क्या हीटवेव आपकी नींद छीन रही है?
३० जुलाई २०२६
साल 2026 के जून की झुलसाने वाली गर्मीने पश्चिमी यूरोप में लोगों की रातों की नींद हराम कर दी. एक सर्वे के मुताबिक, ब्रिटेन में लगभग 65 फीसदी वयस्कों ने स्वीकार किया कि उन्हें सोने में परेशानी हो रही थी. इनमें से लगभग आधे लोगों की हर रात तीन या उससे अधिक घंटों की नींद कम हो गई.
इंसानी गतिविधियों के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन से पैदा हुई लंबी और झुलसा देने वाली गर्मियां लोगों की रातों का सुकून छीन रही हैं. दुनिया के अन्य क्षेत्रों की तुलना में सबसे तेजी से गर्म हो रहे यूरोप का तापमान वैश्विक औसत से दोगुने से अधिक तेजी से बढ़ रहा है, जिससे यह नींद की कमी का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है.
जून महीने में जर्मनी के सैक्सनी प्रांत में एक मौसम केंद्र ने रात का न्यूनतम तापमान 29.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया. इतना अधिक तापमान रात के समय भी भीषण गर्मी का संकेत देता है.
वैज्ञानिक संस्था वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन के अनुसार, कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से बढ़े जलवायु परिवर्तन की वजह से ऐसी बेहद गर्म रातें अब पहले की तुलना में 100 गुना अधिक होने लगी हैं.
जलवायु परिवर्तन का असर अब नींद पर
विशेषज्ञों का मानना है कि गर्मी के कारण होने वाली नींद की कमी, जलवायु परिवर्तन के उन छिपे हुए प्रभावों में से एक है, जो धीरे-धीरे लोगों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है.
दुनिया भर के रिसर्चरों की एक टीम ने पहनने योग्य उपकरणों और गद्दे के नीचे लगाए जाने वाले स्लीप ट्रैकर्स से लगभग 3.18 लाख उपयोगकर्ताओं की 16.5 करोड़ रातों के डाटा का अध्ययन किया. इस अध्ययन में पाया गया कि रात का तापमान 12 डिग्री सेल्सियस से बढ़कर 27 डिग्री सेल्सियस होने पर छह घंटे से कम सोने की संभावना लगभग 40 प्रतिशत बढ़ जाती है.
ऑस्ट्रेलिया की एडिलेड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर टाइ फर्गुसन के अनुसार, पर्याप्त नींद के बिना दिमाग सही ढंग से काम नहीं करता. उनका कहना है कि सात घंटे से कम सोने पर याददाश्त, एकाग्रता और भावनात्मक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. फर्गुसन जुलाई में प्रकाशित इस अध्ययन का हिस्सा नहीं थे, लेकिन वह जलवायु परिवर्तन के कारण नींद पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करते हैं.
फर्गुसन के मुताबिक, नींद की कमी मूड पर असर डालने के अलावा डायबिटीस, डिप्रेशन, दिल की बीमारी और मोटापे जैसी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ा सकती है.
मजबूत इम्यूनिटी और बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है नींद
सिंगापुर के नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता वेन चुबो कहते हैं, "मानव शरीर के लिए नींद उतनी ही जरूरी है जितनी भोजन और पानी." मार्च में प्रकाशित अपने अध्ययन में चू और उनके सह-शोधकर्ताओं ने बच्चों की नींद में कमी के पीछे जलवायु परिवर्तन की भूमिका तथा उसके संभावित आर्थिक प्रभावों का अध्ययन किया था.
डीडब्ल्यू से बातचीत में चुबो ने कहा, "नींद में आने वाली कमी वैज्ञानिकों को यह समझने का मौका देती है कि वातावरण के तापमान में धीरे-धीरे हो रही वृद्धि दुनिया भर के लोगों की सेहत और रोजमर्रा के जीवन को किस तरह प्रभावित कर रही है."
डेनमार्क की कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर केल्टन माइनर कहते हैं, "दिन के मुकाबले रात के समय तापमान अधिक तेजी से बढ़ रहा है." उनकी शोध टीम और वर्ल्ड स्लीप सोसाइटी ने गर्म होती दुनिया में नींद की कमी से निपटने के लिए एक वैश्विक स्लीप टास्क फोर्स बनाने की अपील की है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि रात का तापमान तेजी से बढ़ने के पीछे बादलों की अहम भूमिका है. दिन के समय वे सूरज की किरणों को लौटाते हैं, जबकि रात में गर्मी को अपने भीतर समेटकर धरती की सतह तक पहुंचाते हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार, बादलों के पैटर्न में हो रहे बदलाव ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभाव को और बढ़ा रहे हैं.
धीरे-धीरे गहराता नींद का संकट
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की पर्यावरणीय स्वास्थ्य विशेषज्ञ किम वान डालन के अनुसार, यह समस्या की अक्सर इसलिए अनदेखी हो जाती है क्योंकि इससे जुड़ा कोई बड़ा या अचानक दिखने वाला नुकसान नहीं होता. वान डालन हाल में प्रकाशित उस शोध की सह-लेखिका हैं, जो बताता है कि जलवायु परिवर्तन किस तरह लोगों की नींद को प्रभावित कर रहा है.
वान डालन चेतावनी देती हैं कि गर्म होती रातें समाज के कमजोर वर्गों के लिए विशेष चुनौती बन सकती हैं. कम नींद बच्चों की सीखने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है, जबकि बुजुर्गों और बीमार लोगों के शरीर पर अतिरिक्त स्वास्थ्य बोझ डाल सकती है.
दूसरी ओर चुबो का कहना है कि गर्म होती रातों के कारण नींद में कमी समाज के कई क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती है. उनके मुताबिक, इससे लोगों की कार्यक्षमता कम हो सकती है, सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि कम आय वाले लोग अधिक जोखिम में हैं, क्योंकि उनके घरों में अक्सर उचित वेंटिलेशन नहीं होता और वे एयर कूलिंग का खर्च नहीं उठा पाते.
रिसर्चर केल्टन माइनर के अनुसार, गर्म होती रातों का बोझ सबसे ज्यादा कमजोर तबकों पर पड़ता है. कम आय वाले देश और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदाय, नींद पर गर्मी के असर के प्रति तीन गुना तक अधिक जोखिम में हो सकते हैं. उनके मुताबिक, "गर्मी को बाहर रखने वाले साधन सब लोगों के पास नहीं हैं." यही कारण है कि सड़कों पर रहने वाले लोग, गर्म टेंटों में रह रहे प्रवासी, जेलों में बंद कैदी और छोटे बच्चों वाली माएं नींद की कमी की समस्या से अधिक प्रभावित होती हैं.
क्या हैं उपाय?
फर्गुसन का मानना है कि नेट जीरो उत्सर्जन हासिल होने के बाद भी गर्मी से जुड़ी नींद की समस्याएं तुरंत खत्म नहीं होंगी. तापमान सामान्य होने में लंबा समय लग सकता है. उन्होंने बताया कि पंखों और एयर कंडीशनर की उपलब्धता बढ़ाना, हल्के बिस्तरों का उपयोग, बेहतर घरों के डिजाइन और कम गर्मी सोखने वाले शहरी ढांचे लोगों की नींद की गुणवत्ता सुधारने में मदद कर सकते हैं.
इस बारे में वेन चुबो का कहना है कि बढ़ती गर्मी के प्रभाव को कम करने के लिए अधिक पार्क और हरियाली वाले क्षेत्र, ताप को लौटाने वाली सतहें तथा हवा के बेहतर प्रवाह वाली इमारतें जरूरी होंगी. इसके अलावा, हीटवेव के दौरान काम के घंटों में बदलाव करना भी लोगों को पर्याप्त नींद दिलाने में मदद कर सकता है.
वहीं माइनर का मानना है कि गर्म होती दुनिया में केवल दिन के तापमान पर नहीं, बल्कि रात की बढ़ती गर्मी पर भी ध्यान देना होगा. खासकर यूरोप में, जहां एयर कंडीशनिंग कम है, लोगों को बेहतर नींद दिलाने के लिए नई सोच और नई नीतियों को अपनाने की जरूरत होगी.