पैकेटबंद पराठों और रोटी पर जीएसटी को लेकर चली बहस खत्म हो गई है और गुजरात की अपीलेट अथॉरिटी ऑफ एडवांस रूलिंग ने इस पर फैसला सुना दिया है.
पराठे पर 18 फीसदी जीएसटी तस्वीर: Saadeqa Khan/DW
विज्ञापन
फ्रोजन पराठों और रोटियों के बीच का फर्क उसपर लगाए जाने वाले वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी से समझा जा सकता है. गुजरात की अपीलेट अथॉरिटी ऑफ एडवांस रूलिंग (एएएआर) ने अपने फैसले में रोटी और फ्रोजन (या पैकेटबंद) पराठों के बीच का फर्क समझा दिया है. दरअसल वाडीलाल इंडस्ट्रीज ने एएएआर के सामने अपनी दलील रखी थी कि रोटी और पराठे में एक ही तरह की सामग्री का इस्तेमाल होता है यानी गेहूं के आटे का और इसलिए इसपर अधिक जीएसटी नहीं लगना चाहिए.
लेकिन एएएआर ने अपने आदेश में कहा है कि पराठे पर 18 फीसदी जीएसटी लगेगा और रोटी पर 5 फीसदी. एएएआर ने वाडीलाल इंडस्ट्रीज की दायर याचिका पर अपने आदेश को बरकरार रखा है. यह आदेश जून 2021 में पारित किया गया था. आदेश में कहा गया था कि पैकेटबंद पराठे को खाने से पहले 3-4 मिनट तक पकाना पड़ता है जब तक कि वह दोनों तरफ से गोल्डन ब्राउन न हो जाए और साथ ही ऐसे पराठों में आटे की मात्रा 36 से लेकर 62 फीसदी तक होती है.
लैंटर्न पहनकर खाएं खाना
टोक्यो के एक होटल का कोविड-सुरक्षित होकर खाना खाने का यह तरीका लोगों को खूब लुभा रहा है. देखिए, क्या है ‘लैंटर्न डाइनिंग एक्सपीरियंस’
तस्वीर: Kim Kyung-Hoon/REUTERS
कैसे हो कोविड से सुरक्षा
कोरोना के जमाने में रेस्तरां में सुरक्षित खाना भी बड़ी समस्या है. जापान में रेस्तरां में सोशल डिस्टेंसिंग के जो उपाय किए गए उनमें टोक्यो के शीबुया रेस्तरां में रोबोट की सेवाएं भी शामिल थीं.
टोक्यो के ओटेमाची इलाके में होशीनोया रेस्तरां में कोविड-सुरक्षित होकर भोजन करने के लिए एक और तरीका इस्तेमाल किया जा रहा है. ये तरीका है लैंटर्न की सुरक्षा में भोजन का.
तस्वीर: Kim Kyung-Hoon/REUTERS
सुरक्षा के लिए
खाना खाने वाले लोगों को ये खासतौर पर तैयार की गईं लैंटर्न पहना दी जाती हैं जो ग्राहकों को एक दूसरे से सुरक्षित कर देती हैं.
तस्वीर: Kim Kyung-Hoon/REUTERS
पारंपरिक अनुभव
ये लैंटर्न जापान के पारंपरिक दस्तकारों द्वारा तैयार की गई हैं. इस होटल को चलाने वाले होशीनोया परिवार की कोशिश अपने ग्राहकों को जापानी पारंपरिक अनुभव उपलब्ध करवाना है.
तस्वीर: Kim Kyung-Hoon/REUTERS
महंगा है अनुभव
होटल में रुकने वाले ग्राहकों को इस अनुभव के लिए लगभग 260 डॉलर (करीब 20 हजार रुपये) देने होते हैं. इस कीमत में कई तरह का खाना उपलब्ध है, जो पारंपरिक जापानी तरीकों से बनाया जाता है.
तस्वीर: Kim Kyung-Hoon/REUTERS
बल्ब भी है
हर लैंटर्न लगभग 75 सेंटीमीटर चौड़ी और 102 सेंटीमीटर ऊंची है. लैंटर्न के अंदर एक बल्ब भी लगा है जिससे बहुत सादी सी रोशनी चेहरे पर और खाने की प्लेट पर पड़ती है.
तस्वीर: Kim Kyung-Hoon/REUTERS
पर्यटक लगभग गायब
कोविड महामारी से पहले 2019 में लगभग 80 लाख पर्यटक जापान की राजधानी टोक्यो घूमने पहुंचे थे. पूरे जापान में पर्यटकों की संख्या तीन करोड़ से ज्यादा थी. 2021 में सिर्फ दो लाख 45 हजार 900 लोगों ने जापान की यात्रा की.
तस्वीर: (Kyodo News via AP/picture alliance
7 तस्वीरें1 | 7
एएएआर ने अपने आदेश में कहा, "चूंकि पैकेटबंद पराठे जिन्हें खाने से पहले गर्म करने की जरूरत होती है वह रोटी की तरह नहीं है और उसपर 18 फीसदी जीएसटी लगेगा. वहीं रोटी या चपाती पर पांच फीसदी जीएसटी लगेगा."
वाडीलाल इंडस्ट्रीज ने एएएआर में अपनी दलील में कहा था कि वह मालाबार, मिक्स वेज, प्याज, आलू और मेथी समेत सहित आठ किस्मों के पराठों का उत्पादन कर रही है और सब मुख्य रूप से आटा से बने हैं इसलिए इस पर चपाती के समान ही कर लगे.
एएएआर का कहना है कि रोटी रेडी टु ईट है जबकि पराठा रेडी टु कुक है. एएएआर के मुताबिक सादी रोटी या चपाती में मुख्य तौर पर गेहूं का आटा और पानी होता और इसे सीधे खा सकते हैं.
देश में जीएसटी को लागू हुए इसी साल जुलाई में पांच साल पूरे हो गए हैं लेकिन कई उत्पाद पर लगने वाले टैक्स को लेकर विवाद खड़ा होता रहा है.
एएएआर इसी साल एक और ऐसे ही मामले पर फैसला सुना चुका है. उस मामले में एएएआर को यह बताना पड़ा था कि अलग-अलग स्वाद और सुगंध वाले दूध और आम दूध में क्या अंतर है. एएएआर ने तब फैसला सुनाया कि फ्लेवर्ड दूध, सामान्य दूध से अलग है और इसलिए यह जीएसटी छूट का लाभ नहीं उठा सकता है. फ्लेवर्ड दूध पर जीएसटी के तहत 12 फीसदी टैक्स लगता है, जबकि दूध पर छूट है.
स्वाद बढ़ाने वाली चॉपस्टिक
दुनिया के कई देशों में खाना खाने के लिए चॉपस्टिक का इस्तेमाल होता है. जापानी वैज्ञानिकों ने ऐसी चॉपस्टिक बनाई हैं जो नमकीन स्वाद को बढ़ा देंगी. इसका स्वास्थ्य को भी फायदा होगा.
तस्वीर: Eskymaks/Zoonar/picture alliance
इलेक्ट्रॉनिक चॉपस्टिक
ये हैं इलेक्ट्रॉनिक चॉपस्टिक, जिन्हें जापान की मेजी यूनिवर्सिटी में होमेई मियाशिता ने एक निजी कंपनी किरीन होल्डिंग्स के साथ मिलकर बनाया है. ये कंप्यूटर आधारित चॉपस्टिक हैं जो नमकीन स्वाद को बढ़ा देती हैं.
तस्वीर: Issei Kato/REUTERS
स्वास्थ्य के लिए
वैज्ञानिकों का कहना है कि ये चॉपस्टिक उन लोगों के लिए खासतौर पर फायदेमंद होंगी जिन्हें स्वास्थ्य कारणों से सोडियम कम खाना है. उन्हें स्वाद भी आएगा और नमक भी नहीं खाना होगा.
तस्वीर: Issei Kato/REUTERS
कलाई पर कंप्यूटर
ये चॉपस्टिक प्रयोग करते वक्त कलाई पर बैंड बांधना होता है जो एक छोटा कंप्यूटर है. चॉपस्टिक खाने में सोडियम आयन चुनकर उनका स्वाद सीधे मुंह तक पहुंच देती हैं. इससे नमक का स्वाद डेढ़ गुना तक बढ़ जाता है.
तस्वीर: Issei Kato/REUTERS
चॉपस्टिक का इतिहास
पारंपरिक तौर पर बांस या लकड़ी की बनी मोटी तीलियों को चॉपस्टिक के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है. ये शांग वंश के साम्राज्य के दौरान 1766 से 1122 ईस्वी के बीच में चीन में विकसित हुईं और फिर पूरे पूर्व एशिया में फैल गईं.
तस्वीर: Jürgen Pfeiffer/Imago Images
जापान में चॉपस्टिक
कोरिया, वियतनाम और जापान में चॉपस्टिक 500 ईस्वी में पहुंचीं. पहले जापान में इनका इस्तेमाल सिर्फ धार्मिक क्रियाकलापों में होता था.
तस्वीर: Karl Allgaeuer/Zoonar/picture alliance
चॉपस्टिक के विश्वास
खाने के इस उपकरण के साथ बहुत से मिथक भी जुड़े हैं. जैसे कुछ लोग चांदी की चॉपस्टिक प्रयोग करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि अगर खाना जहरीला होगा तो ये चॉपस्टिक काली हो जाएंगी और उन्हें पता चल जाएगा. कुछ एशियाई देशों में कहा जाता है कि यदि आप गैर बराबर चॉपस्टिक प्रयोग करते हैं तो आपकी नाव या विमान छूट जाएंगे.