मकान बनाने के लिए सरकारी सहायता देने प्रधानमंत्री आवास योजना के अधिकारी जब उत्तराखंड में बुर्का पहनने वाली महिलाओं के बीच पहुंचे तो उन्हें एक अजीबोगरीब स्थिति का सामना करना पड़ा. पहचान के लिए फोटो खिंचानी थी लेकिन महिलाएं बुर्का हटाने को राजी नहीं थी. यही स्थिति घूंघट करने वाली महिलाओं के साथ भी थी.
राज्य के कुछ इलाकों में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीब परिवारों को पक्का घर बनाने के लिए एक लाख 60 हजार रुपये की राशि दी जा रही है, बशर्ते पहले से उनका कोई पक्का मकान न हो. मालिकाना हक परिवार की महिलाओं का होगा. भुगतान के बाद लाभार्थी की तस्वीर खींचकर जमीन के ब्यौरे के साथ प्रधानमंत्री आवास योजना की वेबसाइट पर डाली जानी है. लेकिन देहरादून, रुड़की और हरिद्वार में कई महिलाओं ने फोटो खिंचाने के लिए बुर्का उठाने पर कड़ा एतराज जताया है.
रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में 8120 लाभार्थी इस योजना के तहत चुने गए थे जिनमें छह हजार से अधिक लाभार्थी महिलाएं हरिद्वार, उधमसिंहनगर और देहरादून जिलों के मुस्लिम बहुल इलाकों से हैं. महिलाएं अड़ी रहीं तो बुर्का पहने महिला को हाथ में नाम की तख्ती पकड़ाकर उसे उसके प्लॉट पर खड़ा कर फोटो खींची गई. हर बुर्कानशीं महिला के साथ एक कर्मचारी भी फोटो के फ्रेम में रहेगा जिससे इस बात की तस्दीक होगी कि पहचान क्रॉसचेक कर ली गई है. वैसे अधिकारियों का दावा है कि गड़बड़ियों से बचने के तमाम अन्य तरीके भी इस्तेमाल में लाए गए हैं. लेकिन पहचान की उचित व्यवस्था का अभाव घोटालों को दावत दे सकता है.
आपने ऐसे घर शायद ही देखे हों. यूरोप के ये घर अजीब भी हैं और गजब भी. देखिए...
तस्वीर: DWउत्तर पश्चिमी जर्मनी के मार्ल में फोटोग्राफर जोड़े वनेसा स्टालबाउम और मार्को स्टेपनियाक का घर रेल के डिब्बों से बना है. ये डिब्बे 1970 के दशक के दौरान इस्तेमाल किए जाते थे.
तस्वीर: DWरहना वैसा ही लगे, जैसा रेल के डिब्बे में लगता है इसके लिए वनेसा और मार्को ने डिब्बे में कई चीजों को अपने लिए इस्तेमाल कर लिया है. जैसे कि लेटर ट्रे को अब कटलरी बना लिया गया है.
तस्वीर: DWयह ग्रीनहाउस है जर्मनी के ड्रेसडेन में. यहां मोनिका और थॉमस रहते हैं. वह इस घर में पिछले 20 साल से रह रहे हैं.
तस्वीर: DWघर के अंदर ही नर्सरी है. ग्रीनहाउस में ग्राहक भी आते हैं और पौधे ले जाते हैं. घर के अंदर नर्सरी है या नर्सरी के अंदर घर, बस वही जानते हैं जो इसमें रहते हैं.
तस्वीर: DWनीदरलैंड्स के द हेग का यह घर एक पुराना अनाज भंडार था. आर्किटेक्ट यान कोर्ब्स ने इसे दोमंजिला घर बना दिया. सिर्फ 13 वर्गमीटर में बेडरूम, किचन, बाथरूम सब है.
तस्वीर: Ishka Michockaयान यह संदेश देना चाहते थे कि सस्ते और पर्यावरण के अनुकूल घर बनाना संभव है. इसलिए उन्होंने हर चीज रीसाइकल की है. उन्होंने बस अग्नि सुरक्षा यंत्र खरीदे हैं. बाकी सब पुरानी चीजों से बना है.
तस्वीर: Ishka Michockaइस घर में कोई कोना ही नहीं है. बुलबुलों में कोना नहीं होता ना. घर में कई गोल इमारतें हैं जिनमें फ्रांस के जोएल उनाल का घर है. दक्षिण फ्रांस के आर्डेश इलाके में 1970 से बना यह घर स्टील और कंक्रीट से बना है.
तस्वीर: DWयह घर बनाने में उनाल और उनकी पत्नी को 36 साल लगे हैं. घर का हर कमरा दूसरे से जुड़ा है. ज्यादातर फर्नीचर खुद बनाया गया है. 2010 में इस घर को फ्रांस की राष्ट्रीय इमारत घोषित किया गया.
तस्वीर: DWदूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मन शहर जीगेन के इस बंकर में गोलाबारी से बचने के लिए 800 लोग तक छिप जाते थे. अब इसे अपार्टमेंट्स में तब्दील कर दिया गया है. बंकर की मोटी-मोटी दीवारों में खिड़कियां भी हैं.
तस्वीर: DW70 साल तक बंकर बस बंद रहा. लेकिन अब यहां सब खुला-खुला है, घर जैसा. इसमें आठ अपार्टमेंट हैं. एक पेंटहाउस भी है, विशाल छत वाला. और युद्ध के अंधियारे की सारी यादों को मिटा दिया गया है.
तस्वीर: DW प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 तक सबको मकान का आश्वासन दिया है. इसके लिए अगले छह सालों में करीब 2 करोड़ पक्के मकान बनाने का लक्ष्य है. एक समस्या यह भी है कि यह महात्वाकांक्षी लक्ष्य केंद्र सरकार ने तय किया है लेकिन इस पर अमल की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है जो इसे निजी उद्यमों की साझेदारी में पूरा करेंगे. सरकार ने इस साल के बजट में देहाती इलाकों में बेघर लोगों के लिए एक करोड़ मकान बनाने का प्रावधान किया है. सबके लिये मकान की वित्तीय व्यवस्था पर तो पहल हो रही है लेकिन अगर सरकारी मदद पाने वाले की फोटो पहचान पर कुछ नहीं किया गया तो यह भविष्य में भी समस्या पैदा करता रहेगा.
मुश्किल सिर्फ बुर्का पहनने वाली महिलाओं के साथ नहीं है, शहरी देहातों में घूंघट करने की रिवायत भी है और इसे मानने वाली महिलाएं भी अपनी फोटो खिंचाने से हिचकती हैं. पहाड़ी इलाकों में भी कई जगहों पर महिलाओं को पर्दे की ओट से निकालना दूभर हो जाता है. बहरहाल उत्तराखंड में तो अधिकारियों ने जैसे तैसे अपनी समस्या आप सुलझा ली लेकिन इससे बड़े फलक पर कई सवाल खुलते हैं जिन्हें अंतिम तौर पर सुलझा लेना शायद इतना आसान न हो. सबसे पहला सवाल तो ऐसी सरकारी योजनाओं से ही जुड़ा है कि इन्हें अमल में लाने की प्रक्रिया का एक गंभीर होमवर्क होना चाहिए. सवाल, लाभार्थी की पहचान के निर्धारण के सर्वमान्य और निर्विवाद तरीके का भी है.
चार दीवारों से घिरे घर से आगे भी लोगों ने अपने ठिकाने ऐसी अनोखी जगहों पर बसाए हैं जो सुनने में रहने लायक जगह तो नहीं लगते. देखिए ऐसी असामान्य लोकेशंस पर क्यों और कैसे बसे लोग.
तस्वीर: Carlo Carossio"ला फाब्रिका" - स्पैनिश आर्किटेक्ट रिकार्डो बोफिल ने अपने इस विला को यही नाम दिया है. यह इमारत पहले एक सीमेंट फैक्ट्री हुआ करती थी, जो बाद में बेकार उपेक्षित सी पड़ी थी. पिछले 30 सालों से भी ज्यादा समय से बोफिल अपनी पत्नी और बेटे के साथ अपने बनाए इस विला में रहते हैं. 5,000 वर्ग फीट से भी अधिक क्षेत्र में फैले इस विला में कई दफ्तर, एक लाइब्रेरी, एक शोरूम और कई सारे लिविंग रूम हैं.
तस्वीर: RICARDO BOFILL TALLER DE ARQUITECTURAदूसरे विश्व युद्ध के दौरान तमाम जर्मन शहरों में बंकर बनाए गए थे. लेकिन हवाई हमलों से बचने के लिए जर्मन शहर हैम्बर्ग में सबसे ज्यादा बंकर थे. युद्ध खत्म होने तक वहां करीब 1,000 ऐसे बंकर थे, जिनका कोई काम नहीं रहा लेकिन जिन्हें तोड़ा जाना भी कोई आसान काम नहीं था. तभी कुछ आर्किटेक्ट्स ने इन बंकरों की एक मीटर तक चौड़ी दीवारों को रहने लायक घरों में बदलने का मुश्किल काम किया.
तस्वीर: Imago/ecomedia/R. Fishmanजी हां, वही सिस्टर्न जहां पानी जमा किया जाता था. स्पेन के तटीय इलाके में स्थित कैनेरी द्वीप में बना यह सिस्टर्न एक समय खूब काम आता था. बाद में जब द्वीप पर स्थित गांव के घर घर में हर समय पानी आने लगा तो यहां पानी इकट्ठा करके रखने की जरूरत नहीं रही. तबसे बेकार पड़े इस सिस्टर्न को अभी कुछ ही साल पहले एक स्थानीय दंपति ओडा और यायो फोंटेस डि लियोन ने एक आरामदायक अपार्टमेंट की शक्ल दे दी.
तस्वीर: Rural Villasईंटें केवल सामने ही लगी हैं. जर्मन शहर उत्से में स्थित एक एयरप्लेन हैंगर को बदल कर अंदर एक आरामदायक 140 वर्ग मीटर का घर बसा दिया गया है. हां, बारिश होने पर इसकी धातु की प्लेटों की बनी छत पर शोर तो बहुत होता है, लेकिन बाकी समय शांति रहती है. 1990 के दशक में जब ब्रिटिश सेना इस इलाके को छोड़ कर गई तब यहां के तमाम हैंगरों को ऐसे ही दूसरे कामों में लाया गया.
तस्वीर: Glenn Garriockजब चर्च के पास खर्च के लिए धन ना हो तो वह क्या करे, इमारत किराये पर दे दे. लंदन में ऐसा करना खासा फायदेमंद होता है क्योंकि लंदन में प्रॉपर्टी के दाम काफी ऊंचे हैं. बहुत पॉश माने जाने वाले नॉटिंग हिल के पास स्थित इस वेस्टबॉर्न ग्रोव चर्च की दूसरी मंजिल एक लक्जरी अपार्टमेंट के रूप में बदली जा चुकी है. इससे होने वाली कमाई चर्च के काम आती है.
तस्वीर: Carlo Carossio प्रधानमंत्री आवास योजना की वेबसाइट बताती है कि इसका लक्ष्य जरूरतमंद परिवारों की आवासीय जरूरतों को पूरा करना है. प्रधानमंत्री मोदी ने जून 2015 में इस योजना की शुरुआत की. हालांकि इस बात की आलोचना भी की जाती है कि पहले से चली आ रही इंदिरा आवास योजना पर ही नया मुलम्मा चढ़ाया गया है. ऑनलाइन आवेदन पिछले साल नवंबर से शुरू किये गये. योजना के तहत शहरों में बनने वाले घरों पर नौ लाख के कर्ज पर ब्याज में 4 प्रतिशत और 12 लाख पर 3 प्रतिशत की छूट दी गई है. दो करोड़ से ज्यादा मकान बहुत ही सस्ती कीमतों पर दिये जाएंगे. आवास योजना को तीन चरणों में पूरा किया जाएगा. 2015 से मार्च 2017 तक के पहले चरण में 100 शहरों को कवर किया जाएगा. अप्रैल 2017 से मार्च 2019 के तीसरे चरण में 200 अतिरिक्त शहरों के नाम जोड़े जाएंगे. तीसरा चरण मार्च 2022 तक चलेगा जिसमें अन्य शहरों को जोड़ा जाएगा. 500 श्रेणी-1 के शहरों के साथ 2011 की गणना के हिसाब से 4041 कस्बे भी जुड़ेंगे.
प्रधानमंत्री आवास योजना अपने बुनियादी लक्ष्य में आकर्षक हो सकती है लेकिन क्या ये एक बड़ा झोल नहीं है कि एक ओर डिजिटल भारत का दम भरा जा रहा है और सार्वभौम पहचान की विराट आधार परियोजना लागू कर चुके हैं, तो दूसरी ओर अपनी अलग अलग योजनाओं के लिए शिनाख्त के अलग अलग पैमाने बना रहे हैं. यानी सरकारी योजनाओं और सरकार प्रदत सुविधाओं और व्यवस्थाओं में जुड़ाव का कोई तार नहीं है. आधार कार्ड के अलावा वोटर आईडी कार्ड और राशन कार्ड जैसी अन्य वैधानिक पहचान दस्तावेज भी तो हैं.
कभी कभी शहरों के बड़े प्रोजेक्ट में स्थानीय लोगों का ख्याल नहीं रखा जाता. लेकिन कुछ मामलों में बिल्डरों का ऐसे अड़ियल लोगों से पाला पड़ता है कि उन्हें ही हार माननी पड़ती है. देखें ऐसे ही कुछ प्रसिद्ध प्रॉपर्टी विवाद.
तस्वीर: Reutersउत्तरी ब्रसेल्स के हारेन जिले में एक बड़े जेल के निर्माण का प्रस्ताव आया. ऐसी कोई मेगाजेल अपने पड़ोस में ना चाहने वाले इसका विरोध कर रहे हैं. उन्होंने अगस्त 2014 से ही जेल के लिए प्रस्तावित जमीन पर डेरा डाला हुआ है. 18 हेक्टेयर जमीन में तंबुओं, झोपड़ियों के अलावा कई सामुदायिक बाग भी बस गए हैं. पुलिस के साथ कई झड़पें झेल चुके निवासी 2015 के अंत में इस पर अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे हैं.
तस्वीर: DW/M. Küblerवेनेजुएला की राजधानी काराकस शहर के बीचोबीच स्थित इस 45 मंजिलों वाली गगनचुंबी इमारत को झुग्गी मानना थोड़ा मुश्किल लगता है. दुनिया का सबसे ऊंचा यह स्लम 'टावर ऑफ डेविड' कहलाता है. 2014 में इसके निवासियों को निकाल दिया गया. एक समय इसमें करीब 3,000 लोग रहा करते थे.
तस्वीर: Reutersशीतयुद्ध के काल में बर्लिन के एयरलिफ्ट का केन्द्र रहा टेंपेलहोफ एयरपोर्ट 2008 में बंद हो गया. इसे सार्वजनिक पार्क के रूप में खोल दिया गया और लोगों ने इसे अपनी जगह मान लिया है. न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क जितनी बड़ी इस खुली जगह को ऐसे ही बरकरार रखने पर मई 2014 में वोटिंग हुई. भविष्य में यहां खेलकूद या ओपेन एयर सिनेमा के निर्माण की योजना है.
तस्वीर: Getty Images2010 में जब श्टुटगार्ट के मुख्य रेलवे स्टेशन के पुनर्निर्माण की योजना बनी तो हजारों लोग इसके विरोध में सड़कों पर आ गए. नई हाई स्पीड ट्रेनों के लिए ट्रैक तैयार करने के लिए श्लॉसगार्टेन इलाके में आसपास के करीब 180 पेड़ों को काटना पड़ता. भारी कीमत और पर्यावरण को नुकसान के विरूद्ध होने के बावजूद 2011 में हुए रेफरेंडम में 60 फीसदी लोगों ने प्रोजेक्ट का समर्थन कर दिया.
तस्वीर: picture-alliance/dpaचीन के तेजी से विकास करते शहरों में संघर्ष के कई ऐसे मामले हैं. रॉयटर्स के अनुसार, 2008 में बीजिंग ओलंपिक की तैयारी के दौरान करीब 15 लाख लोगों को विस्थापित किया गया था. आयोजक इसे बढ़ा चढ़ाकर बताई गई संख्या कहते हैं. कई मामलों में लोगों ने मुआवजा लेने से मना कर दिया, जिसका नतीजा ऐसा नजर आता है.
तस्वीर: Reuters2016 में रियो दे जनेरो में होने वाले ग्रीष्मकालीन ओलंपिक की तैयारी में वहां भी खूब निर्माण कार्य चल रहा है. एक खास ओलंपिक पार्क बनाने के लिए गोल्फ कोर्स (तस्वीर में) के अलावा विला ओटोड्रोमा फावेल समुदाय के लोगों को विस्थापित करना पड़ा. यहां के करीब 700 निवासियों ने मुआवजा स्वीकार कर लिया लेकिन कुछ अब भी पानी और बिजली की कमी के बावजूद यहीं रह रहे हैं.
तस्वीर: Getty Images/M. Stockman अगर सिंगल विंडो सिस्टम की बात होती है तो वह सिर्फ निवेश और कारोबार में ही क्यों हो, सरकार की योजनाओं और सामाजिक निवेश के कार्यक्रमों को भी इससे जोड़ना होगा. फिर सरकार को उस तरह की फजीहतों का शायद सामना न करना पड़े जैसा उत्तराखंड के कुछ इलाकों के बारे में फोटो खिंचवाने से संबंधित रिपोर्ट से पता चलता है. क्योंकि ऐसे समाज में जो अपनी सांस्कृतिक, रिवायती और वैचारिक बनावट में इतना मल्टीलेयर्ड और जटिल है, जिसका तानाबाना इतना गुंथा हुआ और बाहर से इतना उलझा हुआ दिख जाता है, वहां पहचान के किसी स्पष्ट नियम के बगैर, सरकारी अनुकंपा बांटने नहीं पहुंच सकते. घोटाले इन्हीं लूपहोल्स का तो इंतजार करते हैं.