एएफडी की तरफ क्यों आकर्षित हो रहा है जर्मनी का श्रमिक वर्ग
२७ मार्च २०२६
जर्मनी के राज्य राइनलैंड पैलेटिनेट में हाल में हुए चुनाव में ‘अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी' (एएफडी) पार्टी को बड़ी सफलता मिली है. उसे इस चुनाव में 19.5 फीसदी वोट मिले, जो पांच साल पहले हुए पिछले चुनाव के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है. दिलचस्प बात यह है कि यह आंकड़ा दो हफ्ते पहले एक अन्य राज्य बाडेन-वुर्टेमबर्ग के चुनाव में एएफडी को मिले वोटों से भी थोड़ा ज्यादा रहा. श्रमिक वर्ग और कम आय वाले मतदाताओं के बीच, एएफडी सबसे लोकप्रिय पार्टी बनकर उभरी है. इस समूह के 39 फीसदी लोगों ने इस पार्टी को वोट दिया.
जर्मनी की घरेलू खुफिया एजेंसियों ने इस पार्टी की कई क्षेत्रीय शाखाओं को ‘धुर-दक्षिणपंथी चरमपंथी' करार दिया है. फिर भी, पूरे जर्मनी में एक नया रुझान देखने को मिल रहा है. देश के पूर्वी हिस्सों में, जो पहले कम्युनिस्ट शासन (पूर्व पूर्वी जर्मनी) के अधीन थे और जहां एएफडी की पकड़ मजबूत है, अब वहां कारखानों में काम करने वाले लगभग आधे श्रमिक इस पार्टी को वोट दे रहे हैं. यह श्रमिक वर्ग ही इस विवादित पार्टी की ताकत बढ़ाने में सबसे बड़ा कारण साबित हो रहा है.
जब देश की अर्थव्यवस्था ठहरी हुई है और हजारों औद्योगिक नौकरियां जा रही हैं, तो ऐसे समय में राजनीतिक जानकार एएफडी की कामयाबी की एक बड़ी वजह बताते हैं: नौकरी खोने का डर और समाज में अपनी स्थिति कमजोर होने की चिंता. होहेनहाइम यूनिवर्सिटी के कम्युनिकेशन रिसर्चर फ्रांक ब्रेटश्नाइडर ने जर्मन पब्लिक ब्रॉडकास्टर ‘एसडब्ल्यूआर' को बताया, "एएफडी श्रमिक वर्ग के बीच मौजूद इन्हीं चिंताओं को न केवल हवा देती है, बल्कि उनका फायदा भी उठाती है.”
युद्ध, जलवायु परिवर्तन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण पैदा हुई कई मुसीबतों ने मिलकर लोकतांत्रिक समाज के लिए एक कड़ी परीक्षा जैसी स्थिति पैदा कर दी है. ऐसा सिर्फ जर्मनी में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है.
सोशल डेमोक्रेट्स के मतदाताओं को लुभा रही एएफडी पार्टी
जर्मनी की सेंटर-लेफ्ट ‘सोशल डेमोक्रेट्स' (एसपीडी) पार्टी दुनिया की सबसे पुरानी श्रमिक पार्टियों में से एक है. हालांकि, बीच में कुछ थोड़े समय को छोड़ दिया जाए, तो पिछले कई सालों से चुनावों में इस पार्टी का प्रदर्शन लगातार गिरता ही जा रहा है.
राइनलैंड पैलेटिनेट के हालिया चुनावों पर ‘इन्फ्राटेस्ट डिमैप' के सर्वे ने सोशल डेमोक्रेट्स के लिए निराशाजनक तस्वीर पेश की है. सर्वे में पाया गया कि 71 फीसदी लोगों का मानना है कि ‘अब एसपीडी साफ तौर पर श्रमिकों के पक्ष में खड़ी नजर नहीं आती है.'
एएफडी इस खाली जगह को भरने की कोशिश कर रही है. रिसर्चर ब्रेटश्नाइडर ने बताया, "यह पार्टी बड़ी चतुराई से लोगों के मन में बनी पुरानी धारणाओं का फायदा उठाती है. जैसे, बाकी पार्टियों के नेता असली दुनिया और उसकी समस्याओं से बिल्कुल कटे हुए हैं. एएफडी के प्रचारक लोगों से कहते हैं कि ‘सत्ता में बैठे लोगों को आपकी असल जिंदगी का कोई अंदाजा नहीं है, लेकिन हम आपकी तकलीफें समझते हैं.' यह बात मतदाताओं के मन को छू जाती है.”
जर्मनी में आर्थिक दबाव के बीच राजनीतिक ध्रुवीकरण गहराया
हैरानी की बात यह है कि श्रमिक वर्ग के लोग एएफडी को आर्थिक नीतियों, सामाजिक न्याय या नौकरियां पैदा करने के मामले में बहुत काबिल नहीं मानते. इसके बावजूद, वे ‘शरण एवं शरणार्थी नीति' और ‘अपराध के खिलाफ लड़ाई' को आर्थिक समझ से ज्यादा जरूरी मानते हैं. एएफडी ने अपने चुनाव प्रचार में इन्हीं मुद्दों को सबसे ऊपर रखा है. वे खुशहाली और सस्ते घरों जैसी जरूरतों को सीधे तौर पर प्रवासन से जोड़ देते हैं. वे प्रवासियों को जर्मन लोगों के रहन-सहन के लिए खतरे की तरह पेश करते हैं, जिससे लोगों में समाज में पिछड़ने का डर पैदा होता है.
यह बात उन प्रमुख अर्थशास्त्रियों की राय के बिल्कुल उलट है, जो मानते हैं कि जर्मनी की खुशहाली बनाए रखने के लिए प्रवासन बहुत जरूरी है. 2025 के एक विश्लेषण में, जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक रिसर्च (डीआईडब्ल्यू) ने यह निष्कर्ष निकाला कि प्रवासियों की बढ़ती संख्या में जर्मनी की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने और तेजी से आगे ले जाने की जबरदस्त क्षमता है.
अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है जर्मनी का सबसे पुराना दल एसपीडी
डीआईडब्ल्यू के अध्यक्ष मार्सेल फ्रात्जशर ने 2023 के अपने विश्लेषण में एक बड़ी बात कही. उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि एएफडी की नीतियों का सबसे बुरा असर उन्हीं लोगों पर पड़ेगा जिन्होंने उन्हें वोट दिया है. फ्रात्जशर के मुताबिक, यह पार्टी ‘अति नव-उदारवादी आर्थिक और राजकोषीय नीति' का समर्थन करती है. यह मुख्य रूप से सबसे ज्यादा कमाई करने वालों के लिए टैक्स में छूट देने की योजना बनाती है और सरकार की दखल को कम करना चाहती है. फ्रात्जशर ने साफ कहा कि जर्मन संसद ‘बुंडेस्टाग' में ऐसी कोई दूसरी पार्टी नहीं है जो सामाजिक लाभों में एएफडी से ज्यादा कटौती करना चाहती हो.
ट्रेड यूनियनों के साथ तालमेल
एएफडी अब श्रमिक संगठनों के साथ भी रिश्ते बनाने की कोशिश कर रही है. इसके लिए, वह ‘सेंट्रम' नाम के एक संगठन का समर्थन कर रही है. यह संगठन खुद को एक ‘वैकल्पिक' श्रमिक आंदोलन के रूप में पेश करता है, लेकिन इसे धुर-दक्षिणपंथी माना जाता है. यह जर्मनी की पुरानी और बड़ी ट्रेड यूनियनों, जैसे ‘आईजी मेटल' के प्रभाव को कम करने की कोशिश कर रहा है. पिछले कई सालों से यह बड़ी जर्मन कार कंपनियों की ‘वर्क काउंसिल' में अपनी जगह बनाने में जुटा है. जर्मनी में वर्क काउंसिल की भूमिका बहुत अहम होती है. ये कर्मचारियों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं और सार्वजनिक बहसों में इनकी बात का काफी महत्व होता है.
भले ही एएफडी की चुनावी सफलताएं कुछ और ही संकेत देती हों, लेकिन इन प्रयासों को अब तक केवल मामूली सफलता ही मिली है. जहां मर्सिडीज और फॉक्सवागन के अलग-अलग प्लांटों में बनी वर्क काउंसिल में सेंट्रम सीटें जीतने में कामयाब रहा, पर पूरे जर्मनी में चल रहे वर्क काउंसिल के चुनावों में उसे कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है. आज भी आईजी मेटल ही सबसे बड़ा विजेता बना हुआ है.
श्रमिकों के वोट पाने की होड़ के बीच, समाजशास्त्र के रिटायर्ड प्रोफेसर क्लाउस ड्योर ने खासकर वामपंथी पार्टियों से अपील की है. उन्होंने कहा है कि इन पार्टियों को श्रमिक वर्ग की असली मुश्किलों और उनकी जिंदगी की असलियत से फिर से गहराई से जुड़ना होगा. बर्लिन के अखबार ‘टागेसाइटुंग' से बात करते हुए डॉर ने कहा, "मेरा मानना है कि जिन श्रमिकों को हम फिर से अपने साथ जोड़ सकते हैं, उनकी संख्या इतनी कम भी नहीं है.”
ड्योर ने गौर किया कि जर्मनी में अब श्रमिकों का अपनी कंपनियों से पहले जैसा लगाव नहीं रहा. अब बहुत कम कर्मचारी ही अपनी कंपनियों के साथ जुड़ाव महसूस करते हैं. यहां तक कि मर्सिडीज और फॉक्सवागन जैसी पुरानी और बड़ी कंपनियों के कर्मचारियों के बीच भी यह बात देखने को मिल रही है. उन्होंने आगे कहा, "लेकिन एक चीज है जिससे लोग हर जगह जुड़ाव महसूस करते हैं और वह है उनकी मातृभूमि.” ड्योर का तर्क है कि वामपंथी पार्टियों को 'मातृभूमि' की इस सोच को एएफडी से वापस छीन लेना चाहिए.
यह लेख मूल रूप से जर्मन में लिखा गया था.