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राजनीतिसंयुक्त राज्य अमेरिका

जर्मन लोगों की नजर में अब अमेरिका "विश्व शांति के लिए खतरा"

थॉमस लाचान
१८ फ़रवरी २०२६

2016 में जर्मनी के लोगों का अमेरिका पर भरोसा रिकॉर्ड स्तर पर था. लेकिन आज हालात बिल्कुल उलट हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है, अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और उनकी कभी भी यू-टर्न लेने वाली नीतियां.

जर्मनी में कार्निवाल के दौरान ट्रंप पर तंज कसती झांकी
माइंत्स के कार्निवाल में भी ट्रंप के प्रति नाराजगी दर्शाती एक झांकीतस्वीर: Thomas Lohnes/Getty Images

साल 2009 में जब बराक ओबामा व्हाइट हाउस पहुंचे थे, तो जर्मनी में खुशी की लहर छा गई थी, जो कि आज के समय में किसी सपने जैसा लगता है. खासकर, जॉर्ज बुश के तनाव भरे दौर के बाद, इस नए अमेरिकी राष्ट्रपति पर जर्मनी का भरोसा आसमान छूने लगा था.

प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे के मुताबिक, 93 फीसदी जर्मनों को लगता था कि ओबामा "वैश्विक स्तर पर सही फैसले लेंगे.” रिकॉर्ड भरोसे का यह आंकड़ा आज तक टूट नहीं पाया है. यहां तक कि 2016 में उनके दूसरे कार्यकाल के अंत तक भी, 86 फीसदी जर्मन लोग ओबामा पर भरोसा जताते थे. उनके नेतृत्व में अमेरिका को भरोसेमंद साथी और आदर्श देश की तरह मान्यता दी जाती थी. यहां तक कि एडवर्ड स्नोडन के बड़े खुलासों के बावजूद यह भरोसा कायम था.

लेकिन 2016 में डॉनल्ड ट्रंप के पहली बार राष्ट्रपति बनते ही पूरा मंजर पलट गया. जर्मनी के लोगों का भरोसा धड़ाम से गिरा. उनके पहले कार्यकाल के अंत में हुए एक सर्वे में सिर्फ करीब 10 फीसदी लोगों ने कहा कि वह ट्रंप पर भरोसा करते हैं.

जो बाइडेन के दौर में भी ज्यादातर जर्मन लोग अमेरिका के साथ रिश्तों को सकारात्मक मानते थे. लेकिन पिछले साल जर्मन ब्रॉडकास्टर, जेडडीएफ के सर्वे ‘पॉलिटबैरोमीटर' में 73 फीसदी लोगों ने माना कि ट्रंप के शासनकाल में अमेरिका के साथ रिश्ते ‘खराब' हुए हैं.

अब तो हालात और अधिक बिगड़ गए हैं. ऑलेंसबाख इंस्टीट्यूट के नए सर्वे के मुताबिक, दो-तिहाई जर्मन लोग अमेरिका को रूस और चीन के साथ-साथ "दुनिया की शांति के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक” मानते हैं.

ओबामा के कार्यकाल में ज्यादातर जर्मनों को अमेरिका पर पक्का यकीन थातस्वीर: Markus Schreiber/AP Photo/picture alliance

भरोसेमंद सहयोगी नहीं रहा अब अमेरिका

अमेरिका की लोकप्रियता में आई गिरावट का सबसे बड़ा कारण खुद डॉनल्ड ट्रंप और उनके नेतृत्व में अमेरिका का अचानक बदला रुख है. जहां एक तरफ, लगभग उनके सभी पूर्ववर्ती राष्ट्रपति नाटो और यूरोपीय संघ को अपना अहम सहयोगी मानते थे और साझा हितों पर जोर देते थे. वहीं, ट्रंप के दौर में अमेरिका का रवैया बिल्कुल उल्टा हो गया है.

ट्रंप प्रशासन लगातार कहता आ रहा है कि यूरोपीय संघ के देशों को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए और इसके लिए सैन्य खर्च बढ़ाना चाहिए. साथ ही, ट्रंप बार-बार अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों को भी झटके दे रहे हैं. चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध का मुद्दा हो या फिर ग्रीनलैंड को "हथियाने” की उनकी धमकियां. जर्मनी, अब अमेरिका को एक भरोसेमंद साझेदार के बजाय एक अनिश्चित साथी के रूप में देखने लगा है.

यहां तक कि फरवरी 2024 में राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार के दौरान ट्रंप ने कहा था कि अगर वे फिर से राष्ट्रपति बनते हैं, तो जिन नाटो देशों ने अपनी रक्षा पर "पर्याप्त खर्च” नहीं किया है, उन पर अगर रूस हमला करता है, तो अमेरिका सुरक्षा नहीं देगा. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा था कि वे रूस को ऐसे नाटो देशों के खिलाफ "जो चाहे, वो करने के लिए प्रोत्साहित” कर सकते हैं.

इस तरह की बयानबाजी ने जर्मनी पर गहरी छाप छोड़ी है. अब यहां एक तिहाई से भी कम लोग मानते हैं कि अगर किसी यूरोपीय नाटो देश पर हमला होता है, तो अमेरिका उनकी सैन्य मदद करेगा.

 

आक्रामक आर्थिक नीतियों से जर्मन कंपनियां परेशान

अमेरिकी राष्ट्रपति के आक्रामक टैरिफ और उनकी आर्थिक नीतियों ने जर्मन कंपनियों पर भी गहरा असर डाला है. अब यूरोपीय संघ से आने वाले ज्यादातर सामान पर 15 फीसदी टैक्स लगाया जा रहा है, जबकि स्टील और एल्यूमिनियम पर 50 फीसदी तक शुल्क है. इसका सीधा असर जर्मन कंपनियों पर पड़ा है और 2025 में उनका अमेरिका को निर्यात पिछले साल के मुकाबले 9 फीसदी से ज्यादा गिर गया.

कोलोन स्थित जर्मन इकोनॉमिक इंस्टीट्यूट की एक स्टडी के मुताबिक, फरवरी से नवंबर 2025 के बीच जर्मन कंपनियों ने अमेरिका में अपना सीधा निवेश पिछले साल की तुलना में करीब 45 फीसदी कम कर दिया है. साथ ही, ग्रीनलैंड विवाद जैसे मुद्दों के बाद और ज्यादा टैरिफ लगाने की धमकियों से लगातार अनिश्चितता बनी हुई है.

सरकारी विदेश व्यापार एजेंसी, जर्मनी ट्रेड एंड इंवेस्ट में अमेरिका मामलों की विशेषज्ञ, रोलांड रोड ने कहा, "व्यापारिक हालात काफी बिगड़ गए हैं.” उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "पूरे साल जर्मन कंपनियों का मूड काफी खराब रहा है.” हालांकि, जर्मन कंपनियों ने अमेरिका के बाजार को पूरी तरह छोड़ा नहीं है, लेकिन सरकार की अनिश्चित और बदलती व्यापार नीतियों की वजह से वह फिलहाल बड़े निवेश करने से बच रही हैं.

आम विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ सेना इस्तेमाल कर रहे हैं ट्रंपतस्वीर: Noah Berger/AP Photo/picture alliance

अमेरिका जाने वाले पर्यटकों की संख्या घटी

यूरोप के बाद जर्मन यात्रियों के लिए अब भी अमेरिका सबसे लोकप्रिय जगह है. लेकिन इन दिनों कई जर्मन वहां छुट्टियां मनाने से हिचक रहे हैं. जिसकी बड़ी वजह अमेरिका की सख्त इमिग्रेशन नीतियां और कड़े एंट्री नियम बन रहे हैं. जनवरी से जुलाई 2025 के बीच करीब 7.8 लाख जर्मन पर्यटक अमेरिका गए, जो 2024 की तुलना में लगभग 12 फीसदी कम है.

एविएशन एक्सपर्ट हाइनरिष ग्रॉसबोंगार्ट ने जर्मन बिजनेस मैगजीन, विर्टशाफ्ट्सवोखे से कहा, "अमेरिका की छवि आजादी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रही है. छुट्टियां मनाने आए लोग लॉस एंजेलिस में नेशनल गार्ड की गश्त और प्रवासियों पर पड़ रहे छापे नहीं देखना चाहते हैं.”

साथ ही, लोगों में यह भी डर है कि अमेरिका आने वाले विदेशी पर्यटकों से पिछले पांच साल की सोशल मीडिया हिस्ट्री शेयर करने को कहा जा सकता है. इसके अलावा, जर्मन नागरिकों के अचानक हिरासत में लिए जाने या देश से बाहर भेजे जाने की खबरों ने भी लोगों को डरा दिया है. पिछले साल अमेरिका में छात्र एक्सचेंज प्रोग्राम के लिए आवेदन करने वालों की संख्या में भी बड़ी गिरावट आई है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसमें करीब 50 फीसदी तक की कमी आई है.

इन सब से यह साफ है कि जर्मनी में अमेरिका पर भरोसा काफी हद तक टूट चुका है. लेकिन पिछले 20 सालों को देखें तो यह भरोसा हमेशा के लिए खत्म नहीं होता. जॉर्ज डब्ल्यू बुश और ट्रंप के दौर में भरोसा बहुत कम था, लेकिन ओबामा और बाइडेन के समय यह फिर तेजी से बढ़ गया था. अगर व्हाइट हाउस में बदलाव होता है, या कम से कम वॉशिंगटन का यूरोप के प्रति रवैया थोड़ा दोस्ताना हो जाता है, तो संभव है कि ये विश्वास फिर से लौटे.

यूरोप अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित

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