क्या जर्मनी में कुशल कामगारों की कमी प्रवासन नीति की देन?
३० जनवरी २०२६
भारत के चेन्नई शहर की एक क्लास में करीब 20 नर्सें तेजी से जर्मन भाषा सीख रही हैं. उनके पास छह महीने हैं, ताकि वह कम से कम इतनी जर्मन सीख सकें कि जर्मनी जाकर काम कर सकें. जिसमें से एक नर्स, रामलक्ष्मी, बताती हैं कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. लेकिन इसके बावजूद उनके परिवार ने उनकी नर्सिंग की पढ़ाई के लिए कई हजार यूरो के बराबर का खर्च किया. पढ़ाई पूरी होने के बाद से ही उन्हें लगने लगा कि अब उन्हें अपने परिवार के लिए कुछ करना है.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "मेरा लक्ष्य विदेश में काम करना है.” वह कहती हैं, "मैं अपने परिवार को आर्थिक रूप से सुरक्षित करना चाहती हूं और अपना खुद का घर बनाना चाहती हूं.”
दक्षिण भारतीय राज्य, तमिलनाडु की सरकार स्थानीय बेरोजगारी से निपटने और वंचित परिवारों को वैश्विक अवसर पर मौका देने के लिए विदेशी भाषा सिखाने का खर्च उठाती है. इसके बाद निजी एजेंसियां भारतीय नर्सों को आगे चलकर उन्हें नौकरी दे सकने वालों से जोड़ने का काम करती हैं.
कामगारों की जरूरत
जर्मनी को इस समय कुशल कामगारों की बहुत जरूरत है. चूंकि, देश की तथाकथित ‘बेबी-बूमर' पीढ़ी अब रिटायर हो रही है और अगले कुछ सालों में श्रम बाजार से बिल्कुल बाहर हो जायेगी. साथ ही, जन्म दर भी काफी कम है. जर्मनी केअस्पतालों में नर्सों की कमी है, स्कूलों में शिक्षकों की जरूरत है और आईटी क्षेत्र सॉफ्टवेयर डेवलपर्स के लिए जूझ रहा है.
जर्मनी के न्यूरनबेर्ग स्थित रोजगार अनुसंधान संस्थान (आईएबी) के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि मौजूदा स्थिति को बनाए रखने के लिए जर्मनी को हर साल लगभग तीन लाख कुशल कामगारों को आकर्षित करने की जरूरत है. आईएबी के शोधकर्ता, मिषाएल ओबरफिश्टर ने डीडब्ल्यू से कहा कि अगर ये कामगार नहीं आए, तो जर्मनी में लोगों को ज्यादा घंटे काम करना पड़ेगा, देर से रिटायर होना होगा और उनके जीवन का स्तर भी गिर सकता है.
जर्मनी के लिए ‘गेस्ट वर्कर्स' कितने जरूरी
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी की अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से आगे बढ़ी. इस दौर को आज भी "आर्थिक चमत्कार” के नाम से याद किया जाता है. 1950, 1960 और 1970 के शुरुआती सालों में आर्थिक विकास इतना ज्यादा था कि जर्मनी को काम की जरूरत पूरी करने के लिए विदेशों से मजदूर बुलाने पड़े थे. जर्मनी ने इटली, ग्रीस, तुर्की और कई अन्य देशों के साथ आधिकारिक समझौते भी किए, ताकि वहां से लगातार कामगार आते रहे.
साल 1973 तक, जब यह नीति बंद की गई, तब तक करीब एक करोड़ 40 लाख लोग काम के सिलसिले में जर्मनी आ चुके थे. काम के सिलसिले में जर्मनी आने वाले इन कामगारों को "गास्टआर्बायटर” यानी गेस्ट वर्कर कहा गया. सरकार का मानना था कि वह कुछ साल काम करने के बाद वापस अपने देश लौट जाएंगे. लेकिन इनमें से कई लोग जर्मनी में ही रुक गए और यहीं अपना घर बसा लिया.
प्रशासनिक अड़चनें बढ़ा रही मुसीबत
आज जर्मनी को फिर से कुशल कामगारों की जरूरत है. लेकिन प्रवासियों को यहां काम करने में कई अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है.
ईरान की रहने वाली जहरा ने जर्मनी से अपनी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी की. लेकिन फिर भी उन्हें शुरुआत में यहां काम करने की अनुमति नहीं मिली. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "छात्र वीजा को वर्क वीजा में बदलवाने के लिए अपॉइंटमेंट मिलने में मुझे लगभग एक साल लग गए.”
जहरा, अपना पूरा नाम प्रकाशित नहीं करवाना चाहती हैं. वह बढ़िया जर्मन बोलती हैं, यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हैं और रिसर्च में काम करती हैं. इसके बावजूद, छह साल से भी ज्यादा समय से जर्मनी में रहने के बाद भी उन्हें स्थायी वर्क परमिट नहीं मिला है. हर बार नौकरी बदलने पर उन्हें अधिकारियों को सूचना देनी पड़ती है. जहरा कहती हैं, "कभी-कभी मैं सोचती हूं, क्या मैं सच में यहां रहना चाहती हूं?” वह सोचती हैं कि क्या उन्हें भी अपने कुछ दोस्तों की तरह कनाडा चले जाना चाहिए था, जिन्हें अब वहां की नागरिकता भी मिल चुकी है. उन्होंने कहा, "साढ़े छह साल यहां रहने के बाद भी मुझे यह सब झेलना पड़ रहा है.”
जर्मनी छोड़ने का फैसला क्यों कर रहे हैं कई प्रवासी?
जर्मनी के कोलोन शहर में रहने वाले प्रवासन कानून के विशेषज्ञ वकील ब्यॉर्न माईबाउम का कहना है कि जहरा का अनुभव कोई इकलौता मामला नहीं है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "दुर्भाग्य से, जर्मनी भर में यही स्थिति है.”
माईबाउम की कानूनी फर्म हर साल ऐसे लगभग 2,000 मामलों को संभालती है. इसमें वह आव्रजन प्रक्रियाओं को तेज कराने की कोशिश करते हैं. डॉक्टर से लेकर नर्स, इंजीनियर और ट्रक ड्राइवर भी उनके मुवक्किलों की सूची में शामिल हैं.
उनके अनुसार, सबसे बड़ी समस्या यह है कि प्रवासन कार्यालयों में कर्मचारियों की भारी कमी है. इस कारण आवेदकों को "कई महीनों या साल भर” भी इंतजार करना पड़ता है. उन्होंने कहा, "यह बेहद निराशाजनक है. और हमें दुनिया को यह संदेश नहीं देना चाहिए. (कामगारों को आकर्षित करने के लिए) हम एक वैश्विक होड़ में हैं.”
कुशल कामगार और शरणार्थी
जर्मनी के संघीय प्रवासन और शरणार्थी कार्यालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, लगभग 1.6 लाख विदेशी नागरिक ऐसे हैं, जिनके पास निवास परमिट है और जिन्हें कुशल कामगारों की सूची में गिना जाता है. लेकिन यह कार्यालय हाल के वर्षों में जर्मनी आए लाखों शरणार्थियों की शरण याचिकाओं को भी संभालता है. यह शरणार्थी सीरिया और यूक्रेन जैसे देशों में युद्ध और संघर्ष के कारण जर्मनी पहुंचे हैं. लेकिन डिजिटलीकरण की कमी के कारण जर्मनी में प्रशासनिक कामकाज बहुत धीमा है.
मुफ्त निवास का ऑफर देते जर्मन शहर
शरणार्थियों की संख्या में तेज बढ़ोतरी और उन्हें रोजगार से जोड़ने में सरकार की नाकामी ने आम लोगों के बीच प्रवासी नीति को लेकर असंतोष बढ़ा दिया है. इसका असर यह हुआ है कि अप्रवासी-विरोधी, दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी को समर्थन बढ़ा है.
पश्चिमी जर्मनी के राइनलांड-फाल्स राज्य के फालेनडार शहर में बीडीएच क्लिनिक में मरीजों की देखभाल के लिए कयलव्ली राजाविल अपने राउंड लगा रही हैं. यह अस्पताल न्यूरोबायोलॉजिकल रिहैबिलिटेशन में विशेषज्ञ है. यहां स्ट्रोक या दुर्घटना के बाद मरीजों को फिर से स्वस्थ होने में मदद की जाती है. राजाविल तमिलनाडु से हैं और उन्हें जर्मनी आए अभी कुछ ही महीने हुए हैं.
डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने बताया कि शुरुआत में जर्मन भाषा उनके लिए काफी मुश्किल थी. उन्होंने कहा, "लेकिन मेरे बॉस और सहकर्मियों ने मेरी और मेरे साथ वालों की काफी मदद की, वह हमारा सम्मान करते हैं.”
विदेशियों के प्रति बढ़ती नकारात्मकता चिंता का विषय
राजाविल उन लगभग 40 नर्सों में से एक हैं, जिन्हें इस क्लिनिक ने पिछले कुछ सालों में भारत और श्रीलंका से नौकरी दी है. इनमें से ज्यादातर की नियुक्ति रिक्रूटमेंट एजेंसियों के जरिए हुई है, जो हर सफल भर्ती के लिए क्लिनिक से लगभग 7,000 से 12,000 यूरो तक का शुल्क लेते हैं.
क्लिनिक के नर्सिंग स्टाफ के प्रमुख, यॉर्ग बीबराख का कहना है कि जर्मनी में विदेशियों के प्रति नकारात्मक माहौल, खासकर नस्लवाद की घटनाएं, यहां काम करने आने वाले भारतीयों के लिए एक गंभीर समस्या है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "अब हमसे राजनीतिक हालात और अलग-अलग पार्टियों के बारे में ज्यादा सवाल पूछे जाते हैं.” उनके मुताबिक, विदेश से आने वाले नए कर्मचारियों को जर्मनी में सहज महसूस कराना लगातार मुश्किल होता जा रहा है. बीबराख ने यह भी बताया कि घर की याद, परिवार से जुड़ी परेशानियां और नई संस्कृति में ढलने की चुनौती के कारण भी विदेशी कर्मचारी अक्सर अपने सामान्य दो साल के कॉन्ट्रैक्ट के बाद यहां रुकना नहीं चाहते.
भारत से प्रशिक्षित नर्सों को आकर्षित करने की वैश्विक होड़ में बने रहने के लिए बीडीएच क्लिनिक अब युवा भारतीयों के लिए अप्रेंटिसशिप कार्यक्रम भी पेश कर रहा है, जिन्होंने हाल फिलहाल में अपने देश में हाई स्कूल पूरा किया है. यह भर्ती प्रक्रिया को तेज कर सकता है, जिसमें आम तौर पर नौ महीने तक लग जाते है. इसके चलते जर्मनी में विदेशी योग्यता की मान्यता लेने की भी जरूरत नहीं होगी, जो कि वैसे ही एक जटिल है और जर्मनी के 16 संघीय राज्यों में अलग-अलग नियम होने के कारण और भी उलझ जाती है.
बीबराख का कहना है कि जर्मनी को युवाओं के लिए "ज्यादा आकर्षक” बनाने के लिए प्रवासन अधिकारियों को "तेजी” से काम करना होगा और कानूनों को अधिक से अधिक "एक समान” बनाना होगा. उन्होंने कहा, "हर कोई कहता है कि हमें कुशल कामगार चाहिए. लेकिन हम अब भी उस स्वागत पूर्ण संस्कृति से काफी दूर हैं, जहां सब कुछ सुचारू रूप से चलता है.”