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मानसिक स्वास्थ्य पर मंडराते संकट को हल्के में लेता भारत

२५ मार्च २०२६

भारत सरकार ने माना है कि देश में मनोचिकित्सकों की उपलब्धता राज्यों के बीच काफी असमान है. मध्य प्रदेश में प्रति एक लाख आबादी के लिए सिर्फ 0.05 मनोचिकित्सक हैं, जबकि केरल में यह संख्या 1.2 है.

नई दिल्ली में मानसिक स्वास्थ्य का इलाज करने वाला एक क्लीनिक
तस्वीर: Manpreet Romana/AFP

"मुझे पिछले साल जुलाई में अमृतसर में स्थित एक निजी बैंक में नौकरी करने का अवसर मिला. मैं वहां अकेला रहता था. कुछ महीनों बाद ही मुझे गहरा अकेलापन महसूस होने लगा. काम और पढ़ाई में मेरा मन नहीं लग रहा था और बिना किसी कारण के थकान रहने लगी. शुरूआत में मैंने ध्यान नहीं दिया. एक दिन मुझे अपने आसपास आवाजें सुनाई देने लगीं. शरीर में झटके भी महसूस हुए. उसी वक्त मैंने तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेने का फैसला किया." यह कहानी दिल्ली के रहने वाले आयुष की है.

आयुष की तरह भारत में कई लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं. इसे लेकर समाज में मौजूद स्टिग्मा, जागरूकता और मनोचिकित्सकों की कमी के चलते उन्हें समय से इलाज नहीं मिल पाता. आयुष आगे बताते हैं, "मेरा मानसिक स्वास्थ्य इतना बिगड़ गया था कि मेरे घर में पड़ा कचरा सड़ने लगता, तब भी मैं उसे फेंकने के लिए बिस्तर से नहीं उठ पाता था. मैं अक्सर बहुत रोया करता. ऐसा तीन महीने तक चलता रहा. लक्षण काफी पहले ही महसूस होने लगते हैं. लेकिन सपोर्ट सिस्टम न होने की वजह से मैं उन्हें नजरअंदाज करता रहा."

आयुष स्थानीय निजी अस्पताल पहुंचे. वहां उन्हें हर हफ्ते काउंसलिंग सेशन दिया गया और दवाओं की मदद से उनके मानसिक स्वास्थ्य में सुधार आने लगा. लगभग डेढ़ महीने के बाद वह फिर से काम पर लौटकर सामान्य जीवन जी रहे हैं. लेकिन इस इलाज में उनका खर्चा भी बहुत हुआ. हर सेशन के उन्हें एक हजार रुपये देने पड़ते थे. हर महीने दवाइयों का बिल भी 2,000 से 3,000 रुपये था.

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आयुष ने बताया कि सरकारी अस्पताल केवल हेल्पलाइन नंबर देकर लौटा देते हैं. वहां पर्याप्त डॉक्टर भी नहीं हैं, जो मरीज पर पूरा ध्यान दे सकें. राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार भारत में आज हर 10 में से एक व्यक्ति मानसिक समस्या से लड़ रहा है. लगभग 90 प्रतिशत लोगों को सही इलाज नहीं मिलता.

हाल ही में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने लोकसभा में बताया कि पिछले पांच सालों में जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (डीएमएचपी) के लिए आवंटित बजट का केवल 47.5 प्रतिशत हिस्सा ही इस्तेमाल हुआ है. साल 2020-21 से 2024-25 के बीच केंद्र सरकार द्वारा 691.24 करोड़ रुपये मंजूर किए गए. जबकि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इसमें से सिर्फ करीब 328.27 करोड़ रुपये ही खर्च किए.

भारत में हर उम्रवर्ग के कई लोग मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैंतस्वीर: imago images/Depositphotos

फंड बढ़ा लेकिन काम नहीं

जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम या डीएमएचपी भारत सरकार के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत संचालित एक महत्वपूर्ण योजना है. इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को जिला और स्थानीय स्तर तक पहुंचाना है. इसके जरिए हर किसी को डिप्रेशन, एंग्जायटी और तनाव जैसी समस्याओं के लिए इलाज, काउंसलिंग और दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं. राज्य स्वास्थ्य मंत्री द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, डीएमएचपी के लिए हर साल बजट बढ़ाया गया है. लेकिन खर्च उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाया.

वित्त वर्ष 2020-21 में 84.13 करोड़ रुपये मंजूर किए गए, जिनमें से केवल 33.92 करोड़ रुपये ही खर्च हुए. 2021-22 में आवंटन बढ़कर 122.90 करोड़ रुपये हो गया, जबकि खर्च 59.78 करोड़ रुपये रहा. 2022-23 में 159.59 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए, जिनमें से 66.55 करोड़ रुपये खर्च हुए. उसके अगले ही साल 2023-24 में 168.95 करोड़  में से 85.65 करोड़ रुपये खर्च हुए. हालांकि 2024-25 में फंड कम कर दिया गया और 157.62 करोड़ रुपये आवंटित किए गए. इसमें से 82.39 करोड़ रुपये ही उपयोग में लाए गए.

स्नेही एक गैर सरकारी सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य संगठन है, जो साल 1994 से काउंसलिंग, सपोर्ट और रेफरल सेवाएं प्रदान करता आ रहा है. इसके निदेशक अब्दुल माबूद बताते हैं कि सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों में फंड का उपयोग कई स्तरों पर जांच और संतुलन के तहत होता है, जिससे पूरी प्रक्रिया काफी जटिल हो जाती है. डीएमएचपी के अंतर्गत, पैसा केंद्र और राज्य दोनों मिलकर देते हैं. अधिकांश राज्य सरकारों के पास या तो इच्छाशक्ति की कमी होती है या फिर अपने हिस्से का बजट देने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते और डीएमएचपी पर खर्च प्रभावित होता है.

संसद से धरातल तक आते आते कहां खो जाते हैं भारत के अहम मुद्देतस्वीर: Sanchit Khanna/Hindustan Times/Sipa USA/picture alliance

इस कार्यक्रम के लिए फंड आवंटन एक तय प्रक्रिया के जरिए होता है. सबसे पहले केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत राज्यों को कुल बजट मंजूर करती है. इसके बाद हर राज्य अपनी जरूरत के हिसाब से प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन प्लान (पीआईपी) बनाकर केंद्र को भेजता है. केंद्र सरकार इस प्रस्ताव की समीक्षा करती है और मंजूरी मिलने के बाद फंड जारी किया जाता है.

अब्दुल माबूद ने बताया, "केंद्र सरकार द्वारा दिया गया फंड तभी पूरी तरह इस्तेमाल किया जा सकता है जब राज्य सरकार अपनी तय हिस्सेदारी (शेयर) देती है. ऐसा न होने पर केंद्र से मिला पैसा पूरी तरह खर्च नहीं हो पाता और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में बाधा आती है."

वह आगे कहते हैं, 'भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं ज्यादातर शहरों तक सीमित हैं. इसलिए सपोर्ट सिस्टम भी मुख्य रूप से शहरी इलाकों में ही उपलब्ध है. इसके अलावा इलाज का खर्च भी काफी ज्यादा है. काउंसलर एक सत्र के लिए दो हजार या उससे अधिक फीस लेते हैं. जिसे लगभग 90 प्रतिशत लोग वहन नहीं कर पाते और इलाज बीच में ही रुक जाता है."

प्रगति के बावजूद रास्ता अभी भी चुनौतीपूर्ण

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (निमहांस) बेंगलुरु के पूर्व निदेशक बीएन गंगाधर से डीडब्ल्यू ने इस मुद्दे पर बात की. वह 1978 से सरकारी कार्यक्रमों में हुई प्रगति को देख रहे हैं. पिछले साल 6.8 लाख से अधिक मरीजों ने निमहांस आकर इलाज कराया. यह एक साल में सबसे अधिक संख्या है. वहीं 2022 में लॉन्च के बाद से भारत सरकार के फ्री हेल्पलाइन नंबर 'टेली-मानस' पर अब तक 34 लाख से अधिक कॉल्स दर्ज किए गए हैं. यानी जागरूकता बढ़ी है और लोग सामाजिक हिचक को पीछे छोड़कर अब मदद लेने के लिए आगे आ रहे हैं. यह सरकार के प्रयासों को दिखाता है.

डॉ गंगाधर बताते हैं, "आज करीब 700 से ज्यादा जिलों में डीएमएचपी चल रहा है. यह एक बड़ा बदलाव है. कोविड महामारी के बाद से सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य मिशन पर ज्यादा जोर दिया है और डिजिटल माध्यमों के जरिए सेवाएं पहुंचाने की दिशा में भी काम हो रहा है. अब अगला फोकस ट्रीटमेंट गैप को कम करने पर होना चाहिए. मरीजों और इलाज पाने वालों की संख्या के बीच अभी भी अंतर है."

मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने की जरूरततस्वीर: imago images/Pond5 Images

मनोचिकित्सकों की कमी एक गंभीर चिंता

भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित मानव संसाधन अभी भी आवश्यकता की तुलना में सीमित हैं. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग आठ हजार से दस हजार मनोचिकित्सक ही कार्यरत हैं. यानी एक लाख मरीजों के लिए 0.75 मनोचिकित्सक ही उपलब्ध है. जबकि वैश्विक औसत लगभग 1.3 है.

इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज (इहबास) में प्रोफेसर एवं मनोचिकित्सक डॉ ओम प्रकाश डीडब्ल्यू से बातचीत में कहते हैं, "मुख्य समस्या डीएमएचपी में प्रशिक्षित मनोचिकित्सक, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, साइकियाट्रिक सोशल वर्कर, नर्स और अन्य सहायक कर्मचारियों की कमी है. भारत में कुल मिलाकर लगभग दस हजार मनोचिकित्सक ही हैं. सरकार को अधिक संख्या में मनोचिकित्सकों को प्रशिक्षित करने और उनकी नियुक्ति पर ध्यान देना चाहिए."

डॉ ओम प्रकाश का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के साथ विशेषज्ञों के प्रशिक्षण पर भी निरंतर ध्यान देना होगा. स्नातकोत्तर स्तर (पीजी) पर प्रशिक्षण क्षमता बढ़ाने से भविष्य में अधिक विशेषज्ञ उपलब्ध हो सकेंगे. लोकसभा में प्रतापराव जाधव ने बताया कि उनका मंत्रालय 19 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े 47 पीजी विभागों को मजबूत करने में मदद कर रहा है.

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