तमाम सामाजिक और राजनीतिक प्रयासों के बावजूद भारतीय समाज में जातीय अहंकार और इससे जुड़ी बुराइयां अब तक नहीं मिट पायी हैं. अंतरजातीय विवाह को जातीय व्यवस्था की बुराइयों से निपटने में एक सक्षम हथियार माना जाता है. इसके बावजूद ऐसे विवाहों के प्रति समाज सहज नहीं हो पाया है. खासतौर पर दलित–गैर दलित विवाह को लेकर लगातार नकारात्मक खबरें आती रहती हैं.
दलित पिटते हैं, गाली खाते हैं और गोली भी: रिपोर्ट
'अच्छे नंबर लाने वाले' दलित लड़के की दो साल तक पिटाई
समाज में जाति व्यवस्था अभी भी मजबूत है. वर्ण व्यवस्था में अगड़ी मानी जाने वाली जातियों के बीच तो विवाह होने लगे हैं लेकिन अगड़ी जातियों के लोग निम्न मानी जाने वाली दलित-अछूत जाति में आज भी कोई रोटी-बेटी का संबंध नहीं करना चाहते. ‘दलित आदिवासी मंच' के माध्यम से अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करने के प्रयास में जुटे डॉ. अनूप श्रमिक का कहना है, "संविधान निर्माता डॉ. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने समाज से छुआ छूत मिटाने के लिए रोटी-बेटी के संबंधों पर खासा जोर दिया है.”
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के डाटा मुताबिक साल 2016 में दर्ज आपराधिक मामले बताते हैं कि उत्तर प्रदेश देश का सबसे असुरक्षित राज्य है. साथ ही शहरी क्षेत्रों में दलितों के खिलाफ होने वाले अत्याचार बढ़ रहे हैं
तस्वीर: Reutersरिपोर्ट मुताबिक, देश में सबसे अधिक गंभीर अपराध उत्तर प्रदेश में होते हैं. यहां महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या भी सबसे अधिक है. कुल अपराधों में उत्तर प्रदेश के बाद बिहार का नंबर आता है. लेकिन महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध उत्तरप्रदेश के बाद पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक होते हैं.
तस्वीर: Reuters/P. Kumarरिपोर्ट मुताबिक शहरी क्षेत्रों में दलितों पर होने वाले अत्याचार अब भी बना हुआ है. लखनऊ और पटना देश के दो ऐसे बड़े शहर हैं जहां ये अपराध सबसे अधिक है. इसके अलावा उत्तर प्रदेश और बिहार दो ऐसे राज्य हैं जहां दलितों के खिलाफ सबसे अधिक अपराध दर्ज किये गये हैं. तीसरे स्थान पर राजस्थान का नंबर आता है.
तस्वीर: picture-alliance/dpaशहरों की बात करें तो दलितों के खिलाफ अपराध में लखनऊ के बाद पटना और जयपुर का नंबर आता है. इसके बाद आईटी हब माने जाने वाले बेंगलुरू और हैदराबाद का स्थान आता है. बेंगलुरू को छोड़कर कर्नाटक में ये अत्याचार अन्य राज्यों के मुकाबले कम है.
तस्वीर: Imago/Indiapictureजाति आधारित अपराधों और अत्याचारों से जुड़े मामलों पर एनसीआरबी साल 2014 से डाटा जुटा रहा है लेकिन यह पहला मौका है जब ये आंकड़ें जारी किये गये हैं. ये रिकॉर्ड पुलिस द्वारा दर्ज किये गये मामलों पर आधारित है इसलिए संभव है कि जमीन पर हालात और भी खराब हो सकते हैं.
तस्वीर: Reutersशहरों में दलितों से जुड़ी आबादी के कोई आंकड़ें नहीं है इसलिए ये बता पाना कि शहरों में इन अपराधों का औसत क्या है, मुश्किल माना जा सकता है. सूत्रों के मुताबिक शहरों में दलित अत्याचार के अधिक मामले सामने का कारण है कि शहरों में रहने दलित अपने अधिकारों के प्रति अधिक वाकिफ हैं. वे अपराधों को दर्ज कराते हैं.
तस्वीर: Reutersएनसीआरबी का डाटा देश में बलात्कार जैसे अपराध की बेहद ही गंभीर तस्वीर पेश करता है. साल 2016 में मध्यप्रदेश में बलात्कार के सबसे अधिक मामले दर्ज किये गये. इसके बाद उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र का नंबर आता है.
तस्वीर: Reutersदिल्ली में हर घंटे 23 आपराधिक मामले दर्ज होते हैं. साल 2015 के मुकाबले इन मामलों में 15 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. आंकड़े मुताबिक देश में कुल दर्ज आपराधिक मामले में से 39 फीसदी मामले दिल्ली में दर्ज किेय गये.
तस्वीर: Getty Images/AFP/M. Sharma वैसे, सरकार ने भी समय समय पर अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करने के कदम उठाये हैं. 2013 से डॉ. अंबेडकर के नाम पर "स्कीम फॉर सोशल इंटीग्रेशन थ्रू इंटरकास्ट मैरिज” के तहत आर्थिक प्रोत्साहन राशि भी दी जा रही है. इस योजना के तहत यदि कोई गैर दलित किसी दलित लड़की से विवाह करता है तो सरकार उस जोड़े को ढाई लाख रुपये की मदद देती है. लेकिन अभी तक यह मदद सिर्फ तभी दी जाती थी जब दंपति की सालाना आय पांच लाख रुपये से कम हो. अब इस शर्त को हटा दिया गया है. डॉ. अनूप श्रमिक का कहना है कि अंतरजातीय विवाह के फायदे तो हैं लेकिन मुश्किलें भी कम नहीं है.
बदलता समाज
आधुनिकता की बयार कहें या शहरीकरण से उपजी नयी सामाजिक संरचना, लेकिन अब धीरे धीरे अंतरजातीय विवाह की स्वीकार्यता बढ़ रही है. शोध छात्रा प्राची भट्ट एक दलित युवक से शादी के बाद सुखद जीवन जी रही हैं. उनके पति हेमंत टोप्पो कहते हैं कि जाति को लेकर उनके परिवारों के बीच कोई दिक्कत नहीं हुई. वहीं पेशे से डेंटिस्ट डॉ. क्षिति पांडव और उनकी डेंटिस्ट पत्नी डॉ. यशा का भी अंतरजातीय विवाह को लेकर अनुभव अच्छा रहा है. क्षिति कहते हैं कि शुरूआती नाराजगी के बाद दोनों परिवारों ने उनकी शादी को स्वीकार कर लिया.
बॉम्बे हाई कोर्ट के अधिवक्ता रवि श्रीवास्तव कहते हैं कि परिवार की सामाजिक हैसियत में अंतर हो तो अधिकतर जोड़ों को समस्या आती है. उनके अनुसार, "शहरी शिक्षित मध्यम वर्ग के लोग कानून या पुलिस के चक्कर में फंसने की बजाय जोड़ों को अपने हाल मे ही छोड़ देते हैं.”
पंजाब की गिन्नी माही उभरती हुई गायिका हैं. लेकिन उनके गीत खास हैं जो भारत में जातिवाद पर चोट करते हैं और दलितों के हक की आवाज उठाते हैं.
तस्वीर: DW/A. Andre17 साल की गिन्नी का नाता पंजाब से है और अपने गीतों के जरिए वह निचली कही जाने वाली चमार जाति के लोगों के अधिकारों की आवाज को बुलंद कर रही हैं.
तस्वीर: DW/A. Andreमाही कहती हैं, "मैं चाहती हूं कि मेरी बिरादरी का मान बढ़े और उसे पूरी दुनिया में जाना जाए.”
तस्वीर: DW/A. Andreदलितों के मसीहा कहे जाने वाले डॉ. अंबेडकर को गिन्नी माही अपनी प्रेरणा मानती हैं और उन्हीं के पदचिन्हों पर चलना चाहती हैं.
तस्वीर: APयूट्यूब पर उनके वीडियो पसंद किए जा रहे हैं. सितंबर में ही उन्होंने दिल्ली में अपनी पहली परफॉर्मेंस दी, जिसे खूब पसंद किया गया.
तस्वीर: DW/A. Andreजागरूकता फैलाने के प्रयासों के बावजूद भारत में दलितों के साथ भेदभाव और हिंसा की खबरें अकसर आती रहती हैं.
तस्वीर: UNIदलित कार्यकर्ताओं का कहना है कि मुख्यधारा के मीडिया में उन्हें उचित स्थान नहीं दिया जाता. इसलिए इन दिनों दलितों की अपनी कई पत्रिकाएं और पत्र भी प्रकाशित हो रहे हैं.
तस्वीर: DW/A. Andreदलित विचारक चंद्रभान प्रसाद ने हाल में दलित फूड्स के नाम से खाद्य उत्पादों की एक सीरिज शुरू की है. वो दलितों में उद्यमशीलता बढ़ाने पर जोर देते हैं.
तस्वीर: Dalit Foodsगिन्नी माही कहती है कि दलितों पर होने वाले जुल्म बंद होने चाहिए. पंजाब में जनसंख्या अनुपात के हिसाब से दलितों की सबसे ज्यादा आबादी है.
तस्वीर: DW/A. Andre चुनौतियाँ
वहीं दलित युवती नेहा (बदला हुआ नाम) उच्च शिक्षित हैं और पेशे से शिक्षिका हैं. सवर्ण जाति के युवक से विवाह के अपने फैसले पर उन्हें पछतावा है. शादी को दु:स्वप्न बताते हुए वह कहती हैं, "जाति को लेकर लगातार अपमानजनक व्यवहार संबंधियों द्वारा होता रहा." वह कहती हैं कि कमाऊ पत्नी होने बावजूद नाकारे पति ने जाति सूचक ताने और मारपीट से जीना दूभर कर दिया. अपने आंसू पोंछते हुए वह बताती हैं कि उनका परिवार शादी के निर्णय के खिलाफ था. अब शादी के नाकाम होने पर साथ देने वाला कोई नहीं है.
समाजशास्त्री और रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. साहेबलाल का कहना है कि कमज़ोर आर्थिक हैसियत वाले दलितों के लिए जाति जोंक की तरह है जो एक बार चिपक जाती है तो उम्र भर पीड़ा देती है. आधुनिक सोच और प्रगति के बाद भी दलितों के साथ रोटी-बेटी के संबंध आसानी से स्वीकार नहीं किये जाते.
जागरूकता की ज़रूरत
प्राची का कहना है कि शिक्षा और जागरूकता के जरिये ही जातीय बंधन को तोड़ा जा सकता है. आर्थिक प्रोत्साहन से ज्यादा सुरक्षा को महत्वपूर्ण बताते हुए प्राची कहती हैं कि आर्थिक लाभ के लालच में हुए विवाह की परिणिति सुखद नहीं होगी. केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्य मंत्री और महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़े दलित चेहरा रामदास अठावले भी जातिगत बाधाएं तोड़ने में अंतरजातीय विवाह की वकालत करते हैं. उनका कहना है कि उन्होंने खुद एक ब्राह्मण लड़की से शादी की है जो जातिगत बाधाएं तोड़ने के लिए डॉ. अंबेडकर के विचारों के अनुरूप है. रामदास अठावले आर्थिक मदद और सरकारी प्रोत्साहन को उपयोगी मानते हैं.
बहरहाल जातिवाद के खात्मे में अंतरजातीय विवाह को उपयोगी मानने वालों की संख्या कम नहीं है, लेकिन इसकी स्वीकार्यता को व्यापक बनाने के लिए लोकप्रिय सामाजिक आंदोलन की जरूरत भी महसूस की जा रही है.
70 साल के दुर्गा कामी नेपाल के सबसे बुजुर्ग छात्र हैं. दलित होने की वजह से बचपन में उन्हें पढ़ाई का मौका नहीं मिला. फिर बाल बच्चों की जिम्मेदारियां आ गई. अब फुर्सत मिली है और दुर्गा ज्योति की तरह जगमगा रहे हैं.
तस्वीर: Reuters/N. Chitrakarमध्य नेपाल के फेडीखोला में रहने वाले 68 साल के दुर्गा कामी हर दिन स्कूल जाते हैं. 2001 में पत्नी के निधन के बाद दुर्गा सुबह घर का सारा काम काज अकेले करते हैं और फिर स्कूल के लिए तैयार होते हैं.
तस्वीर: Reuters/N. Chitrakarसाफ सुथरी यूनिफॉर्म पहनकर दुर्गा रोज कई किलोमीटर पैदल चलते हैं और स्कूल पहुंचते हैं. गांव से उनका स्कूल दूर है, इसके बावजूद दुर्गा हर दिन श्रीकाल भैरब हायर सेकेंडरी स्कूल जाते हैं. रास्ते में अक्सर उनकी मुलाकात अपने 14 साल के सहपाठी सागर थापा से भी होती है.
तस्वीर: Reuters/N. Chitrakarदुर्गा को पढ़ना लिखना बिल्कुल नहीं आता था. लेकिन स्कूल में दाखिला लेने के बाद अब दुर्गा 10वीं पढ़ रहे हैं. वह बोर्ड का पर्चा भर चुके हैं. टीचरों के मुताबिक बुजुर्ग छात्र काफी मन लगाकर पढ़ाई करते हैं. अगर कुछ समझ में नहीं आता तो वे बेझिझक दूसरे बच्चों और टीचरों से पूछते हैं.
तस्वीर: Reuters/N. Chitrakarस्कूल के प्रिंसिपल और बाकी टीचरों को भी दुर्गा को देखकर बेहद खुशी होती हैं. दुर्गा की उम्र कई टीचरों के पिता के बराबर है. लिहाजा क्लास में उनके साथ एक बेहद भावुक नाता बनता है.
तस्वीर: Reuters/N. Chitrakarइंटरवल के दौरान या खेलकूद के दौरान भी दुर्गा लोगों को हैरान करते हैं. बच्चों के साथ वॉलीबॉल सीखने के बाद अब वह गजब का वॉलीबॉल खेलते हैं. पहाड़ी पगडंडियों पर चलने के लिए भले ही वह लाठी का सहारा लें लेकिन वॉलीबॉल खेलते हुए वह उम्र को काफी पीछे छोड़ देते हैं.
तस्वीर: Reuters/N. Chitrakar