भारत में गूगल के डेटा सेंटर का भारी विरोध
११ अक्टूबर २०२६
आंध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम में गूगल के प्रस्तावित विशाल डेटा सेंटर को लेकर विरोध तेज हो गया है. एक तरफ भारत और आंध्र प्रदेश सरकार इसे डिजिटल भविष्य की दिशा में बड़ा कदम बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय समुदाय, किसान और सामाजिक कार्यकर्ता इसके संभावित प्रभावों को लेकर सवाल उठा रहे हैं. करीब 15 अरब डॉलर की लागत से बनने वाला यह केंद्र अमेरिका के बाहर गूगल की सबसे बड़ी डेटा सेंटर परियोजना माना जा रहा है. इसका निर्माण कार्य शुरू हो चुका है और परियोजना के लिए बड़ी मात्रा में जमीन अधिग्रहण किया गया है. सरकार का कहना है कि इससे निवेश बढ़ेगा, लेकिन स्थानीय स्तर पर लोगों में बड़ी चिंताएं हैं.
विशाखापट्टनम को इस परियोजना के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि यह समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबलों का महत्वपूर्ण केंद्र है. यहां से भारत का संपर्क कई अंतरराष्ट्रीय नेटवर्कों से जुड़ता है, जिससे डेटा ट्रैफिक को संभालना आसान होता है. राज्य सरकार लंबे समय से शहर को तकनीकी और डिजिटल निवेश के केंद्र के रूप में विकसित करना चाहती है. इसी रणनीति के तहत कई बड़ी तकनीकी परियोजनाएं यहां लाई जा रही हैं. अधिकारियों को उम्मीद है कि इससे भारत की डेटा सेंटर क्षमता बढ़ेगी और देश वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति मजबूत कर सकेगा.
भविष्य के संसाधन खत्म होने का डर
हालांकि परियोजना के विरोधियों का कहना है कि विकास की इस दौड़ में स्थानीय समुदायों की चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा. कई किसानों की कृषि भूमि अधिग्रहित की गई है. कुछ लोगों को मुआवजा मिला है, लेकिन उनका कहना है कि जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं होती. जमीन उनके जीवन, पहचान और आजीविका का आधार भी होती है. कई परिवारों को डर है कि परियोजना पूरी होने के बाद उनकी पारंपरिक आय के साधन खत्म हो जाएंगे. इसी वजह से इलाके में विरोध प्रदर्शनों और जनसभाओं का आयोजन किया जा रहा है.
सबसे बड़ी चिंता पानी के इस्तेमाल को लेकर है. डेटा सेंटरों को आमतौर पर भारी मात्रा में ऊर्जा और संसाधनों की जरूरत होती है. स्थानीय लोगों का कहना है कि कई इलाकों में पहले से जल संकट मौजूद है और भविष्य में स्थिति और खराब हो सकती है. ग्रामीणों का सवाल है कि जब आम लोग पानी की कमी झेल रहे हैं, तब इतनी बड़ी परियोजनाओं के लिए संसाधन कहां से आएंगे. हालांकि गूगल का कहना है कि केंद्र में उन्नत एयर-कूलिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे पानी की खपत कम होगी. इसके बावजूद लोगों की आशंकाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं.
स्थानीय लोगों को कुछ भी ना मिलने का डर
ऊर्जा की भारी जरूरत भी बहस का अहम हिस्सा बनी हुई है. डेटा सेंटर चौबीस घंटे काम करते हैं और उन्हें लगातार बिजली की जरूरत होती है. राज्य सरकार ने कहा है कि बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने की योजना बनाई गई है. अधिकारियों का कहना है कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नई क्षमता विकसित की जा रही है पर आलोचकों का तर्क है कि इतनी बड़ी परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए. उनका कहना है कि केवल आर्थिक लाभ देखकर फैसले नहीं किए जाने चाहिए.
रोजगार के दावों को लेकर भी अलग-अलग राय सामने आ रही है. गूगल का अनुमान है कि निर्माण चरण में हजारों नौकरियां पैदा होंगी और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ मिलेगा. राज्य सरकार भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन की बात कर रही है. लेकिन सामाजिक संगठनों का कहना है कि डेटा सेंटर अत्यधिक पूंजी आधारित उद्योग हैं और इनमें स्थायी नौकरियों की संख्या अपेक्षाकृत सीमित रहती है. उनका मानना है कि स्थानीय समुदायों को उतना लाभ नहीं मिलेगा, जितना निवेश के आंकड़ों से लग रहा है.
भारत के लिए बड़ा बैलेंसिंग एक्ट होगा ये डेटा सेंटर
विशाखापट्टनम में गूगल अकेली कंपनी नहीं है जो बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है. दूसरी तकनीकी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं भी यहां प्रस्तावित हैं. इसके कारण शहर में जमीन की कीमतों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है. रियल एस्टेट क्षेत्र इस बदलाव को अवसर के रूप में देख रहा है, जबकि कई स्थानीय लोग इसे बढ़ती असमानता का संकेत मानते हैं. विकास समर्थकों का तर्क है कि बड़े निवेश से पूरे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी, जबकि विरोधियों का कहना है कि लाभ और लागत का बंटवारा बराबरी से नहीं हो रहा.
फिलहाल विशाखापट्टनम भारत की तकनीकी महत्वाकांक्षाओं और स्थानीय संसाधनों के बीच संतुलन की परीक्षा बन चुका है. सरकार विकास, निवेश और डिजिटल भविष्य की बात कर रही है. दूसरी ओर नागरिक समूह पानी, पर्यावरण और स्थानीय अधिकारों की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं. आने वाले वर्षों में यह परियोजना केवल एक डेटा सेंटर की सफलता या असफलता से नहीं आंकी जाएगी. यह भी देखा जाएगा कि तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्थानीय समुदायों की जरूरतों के बीच संतुलन किस तरह स्थापित किया गया.