बढ़ सकता है.
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ऐसा नहीं है कि सिर्फ जर्मनी के लोग ही संसाधनों का दोहन कर रहे हैं. कतर, लग्जमबर्ग, चीन, अमेरिका, कंबोडिया, सहित आधे से ज्यादा देशों की हालत इस मामले में गंभीर बनी हुई है. पर्यावरण पर काम कर रही संस्थाओं का यह भी कहना है कि ज्यादा प्राकृतिक संसाधन इस्तेमाल करने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि इससे लोगों का जीवनस्तर बेहतर हो रहा है. उदाहरण के तौर पर स्वीडन और जर्मनी में जीवन स्तर काफी समान है, लेकिन स्वीडन ने यह जर्मनी की तुलना में प्रति व्यक्ति 16% कम उत्सर्जन में हासिल की है.
अर्थ ओवरशूट डे वह तारीख है जब प्राकृतिक संसाधनों के लिए इंसानों की मांग उस मात्रा से अधिक हो जाती है जिसे पृथ्वी उस साल में दोबारा बना सकती है. आधिकारिक वैश्विक तारीख की घोषणा ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क 'विश्व पर्यावरण दिवस' के मौके पर करेगा जो हर साल पांच जून को मनाया जाता है.