ट्रंप की पार्टी की हार से भारत-अमेरिका रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा?
६ नवम्बर २०२६
अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने शानदार जीत हासिल की है. पार्टी ने कांग्रेस (अमेरिकी संसद) के दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है. ऐसे में डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाली रिपब्लिकन सरकार के कामकाज पर उनके कार्यकाल के बाकी समय में पहले से कहीं ज्यादा नजर रखी जाएगी.
ट्रंप को अपनी विवादास्पद विदेश नीति को लेकर विरोध का सामना करना पड़ सकता है. इस नीति के चलते अमेरिका ने अपने ज्यादातर सहयोगी देशों को नाराज कर दिया है और मध्य-पूर्व में एक और ऐसे युद्ध में उलझ गया जिसे जनता का समर्थन हासिल नहीं है. इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन ने वैश्विक मंच पर कई ऐसे कदम भी उठाए हैं, जो भले ही ज्यादा चर्चा में न रहे हों, लेकिन वे बेहद विवादास्पद हैं. इनमें भारत के साथ कई बार हुआ टकराव भी शामिल है.
भारत और अमेरिका के बीच संबंध अभी भी तनावपूर्ण हैं. इसके कई कारण हैं. मसलन, रुका हुआ व्यापार समझौता, आव्रजन (इमिग्रेशन) पर प्रतिबंध, और रूस से तेल और हथियार खरीदने को लेकर भारत से असहमति. हालांकि, मार्च 2026 में अमेरिका ने भारत को तेल प्रतिबंधों से छूट दी थी और अक्टूबर में ट्रंप ने रूस पर लगे कुछ प्रतिबंधों में भी ढील दी थी.
अमेरिकी कांग्रेस के नए सदस्य टैरिफ और आव्रजन जैसे मुद्दों पर ट्रंप पर दबाव बनाने का फैसला कर सकते हैं, लेकिन विदेश नीति के मामले में राष्ट्रपति के पास अब भी काफी अधिकार हैं.
ट्रंप के व्यापार प्रतिबंधों की समीक्षा कर सकती है कांग्रेस
व्यापार के मुद्दे पर ही भारत को लेकर ट्रंप की नीति की पहली परीक्षा होने वाली है. फरवरी में ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच अंतरिम व्यापार व्यवस्था पर सहमति की बात हुई थी, लेकिन भारत और अमेरिका ने अब तक इसे औपचारिक रूप नहीं दिया है. बाजार तक पहुंच और व्यापार संबंधी दूसरी प्रतिबद्धताओं को लेकर दोनों देशों में अभी भी सहमति नहीं बन पाई है.
स्वतंत्र शोध मंच ‘मांत्रया इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रेटेजिक स्टडीज' की संस्थापक शांथी मैरिएट डिसूजा का मानना है कि नई कांग्रेस ट्रंप सरकार की ओर से लागू किए गए ‘संरक्षणवादी उपायों की ज्यादा बारीकी से जांच' कर सकती है.
उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि अमेरिकी सांसद "व्यापार पर कड़ी निगरानी रखने और पर्यावरण तथा श्रम संबंधी मुद्दों के लिए स्पष्ट मानक तय करने” पर जोर दे सकते हैं. ऐसे में भारत को कुछ राहत मिल सकती है, क्योंकि अमेरिका उसका बड़ा निर्यात बाजार है.
उन्होंने यह भी कहा कि "भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी की बुनियाद मजबूत बनी रहने की संभावना है.” इसके अलावा, "दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को लंबे समय में और मजबूत बनाने की कोशिशें भी जारी रहने की उम्मीद है.”
‘समझदारी से काम नहीं करते हैं ट्रंप'
आव्रजन यानी इमिग्रेशन का मुद्दा एक अलग तरह की चुनौती पेश करता है. ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा के नियम सख्त कर दिए हैं. इसमें कुछ नए आवेदनों के लिए 1 लाख डॉलर (88,761 यूरो) का भुगतान अनिवार्य करना भी शामिल है. इससे भारतीय पेशेवरों और उन तकनीकी कंपनियों की चिंता बढ़ गई है, जो अमेरिका में नौकरी पाने के लिए इस वीजा कार्यक्रम पर निर्भर हैं.
डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत होने से इस मुद्दे पर भी सरकार की जांच-पड़ताल बढ़ सकती है. हालांकि, इससे ट्रंप के कार्यकारी आदेश के जरिए लागू किए गए फैसले अपने-आप वापस नहीं होंगे.
डॉनल्ड ट्रंप की ‘सुपर इंटेलिजेंस फोर्स’ क्या है और इसकी कमान किसके हाथ में है?
राजकृष्ण अय्यर, कैलिफोर्निया में लाइसेंस प्राप्त आव्रजन वकील हैं. उन्होंने कहा, "दोनों राजनीतिक दलों के सामने इससे भी बड़े मुद्दे हैं, जिन पर उन्हें ध्यान देना है. पिछले 25 साल से भी ज्यादा समय से कांग्रेस ने आव्रजन के मुद्दे पर कुछ नहीं किया है.” अय्यर का मानना है कि कानूनी तरीके से अमेरिका आने वाले प्रवासियों का मुद्दा मतदाताओं की प्राथमिकता में ज्यादा ऊपर नहीं है. फिर भी, वह मध्यावधि चुनावों के नतीजों को ट्रंप की आव्रजन नीतियों के खिलाफ एक संदेश के तौर पर देखते हैं.
अय्यर ने कहा, "एक समझदार राष्ट्रपति कानूनी तरीके से अमेरिका आने वाले लोगों पर और प्रतिबंध लगाने की कोशिश नहीं करेगा. लेकिन हम जानते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप विवेक से काम नहीं लेते.” आव्रजन मामलों के वकील अय्यर का मानना है कि कुछ एच-1बी आवेदनों के लिए लगाई गई नई और भारी फीस को अदालत में चुनौती दी जाएगी. वह कहते हैं, "इस बात की पूरी संभावना है कि ये नए नियम लागू ही नहीं होंगे. अगर लागू भी होते हैं, तो संघीय अदालतें इन्हें रद्द कर सकती हैं, क्योंकि ये फीस उचित नहीं हैं.”
अय्यर का तर्क है कि प्रशासनिक लागत और महंगाई को ध्यान में रखते हुए सरकार की कार्यकारी शाखा शुल्क बढ़ा सकती है. लेकिन इस तरह की भारी-भरकम फीस लोगों को कानूनी रूप से अमेरिका आने से हतोत्साहित कर सकती है. उन्होंने कहा, "इस तरह का कानून बनाने का अधिकार केवल कांग्रेस को है.”
रूस पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है अमेरिका
वॉशिंगटन में सत्ता का बदला हुआ संतुलन दुनिया के राजनीतिक समीकरणों पर भी असर डाल सकता है. इससे रूस को लेकर अमेरिका की नीति में भी बदलाव आ सकता है. हालांकि, यह कहना मुश्किल है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुमत वाली कांग्रेस, रूसी ऊर्जा खरीदने के मुद्दे पर भारत और अमेरिका के बीच चल रहे विवाद में कोई बदलाव लाएगी या नहीं. सितंबर में रूस पर प्रतिबंधों को लेकर कांग्रेस में हुए मतदान में बड़ी संख्या में डेमोक्रेटिक सांसदों ने रिपब्लिकन सांसदों का साथ देते हुए मॉस्को के खिलाफ व्यापारिक पाबंदियों का समर्थन किया था.
इस मामले पर डिसूजा कहती हैं, "रूसी तेल को लेकर अमेरिकी प्रशासन मॉस्को पर निर्भरता कम करने की अपनी प्राथमिकता बनाए रख सकता है. हालांकि, भारत के साथ संबंधों को खराब होने से बचाने के लिए वह इस मामले में सोच-समझकर कूटनीतिक कदम उठाएगा.”
पाकिस्तान को हथियार देने के कारण अमेरिका से नाराज है भारत
ईरान में जारी युद्ध से यह मामला और पेचीदा हो गया है. अगर तनाव और बढ़ता है, तो मध्य-पूर्व से होने वाले ऊर्जा निर्यात पर असर पड़ सकता है. इससे भारत की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, क्योंकि वह अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल आयात करता है.
अमेरिका और इस्राएल में भारत के राजदूत रहे नवतेज सरना ने मध्य-पूर्व में अमेरिकी नीति के भविष्य पर चर्चा करते समय सावधानी बरतने की सलाह दी. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "विदेश नीति के अलग-अलग मुद्दों पर इन चुनावी नतीजों के तत्काल असर का आकलन करना जल्दबाजी हो सकती है. काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि ट्रंप आगे क्या रुख अपनाते हैं.”
इसके साथ ही, सरना को लगता है कि वॉशिंगटन में अब ‘मतभेद और टकराव' बढ़ सकते हैं. भारत और अमेरिका के बीच विवाद वाले मुद्दों पर कांग्रेस की ओर से ट्रंप प्रशासन को अधिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है. वह आगे कहते हैं, "अगर इससे संतुलन और स्थिरता आती है और दोनों देशों के संस्थागत संबंध फिर से मजबूत होते हैं, तो यह भविष्य में हमारे रिश्तों के लिए बेहतर होगा.”
सुरक्षा सहयोग भी दोनों देशों के बीच तनाव की एक बड़ी वजह है. भारत अभी भी रूसी हथियारों का बड़ा खरीदार है. इससे अमेरिका नाराज रहता है. वहीं, पाकिस्तान को अमेरिकी हथियारों की आपूर्ति पर भी भारत ने आपत्ति जताई है. इसमें पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमानों के लिए आधुनिक सैन्य तकनीक की 68.6 करोड़ डॉलर की बिक्री भी शामिल है.
डिसूजा ने कहा, "पाकिस्तान को अमेरिका का सैन्य समर्थन अब भी एक जटिल मुद्दा है. हालांकि, क्षेत्र में लगातार बदलते हालात और स्थिरता को लेकर अमेरिका की चिंताओं के कारण उसकी नीति में शायद ही कोई बड़ा बदलाव देखने को मिले.”
भारत के प्रति अपनी नीति और सख्त कर सकते हैं ट्रंप
बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनाव के बाद अमेरिका का रुख पहले से ज्यादा स्थिर और अनुमान के मुताबिक होगा या डॉनल्ड ट्रंप और ज्यादा टकराव वाला रवैया अपनाएंगे.
राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप घरेलू मुद्दों पर समझौता करने की कोशिश कर सकते हैं. हालांकि, कांग्रेस के विरोध के जवाब में ट्रंप अन्य मामलों में अपना रुख और कड़ा भी कर सकते हैं.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के ‘स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज' के डीन, अमिताभ मट्टू ने डीडब्ल्यू से कहा, "हमें उम्मीद है कि चुनावी झटके के बाद ट्रंप अपने पिछले कदमों पर अधिक गंभीरता से पुनर्विचार करेंगे.” हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि भारत-अमेरिका संबंधों पर इसके असर का आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी.
मट्टू बताते हैं, "अगर ट्रंप को यह लगने लगे कि भारतीयों ने, खासकर प्रवासी भारतीयों के कुछ वर्गों ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनकी पार्टी की हार में भूमिका निभाई है, तो वे अपना रुख नरम करने के बजाय, भारत के प्रति और भी सख्त रवैया अपना सकते हैं.”
क्या अमेरिका और भारत के बीच सब कुछ पहले जैसा ही रहेगा?
‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन' (ओआरएफ) से जुड़े हर्ष पंत ने कहा कि रिपब्लिकन पार्टी को चुनाव में झटका लगने के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति के पास विदेश नीति को प्रभावित करने के काफी अधिकार हैं. साथ ही, भारत-अमेरिका साझेदारी को पारंपरिक रूप से दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों का समर्थन मिलता रहा है.
पंत ने डीडब्ल्यू को बताया, "मुझे नहीं लगता कि भारत उन मुद्दों में शामिल होगा, जिन्हें लेकर व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच टकराव हो सकता है.” हालांकि, उनका तर्क है कि पिछले दो वर्षों के अनुभव से यह बात और पुख्ता होती है कि भारत को किसी एक साझेदार पर अपनी निर्भरता कम करने की जरूरत है. पंत कहते हैं, "हमें अलग-अलग देशों के साथ साझेदारी बढ़ाने, कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनने और आपूर्ति के वैकल्पिक रास्ते तैयार करने की जरूरत है. ये सभी जरूरतें पहले जैसी ही हैं. अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से इन बातों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता.”