विटामिन डी की कमी को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है
प्रेरणा देशपांडे
२१ फ़रवरी २०२५
भारत में विटामिन डी की कमी को अब "मौन महामारी" कहा जाता है. इससे देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य और विकास पर लम्बे समय के लिए असर हो सकता है.
विटामिन डी की कमी भारत में एक बड़ी समस्या हैतस्वीर: Elena Safonova/Zoonar/picture alliance
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आत्महत्या के विचारों से पीड़ित लगभग 60 फीसदी लोगों में एक बात समान है: विटामिन डी की कमी. मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी की एक नई रिपोर्ट बताती है कि विटामिन डी की कमी को अब तक जितना माना गया था उससे ज्यादा हानिकारक हो सकती है. यह मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं और आत्महत्या की प्रवृत्तियों को और बढ़ा सकती है.
भारत दुनिया के उन देशों में से एक है जहां लोगों में विटामिन डी की कमी सबसे अधिक है. टाटा 1एमजी लैब्स के 2023 के आंकड़ों से पता चलता है कि हर चार में से तीन भारतीय, यानी करीब 76 फीसदी लोग, विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं. दुनिया में सबसे ज्यादा सूरज की रोशनी पाने वाले देशों में शामिल होने के बावजूद क्यों यहां "विटामिन डी" की कमी की समस्या इतनी बड़ी है?
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विटामिन डी की कमी बनी मौन महामारी
रिसर्च रिपोर्ट बताती है हमारी खाने-पीने की आदतें और संस्कृति से जुड़े कुछ तौर तरीके इसके लिए जिम्मेदार हैं. देश में ऐसे लोगों की संख्या बड़ी है जो मछली, अंडे की जर्दी और फोर्टिफाइड डेयरी जैसे विटामिन डी से भरपूर चीजों को अपने आहार में शामिल नहीं करते. इसके अलावा, पारंपरिक पहनावा भी अक्सर धूप को सीधे त्वचा तक पहुंचने नहीं देता. यह कमी पूरे देश में हुई है, लेकिन शहरों में स्थिति और गंभीर है. इसके कारण हैं प्रदूषण, बदलती जीवनशैलियां, सनस्क्रीन का बढता इस्तेमाल और सस्ते सप्लीमेंट्स की कमी. शहरी इलाकों में पर्याप्त धूप भी विटामिन डी के पर्याप्त स्तर में तब्दील नहीं होती क्योंकि लोग बाहर कम समय बिताने लगे हैं और हवा में प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है.
शराब पीने को लेकर किस देश में क्या चेतावनी दी जाती है
अमेरिका में शराब की बोतलों पर कैंसर की चेतावनी देने की जरूरत पर बहस चल रही है. अलग अलग देशों में शराब पीने को लेकर अलग अलग नियम हैं.
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ब्रिटेन
ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा कहती है कि एक हफ्ते में 14 यूनिट से ज्यादा शराब नहीं पीनी चाहिए. उसका यह भी कहना है कि "पीने का पूरी तरह से सुरक्षित कोई भी स्तर नहीं है, लेकिन इन दिशा निर्देशों के पालन से आपके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचने का जोखिम कम हो जाता है." इन दिशा निर्देशों के मुताबिक, कम शराब पीने के लंबी अवधि के फायदों में कैंसर के जोखिम का कम होना शामिल है.
तस्वीर: Benis Arapovic/Zoonar/picture alliance
फ्रांस
फ्रांस की स्वास्थ्य एजेंसी का कहना है कि वयस्कों को एक दिन में अधिकतम दो सामान्य ड्रिंक जितनी शराब पीनी चाहिए और हर रोज नहीं पीना चाहिए. एक हफ्ते में 10 से ज्यादा सामान्य ड्रिंक नहीं लेने चाहिए और हर हफ्ते शराब ना पीने वाले वाले दिन भी होने चाहिए. एजेंसी के मुताबिक शराब कैंसर का जाना माना कारण है और कुछ तरह के कैंसर होने का खतरा रोज एक ड्रिंक लेने से भी बढ़ जाता है.
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जर्मनी
जर्मन सेंटर फॉर एडिक्शन इशूज कहता है कि एक दिन में महिलाओं को 12 ग्राम से ज्यादा और पुरुषों को 24 ग्राम से ज्यादा शराब नहीं पीनी चाहिए. हर हफ्ते कम से कम दो दिन शराब से परहेज भी करना चाहिए. 2022 में सरकार के पैसे से हुए एक अध्ययन में दावा किया गया था कि शराब पीने से कई तरह के कैंसर हो सकते हैं.
तस्वीर: Tobias Schwarz/AFP/Getty Images
आयरलैंड
अगले साल लागू होने वाले नए नियमों के तहत आयरलैंड में बिकने वाले सभी शराब उत्पादों पर स्वास्थ्य से जुड़ी लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया गया है. इनमें कैंसर, लिवर की बीमारी आदि से संबंध और गर्भावस्था में पीने के जोखिम को लेकर चेतावनियां शामिल हैं. इस कदम का स्वागत करते हुए उस समय विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा था कि आयरलैंड शराब उत्पादों पर स्वास्थ्य से जुड़े लेबल देने वाला पहला देश बन जाएगा.
तस्वीर: Artur Widak/picture alliance/NurPhoto
लिथुआनिया
लिथुआनिया के कड़े नियम शराब पीने को लेकर किसी भी तरह के सार्वजनिक प्रोत्साहन को प्रतिबंधित करते हैं. यहां तक कि शराब के विज्ञापन भी नहीं निकाले जा सकते हैं. सरकार के नारकोटिक्स, टोबैको एंड अल्कोहल कंट्रोल बोर्ड की वेबसाइट पर एक बयान में शराब और कैंसर के बीच संबंध के बारे में बताया गया है. हालांकि इसमें कैंसर को लेकर स्पष्ट चेतावनी नहीं दी गई है.
तस्वीर: Pond5/IMAGO
नॉर्वे
नॉर्वे के स्वास्थ्य निदेशालय का कहना है कि शराब पीने का कोई सुरक्षित स्तर नहीं है और इसे "जितना हो सके उतना कम" पीना चाहिए. 2024 में जारी किए गए दिशानिर्देशों में निदेशालय ने कहा, "शराब पीना कैंसर के विकसित होने से जुड़ा हुआ है, विशेष रूप से स्तनों का कैंसर और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट का कैंसर."
तस्वीर: picture alliance/PantherMedia
स्पेन
स्पेन के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि शराब पीने से हमेशा ही जोखिम रहता है और "शराब को जितना कम पिया जाए उतना अच्छा." महिलाएं एक दिन में वाइन का आधा गिलास या बियर का छोटा गिलास पीएं तो जोखिम कम रहता है. पुरुषों के लिए यह सीमा एक दिन में वाइन का एक गिलास या बियर के दो छोटे गिलास है. मंत्रालय के मुताबिक जोखिम भरे सेवन से भविष्य में कैंसर या मानसिक रोग जैसी समस्याओं के होने की संभावना बढ़ती है.
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अमेरिका
अमेरिका में शराब आधारित ड्रिंक्स पर 1988 से एक स्वास्थ्य चेतावनी रहती है, लेकिन इसमें गर्भवती महिलाओं को सलाह दी गई होती है कि वो इन्हें ना पिएं. यह भी लिखा होता है कि शराब पीने से इंसान की गाड़ी चलाने और मशीनें चलाने की क्षमता पर असर पड़ता है. सीके/एनआर (रॉयटर्स)
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विटामिन डी का पर्याप्त स्तर सेहत के लिए बड़ा महत्वपूर्ण होता है, और इसकी कमी से प्रतिरक्षा तंत्र, उपापचय, हृदय स्वास्थ्य और समग्र स्वास्थ्य को लंबे समय तक नुकसान पहुंचा सकता है. चिंताजनक रूप से लोगों पर इसका बढ़ता असर और इसके बारे में कम जागरूकता होने की वजहों से भारत में विटामिन डी की कमी को अब "मौन महामारी" कहा जा रहा है.
दूसरी मौन महामारी
इस बीच, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) में आत्महत्याओं की बढ़ती घटनाओं के चलते, एक और मौन महामारी की आखिर कार देश के लिए नीतियां बनाने वालों का ध्यान गया है, यह है मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट.
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान (निमहांस) के रिसर्चरों की एक रिपोर्ट से पता चला है कि कॉलेज के छात्रों में अवसाद, चिंता और आत्महत्या के विचार परेशान करने वाले स्तर पर हैं. इस परिस्थिति से निपटने के लिए कई कदम उठाए गए हैं. इसमे शामिल हैं नेशनल वेलबीइंग कॉन्क्लेव जो केंद्र सरकार के जरिए हो रहा है. इसके अलावा कई और कार्यक्रम हैं जो आईआईटी ने शुरू कराए हैं.
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लेकिन और कोशिशें जरूरी हैं क्योंकि यह संकट काफी बड़ा है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो दशकों में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में 115 से ज्यादा छात्रों की आत्महत्या से मौत हुई है. आत्महत्या के विचारों में विटामिन डी की कमी की भूमिका पर आए नए आंकड़ों के मद्देनजर सवाल उठता है: क्या देश में चल रहीं दोनों मौन महामारियों के बीच कोई अंतर्संबंध हो सकता है?
आगे का रास्ता
विटामिन डी और समग्र मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध है, कम से कम यह बात तो अनुसंधान साफ दिखाता है. रिसर्चर यह सलाह देते हैं कि विटामिन के स्तर की नियमित जांच होनी चाहिए, और सस्ती सप्लीमेंट्स और भरपूर पोषण वाली खाने पीने की चीजें मुहैया कराई जानी चाहिए. रिसर्चरों का कहना है कि ऐसे कदम भारत में विटामिन डी की कमी पूरा करके देश के सार्वजनिक शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार ला सकते हैं. देश में चल रहे स्वास्थ्य की समस्याओं पर तुरंत कदम नहीं उठाए गए तो लंबे समय के लिए देश कि उत्पादकता और प्रगति पर भी इनका असर हो सकता है.