शुरू हो चुकी है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में हथियारों की दौड़
८ जून २०२१
हथियारों की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की एंट्री हो चुकी है. और वे हमारे अंदाजे से कहीं ज्यादा तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं. हाल ही में एक युद्ध में यह दिखाई भी दिया.
तस्वीर: DW
विज्ञापन
दुनिया में हथियारों की नई दौड़ शुरू हो चुकी है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने हथियारों की दौड़ में बाकी सबको पीछे छोड़ दिया है. ये हथियार सेनाओं को ज्यादा तेज, ज्यादा स्मार्ट और ज्यादा सक्षम बना रहे हैं. लेकिन, बेकाबू होकर ये पूरी दुनिया के लिए खतरनाक भी साबित हो सकती है.
जर्मन विदेश मंत्री हाइको मास ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से चलने वाले हथियारों की दौड़ शुरू हो चुकी है. डीडब्ल्यू की नई डॉक्युमेंट्री ‘फ्यूचर वॉर्सः एंड हाउ टु प्रिवेंट देम' में हाइको मास ने कहा, "हम बिल्कुल इसके बीच में हैं. यह सच है जिसका सामना हमें करना ही होगा.”
रेस शुरू हो चुकी है
दुनिया के ताकतवर मुल्कों के बीच आर्टिफिशियल हथियारों की यह होड़ और दौड़ शुरू हो चुकी है. घातक हथियारों के बारे में संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के समूह के पूर्व अध्यक्ष अमनदीप सिंह गिल कहते हैं यह दौड़ सेनाओं के बीच ही नहीं बल्कि नागरिक जीवन में भी पैठ बना चुकी है. अमेरिका की ‘नैशनल सिक्युरिटी कमीशन ऑन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' की हालिया रिपोर्ट में भी यह बात काफी उभरकर आई है.
इस रिपोर्ट में युद्ध के नए परिप्रेक्ष्यों पर बात की गई है जहां एक एल्गोरिदम की दूसरे से लड़ाई की संभावना का जिक्र है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि संभावित विरोधी लगातार उन्नत हो रहे हैं इसलिए निवेश बढ़ाना होगा.
फ्रांस की सेना ने ड्रोन से लड़ने के लिए बाजों की फौज बनाई है. इसके लिए बाजों को बकायदा ट्रेनिंग दी जा रही है. आतंकवादी ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हीं को रोकने के लिए सेना ने यह कदम उठाया है.
तस्वीर: Getty Images/AFP/G. Gobet
खास तैयारी जन्म के पहले से ही
बाज के चार अंडों को ड्रोन पर रख कर ही उनमें से बच्चों के निकलने की प्रक्रिया पूरी कराई गई. पैदा होने के बाद भी बाजों को इन्हीं ड्रोन पर रख कर खिलाया जाता था. नतीजा यह हुआ कि वे ड्रोन से अच्छी तरह परिचित हो गए.
तस्वीर: Getty Images/AFP/G. Gobet
बाजों की ट्रेनिंग
पिछले साल जन्मे चार गोल्डेन ईगल यानी सुनहरे बाजों को सेना की निगरानी में ड्रोन से लड़ने के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है. इनके नाम हैं अथोस, पोर्थोस, अरामिस और डे आर्टांगनान
तस्वीर: Getty Images/AFP/G. Gobet
ड्रोन का पीछा
इन बाजों ने हरे घास के मैदानों में पिछले दिनों ड्रोन का पीछा किया और फिर चोंच के वार से उन्हें गिरा दिया, इस कामयाबी पर उन्हें पुरस्कार में मांस मिला जिसे उन्होंने उन्हीं ड्रोन के ऊपर बैठ कर खाया.
तस्वीर: Getty Images/AFP/G. Gobet
तेज रफ्तार
बाजों ने ड्रोन का पीछा करते हुए 20 सेकेंड में 200 मीटर तक की दूरी तय कर ली. फिर गोता लगा कर उसके साथ साथ ही घास के मैदान पर नीचे आ गए.
तस्वीर: Getty Images/AFP/G. Gobet
फ्रांस का डर
फ्रांस को पहले ड्रोन से डर नहीं लगता था, शहरों में और दूसरी जगहों पर भी वे अकसर उड़ान भरते थे लेकिन 2015 में ड्रोन को सैन्य ठिकानों और राष्ट्रपति के आवास के आसपास उड़ते देख सेना सजग हो गई.
तस्वीर: Getty Images/AFP/G. Gobet
आतंकवादी हमले
2016 में हुए आतंकवादी हमलों के बाद से फ्रांस खासतौर से चिंतित हुआ है. उसे डर है कि ड्रोन का इस्तेमाल आतंकवादी अपने मंसूबों के लिए कर सकते हैं और उसी से बचने के लिए बाजों को तैयार किया जा रहा है.
तस्वीर: Getty Images/AFP/G. Gobet
शिकारी बाज
तेज रफ्तार, तीखी नजर और चोंच के वार से हड्डियों को चूर कर देने की ताकत बाज को बेहतरीन शिकारी बनाते हैं. शिकार के लिए इनका इस्तेमाल सदियों से हो रहा है जो इस इंटरनेट दौर में भी जारी है.
तस्वीर: Getty Images/AFP/G. Gobet
शिकारी बाजों का अगला बैच
बहुत जल्द ही अगले बैच के लिए बाज के अंडों से बाज पैदा करने के लिए उसी प्रक्रिया को दोहराया जाएगा. बाज के नाखूनों और चोंच की रक्षा के लिए खास तरह के चमड़े के दस्ताने भी बनवाए गए हैं.
तस्वीर: Getty Images/AFP/G. Gobet
8 तस्वीरें1 | 8
चीन की नई पंचवर्षीय योजना में भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को शोध और विकास के केंद्र में जगह दी गई है और उसकी सेना पीपल्स लिबरेशन आर्मी भविष्य के ‘इंटेलिजेंटाइज्ड' युद्ध की तैयारी कर रही है. रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन ने तो 2017 में ही कह दिया था कि जो भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में नेतृत्व करेगा, वही दुनिया पर राज करेगा.
लेकिन सिर्फ ताकतवर देश ही इस क्षेत्र में तैयारी कर रहे हों, ऐसा नहीं है.
2020 के दूसरे हिस्से में जब दुनिया महामारी से जूझ रही थी, तब कॉकेशस इलाके में दो देश यद्ध में उलझ गए. अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच नागोर्नो-कराबाख के विवादित इलाके को लेकर हुआ युद्ध भले ही दो पड़ोसियों के बीच पुराना झगड़ा लगता हो, लेकिन जिन लोगों ने ध्यान से देखा, उन्हें परतों के नीचे कई दिलचस्प चीजें भी नजर आईं.
विज्ञापन
छोटे ड्रोन, बड़ा खतरा
यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरन रिलेशंस में ड्रोन युद्ध के विशेषज्ञ उलरीके फ्रांके कहते हैं, "मेरे विचार से नागोर्नो-कराबाख विवाद का सबसे अहम पहलू था छोटे ड्रोन का इस्तेमाल. ये स्वचालित सिस्टम होते हैं.”
एक बार छोड़ दिए जाने के बाद ये ड्रोन निशाने वाले इलाके के ऊपर उड़ते हैं और स्कैन करते हुए लक्ष्य को खोजते हैं. जब उन्हें लक्ष्य मिल जाता है तो पूरी ताकत से हमला करते हैं. फ्रांके कहते हैं, "इनका इस्तेमाल अलग-अलग तरीकों से पहले भी हुआ है लेकिन इस बार तो उन्होंने खुलकर बताया कि वे कितने फायदेमंद हैं. और यह समझाया कि इस सिस्टम से लड़ना कितना मुश्किल है.”
सेंटर फॉर स्ट्रैटिजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज की एक रिसर्च बताती है कि अजरबैजान को इस्राएली डिजाइन वाले करीब 200 ड्रोन के कारण बड़ा फायदा मिला. अजरबैजान के पास ऐसे चार मॉडल थे जबकि आर्मेनिया के पास सिर्फ एक.
विशेषज्ञ कहते हैं कि यह तो सिर्फ शुरुआत है. बहुत जल्द आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से चलने वाले हथियार सेनाओं के मुख्य हथियार होंगे और वे मौजूदा हथियारों से कहीं ज्यादा घातक होंगे.
रिपोर्टः रिचर्ड वॉलकर
इंसान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाले यातायात साधनों की दुनिया में एक नई खोज क्रांति ला सकती है. जानिए ड्रोन जैसे दिखने वाले वोलोकॉप्टर की खूबियां.
तस्वीर: e-volo GmbH
एक जर्मन कंपनी शहरी यातायात के नए युग में प्रवेश की तैयारी कर रही है. इसके आविष्कार दुनिया के पहले सर्टीफाइड मल्टीकॉप्टर में इंसान को उड़ाना चाहती है.
तस्वीर: e-volo GmbH
मल्टीकॉप्टर को केवल एक हाथ या यूं कहें कि केवल एक जॉयस्टिक से उड़ाया जा सकता है. निर्माता मानते हैं कि इस सरल कंट्रोल सिस्टम के कारण उड़ान में मानव त्रुटियों की संभावना कम होगी.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/U. Deck
इसमें ऑटोमेटिक आल्टीट्यूड कंट्रोल है जिससे वोलोकॉप्टर एक खास ऊंचाई पर बिना ड्राइवर के हाथ लगाए उड़ता रह सकता है. यह भविष्य में एयर टैक्सी के रूप में भी काम आ सकता है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/U. Anspach
दूसरे हेलिकॉप्टरों की ही तरह इसमें सीधी टेकऑफ और लैंडिंग होती है. मगर पायलटों के लिए वोलोकॉप्टर VC200 को उड़ाना सीखना बेहद आसान होगा.
तस्वीर: e-volo GmbH
इसमें रीचार्जेबल बैटरियां लगाई गई हैं जो पर्यावरण के लिहाज से एक अच्छी तकनीक है. बैटरी से चलने वाले टू-सीटर वोलोकॉप्टर में 20 से 30 मिनट लंबी उड़ान भरी जा सकती है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/U. Deck
इसे ई-वोलो कंपनी ने डिजायन किया है. फरवरी 2016 में जर्मन प्रशासन ने इसे एक बेहद हल्के एयरक्राफ्ट के तौर पर 'परमिट टु फ्लाई' भी दे दिया. टीम ने इसे बनाने की शुरुआत तीन साल पहले की थी.
तस्वीर: e-volo GmbH
इसे स्पोर्ट्स फ्लाइंग के लिए पहले ही सर्टिफिकेट मिल चुका है. हेलिकॉप्टर के ऊपर 18 रोटर लगे हैं जो बैटरी से चलते हैं. निर्माता इसे आज तक का सबसे इको-फ्रेंडली हेलिकॉप्टर बता रहे हैं.